Wednesday, May 25, 2011

सूरज की कविता - कविता से बाहर पाँव रखते हुए



कविता से बाहर पाँव रखते हुए


सुथरे निथरे दराज से चूहे निकलते हैं, डरे हुए दिमाग से दु:स्वप्न
फाईलें कागज से अटी पड़ी हैं,यादाश्त शब्दों से
दफ्तर के जँगले जिनके बाहर वो हरा है जो कविता नहीं,
भारी पत्थर है
समय की नस पर पड़ गया है.

दफ्तर नमक की तरह घुलता जा रहा है रक्त में
शुक्रग़ुजारी और एहसानफरोशी ने चोट की है रीढ़ पर
काम, जैसा भी है, अपना लगता है और जरूरी भी.

फुर्सत उस जमाने की कविता है
जहाँ पेड़ पर फल लगते थे
जिनसे रौशनी निकलती थी
प्रेम, शिक्षक की तरह, लाया कविता तक
विदा के वक्त प्रेम ने
कविता से लगे रहने का ध्यान धराया

आसान नहीं था कविता के बाहर पाँव रखना
जैसे उस मित्र का परित्याग था
जिसके साथ कदम दर कदम मिला पाने में असमर्थ हों.

वो शब्द सारे
जिनसे कविता की छत
और दीवाल गढ़ा करता था कवि
पड़े रहेंगे,
इनसे भयभीत है कवि या शर्मिन्दा
इसका ठीक ठीक अन्दाजा है मुश्किल,
जाग रहे समय का नहीं पता
पर शब्द हैं साथी
यह कवि भलीभाँति जानता है नीन्द में
जहाँ हर क्षण पलक वो कर रहा होता है
अपनी नई कविता का
आखिरी ड्राफ़्ट.

...............................................................सूरज की कविता

10 comments:

शशिभूषण said...

अच्छी कविता।

फुर्सत उस जमाने की कविता है
जहाँ आम पर फल लगते थे
जिनसे रौशनी निकलती थी
प्रेम,शिक्षक की तरह लाया कविता तक
विदा के वक्त प्रेम ने
कविता से लगे रहने का ध्यान धराया

यादगार लाइने हैं ये। शब्दों की कल्पनाशील गूँज।

दिपाली "आब" said...

hey
Its a beautiful poem.. Worth reading again n again.. Thanx chandan for sharing.

Vijaya Singh said...

Suraj ji ki kwita hmesha hi sahaj anubhutiyon ki anuthi ahivykti krti hai.AABHAR.

डॉ .अनुराग said...

बहुत खूबसूरत ....

Arun Aditya said...

दफ्तर के जँगले जिनके बाहर वो हरा है जो कविता नहीं,
भारी पत्थर है / समय की नस पर पड़ गया है।
कवि की सौंदर्यदृष्टि और भौतिक स्थितियों का अन्तर्द्वन्द्व इस कविता को एक ऐसे क्षितिज की ओर ले जाता है जहां वस्तु और रूप ऐसे एकीकृत नजर आते हैं जैसे सूरज और रोशनी। सूरज के शब्द बेधक हैं पर अपनी अन्विति में वे जिस अर्थ को वहन करते हैं, वह और भी तीक्ष्ण है। बधाई।

मनोज पटेल said...

सूरज ने एक बार फिर प्रभावित किया... आपको धन्यवाद सूरज की कविता पढ़वाने के लिए.

ravindra vyas said...

विदा के वक्त प्रेम ने
कविता से लगे रहने का ध्यान धराया


kya baat hai! jio brother!!

Aparna said...

"फुर्सत उस जमाने की कविता है
"

Awesome! One more entry of Suraj & undoubtedly it carries the "wow" factor. I am really very happy to read it. Thanks to Suraj & Chandan.

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' said...

हम कविता को जितने तरीकों से परिभाषित करते हैं, वह कविता की सीमाओं को बांधने का प्रयास भर है. जबकि कविता हमेशा अपरिभाषित रही है, लगभग हमारे अप्रकाशित जीवन की तरह.

बहुत सुन्दर रचना है भाई साहब

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' said...

हम कविता को जितने तरीकों से परिभाषित करते हैं, वह कविता की सीमाओं को बांधने का प्रयास भर है. जबकि कविता हमेशा अपरिभाषित रही है, लगभग हमारे अप्रकाशित जीवन की तरह.
बहुत सुन्दर रचना है भाई साहब