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Sunday, February 14, 2010

अगली कहानी – नया

कल रात एक कहानी पूरी की। कहानी मंझोली है पर डेढ़ साल से लिखी जा रही थी और कई सारे तरीकों से लिख लिख के छोड़ता रहा। एक बार तो कहानी पूरी हो गई थी, बीते अप्रेल में, पर खुद को ही पसन्द नही आ रही थी।
अब जब पूरी हुई तो मन बहुत उदास हो गया। रात भर नीन्द नही आई। किसी को बताना चाहता था कि आज मैने एक कहानी पूरी की है पर दो तीन बजे किसे बताता। रात की एक दूसरी ही तकलीफदेह घटना से मन कई गुना बेचैन था। बार बार मैं जोर जोर से बोलना चाहता था। लवें तप रही थी। पानी लगातार पीना भी बेअसर जा रहा था। दूध नही था सो लाल चाय बनाकर पिया। स्वाद बहुत खराब था। पर उससे अपना ही ध्यान बँटाने में खासी मदद मिली।

रात रात भर जाग कर और तमाम शहरों के होटलों में रह कर यह कहानी लिखी गई है। एक पैरा जम्मू तो अगला पन्ना जयपुर उसके बाद अगली लाईन बस में, फिर कोई हिस्सा ट्रेन में। मुझे याद आ रहा है कि जब मैं पार पुल वाला हिस्सा लिख रहा था, जुलाई की बात है, उस दिन मैं अमृतसर था और खूब बारिश हो रही थी। अब ये कहानी एक पत्र के फॉर्म में लिखी गई है। आज आखिरी से पहले वाला ड्राफ्ट पूरा हुआ और अभी उसी की मानसिक थकान से उबरने की कोशिश कर रहा हूँ। मानसिक थकान ऐसी है कि एक शब्द लिखने का मन नही हो रहा पर अभी कहानी के कुछ तंतु जो छूट रहे हैं उन्हे टाँकने का काम बाकी है। डरते डरते कुछ मित्रों को पढ़ने के लिये अपनी कहानी भेज रहा हूँ। क्या पता उन्हे पसन्द आये, ना आये।

कहानी का शीर्षक है - “नया”।

उम्मीद है अगले महीने तक आप सबके सामने उस कहानी के साथ उपस्थित हूँगा। तब तक दूसरी कहानी पूरी होने की सम्भावना है। सफर में लगातार रहने के कारण कोई भी कहानी इकट्ठे नही कर पा रहा था पर लगातार के इस सफर और लगातार के ही इस खौफनाक अकेलेपन का सुन्दर पहलू भी है कि कई कई कहानियों पर काम करता रहा और अब सब सही राह पर हैं। कई कई दिन अबोले गुजर जाते हैं। इस महीने कोशिश करूंगा कि सम्भव हो तो यात्रायें कम करूँ। अगर महीने में पांच छ दिन भी समय से कमरे पर आ गया तो अगली कहानी का खांचा खिंच जायेगा।

Sunday, January 31, 2010

पूजा की डायरी: अमिताभ बच्चन हमारे ऑफिस में

(विश्व की तमाम भाषाओं की तरह कितनी सारी विधाये भी लुप्त होती जा रही हैं। जैसे डायरी, रिपोर्ताज इत्यादि। हम सब इनके विलुप्त होते जाने पर सच्चे हृदय से चिंतित होते हैं, पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इस मुश्किल से निकलने के रास्ते हमें नही दिखते। डायरी लिखने वाले भी अक्सर गुरु निकलते हैं जब वो यह सोच कर डायरी लिखते है कि उसे छपवाना है। उसमें भी इतने दिखावे करते है कि पूछिये मत। वैसे में डायरी लेखन के लिये पूजा की डायरी के कुछ पन्नों से इस ब्लॉग पर आगाज करते हैं इस उम्मीद के साथ कि ‘कारवाँ बनता चला जायेगा।‘ अमिताभ बच्चन और उनसे आभासी मुलाकात से जुड़ा यह डायरी अंश इसी अट्ठाईस जनवरी का है।)

नेटवर्क-18 के ऑफिस की हवा में गुरुवार को अलग ही तरह की खुशबू बिखरी हुई थी। मैं भी कहूं कि कोई बात जरूर है। सुबह मदरडेरी से न केवल बस समय पर मिल गई बल्कि कंडक्टर ने बैठने खातिर अपनी सीट भी दे दी। और साथ ही प्यास लगने पर पानी भी पिलाया। लग रहा था आज कुछ अच्छा घटेगा और हुआ क्या ऑफिस पहुँचते ही गार्ड भईया ने बताया कि आज अमिताभ बच्चन आने वाले हैं। अमिताभ बच्चन! हिंदुस्तान में क्या कोई इस नाम से अपरिचित होगा।

मेरे घर में गुरुवार को कोई भी अच्छा काम करने का चलन नहीं है। चाहे वह कितना जरूरी क्यों न हो। या तो एक दिन पहले या बाद में उस जरूरी काम का निपटारा होता है। लेकिन ठीक उलट मेरे लिए यह दिन विशेष रहता है। अक्सर ऐसा होता है कि मेरा अधूरा काम इस दिन पूरा हो जाता है और नया काम शुरू हो जाता है। इस दिन ने मुझे बहुत कुछ दिया है।

ऑफिस में साथी वजह-बेवजह की उत्तेजना में थे। कोई कांप रहा था तो कोई हांफ रहा था। अभी अमित जी आईबीएन-7 के ऑफिस में हैं एक लड़की बगल से चीखती हुई गुजरी है। अमिताभ के आने की बात धीरे-धीरे यह बात ऑफिस के हर उस शख्स ने बताई जो मुझसे परिचित था। फोन पर हर कोई दूसरे को अमिताभ बच्चन के आने की खबर दे रहा था। मैं बहुत उत्साहित थी। मैं जितनी बार अपनी सीट से उठती देखती क्या? - हर कोई गेट की तरफ टकटकी लगाए खड़ा है। ये अभिषेक के पिता एश्वर्या के ससुर या जया के पति के लिए नहीं था। यह हरिवंश राय के बेटे के लिये भी नहीं था। यह था सिर्फ और सिर्फ अमिताभ के लिए।

लंच जाते समय एक बार मन में आया कि कहीं इस बीच अमित जी चले न जाएं। थोड़ा डर भी था। लंच सिर्फ दो मिनट में करके मैं वापस आई, तो जान में जान आई। ग्राउंड फ्लोर खचाखच भरा हुआ था। सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 4 बजे तक अमिताभ को देखने वालों का भारी हुजूम खड़ा हो गया था। मैंने जानबूझकर एक दो जनों से पूछा कि इतनी भीड़ क्यों हैं, पहले तो लोगों ने मुझे एक पल देखा और कहा आपको नहीं पता अमिताभ जी आने वाले हैं। लेकिन लगता है कि उन्हे देखने का मौका नहीं मिल पाएगा। मैंने पूछा क्यों? जवाब आया कि सिक्यूरिटी बहुत टाईट है और उन्हें छुपाकर सीधा स्टूडियों तक ले जाया जाएगा। अब अपने काम में मेरी कोई रूचि नहीं बची थी बस पीछे मुड़मुड़कर देख रही थी कि कहीँ अमिताभ आ न गए हो।


चार बजते बजते मैंने एक ऐसे शख्स के चहकने की आवाज सुनी, जो हमेशा सिर्फ गंभीर बातों में ही शामिल रहता है। मनु नाम का यह शख्स बच्चों की तरह उछलते-कूदते हुए बताया: अमिताभ बच्चन आ गए। सभी अपना काम छोड़कर ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचे। मैं भी थी। तभी अमित बच्चन की गाड़ी सीधा बेसमेंट में पहुंची और वहां से वे राजदीप के साथ फस्ट फ्लोर पर पहुंचे। राजदीप की चमक फिर भी अलग थी। अपने जादुई अन्दाज के साथ जो मुस्कुराहट राजदीप के चेहरे पर रहती है, वो तब भी थी।

अमिताभ को नही देख पाने के बाद मुझे बहुत गुस्सा आया। मन ही मन सोचती रही कि उन्हें ग्राउंड फ्लोर से उपर ले जाना चाहिए था। मैंने अकेले में सबकों बुरा भला कह रही थी कि तब तक अमिताभ बच्चन उपर हाथ हिलाते दिख गए। मैं खुश हो गई। लेकिन अभी तो और अच्छे से मुझे उन्हें देखना था। नीचे खड़े लोग भी उतने ही खुश नजर आ रहे थे। लगभग बावले हो चुके लोग हाथ हिलाकर अमित जी आई लव यू अमित जी आई लव यू कह रहे थे और सीटी बजा रहे थे। फिर अचानक से अमित जी गायब हो गए। मैं इधर उधर देखने लगी। एकबारगी लगा मेरी जान पहचान का कोई भी वहाँ नहीं है। तभी अरुण दिखा। वह भी इन्ही वजहों से हैरान परेशान! आधी हंसी में मुझसे कहा: चलो अब उपर ही चलते हैं। मैं भी एक अकेली! उसके पीछे चल दी।

उपर भी बहुत भीड़ थी। भीड़ में मनु था। उसके चेहरे की चमक बता रही थी कि वह अमिताभ को देखने और फोटो लेने में सफल हो चुका है। लोग एक दूसरे के उपर चढ़ कर अमिताभ की एक झलक पाने को बेताब थे। मैंने भी संघर्ष किया लेकिन जब असफल रही तो एक किनारे की जगह ले खड़ी हो गई। पर आश्चर्य, पांच मिनट बाद अमिताभ ठीक मेरे बगल में थे! मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं भी उनके साथ तब तक चलती रही जब तक कि वो स्टूडियों के भीतर न पहुंच गए हो। हाथ में एक विजिटिंग कार्ड था और मांगी गई एक पेंसिल कि अगर मौका मिला तो आटोग्राफ लेने में नहीं चूक होगी। लेकिन फिलहाल यह इच्छा तो अधूरी रह गई। वैसे मैंने कहीं पढ़ा है कि जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रहनी चाहिए, तभी जीवन में आस्था बनी रहती है।

क्या इस गुरुवार को मुझे भगवान से कुछ और भी मांगना चाहिए था?