Sunday, January 31, 2010

पूजा की डायरी: अमिताभ बच्चन हमारे ऑफिस में

(विश्व की तमाम भाषाओं की तरह कितनी सारी विधाये भी लुप्त होती जा रही हैं। जैसे डायरी, रिपोर्ताज इत्यादि। हम सब इनके विलुप्त होते जाने पर सच्चे हृदय से चिंतित होते हैं, पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि इस मुश्किल से निकलने के रास्ते हमें नही दिखते। डायरी लिखने वाले भी अक्सर गुरु निकलते हैं जब वो यह सोच कर डायरी लिखते है कि उसे छपवाना है। उसमें भी इतने दिखावे करते है कि पूछिये मत। वैसे में डायरी लेखन के लिये पूजा की डायरी के कुछ पन्नों से इस ब्लॉग पर आगाज करते हैं इस उम्मीद के साथ कि ‘कारवाँ बनता चला जायेगा।‘ अमिताभ बच्चन और उनसे आभासी मुलाकात से जुड़ा यह डायरी अंश इसी अट्ठाईस जनवरी का है।)

नेटवर्क-18 के ऑफिस की हवा में गुरुवार को अलग ही तरह की खुशबू बिखरी हुई थी। मैं भी कहूं कि कोई बात जरूर है। सुबह मदरडेरी से न केवल बस समय पर मिल गई बल्कि कंडक्टर ने बैठने खातिर अपनी सीट भी दे दी। और साथ ही प्यास लगने पर पानी भी पिलाया। लग रहा था आज कुछ अच्छा घटेगा और हुआ क्या ऑफिस पहुँचते ही गार्ड भईया ने बताया कि आज अमिताभ बच्चन आने वाले हैं। अमिताभ बच्चन! हिंदुस्तान में क्या कोई इस नाम से अपरिचित होगा।

मेरे घर में गुरुवार को कोई भी अच्छा काम करने का चलन नहीं है। चाहे वह कितना जरूरी क्यों न हो। या तो एक दिन पहले या बाद में उस जरूरी काम का निपटारा होता है। लेकिन ठीक उलट मेरे लिए यह दिन विशेष रहता है। अक्सर ऐसा होता है कि मेरा अधूरा काम इस दिन पूरा हो जाता है और नया काम शुरू हो जाता है। इस दिन ने मुझे बहुत कुछ दिया है।

ऑफिस में साथी वजह-बेवजह की उत्तेजना में थे। कोई कांप रहा था तो कोई हांफ रहा था। अभी अमित जी आईबीएन-7 के ऑफिस में हैं एक लड़की बगल से चीखती हुई गुजरी है। अमिताभ के आने की बात धीरे-धीरे यह बात ऑफिस के हर उस शख्स ने बताई जो मुझसे परिचित था। फोन पर हर कोई दूसरे को अमिताभ बच्चन के आने की खबर दे रहा था। मैं बहुत उत्साहित थी। मैं जितनी बार अपनी सीट से उठती देखती क्या? - हर कोई गेट की तरफ टकटकी लगाए खड़ा है। ये अभिषेक के पिता एश्वर्या के ससुर या जया के पति के लिए नहीं था। यह हरिवंश राय के बेटे के लिये भी नहीं था। यह था सिर्फ और सिर्फ अमिताभ के लिए।

लंच जाते समय एक बार मन में आया कि कहीं इस बीच अमित जी चले न जाएं। थोड़ा डर भी था। लंच सिर्फ दो मिनट में करके मैं वापस आई, तो जान में जान आई। ग्राउंड फ्लोर खचाखच भरा हुआ था। सुबह 11 बजे से लेकर शाम के 4 बजे तक अमिताभ को देखने वालों का भारी हुजूम खड़ा हो गया था। मैंने जानबूझकर एक दो जनों से पूछा कि इतनी भीड़ क्यों हैं, पहले तो लोगों ने मुझे एक पल देखा और कहा आपको नहीं पता अमिताभ जी आने वाले हैं। लेकिन लगता है कि उन्हे देखने का मौका नहीं मिल पाएगा। मैंने पूछा क्यों? जवाब आया कि सिक्यूरिटी बहुत टाईट है और उन्हें छुपाकर सीधा स्टूडियों तक ले जाया जाएगा। अब अपने काम में मेरी कोई रूचि नहीं बची थी बस पीछे मुड़मुड़कर देख रही थी कि कहीँ अमिताभ आ न गए हो।


चार बजते बजते मैंने एक ऐसे शख्स के चहकने की आवाज सुनी, जो हमेशा सिर्फ गंभीर बातों में ही शामिल रहता है। मनु नाम का यह शख्स बच्चों की तरह उछलते-कूदते हुए बताया: अमिताभ बच्चन आ गए। सभी अपना काम छोड़कर ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचे। मैं भी थी। तभी अमित बच्चन की गाड़ी सीधा बेसमेंट में पहुंची और वहां से वे राजदीप के साथ फस्ट फ्लोर पर पहुंचे। राजदीप की चमक फिर भी अलग थी। अपने जादुई अन्दाज के साथ जो मुस्कुराहट राजदीप के चेहरे पर रहती है, वो तब भी थी।

अमिताभ को नही देख पाने के बाद मुझे बहुत गुस्सा आया। मन ही मन सोचती रही कि उन्हें ग्राउंड फ्लोर से उपर ले जाना चाहिए था। मैंने अकेले में सबकों बुरा भला कह रही थी कि तब तक अमिताभ बच्चन उपर हाथ हिलाते दिख गए। मैं खुश हो गई। लेकिन अभी तो और अच्छे से मुझे उन्हें देखना था। नीचे खड़े लोग भी उतने ही खुश नजर आ रहे थे। लगभग बावले हो चुके लोग हाथ हिलाकर अमित जी आई लव यू अमित जी आई लव यू कह रहे थे और सीटी बजा रहे थे। फिर अचानक से अमित जी गायब हो गए। मैं इधर उधर देखने लगी। एकबारगी लगा मेरी जान पहचान का कोई भी वहाँ नहीं है। तभी अरुण दिखा। वह भी इन्ही वजहों से हैरान परेशान! आधी हंसी में मुझसे कहा: चलो अब उपर ही चलते हैं। मैं भी एक अकेली! उसके पीछे चल दी।

उपर भी बहुत भीड़ थी। भीड़ में मनु था। उसके चेहरे की चमक बता रही थी कि वह अमिताभ को देखने और फोटो लेने में सफल हो चुका है। लोग एक दूसरे के उपर चढ़ कर अमिताभ की एक झलक पाने को बेताब थे। मैंने भी संघर्ष किया लेकिन जब असफल रही तो एक किनारे की जगह ले खड़ी हो गई। पर आश्चर्य, पांच मिनट बाद अमिताभ ठीक मेरे बगल में थे! मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं भी उनके साथ तब तक चलती रही जब तक कि वो स्टूडियों के भीतर न पहुंच गए हो। हाथ में एक विजिटिंग कार्ड था और मांगी गई एक पेंसिल कि अगर मौका मिला तो आटोग्राफ लेने में नहीं चूक होगी। लेकिन फिलहाल यह इच्छा तो अधूरी रह गई। वैसे मैंने कहीं पढ़ा है कि जीवन में कुछ इच्छाएं अधूरी रहनी चाहिए, तभी जीवन में आस्था बनी रहती है।

क्या इस गुरुवार को मुझे भगवान से कुछ और भी मांगना चाहिए था?

16 comments:

Udan Tashtari said...

कल ही तो कहीं और पढ़ा था आपको इसी बारे में बात करते??

हिमांशु । Himanshu said...

सुन्दर ! आभार ।

rakampal said...

बहुत मासूम अभिव्यक्ति।
एक बार मुझे भी अमिताभ को देखने का मौका मिला था। एक चुनावी रैली में आने वाले थे। पर मैं सिर्फ उस हेलिकॉप्टर को ही देख पाया, जिसमें वो आ रहे थे।

शशिभूषण said...

अच्छी याद है.कलाकार के रूप में अमिताभ बच्चन ऐसे हैं ही कि कोई भी याद रखेगा,गर्व करेगा हाँ हमने उन्हें देखा है.मैंने महसूस किया कि गार्ड भइया पूजा का ही संबोधन हो सकता है.इस दौरान वे कितनी खुश लेकिन निस्पृह होंगी इसकी कल्पना करके मुझे अच्छा लग रहा है.जिस तरफ़ चंदन इशारा कर रहे हैं उससे मन में सवाल उठे कि वो कौन से पहलू हों जिसमें किसी डायरी या आतमकथ्य को सार्थक कहा जाए.सिर्फ़ ईमानदारी या साथ में लेखकीय सफलता को भी.चंदन,एक सचमुच के सवाल का जवाब दो कि अच्छे लोग बड़े लोगों पर डायरी लिखते हैं और अच्छे लेखक मामूली लोंगों की ज़िंदगी.क्यों?और यही अच्छे लोग जब लेखक हो जाते हैं तब किसका साथ देते हैं अपना या लेखन का?

Suchita said...

Simply pooja .....but ithing is true that whenevr we jot down our real emotions with the way we feel it, it goes simply superb....

Suchita said...

Simply pooja .....but 1 thing is true that whenevr we jot down our real emotions with the way we feel it, it goes simply superb....

Shrikant Dubey said...

पढ़ के बहुत कुछ अच्छा अच्छा सा लगा... शुक्रिया पूजा.

Aparna said...

A true & simple way of expressing you such an innocent feel of the incidence.... anyways congrats for walking few steps with Amitji....

Vivek Rastogi said...

पर केवल देख लेने भर से क्या मिला, अमिताभ भी तो आम आदमी ही है, उसे भी भूख लगती है और नींद आती है, इत्यादि जो भी कर्म एक आम आदमी करता है। केवल एक सफ़ल व्यक्ति हैं वह यही उनकी विशेषता है, खैर अपनी अपनी सोच है।

chandan said...

शशिभूषण जी, विनम्रता से कहूँ तो आपके सवाल कोई सवाल बनते ही नही है। यह कोई नियम नही है कि बड़े लोग मामूली लोगों पर डायरी लिखते हैं और मामूली लोग बड़े लोगो पर। कोई भी किसी पर लिख सकता है। डायरी दरअसल किसी पर लिखने की विधा नही है। यह अपने रोजमर्रा का इंतिखाब होता है। उसमे कभी कोई किसी आदमी लिखता है और कभी किसी किसी परिस्थिति पर।दूसरे यह भी कोई सवाल नही है कि सफल होने पर किसका साथ देते हैं अपना या लेखन का? आप गोदार की डायरी पढिये या काफ्का की उसने अपने समकालीन बड़ों के बारे में खूब लिखा है।

रंगनाथ सिंह said...
This comment has been removed by the author.
रंगनाथ सिंह said...

पूजा का गद्य सुन्दर है। उन्होने पूरी सफलता से उस घटना को प्रस्तुत किया है। यह एक सफल रचना है। इस रचना को आपने डायरी क्यांे माना मुझे नहीं पता। मुझे तो यह संस्मरण प्रतीत हो रहा है।

हमें तो शशिभूषण का प्रश्न बड़ा ही मौजूँ जान पड़ा। बड़े लोग-छोटे लोग के मामले में शशिभूषण अतिसरलीकरण कर बैठे हैं लेकिन उनका दूसरा बिन्दु बहुत मानीखेज है। छपवाने के लिए डायरी लिखने वालों के इतिहास को देखते हुए...

वैसे, एक डायरी सोरेन कीर्कगार्द ने भी लिखी थी जिसमें उसने अपने समकालीनों की नीचता और मूर्खता पर काफी स्याही खर्च की थी। हो सकता है हिन्दी में भी कोई वही नेक काम कर रहा हो। खुदा खैर करे।

संदीप पाण्डेय said...

रंगनाथ से सहमति। निश्चित रूप से पूजा का लिखा हुआ गद्य के अधिक नजदीक ठहरता है। पूजा के लिखे में उनके पत्रकारीय कौशल की झलक मिलती है। यह बहुत ही जीवंत रिपोर्ट है जिसे उन्होंने शुरू से सहज, सरस और रोचक बनाए रखा है।

संदीप पाण्डेय said...

संशोधन: मेरा कहने का मतलब पूजा का गद्य संस्मरण के नजदीक ठहरता है।

शशिभूषण said...

चंदन आपको सवाल सवाल नहीं लगा तो मैं ही मान लेता हूँ पूछने में कोई कसर रह गई होगी.आखिर भाषा का लफडा भी तो गजब ही है.सो इस बार थोड़ा बहक जाता हूँ.
मैं उनकी बहुत इज़्जत करता हूँ अपने दिमाग़ में उन्हें सजाकर भी रखता हूँ जो आज डायरी लिखते हैं स्याही सूखने नहीं पाती,डायरी के पन्नों पर हाथ का पसीना गाढ़ा होने नहीं पाता डायरी आज ही छप जाती है.ये पत्र भी लिखते हैं तो ऐसा ही होता है इधर पत्र पोस्ट करते हैं.उधर वह सीधे छापाखाना चला जाता है.वहाँ से सुधी पाठकों के दिलो-दिमाग़ में.मेरे कहने का मतलब ये कि यही लोग दरअसल लेखक हैं.विधा कोई भी हो ये लेखक सीधे पाठकों को जीत लेते हैं.उसके पास पढ़ लेने के सिवा दूसरा चारा नहीं बचता.भई,हमारे इधर तो अपीलों को यह सौभाग्य नसीब नहीं.गुहार कोई नहीं सुनता तान सुनने लोग परदेश से आ जाते हैं.सो अपनी योग्यता अभी इतनी ही है कि हम मुक्तिबोध की किताब एक साहित्यिक की डायरी को डायरी ही नहीं मानते.इसलिए मैं यहाँ रंगनाथ जी और संदीप को मन ही मन पूरा सही ठहरा रहा हूँ पर कहूँगा नहीं क्योंकि मुझे नहीं पता इसे विनम्रतापूर्वक कैसे कहा जाएगा.

नीरेंद्र नागर said...

विवेक रस्तोगी से सहमत हूं। अमिताभ एक जबर्दस्त कलाकार हैं। उनकी कुछ फिल्में देखना अच्छा लगता है। कुछ में उन्होंने बहुत ही वाहियात काम भी किया है। उसमें कोई बुराई नहीं। कोई भी व्यक्ति हमेशा अच्छा काम नहीं कर सकता। न वह न हम। मेरे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इंसान के तौर पर कैसे हैं। लेकिन यह जानने को मौका नहीं मिला। कहा जाता है - तुम अपने दोस्तों के नाम मुझे बता दो, मैं बता दूंगा कि तुम कैसे हो। तो अमिताभ के दोस्त मुलायम और अमर सिंह या अनिल अंबानी उनके बारे में कोई बहुत अच्छी राय बनाने को प्रेरित नहीं करते। ये सारे लोग अपने और सिर्फ अपने हित में काम करते हैं। अमिताभ ने भी ऐक्टिंग के अलावा समाज के लिए कुछ किया हो तो मुझे इसका ज्ञान नहीं है। ऐसे में अमिताभ या किसी भी स्टार के लिए पूजा की हद तक दीवानगी मुझे समझ में नहीं आती। लेकिन हम ऐसे ही हैं। चाहे राहुल गांधी हों या सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन। अरे भाई, वे अपना काम कर रहे हैं और हम अपना काम कर रहे हैं। अगर पूजना हो तो उनको पूजो जो बिना स्वार्थ के किसी गांव में गरीबों के लिए लड़ रहे हैं, पुलिस, पैसे और मसल की ताकत से लड़ रहे हैं, लड़ते-लड़ते अपनी जान दे रहे हैं। लेकिन उनके बारे में हम कभी नहीं सोचेंगे, कभी नहीं जानेंगे। अफसोस।