Monday, January 25, 2010

तानाशाह

कुमार अनुपम। उम्र और तेवर से युवा। कुशल चित्रकार।चर्चित हो रहे कवि।बेहतर मित्र। भविष्य में अनुवाद का काम भी करेंगे। अकादमिक परिचय और दो सुन्दर कवितायें यहाँ (अनुनाद) पर।यहाँ ‘तानाशाह’ कविता।

तानाशाह

इस बार आया
तो पूछा इसने कौन बनेगा करोड़पति
दस सरलतम सवाल पूछे
एक सवाल तो यही, तिरंगे में कितने रंग होते हैं
पूछते हुए इसकी वाणी से इतना परोपकार टपक रहा था
जैसे हमें हर हाल में जीतने की मोहलत दी उसने
सही जवाब पर हमारी पीठ ठोंकी
बढ़कर हाथ मिलाया और कुशलतम बुद्धि की
तारीफ की दिल खोलकर

फिर भला किसकी मजाल
जो पूछे उससे
लेकिन तुम क्या मूर्ख हो अव्वल जो इतने सरलतम सवालों पर
दिये दे रहे हो करोड़ों
यहाँ तक कि सन्देह भी नहीं हुआ तनिक उसकी किसी चतुर चाल पर
हमारी अचानक अमीरी की खुशी में वह इस कदर शरीक हुआ
कि नाचने तक लगा हमारे साथ साथ
बल्कि तब अपने निम्न-मध्य रहन-सहन पर हमें लाजवाब लज्जा हुई
हम निहाल होकर उसकी सदाशयता पर सहर्ष सब कुछ हार बैठे

इस बार आया
तो अपने साथ लाया देह-दर्शना विश्वसुन्दरियों का हुजूम
वे इतनी नपी-तुली थीं कि खुद एक ब्रांडेड प्रॉडक्ट लगती थीं
उनकी हँसी और देह और अदाएँ इतनी कामुक
कि हर कीमत उनके लायक बनना हमने ठान लिया मन ही मन
तब गृहस्थी की झुर्रियों और घरेलूपन की मामूलियत
से घिरी अपनी पत्नियों पर हमें एक कृतघ्न घिन-सी आयी
वे शुरू शुरू में किसी लाचारी और आशंका में
अत्यधिक मुलायम शब्दों में प्रार्थना करती हमारे आगे काँपती थीं थरथर
किन्तु इस आपातकाल
से उबरने में उन्होंने गँवाया नहीं अधिक समय
और किसी ईष्र्या के वशीभूत मन ही मन
उन्होंने कुछ जोड़ा कुछ घटाया

और हम एक विचित्र रंगमहल में कूद पड़े साथ साथ

जीवन की तमाम प्राथमिकताओं और पुरखा-विश्वासों
को स्थगित करते हुए हम
अपनी आउटडेटेड परम्पराओं से नजात पाने के लिए दिखने लगे आमादा
यह मानने के बावजूद कि हमारा सारा किया-धरा ब्रांडेड बनावट के बरक्स
बहुत फूहड़ और हमारी औकात क्षेत्रीय फिल्मों के नायक-नायिकाओं से भी गयी-गुजरी
फिर भी एक अजब दम्भ में हम
एक आभासी विश्व की पाने के लिए विश्वसनीयता
सब कुछ करने को तत्पर थे फौरन से पेशतर
हमने अपनी अस्मिता से पाया छुटकारा और जींस पैंट्स और शर्ट की
एक रंग आइडेंटिटी में गुम हो गये हमने खुरच खुरच कर छुड़ा डाले
अपने मस्तिष्क से चिपके एक एक विचार सिवा इस ख्य़ाल के कि अब
हमें सोचना ही नहीं है कुछ
कि हमारे लिए सोचनेवाला
ले चुका है इस धराधाम पर अवतार

अगली बार आया
तो उसके मुखमंडल पर एक दैवीय दारुण्य था
दहशतगर्दी के खिलाफ उसने शुरू किया विश्वव्यापी आन्दोलन जिसे सब
उसी की पैदाइश मानते रहे थे अपने पूर्व पापों के पश्चात्ताप में विगलित उसने
एक देश के ऊर्जा संसाधनों को पूरे विश्व की पूँजी मानने
का सार्वजनीन प्रस्ताव पेश किया विरुद्धों से भी कीं वार्ताएँ सन्धियाँ कीं उसने रातोंरात
और प्राचीन सभ्यताओं की गारे-मिट्टी से बनी रहनवारियों
को नेस्तनाबूत कर डाला यहाँ तक कि हाथ-पंखों और कोनों-अँतरों में छुपती लिपियों
और भाषाओं और नक्काशीदार पतली गर्दनोंवाली सुराहियों को भी कि अगली पीढिय़ों
को मिल न सके उनका एक भी सुराग कि उन्हें शर्मिन्दा न होना पड़े कतई
नये-नवेले उत्तर-आधुनिक विश्व में
उसने कितना तो ध्यान रखा हमारी भावनाओं का


इस बार आया जबकि कहीं गया ही नहीं था
वह यहीं था हमारे ही बीच पिछले टाइप्ड तानाशाहों के किरदारों से मुक्ति की युक्ति
में इतना मशगूल इतना अन्तर्धान कि हमें दिखता नहीं था
पूरी तैयारी के साथ आया इस बार तो उसकी कद-काठी और रंग
बहुत आम लगता था और बहुत अपना-सा
उसने नदी में डगन डालकर धैर्य से मछलियाँ पकड़ीं
उसकी तसवीरें छपती रहीं अखबारों में लगातार
उसने तो सोप-ऑपेरा की औचित्य-अवधारणा में चमत्कारी चेंज ही ला दिया
टीवी पर कई कई दिनों तक उसके फुटेज दिखाए जाते रहे जब वह
हमारी ही तरह अपने बच्चों को स्कूल छोडऩे गया और अपनी दाढ़ी बनवाते हुए
हज्जाम से गाल और गले पर चलवाता रहा उस्तरा
बिना किसी भी आशंका के
उसने कई प्रेम कर डाले और गज़ब तो यह
कि उसने स्वीकार भी किया सरेआम
महाभियोग झेलकर उसने पेश किया प्रेम के प्रति ईमानदार समर्पण का नायाब नमूना
और सबका दिल ही जीत लिया

धीरे धीरे वह ऐसा सेलिब्रिटी दिखने लगा
कि छा गया पूरे ग्लोब पर अपनी मुस्कुराहट के साथ
राष्ट्रों का सबसे बड़ा संघ घबराकर अन्तत:
तय करने लगा अपने कार्यक्रम उसके मन-मुताबिक
तमाम धर्म राजनीति साहित्य दर्शन वगैरह उसकी शैली से प्रभावित दिखने लगे बेतरह

इस तरह तमाम कारनामों के बावजूद
वह इतना शान्त और शालीन दिखता था
कि उसकी इसी एक अदा पर रीझकर
दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित शान्ति पुरस्कार के लिए उसका नाम
सर्व सम्मति से निर्विरोध चुन लिया गया

अब सिरफिरों का क्या किया जाए
सिरफिरे तो सिरफिरे
जाने किस सिरफिरे ने फेंककर मार दिया उसे जूता
जो खेत की मिट्टी से बुरी तरह लिथड़ा हुआ था और जिससे
नकार भरे कदमों की एक प्राचीन गन्ध आती थी।

........................कुमार अनुपम

6 comments:

naveen kumar naithani said...

अच्छी कविता

Aparna said...

अच्छी कविता है अनुपमजी!!!! बहुत ख़ुशी हुई आपको पढ़ के, आज आपकी कविता पढ़ते वक़्त मैंने साथ में चावल बनने के लिए रखा था और पढने में मैं ऐसे खो गयी कि मैंने चावल जला दिया!!!!

Shrikant Dubey said...

बहुत अच्छा अनुपम भैया, बधाई!!!

Ravi said...

bahoot he chawal jalau kavita hai ..........

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी कविता अनुपम भाई

और चावल वाले कमेण्ट पर वागर्थ पुरस्कार के समय दिया अल्पना जी का वक्तव्य याद आया…

NISANT said...

BHAEE BADHAEE................