Friday, January 1, 2010

युवा कथाकार कुणाल सिंह का पहला उपन्यास – "आदिग्राम उपाख्यान"

अप्रतिम युवा कथाकार कुणाल सिंह। अभिनव भाषा, बेहतरीन गद्य और नई सूझ बूझ से लैस कथाकार। ‘सनातन बाबू का दामपत्य’ कथा संग्रह खूब चर्चित। पारम्परिक किस्म के आलोचकों की पहली (ना)पसन्द। बावजूद इसके, लोग इनकी रचनाओं का इंतजार करते हैं। पच्चीस तक की उम्र कलकत्ते में गुजारी और अब पिछले तीन सालों से दिल्ली में। यह पहला उपन्यास- ‘आदिग्राम उपाख्यान’। आज की तारीख में बेहद मौजूँ विषय वस्तु।
इस उपन्यास के अंश नितांत पहली बार कहीं भी प्रकाशित हो रहे..नववर्ष के पहले पहल दिन पर...। उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य।


किस बाबरनामे में आदिग्राम का जिक्र आता है?

परिमलेन्दु दा ने बच्चों को जिस रानी रासमणि की कथा सुनाई थी, वह कोई सचमुच की रानी नहीं थी। वह एक गरीब चासी (किसान) की बेटी थी, जिसकी मौत बंगाल के अकाल में चावल की खुशबू से हुई थी। बंगाल में अकाल कब पड़ा था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं कि सन् तैंतालीस की बात है। रानी रासमणि की शादी बाबर से कब हुई थी, पूछा जाए तो परिमलेन्दु दा कहेंगे कि सन् 1760 की बात है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इस पूरे इलाके को गोरे-काले फौजियों और तोपचियों से भर दिया था। बाबर कौन था, यहाँ कहाँ से आया था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं...। यह सब क्या गोलमाल है! परिमलेन्दु दा एक साथ कितनी कहानियों को जोड़-गूँथ देते हैं।


अच्छा, बाबर मतलब तो मुस्लिम, फिर उसकी शादी रानी रासमणि से क्योंकर हुई! होती है क्या? फटिकचन्द्र पूछना चाहता है कि इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की बेटी बिलकीस से वह चाहे तो ब्याह कर सकता है क्या! पिछले बरस गौरांग पूजा के टाइम उसने बिलकीस को एक हेयरबैंड और रोटोमैक की कलम दी थी। लिखते-लिखते लव हो जाए। बिलकीस ने मुस्कराकर कहा था— आईलवयू।

इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ दोनों जुड़वाँ भाई थे। बचपन से ही वे दोनों इतने एक जैसे थे कि उनके अम्मी-अब्बा भी उन्हें सही-सही नाम से पहचानने में धोखा खा जाते थे। जब तक दोनों ने होश सम्भाला, तब तक किसका नाम इज़राइल है और किसका इस्माइल, यह पता कर पाना मुश्किल था। हो सकता है बचपन में कई बार इनके नामों में अदला-बदली भी हुई हो। अन्तत: लोगों ने इसका समाधान ऐसे निकाला कि जब भी किसी एक से काम पड़ता, वे दोनों का ही नाम लेकर पुकारते। जब वे स्कूल जाने जितने बड़े हुए, आर्थिक तंगी के कारण उनके अब्बा ने स्कूल में दोनों में से एक को ही दाखिला दिलवाया— इज़राइल हसन। लेकिन गुप्त बात यह थी कि कभी इज़राइल स्कूल चला जाता तो कभी इस्माइल। इस तरह गाँव वालों को बहुत मुश्किल से दोनों को अलग-अलग पहचानने का एक नुस्खा मिला कि दोनों में से जो भी स्कूल जाए वह इज़राइल, और जो न जाए तत्काल के लिए वह इस्माइल। स्कूल के रजिस्टर की मानें तो इज़राइल हसन ही पढ़ा-लिखा है और इस्माइल हसन काला अक्षर भैंस बराबर है। इस प्रकार 'इज़राइल हसन’ नाम ने छठी दर्जा पास कर लिया और 'इस्माइल हसन’ नाम अब्बा के साथ हाइवे के पास जड़ी-बूटियों और मसालों की दुकान पर बैठने लगा। बाद में जब उनकी दाढ़ी-मूँछ आ जाए जितने वे बड़े हो गये तो लोगों ने सुझाया कि एक को दाढ़ी और दूसरे को मूँछ रख लेनी चाहिए। कुछ दिनों तक उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। लोग भूल जाते कि दाढ़ी वाला इज़राइल है या इस्माइल।


चूँकि अब्बा ने स्कूल में सिर्फ एक लड़के की फीस भरी थी, इसलिए उनका एक ही लड़का छठी पास कहा जा सकता था और दूसरे को अनिवार्यत: अनपढ़ होना होगा। उन्होंने एक पतलून-कमीज़ सिलवा दी ताकि पढ़े-लिखे इज़राइल को नलहाटी बाज़ार में कोई ठीक-ठाक काम मिल सके। पतलून-कमीज़ वाले लड़के को एक आढ़त में मुंशी के काम पर रख लिया गया। पतलून-कमीज़ पहनकर मुंशीगिरी करने कभी इज़राइल चला जाता तो कभी इस्माइल। दूसरा जो रह जाता, लुंगी-बनियान पहनकर मसालों की दुकान पर बैठ जाता। एक दिन पास के गाँव से पढ़े-लिखे इज़राइल के लिए एक रिश्ता आया। पहले यह सोचा गया था कि इज़राइल और इस्माइल की शादी एक ही साथ किन्हीं दो बहनों से की जाएगी। लेकिन अब्बा को दहेज़ में अच्छी-खासी रकम मिल रही थी, सो इंकार न कर सके। अच्छा, लड़की अगर दो बहन होती तो भी क्या उसका बाप दूसरी लड़की की शादी 'अनपढ़’ इस्माइल से करने के लिए राज़ी हो पाता? बहरहाल, लड़की इकलौती थी और सुनने में आ रहा था, बहुत सुन्दर थी।

ऐन शादी के दिन क्या हुआ कि इज़राइल को दस्त लग गयी। शादी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं, बारात निकल पडऩे को तैयार थी और इधर इज़राइल ने खाट पकड़ ली। लोगों को कुछ सूझ नहीं रहा था। अचानक इज़राइल तैयार होकर घर से बाहर आया और बोला कि अब उसकी तबीयत बिल्कुल ठीक हो चुकी है और बदले में इस्माइल की तबीयत बिगड़ गयी है। लोगों ने कुछ नहीं कहा। इज़राइल ने निकाह पढ़ी। शादी हो गयी। दुल्हन घर आई। साल भर बाद बिलकीस का जन्म हुआ।


बिलकीस का जन्म 6 दिसम्बर, 1992 को हुआ था। उसके जन्म के दिन देश भर में एक ज़लज़ला आया था, आदिग्राम में भी। लोगों के घर धू-धू कर जलने लगे थे। कई लोग मारे गये। कुछ मुसलमान बांग्लादेश भाग गये और कुछ हिन्दू वहाँ से भागकर यहाँ आ बसे। इज़राइल-इस्माइल की जोड़ी भी उसी साल टूटी। इनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि वह बांग्लादेश भाग गया। कुछ लोग कहते हैं कि दरअसल वह कहीं नहीं गया, सचाई यह थी कि वही बिल्कीस का असली बाप था, इसलिए इज़राइल-इस्माइल में से दूसरे ने उसे मारकर कहीं दफ्ना दिया। अन्त के दिनों में कुछ लोगों ने उसे बाघा की पत्नी मयना के साथ भी देखा था और वे मानते हैं कि अफरा-तफरी का फायदा उठाकर वह मयना के साथ बांग्लादेश भाग गया। बाघा भी ऐसा ही सोचता है।

यह बहुत पहले की बात है जब बिलकीस पैदा हुई थी। जिस दिन बिलकीस पैदा हुई थी, उसी दिन बाबरी मस्जिद का ढाँचा ढहाया गया था। इतिहास के सर बताते हैं कि बाबर दिल्ली का...। लेकिन रानी रासमणि तो आदिग्राम की थी। ...इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की तरह इतिहास में दो-दो बाबर हुए थे क्या? या दोनों दो इतिहास में अलग-अलग हुए। कौन से इतिहास में आदिग्राम का जिक्र आता है?

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रानी रासमणि का जन्म एक गरीब किसान के घर हुआ था। रासमणि जब पैदा हुई, उसे देखकर उसका बाप डर गया। रासमणि की माँ ने समझा कि उसके पति का चेहरा सहसा इसलिए बुझ गया है कि वह मन ही मन बेटे की आस लगाये होगा। उसने डरते-डरते कहा, ''लेकिन तुम तो कहते थे कि बेटा हो या बेटी, भगवान का दिया सर-आँखों पर! बेटी को भी वही दर्जा दोगे जो, मान लो कि बेटा होता, तो उसे देते’’।

''लेकिन इतनी सुन्दर लड़की! हमलोग गरीब हैं। आखिर क्या गलती हुई जो हम गरीब को ऊपरवाले ने इतनी सुन्दर लड़की दी!”


रासमणि की माँ ने नवजात को देखा, उसकी छोटी-सी देह से जैसे रोशनी की धारें फूटती हों।''हम इसे कहाँ छिपा के रखेंगे!” बाप ने कहा और डर गया।

कहते हैं जिस दिन वह पैदा हुई, एकाएक उसके बाप की उमर दुगनी हो गयी। बाल आधे से ज़्यादा झड़ गये और जो बचे उस पर चाँदी का पानी चढ़ गया। चेहरा झुर्रियों से भर गया, सारे दाँत गिर गये, आँखों में मोतिया के छल्ले पड़ गये। वह दिन-दिन भर खाँसने और कमर के दर्द के मारे झुककर चलने लगा। वह इतना कमज़ोर हो गया कि साँस लेने में भी उसे काफी मशक्कत करनी पड़ती और चलते वक्त अक्सर उसका दायाँ पैर सन्तुलन खोकर घिसटने लग पड़ता था।


जैसे-जैसे रासमणि बड़ी होती गयी, उसकी सुन्दरता की कीर्ति फैलती गयी। वह जहाँ कहीं जाती, एक पवित्र उजाले से उसका आसपास भर उठता। अँधेरे में भी रासमणि की देह से रोशनी फूटती होती। लोग दूर-दूर से उसे देखने आते और कहीं किसी आड़ से देखते, लौट जाते। दुनिया में यह कहने-सुनने का प्रचलन होता था कि रासमणि की सुन्दरता में ऐसी गैबी ताकत है कि जो कोई भी उसे सीधे-सीधे, बिना किसी ओट के देखता, फिर उसमें कुछ और देखने की लालसा हमेशा के लिए मर जाती। उसका कोई अंग विक्षत हो जाता, एक आँख की रोशनी चली जाती, एक पैर में फालिज मार जाता, एक हाथ बेकाम हो जाता, वह गूँगा-बहरा हो जाता। इस संसार से उसका जी उचाट हो जाता, मन में वैराग्य घर कर जाता, घर-द्वार पत्नी-बच्चे बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर वह साधू-संन्यासी हो जाता, जंगल-जंगल पर्वत-पर्वत घूमता-बउआता रहता, एक दिन आत्महत्या कर लेता।

रानी रासमणि जब अठारह साल की हुई तो बंगाल में फिर दूसरा अकाल पड़ा। तब तक ईस्ट इंडिया कम्पनी नलहाटी बाज़ार में अनाज की आढ़त और गोदाम बनवा चुकी थी। यहाँ से अनाज बैलगाडिय़ों में लादकर कलकत्ते पहुँचाये जाते। कहा जाता है कि जब दूसरा अकाल पड़ा, कम्पनी के गोदामों में कोई एक लाख मन धान जमा रखे हुए थे। रानी रासमणि का बूढ़ा बाप अब तक इतना कमज़ोर पड़ चुका था जैसे कोई पुराना ज़र्द कागज़। उसकी देह की चमड़ी छिपकली की तरह सिकुड़ गई थी। कहते हैं कि जिस दिन वह मरा, उस दिन अँग्रेजों की कोठी में बासमती चावल पकाया जा रहा था। चूल्हे पर चढ़ाई गयी चावल की हाँड़ी से गरम-गुदाज खदबदाहट की आवाज़ निकल रही थी।


पकते हुए चावल की खुशबू हाँड़ी से निकलकर कोठी की सेहन तक जब पहुँची, सुबह के सवा दस बज रहे थे। सेहन में दो काले पहरेदार रात भर के जागरण के बाद अभी अधनींदे बैठे थे। वहीं एक खाज खाया कुत्ता गुटिआया हुआ पड़ा था। कुत्ते ने अपनी थूथन उठाकर खुशबू को देखा और इशारा किया। खुशबू, इसकी भरपूर कोशिश करते हुए कि उसके पैरों की आहट पहरेदारों को न मिले, सेहन से उतरकर बाहर चली आई।कुत्ते ने जिस रास्ते की ओर इशारा किया था, उस पर कदम रखते ही चावल की खुशबू के होश उड़ गये। चारों तरफ, जहाँ तक नज़र जाती, लाश ही लाश पड़ी थीं। कुछ लाशों को गिद्ध-सियारों ने बुरी तरह नोंच डाला था। उनके खुले हुए पेट से आँतों की बद्धियाँ दूर-दूर तक खिंची हुई थीं। एक बच्चे की साँसें अभी तक चल रही थीं। दो कौव्वे उसकी आँखों पर चोंच मार रहे थे। बच्चे के शरीर में इतनी सकत भी नहीं बची थी कि वह उन्हें उड़ा पाता। खून और कीचड़ से सनी पृथ्वी पर बेशुमार घोंघे और केंचुए रेंग रहे थे। साँपों से धरती पट गयी थी।

चावल की सोंधी खुशबू ने अपने पाँयचे उठा लिए और खून के चहबच्चों को पार करने लगी। जैसे ही वह बच्चे के पास से गुज़री, न जाने कहाँ से ताकत बटोरकर बच्चे ने उसके एक पैर को कस के जकड़ लिया। खुशबू डरकर चीख पड़ी। बच्चे की आँखें कौव्वों की चोंच के प्रहार से बाहर निकलकर किसी पतली शिरा के सहारे लटक रही थीं। बच्चे का मुँह बार-बार खुलता बन्द हो रहा था, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। थोड़ी देर बाद बच्चे की पकड़ ढीली हो गयी और उसका आधा उठा हुआ शरीर वापस ज़मीन पर धम्म-से गिर पड़ा।


खुशबू ने ठिठककर इधर-उधर देखा कि कहीं उसकी चीख सुनकर पहरेदार तो नहीं दौड़े आ रहे हैं! ...नहीं, कोई नहीं। वह जल्दी-जल्दी रानी रासमणि की झोंपड़ी तक पहुँची। दरवाज़ा जैसा जो कुछ था, खुला हुआ था। भीतर चटाई पर लेटा रासमणि का बूढ़ा बाप भूख से बिलबिला रहा था। खुशबू ने राहत की एक लम्बी साँस ली कि उसे यहाँ आते किसी ने देखा नहीं। उसकी साँस की आवाज़ बूढ़े तक पहुँची तो उसने पूछा, ''आ गयी तू?”खुशबू ने कहा, ''हाँ!”
अपरिचित आवाज़ से बूढ़ा चौंका। पूछा, ''रासमणि? ...कौन?”
''मैं, चावल की खुशबू!”
बूढ़ा बाहर आया। उसे चावल की खुशबू की लू लग गयी। वह मर गया।

21 comments:

aravind said...

“खुशबू की लू” ‘रानीरासमणि की सुंदरता’ “इजराईल-इसराईल की जोड़ी”...सबकुछ कौतुक पूर्ण। आपकी भाषा का फैन हूँ। अब तो उपन्यास का इंतजार है।

संदीप पाण्डेय said...

Very nice part will wait for it...

anurag said...

यह तो अच्छी खबर है। उपन्यास कब तक प्रकाशित हो रहा है? प्रकाशन कौन सा है?

उद्धव said...

रासमणि की सुन्दरता वाला हिस्सा अच्छा और वो दोनो भाई वाला हिस्सा बहुत अच्छा बन पड़ा है। कुछ और अंश भी पढ़ने को मिलेगा तो बात बनें।

vimal chandra pandey said...

bahut badhiya Kunal, is kahani ko padhne ke baad sach kahoon to aj se kai saal pehle hi mujhe laga tha ki ye kisi vrihad vritant ka ansh hai aur meri soch aaj sahi sabit hui. Bhasha ke vishaya me to kuchh kehna hi nahi hai bas shurat se hi pathak ka gadya se jo tartamya ban gaya hai woh ab upanyas ke saath saath sans lega. Kunal ko bahut badhai aur chandan ko apne vyast samay me se asambhav tarike se samay nikal kar itne punya ka kaam karne ke liye bhi bahut badhai.
Vimal Chandra Pandey

Shrikant Dubey said...

हमेशा की तरह इस बार भी आपके गद्य से गुजरना किसी अदेखे, सुरम्य लैंडस्केप से होकर भागते जाने जैसा रहा. इस सफ़र की मंजिल कहाँ है, इसका पता उपन्यास के ताने बाने के विस्तार के साथ ही चलेगा. मुझे इस सिलसिले की हर कड़ी का शिद्दत से इंतज़ार है. ब्लॉग पर उपस्थिति के लिए कुणाल भैया को धन्यवाद!!!

तल्ख़ ज़ुबान said...

उपन्यास अंश से उपन्यास का अंदाज़ लगा पाना मुश्किल है. अभिनव भाषा और नई सूझ बूझ वगैरह आपने कहा है - आपके लेखन का मैं कायल हूँ और आपके शब्दों पर भरोसा भी करता हूँ लेकिन मुआफ़ फरमाइएगा उपन्यास का यह अंश वैसा लग नहीं रहा. जनाब कुणाल सिंह का कहानी संग्रह मैंने पढ़ा है, वे नए हैं, अच्छे भी हैं पर उतने एक्स्ट्रा आर्डिनरी नहीं जैसा मैंने उनके बारे में प्रचार होता देखा है. आप भी उस प्रचार में योगदान तो नहीं दे रहे? वो क्या कहते हैं हिंदी में "महिमा मंडन"! खैर...इस अंश ने उत्सुकता तो पैदा की ही है. उपन्यास छपे तो प्रकाशक आदि के बारे में भी सूचित कीजियेगा- ताकि तुरंत ख़रीदा जा सके. हम तो किताबों पर पैसा ख़र्च करते हैं और उम्मीद करते हैं कि हमारा पैसा ज़ाया न हो! दुआ कीजिये कि इस उपन्यास को खरीद कर पाठकों को संतोष मिले.

Anonymous said...

संजीव जी, आप मार्केट की नजाकत देख कर किसी कंपनी का शेयर खरीदिये, वो शायद आपको कुछ मुनाफा भी करा दे... उपन्यास तो खैर सिर्फ पढ़ने के काम आएगा.

रवि रंजन
नई दिल्ली

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प है .इंतज़ार रहेगा....पंजाब की बेकग्रायुंड पर कुनाल की कहानी मुझे तो बहुत पसंद आयी थी ...

तल्ख़ ज़ुबान said...
This comment has been removed by the author.
तल्ख़ ज़ुबान said...

जनाब रविरंजन जी,

आपने मेरा प्रोफाइल देखने की ज़हमत उठाई इसके लिए शुक्रिया. आपने मुझे शेयर मार्केट जाने की सलाह दी है -इसका भी शुक्रिया. आपकी टिप्पणी से साफ़ है कि आप जैसे लोगों के लिए मतान्तरों के लिए कोई जगह नहीं, आप जड़ हैं और खुद जो सोचते हैं उसे दूसरों पर थोपने में यक़ीन करते हैं. किताब खरीद कर पढने का अर्थ पता है आपको? एक पाठक जब किताब खरीदता है और उसे अपने संग्रह में सहेजता है तो इसका उस किताब के लेखक के लिए क्या मोल है, क्या आपको जरा भी एहसास है? अगर आप लेखक एक दुसरे की पीठ खुजा कर ही प्रसन्न हैं तो फिर मस्त रहिये. प्रशंसा और बड़प्पन के खूब जुएँ पालिये, वानरों की तरह आपस में ही उन्हें बीनिये और हम जैसे जेनुइन पाठकों को देख दांत निपोरिये और इसी तरह की घुड़कियाँ दीजिये .

ख़ुदा ख़ैर करे...

आपका संजीव शर्मा

Anonymous said...

संजीव सर, कुणाल जी के लिखने पर चर्चा करने की बजाय ऐसे वाद विवाद में पड़ना काफी दुखद है, लेकिन अभी सिर्फ एक और बात बताने से खुद को नहीं रोक पा रहा हूँ. आपकी जानकारी के लिए सिर्फ इतना कह दूं कि साहित्य लिखने से मेरा वास्ता सिर्फ उतने भर का है जितना कि एक पाठक का होता है. मैंने कृति के नज़रिए से अब तक न तो कुछ लिखा है और न ही आगामी भविष्य में ऐसी कोई योजना है. इसकी एक वजह कुणाल जैसे लखकों का उम्दा लेखन भी हैं. आपका प्रोफाइल देखना इसलिए ज़रूरी हो गया था कि न जाने क्यूँ आपका कमेन्ट देखकर लगा कि आप एक गैर लेखक नहीं हो सकते. प्रोफाइल देखकर मेरी कल्पना सही साबित हो गयी. अगर आप ही के कमेन्ट से एक बात करूँ, तो "एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी" का इस्तेमाल कम्परेटिव सेंस में होते पहली बार देखा है (शुक्र है कि आप थोडा कम ही सही, लेकिन इन्हें "एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी" मानते तो हैं). आगे, एक एक छोटी सी अपील ये करना चाहूँगा कि गंभीर साहित्य की इस संकटग्रस्त दुनिया में महेश भट्ट और प्रियदर्शन कि फिल्मों के साथ जुड़ने वाले टर्म "पैसा वसूल" की एंट्री न होने दें. और आखिर में एक अंतिम गुज़ारिश ये, कि हो सके तो इस बहस को अब विराम दें ताकि अच्छे लेखक ब्लॉग कि दुनिया को अभिव्यक्ति के लिए एक साफ़ सुथरा प्लेटफ़ॉर्म मान सकें और यहाँ लिखते रहें.

आपका
रवि रंजन.

rakampal said...

बढ़िया गद्य है। उपन्यास को लेकर उत्सुक कराता हुआ अंश है ये। आदिग्राम शब्द में कोई अर्थ छुपा है तब तो थोड़ा थोड़ा समझ में आ रहा है कि उपन्यास की थीम क्या है? पर एक दो अंश और देख ले पहले। कुणाल जी से उम्मीदें हैं। पर हिन्दी के युवा रचनाकारों में सबसे ज्यादा उम्मीद आपसे है चन्दन जी। आपकी भाषा देशज है, आपकी कहानियाँ अपनी बात लगती है। आपका उपन्यास कब आ रहा है?

विनीत कुमार said...

साहित्य का स्टूडेंट रहा लेकिन ईमानदारी से कहूं तो साहित्य के प्रति लंबे समय तक आस्था बची नहीं रह गयी। करीब चार साल से कविता,कहानी,उपन्यास औऱ बाकी विधाएं भी अपने से छूटती चली। एक हद तक मैं ही छोड़ता चला गया। लेकिन इधर पिछले सालभर से महसूस कर रहा हूं कि इनके प्रति एक बार फिर से लगाव बनने लगा है।..और वजह सिर्फ जैगम,कुणाल सिंह,चंदन पाण्डे,प्रभात रंजन जैसे नए रचनाकारों की की खेप की रचनाओं से गुजरना। मुझे लगता है कि कुणाल सिंह हम जैसे साहित्य के भटके स्टेडेंट को साहित्य में वापस लाने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।..इस उपन्यास को पढ़कर इस पर कुछ लिखना चाहूंगा।.

शिरीष कुमार मौर्य said...

प्रिय तल्ख़ ज़ुबान जी यहाँ रविरंजन जी से भिड़ गए.....मुझे रवि भाई का लहज़ा पहली टिप्पणी में ग़लत लेकिन दूसरी में बिलकुल सही लग रहा है. वाकई इस तरह की बहसों को विराम देना चाहिए. और हाँ एक बात और, रवि भाई की तरह मुझे भी तल्ख़ ज़ुबान ग़ैर लेखक नहीं लगते! कुणाल को उपन्यास रचने की बधाई. इसके प्रकाशन का हमें इंतज़ार रहेगा.

Vijaya Singh said...

Upnyas-ansh rochk hai.Khani k aage bdne k sath uska gurutw v bdta jata hai.Bhasha ka prayog suruchiprna hai. Naye UPANYAS hetu Subhkamnayen.

Anonymous said...

kahani ki itni pyari shaili, chamakdaar shabdo me jhankti adhmare bachcho ki bhookh....AUR KYA KAHU..

CHARU

गिरिराज said...

विनीत का कन्फेशन दिलचस्प है; यह शायद एक तरह का सुधीश पचौरी इफेक्ट रहा है।

कुणाल का लिखा हुआ हमेशा अच्छा लगता है,इस अर्थ में ख़ासकर कि
वे जिस विधा में लिखते हैं उसकी संभावनाओं और चुनौतियों का सामना सिर्फ हिन्दी के इमिजियेट पर्यावरण के संदर्भ में ही नहीं करते हैं - यह महत्वाकांक्षा इधर कुछ युवा लेखकों में दिखती है तो बहुत अच्छा लगता है।

टीज़र से अंदाजा लगा पाना मुश्किल है पर निजी रूप से मेरे लिये हिन्दी में उपन्यास को लेकर उम्मीद की एक वजह बन गई है।

Anonymous said...

Upanyas padhne se pahle Comments padh liye...Ravi ji jada sahi lag rahe hai...lekin Jubaan bi kam Talkh nahi hujur...ye to jarur Priyadarshan ki paisa wasul kahani ho sakti hai...rahi baat Kunal ki to lajawab ko lajawab kyo kahu....lekin baki bandhuwaro se gujarish hai- Are maja aa raha tha guru!! Ladte raho...PLEASE!!!

Anonymous said...

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प्रज्ञा पांडेय said...

bhaasha ka kamaal hai aapke paas .