Monday, January 11, 2010

जब हम देखते हैं तो क्या देखते हैं?


(कुणाल सिंह के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण अंश, तस्वीर भी कुणाल की ही )

हाँ तो सन् 1760 की कथा चल रही थी जब ज़मींदारी खत्म कर ईस्ट इंडिया कम्पनी के तीन कारिन्दे मालगुजारी के नियमों में हुए बदलाव की घोषणा करने आदिग्राम पहुँचे थे। कहते हैं कि तब यहाँ जंगल का फैलाव मीलों मील था। नलहाटी बाज़ार तो अँग्रेजों के यहाँ आने के बाद बसा, जब जी.टी. रोड से नज़दीकी के कारण वहाँ अनाज मंडी और गोदाम बनाये गये। इधर जहाँ आज रानीरहाट है, वहाँ पहले कुछ मुसलमान घर थे और बाद में रानी रासमणि के नाम पर उस जगह का नाम रानीरहाट पड़ गया। इस पूरे इलाके का ज़मीदार का नाम बाबर था, जिसकी कोठी आदिग्राम में थी। कोठी अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है, जहाँ बाघा और दक्खिना ने अपनी गृहस्थी बसा रखी है।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से जो तीन कारिन्दे आए थे, उनमें दो गोरे थे और तीसरा काला। काले को साथ में इसलिए रखा गया था क्योंकि वह मूलत: यहीं का रहने वाला था, सो इलाके के भूगोल से भली-भाँति परिचित था। दूसरे, वह गोरे साहबों की भाषा भी जानता था और यहाँ बोली जाने वाली देसी भाषा भी।

आदिग्राम के किसानों ने जब जाना कि अब उनकी ज़मीन उनकी नहीं रही, ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो गयी है, और इस पर खेती करने के लिए उन्हें फसल का एक हिस्सा कम्पनी को देना होगा, तो वे मरने-मारने पर उतारू हो गये। एक दिन आदिग्राम के जंगलों में दोनों गोरे अफसरों की लाश पायी गयी। काले को इसलिए जि़न्दा छोड़ दिया गया कि वह जाकर अपने हुक्मरानों को इसकी इत्तेला कर सके। उन दो गोरे अफसरों में हैट और चुरुट वाला, भारत का पहला अँग्रेज कलक्टर था और दूसरा जो उससे थोड़ी कम उम्र का, लेकिन ज़्यादा अनुभवी लगता था, दारोगा था।

आदिग्राम के इतिहास में होने वाला यह पहला कत्ल था, और एक नहीं दो-दो, दोनों ही गोरे अफसर। दूर-दूर से लोग आए थे देखने। छूकर देख रहे थे कि गोरी चमड़ी को छूने में कैसा लगता है। लाशों की मिट्टी काठ की तरह कड़ी हो गयी थी। लोग तय नहीं कर पा रहे थे कि लाशों को हिन्दुओं की तरह जलाया जाए या मुसलमानों की तरह दफ्न किया जाए। हिन्दू तैयार नहीं थे कि जहाँ उनके शवों का दाह किया जाता है वहाँ किसी म्लेच्छ का भी अन्तिम संस्कार हो और दूसरी तरफ मुसलमान भी अपने कब्रिस्तान में उन्हें कोई कब्र देने के लिए राज़ी नहीं हो रहे थे। इलाके के इतिहास में यह पहली बार था जब दो-दो लाशों को यों ही छोड़ दिया गया जंगली जानवरों के हवाले। जंगली जानवरों ने पहली बार इंसानी खून चखा।

दस-पन्द्रह दिन के भीतर आदिग्राम का चप्पा-चप्पा गोरे-काले फौजियों से भर गया। जंगल के सीमान्त प्रदेश में सात-आठ सौ तम्बू लग गये, जगह-जगह तोप, बंकर। लोगों के चेहरे पर भय की काली परछाइयाँ उतरने लगीं। फौज के कमांडर ने गाँव में घूम-घूमकर मुनादी करवा दी कि जो किसान कम्पनी को मालगुजारी देने में आनाकानी करेगा, उसे सरेआम कोड़े से पीटा जाएगा। अगर वह फिर भी राज़ी नहीं हुआ, तो उसे सूली पर टाँग दिया जाएगा। इस प्रकार रातोंरात पूरे इलाके पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज हो गया। सारी ज़मीन एक झटके में कम्पनी की हो गयी। अब किसान अपनी ही ज़मीन पर मजदूरी करेंगे। फसल बोने से पहले उन्हें कम्पनी की इजाज़त लेनी पड़ेगी कि धान रोपें या मान लीजिए अफीम या नील की खेती करें।

इतना होने के बाद, जैसे यह काफी नहीं था, पाँच-छ: साल बाद भीषण अकाल पड़ा। अब तक दर्ज इतिहास में बंगाल पर पडऩे वाला पहला अकाल। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। चारों तरफ हाहाकार मच गया। लेकिन कम्पनी ने मालगुजारी में कोई रियायत नहीं बरती। खाने को अन्न नहीं, मालगुजारी कहाँ से दे! बच्चे बूढ़े सब पर कोड़े बरसे, औरतों ने अफसरों की सेवा-टहल तक कबूल कर ली, फिर भी मालगुजारी चुक्ता करने भर पैसे इकट्ठा नहीं हुए।

परिमलेन्दु दा बताते हैं कि एक तरफ तो बंगाल के इस इलाके में इतना भीषण अकाल पड़ा था, दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारिन्दों का मालगुजारी वसूलने के लिए इतना अमानवीय अत्याचार। धीरे-धीरे अकाल की मार से बचे हुए लोगों में विद्रोह की चिनगारी सुलगने लगी। वे एकजुट होकर छिटपुट हमले करने लगे। कम्पनी के कारिन्दों की लाशें कभी पोखर से तो कभी जंगल से बरामद होतीं। बाद के वर्षों में आदिग्राम में दो और अँग्रेज कलक्टरों की हत्या हुई। इतिहास में इस विद्रोह को 'चुआड़ विद्रोह’ कहा गया। अँग्रेज इस विद्रोह को कुचलने में नाकामयाब हो रहे थे। इलाके के बच्चे-बच्चे तक तीरन्दाज़ी में पारंगत हो चुके थे। जंगलों में गुप्त मीटिंगें होतीं और आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की जाती। 'जान दूँगा, ज़मीन नहीं दूँगा’ जैसे नारे पहली बार इतिहास में तभी गूँजे थे।
लेकिन परिमलेन्दु दा ये किस इतिहास की बात कर रहे हैं? स्कूल के पाठ्यक्रम में इतिहास की जो पुस्तक लगी है, उसमें कहाँ किसी 'चुआड़ आन्दोलन’ और 'जान दूँगा, ज़मीन नहीं दूँगा’ जैसे नारों का जिक्र आता है? कोलकाता से पढ़-लिखकर आए इतिहास के सर भी इस बारे में कुछ नहीं जानते। ...और वह 27 अक्तूबर वाली घटना? बच्चों ने जि़द की कि परिमलेन्दु दा एक बार फिर से 27 अक्तूबर वाली कथा सुनाएँ।

रानी रासमणि ने इलाके की औरतों को बटोरकर एक लड़ाकू वाहिनी तैयार की थी। 27 अक्तूबर, 1770 की घनघोर अँधेरी रात जब कम्पनी के कुछ कारिन्दे नलहाटी बाज़ार से बैलगाडिय़ों पर धान लादकर चले तो उन्हें इस बात का ज़रा भी अन्दाज़ा नहीं था कि उनके साथ क्या होने जा रहा है।

नलहाटी से जी.टी. रोड पकड़कर कलकत्ते की ओर बढ़ें तो बशीरपुर के पास आधेक मील तक रोड जंगल से होकर गुज़रता है। कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात। जंगल में चारों तरफ झिंगुरों की चिर्र-चिर्र, साँपों की सिसकारियाँ। जुगनुओं की चौंध उरूज पर थी। धान से लदी चार बैलगाडिय़ाँ थीं, सबके नीचे एक-एक लालटेन लटक रहा था। लालटेन की रोशनी आगे कुछ फलाँग भर पीला उजाला कर रही थी, फिर दूर दृश्य के अँधेरे में बिला जाती थी।
पहली बैलगाड़ी पर एक बन्दूकधारी सिपाही भी बैठा था। बैल सुस्त चाल में चलते-चलते जब एकाएक ठिठक गये तो उसकी नींद में झिपझिपाती आँखें खुलीं। उसने चौंककर गाड़ीवान को देखा। गाड़ीवान के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, यह उस मद्धिम रोशनी में भी साफ-साफ दिख गया। आँखों की पुतलियाँ स्थिर पड़ गयी थीं, मानो पत्थर की हो गयी हों। वह सामने की तरफ देख रहा था। सिपाही ने उसकी दृष्टि का अनुसरण करते हुए जब सामने की तरफ देखा, उसकी भी घिघ्घी बँध गयी।

पहली नज़र में तो लगा, जंगल के घनघोर अँधेरे में कहीं से दूधिया रोशनी का एक फौव्वारा फूट निकला हो। धीरे-धीरे रोशनी के केन्द्र में एक स्त्री आकृति उद्भासित हुई। सिपाही ने देखा, उस स्त्री की देह पर एक सूत भी कपड़ा नहीं था। बाल खुले हुए पीछे, जैसे घुटनों तक काले पानी का कोई झरना गिर रहा हो। शरीर का हर अंग अनावृत होकर जैसे सम्पूर्ण हो गया हो, और इस दर्प से भरकर दमकने लगा हो। केले के थम्ब जैसी चिकनी जाँघें, पेट के सुडौल खम और निर्दोष गोलाइयों वाले स्तन जैसे दुनिया की नश्वरता और असम्पूर्णता का उपहास उड़ा रहे हों। उसकी देह से छिटकती रोशनी में दुनियावी मिट्टी का कण मात्र नहीं था, वह मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो।

सिपाही को काठ मार गया। वह अपनी जगह पर बुत बन गया। कम्पनी का वह जाना-माना बन्दूकची था। सिपाही पद पर नियुक्ति से पहले उसे बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग दी गयी थी। उसका निशाना इतना पक्का था कि उड़ती हुई चिडिय़ा के पंख झाड़ देता था। नियुक्तिपूर्व वह हर अभ्यास में अव्वल आया था। उसका कद छ: फुट से ऊपर था। चौरस चेहरा, प्रकांड सिर, घने-घुँघरीले बाल, गलमुच्छे। उसके शरीर में दैत्य का बल था। चलता था तो धरती धम्म-धम्म बजती थी। वह उखड़े हुए अरबी घोड़े की लगाम पकड़कर मिनटों में उस पर काबू पा लेता था। अशर्फी को मुट्ठी में जकड़कर चूरमा बना डालता था। पेड़ को अँकवार में पकड़कर जड़ समेत उखाड़ फेंकता था। पूरा मेमना एक बार में खा जाता था और डकारता भी नहीं था। लोगबाग उसका नाम सुनकर ही काँप जाते थे। लेकिन जीवन में पहली बार डर के मारे उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदे चुहचुहा आईं।

रानी रासमणि उसके करीब आई। लालटेन की पीली रोशनी में उसने रासमणि के अंडाकार चेहरे को देखा। भँवों की गोलाई, मछलियों जैसी उसकी आँखें देखीं। गरदन की धारियाँ और नीचे की फीकी त्वचा जहाँ से स्तन उगने शुरू हुए थे, बायीं तरफ एक काला तिल था। सिपाही उस तिल पर जाकर अटक गया। उसे लगा, उसके भीतर के सारे दरवाज़े एकाएक भड़भड़ाकर बन्द पड़ गये हों। उसने अपने घुटनों में हल्की कँपकँपी महसूस की। पेडू में रह-रहकर एक मरोड़-सी उठ रही थी। हलक में मानो काँटे उग आये हों। उसने कई बार अपने होंठ गीले करने की कोशिश की। धड़कनों की रफ्तार इतनी बढ़ गयी थी कि लगता था छाती के पंजरे फट पड़ेंगे। सिपाही पद पर नियुक्ति के वक्त उसे बिल्कुल नहीं सिखाया गया था कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। उसके पास कारतूस से भरा बन्दूक था, लेकिन आज वह एक छोटे-से तिल से हार गया था।

तभी पीछे से कई स्त्रियाँ आईं और बैलगाडिय़ों से धान की बोरियाँ उतारने में लग गयीं। सिपाही समेत सारे गाड़ीवान उन्हें ऐसा करते देखते रहे और अपनी जगह पर बुत बने रहे। बोरियाँ उतारकर उन्होंने एक दूसरे की पीठ पर लादी और जैसे आई थीं, वैसे ही अँधेरे में बिला गयीं। रानी रासमणि ने सिपाही के कन्धे पर हाथ रखा। एकाएक सिपाही के शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ गया। सबसे पहले उसकी नाक से खून की बूँदें निकलीं, टपकने लगीं। दाँतों-मसूढ़ों से खून निकलकर होंठों को रँगने लगा। उँगलियों की पोरें फट गयीं। कनपटी के पीछे से खून की एक झिझकती-सी रेखा निकल पड़ी। हड्डियाँ तिड़कने लगीं। रासमणि के निर्वस्त्र शरीर की आँच से सिपाही झुलसने लगा, उसकी चमड़ी गलने लगी। चारों तरफ मांस जलने की एक चिरचिराती-सी गन्ध फैल गयी। देखते-देखते सिपाही का पूरा शरीर गलकर बहने लगा। सिपाही फना हो गया।

ऐसी रानी रासमणि ने इलाके के ज़मींदार बाबर से शादी क्यों की? कहते हैं कि बाबर अमावस की अँधेरी रात की तरह काला था, उसकी तोंद निकली हुई थी, उसकी एक आँख पत्थर की थी, उसे एक कान से सुनाई नहीं देता था, वह लँगड़ा कर चलता था और उसकी देह से हमेशा पसीने की एक अजीब खट्टी गन्ध आती थी। क्या इन्हीं सब वजहों से इस दुनिया में सिर्फ वही था जो रानी रासमणि से ब्याह कर सकता था?

लेकिन मूल प्रश्न था कि रानी रासमणि ने बाबर में ऐसा क्या देखा जो उससे शादी कर ली! फोटोग्राफर से पूछा जाए कि देखना आखिर कहते किसे हैं! फटिकचन्द्र के बहुत से साथियों को बिलकीस अच्छी नहीं लगती, लेकिन जब फटिक उसे देखता है तो बस देखता ही रह जाता है। वह अक्सर अपने दोस्तों को सफाई देता है कि तुम लोग जिस दिन उसे मेरी नज़र से देखोगे, समझ जाओगे। किसी और की नज़र से भला कैसे देखा जाए! दो लोगों की नज़र में दुनिया दो तरह की दिखती होगी। इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ इतने एक जैसे थे कि भले ही उन्हें दुनिया दो तरह की दिखती हो, लेकिन दुनिया उन्हें एक ही नज़र से देखती थी। वे भी चालाकी से अपनी अलग-अलग देखी दुनिया को परस्पर साझा कर लिया करते थे। एक कहता था, भाई याद रखना मैंने बेनी माधव की बहू से मज़ाक किया है और कहा है कि तुम मुझे बहुत सुन्दर लगती हो। उस दिन के बाद से बेनी माधव की बहू दूसरे भाई को भी सुन्दर लगने लगती। मुलाकात होती तो वह भी कहता, तुम मुझे बहुत सुन्दर लगती हो जी! बेनी माधव की बहू कहती, ओहो, कितनी बार कहोगे! इसी तरह जो भाई अपने अब्बा के साथ दुकान पर बैठा, वह नलहाटी बाज़ार में मुंशीगिरी करने के बाद लौटे हुए भाई को यह ज़रूर बता देता कि आज बंशी पोद्दार ने पचास रुपये का बकाया सामान लिया है, ताकि दूसरे दिन अगर उसकी जगह मुंशी भाई दुकान पर बैठे तो बकाया वसूल न सही, कम से कम तगादा तो कर सके। दोनों भाई अपने साथ घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का जिक्र एक दूसरे से करते। इस प्रकार बाकियों के लिए अगर चौबीस घंटे के दिन-रात हों तो इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ के लिए अड़तालीस घंटे के होते थे। यह प्रकृति के शाश्वत नियमों का उल्लंघन था। दुनिया में एक आदमी एक ही वक्त दो-दो जगहों पर मौजूद रहे, यह दुनिया की आँखों में धूल झोंकने जैसा था। इसलिए दुनिया ने षड्यन्त्र रचकर एक देश के दो टुकड़े कर दिए और दोनों को अलग-अलग दो देशों में डाल दिया। बीच में सरहद खींची, बी.एस.एफ. का दस्ता तैनात कर दिया।
जब हम देखते हैं, तो आखिर क्या दिखता है! जो हमें दिखता है, ऐन वही क्या गाय भैंस बकरी को भी दिखता है? गाय भैंस बकरी की नज़र से देखा जाए तो दुनिया घास से भरी हुई एक टोकरी है। उन्हें हर जगह घास ही घास दिखता होगा। अगर कहीं नहीं दिखता तो घास की तलाश में वे पृथ्वी के दूसरे कोने तक चले जाएँगे। पर्वत पठार गुफा समन्दर सब लाँघ जाएँगे, लेकिन जब लौटेंगे तो उनके पास सिर्फ घास के संस्मरण होंगे। वे घास के बारे में बतियाते होंगे, उस पर कविता-कहानी लिखते होंगे, रियलिटी शो और टैलेंट हंट करवाते होंगे और पुरस्कार स्वरूप जीतने वाले के घास-फूस के घर को एक टाल घास से भर देते होंगे।
फोटोग्राफर को जब अपने देखने पर यकीन नहीं होता कि उसने सिटकनी लगायी है या नहीं, तो वह उसे छूकर देख लेता है। लेकिन तारों को देखना हो तो उन्हें कैसे छुआ जाए! किसी तारे को देर तक एकटुक देखते रह जाया जाए जो वह सिहरकर टिमटिमाने लगता है। सूरज की रोशनी या दिन को देखना इतना अदृश्य होता है कि उन्हें अलग से नहीं देखना पड़ता। दोपहर के वक्त किसी पेड़ के दृश्य में दिन की रोशनी का दिखना इतना घुला-मिला होता है जैसे दूध में पानी। हंस को पेड़ का दिखना और दिन का दिखना अलग-अलग दिख जाता होगा। अँधेरे में बिना टॉर्च या लालटेन के चलो तो रास्ता नहीं दिखता, सिर्फ अँधेरा दिखता है। जुगनुओं को दिखने के लिए अँधेरे का इन्तज़ार करना पड़ता है। रात के अँधेरे में कहीं रातरानी खिली हो तो उससे आती खुशबू उसका पता बता देती है। रातरानी कभी नहीं देख पाती कि वह कितनी खूबसूरत है और एक दिन मुरझा कर गिर जाती है। रासमणि और रातरानी में कितनी समानता है! दोनों ही एक दूसरे की तरह अन्धी हैं।

12 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

बहुत रोचक और उत्सकता पैदा करने वाला.

Aparna said...

Interesting...... & Awaited

विनीत कुमार said...

यकीन मानिए,उपन्यास के इस हिस्से को पढ़ते हुए मुझे दास्तानगोई की याद आती चली गयी। महमूद फारुकी का दास्तान के हिसाब से बनता, बदलता चेहरा याद आने लगा और दानिश की दास्तान के हिसाब से स्वरों का उतार-चढ़ाव,शब्दों का खिंचाव। इस उपन्यास में कथानक को थोड़ी देर के लिए अलग करते हुए सिर्फ और सिर्फ कहने के ढंग पर बात करें तो आपको लगेगा कि इतिहास का पढ़ना इतना रोमांचकारी अनुभव हो सकता है? वही इतिहास जिससे हम अक्सर पिंड छुड़ाते रहे। ये पूरा का पूरा पढ़ते हुए दृश्य बिंब पैदा करती है और कभी भी नहीं लगता है कि उपन्यास को हम पाठक की हैसियत से पढ़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि कोई हमें पढ़कर सुना रहा है,इनैक्ट करके दिखा रहा है। रेडियो नाटक का रोमांच पैदा कर रहा है ये उपन्यास और बड़ी इच्छा है कि इसे जल्द ही विजुअल माध्यम में रुपांतरित किया जाय। इसके भीतर इसकी संभावना और ताकत मौजूद है।..लगता नहीं कि इस तरह टुकड़ो-टुकड़ो में पढ़कर बात बनेगी।..

Anonymous said...

interesting. novel kahan se publish hoga?

nikki, new delhi

Anonymous said...

कुणाल....
उपन्यास का यह अंश रोचक..
आदिग्राम में दिल कहीं फंस गया लगता है..
रानी रासमणि...और कई चेहरे पहचाने से...
लेकिन चमत्कार करना कोई तुमसे सीखे...
तुम्हारा कल भी कायल था
आज भी हूँ
आशा है बहुत जल्द पूरा उपन्यास पढ़ने को मिलेगा....
Keep it up........
विमलेश त्रिपाठी
मेरा ब्ल़ॉग भी देखो http://bimleshtripathi.blogspot.com

अंकुर said...

मेरी बधाई स्वीकार करो

Vijaya Singh said...

Upanyas ka dusra ansh v man bandhnewala hai.Bhasha ne v bhaw k sundar visuals creat kiye hai.Rani Rasmani dwara stri sexality ka adhikar aur prayog stri-stya se puns-stya ko algata hai.Apne shrir aur satta ka swaytt nirnay leti nari ka sach bahuaayami hai jiske samne ekayami aadhar par tiki punswadi vyawstha nihatthi hai,gungi hai,jad hai...RASMANI ke chhute hi sipahi galne lgta hai.MANY WISHES...

Anonymous said...

जब हम देखते हैं, तो आखिर क्या दिखता है! जो हमें दिखता है, ऐन वही क्या गाय भैंस बकरी को भी दिखता है? गाय भैंस बकरी की नज़र से देखा जाए तो दुनिया घास से भरी हुई एक टोकरी है। उन्हें हर जगह घास ही घास दिखता होगा। अगर कहीं नहीं दिखता तो घास की तलाश में वे पृथ्वी के दूसरे कोने तक चले जाएँगे। पर्वत पठार गुफा समन्दर सब लाँघ जाएँगे, लेकिन जब लौटेंगे तो उनके पास सिर्फ घास के संस्मरण होंगे। वे घास के बारे में बतियाते होंगे, उस पर कविता-कहानी लिखते होंगे, रियलिटी शो और टैलेंट हंट करवाते होंगे और पुरस्कार स्वरूप जीतने वाले के घास-फूस के घर को एक टाल घास से भर देते होंगे।
फोटोग्राफर को जब अपने देखने पर यकीन नहीं होता कि उसने सिटकनी लगायी है या नहीं, तो वह उसे छूकर देख लेता है। लेकिन तारों को देखना हो तो उन्हें कैसे छुआ जाए! किसी तारे को देर तक एकटुक देखते रह जाया जाए जो वह सिहरकर टिमटिमाने लगता है। सूरज की रोशनी या दिन को देखना इतना अदृश्य होता है कि उन्हें अलग से नहीं देखना पड़ता। दोपहर के वक्त किसी पेड़ के दृश्य में दिन की रोशनी का दिखना इतना घुला-मिला होता है जैसे दूध में पानी। हंस को पेड़ का दिखना और दिन का दिखना अलग-अलग दिख जाता होगा। अँधेरे में बिना टॉर्च या लालटेन के चलो तो रास्ता नहीं दिखता, सिर्फ अँधेरा दिखता है। जुगनुओं को दिखने के लिए अँधेरे का इन्तज़ार करना पड़ता है। रात के अँधेरे में कहीं रातरानी खिली हो तो उससे आती खुशबू उसका पता बता देती है। रातरानी कभी नहीं देख पाती कि वह कितनी खूबसूरत है और एक दिन मुरझा कर गिर जाती है। रासमणि और रातरानी में कितनी समानता है! दोनों ही एक दूसरे की तरह अन्धी हैं।

aisa lagta hai sare pyare shabd aapki baat johte hai
aap kuchh likhne ki sochte hai aur wo gaon ki galiyon se upakhyano se lokkathawo se jane kaha kaha se aakar aapki lekhni se lipat jate hai. yah ansh aur bhi achha laga..itihas k kale andhere me ujli rasmani, adbhut...

Anonymous said...

जब हम देखते हैं, तो आखिर क्या दिखता है! जो हमें दिखता है, ऐन वही क्या गाय भैंस बकरी को भी दिखता है? गाय भैंस बकरी की नज़र से देखा जाए तो दुनिया घास से भरी हुई एक टोकरी है। उन्हें हर जगह घास ही घास दिखता होगा। अगर कहीं नहीं दिखता तो घास की तलाश में वे पृथ्वी के दूसरे कोने तक चले जाएँगे। पर्वत पठार गुफा समन्दर सब लाँघ जाएँगे, लेकिन जब लौटेंगे तो उनके पास सिर्फ घास के संस्मरण होंगे। वे घास के बारे में बतियाते होंगे, उस पर कविता-कहानी लिखते होंगे, रियलिटी शो और टैलेंट हंट करवाते होंगे और पुरस्कार स्वरूप जीतने वाले के घास-फूस के घर को एक टाल घास से भर देते होंगे।
फोटोग्राफर को जब अपने देखने पर यकीन नहीं होता कि उसने सिटकनी लगायी है या नहीं, तो वह उसे छूकर देख लेता है। लेकिन तारों को देखना हो तो उन्हें कैसे छुआ जाए! किसी तारे को देर तक एकटुक देखते रह जाया जाए जो वह सिहरकर टिमटिमाने लगता है। सूरज की रोशनी या दिन को देखना इतना अदृश्य होता है कि उन्हें अलग से नहीं देखना पड़ता। दोपहर के वक्त किसी पेड़ के दृश्य में दिन की रोशनी का दिखना इतना घुला-मिला होता है जैसे दूध में पानी। हंस को पेड़ का दिखना और दिन का दिखना अलग-अलग दिख जाता होगा। अँधेरे में बिना टॉर्च या लालटेन के चलो तो रास्ता नहीं दिखता, सिर्फ अँधेरा दिखता है। जुगनुओं को दिखने के लिए अँधेरे का इन्तज़ार करना पड़ता है। रात के अँधेरे में कहीं रातरानी खिली हो तो उससे आती खुशबू उसका पता बता देती है। रातरानी कभी नहीं देख पाती कि वह कितनी खूबसूरत है और एक दिन मुरझा कर गिर जाती है। रासमणि और रातरानी में कितनी समानता है! दोनों ही एक दूसरे की तरह अन्धी हैं।

aisa lagta hai sare pyare shabd aapki baat johte hai
aap kuchh likhne ki sochte hai aur wo gaon ki galiyon se upakhyano se lokkathawo se jane kaha kaha se aakar aapki lekhni se lipat jate hai. yah ansh aur bhi achha laga..itihas k kale andhere me ujli rasmani, adbhut...
PRERNA

GUESS? said...

kunal aaj meine tumara upanyas ko mile comment pade. achche lage. aisa laga jaise koi mere upanyas ki tarif kar raha hai.

ALL D BEST.

Anonymous said...

chandan bhai upanyas ka 3rd ansh kab aayega? ya is beech upanyas publish ho chuka? agar haan to kahan se?
ashok aahuja

प्रज्ञा पांडेय said...

kunaal .. jo thoda sa padhaa vah behad romaanchak hai .bhaasha ko aapne apane dhang se dhaala hai tahe dil se badhaayi ..