Tuesday, March 8, 2011

कला का आदर

जिन दिनों लिखना, किसी नाव की तरह, ठहर जाता है, उन्हीं दिनों अचानक से कोई मित्र नमूदार होता है और चीजें धार पकड़ लेती हैं. साथी सचिन (दैनिक जनवाणी) से बातचीत के दौरान यह तय हुआ कि गद्यनुमा कुछ लिखा जाए. यह गद्यांश दैनिक जनवाणी में प्रकाशित है.  तस्वीर साथी नासिर के किताबे-अक्स (फेसबुक) की दीवार से..




सप्ताहांत का नाम फुर्सत दिया जाए ?


अगर थोड़ी फुर्सत की इच्छा करें तो आजकल समय, किसी अतिप्रिय की आवाज की तरह हो गया है. ऐसी आवाज जिसे सुनने को जी चाहता है पर बोले जाने के कुछेक पल के बाद ही वो आवाज खो जाती है, मिट जाती है. समय भी ऐसा हो गया है कि फुर्सत के कुछ पल चाहिए और जब वे पल आते हैं तो साथ ही साथ यह अन्देशा भी चला आता है कि यह मोहलत बहुत मामूली है. इतनी मामूली कि कोई मनपसन्द काम नहीं हो पाता. आप कुछ लिख नहीं पाते, कुछ पढ़ नही पाते और देखते देखते सप्ताहांत बीत जाता है.

महीना पहले जब मैं बंगलौर आया तो मेरे साथ किताबें थीं और जगह कम. पर मेरे रूम पार्टनर, श्रीधर, ने खुशी खुशी जगह बनाई और हमने कई तहों में किताबें, आलमारियों में सहेजने के अन्दाज में रखा. वो मेरे कहानीकार होने को जानते थे और उनके मन में कला का यह ऊंचा भाव है कि जब तब उनके मित्र आते हैं और खुशी खुशी वो मेरा परिचय देते हैं – चन्दन भाई, कहानीकार हैं. मेरे बारे में सारी दूसरी सूचनाएँ गौण हैं.

इसी तरह, उन्होने मेरे बारे में उस औरत को बताया होगा, जो हमारे यहाँ भोजन पकाने आती हैं. उन्हें हम दीदी बुलाते हैं. नीचे के फ्लैट मे रहने वाली एक राजस्थानी महिला इस दीदी का इस्तेमाल गब्बरनुमा करती है. वो अपने बच्चे को कहती है : बेटा नीचे आ जाओ वरना भूत आ जायेगा. होता क्या है कि यह दीदी मुसलमान हैं और बुर्के/ नकाब के लिबास में आती हैं. इसी नकाब की वजह से उस महिला ने, जाने मासूमियत से या बदमाशी से, इनका नाम भूत रख दिया है.

पर हम बात कला के आदर की कर रहे थे.

शाम का कोई झुटपुटा समय था, मैं ‘नाथन इंग्लैंडर’ का कहानी संग्रह ‘फॉर द रिलीफ ऑफ अनबियरेबल अर्जेज’ पढ़ रहा था कि दीदी ने पूछा : भईया, आप किताब लिखते हो ? उनके पूछने मे एक पुलक थी. मैने भी जबाव दिया: हाँ, लिखता तो हूँ. मैं बूझ गया कि श्रीधर ने इन्हे बताया होगा. बात आई गई हो गई.

दसेक दिन पहले की बात है, दीदी ने एक मुझसे कहा : भईया, आप बच्चों की कहानियाँ भी लिखते हो? मैने कहा : नहीं. फिर मैने एक पाठनुमा उन्हे कुछ पढ़ा दिया. मैं गम्भीर मुद्दों पर लिखता हूँ. मैं ऐसा करता हूँ. मैं वैसा करता हूँ. ना जाने कैसा करता हूँ. दीदी चुप हो गई. उन्हें लगा कि शायद उनसे कोई गलती हो गई है इसलिए उन्होने शब्दश: तो माफी नहीं मांगी पर जो कहा उसमें भाव माफी मांगने वाला था. उन्होने कहा : मेरे बच्चे ने पूछा था.

इस बात पर मेरी दिलचस्पी बढ़ गई. मैने उनके बच्चे के बारे मे पूछा, मुझे लगा कि कालेज जाने आने वाला जिज्ञासु होगा. उन्होने बताया कि उनका सबसे छोटा बेटा, वसीम, पांचवी कक्षा का छात्र है. उस बच्चे को स्कूल से प्रोजेक्ट मिला था कि अपने मन से कोई कहानी लिखकर लानी है और जब उसने अपनी माँ से मेरे बारे में सुना था तो यह अर्ज लगाई थी कि क्या अंकल मेरे लिए कहानी लिख देंगे?

सच कहूँ तो यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात थी. लोग कहते हैं कि कला का अनादर हो रहा है. पर आजतक मैने कोई ऐसी जगह नहीं पाई जहाँ मेरा अनादर या अपमान इसलिए किया गया हो क्योंकि मैं कहानीकार हूँ. यह जरूर है कि मैं सारी अपेक्षाओं का बोझ कला के सर नहीं डाल देता जैसे मैं कभी यह अपेक्षा नहीं रखता कि मेरे कहानीकार होने के नाते मुझे कोई आरक्षण दिया जाए . यह भी नहीं कहानीकार होने के नाते मैं कोई गैरवाजिब फायदा मैं लेने की कोशिश करूँ. कला की सीमा है तो उसके रंगरूटों की भी होनी चाहिए. यह समय कला का उत्कर्ष काल नही है.

वसीम के प्रस्ताव पर मैं बहुत खुश हुआ. सादा इच्छा यह जगी कि अपनी जमा की गई कहानियाँ लिखता ही रहता हूँ इस बार वसीम के लिए लिखी जाए. एक बार मैं वसीम से मिला. उससे पूछा कि कैसी कहानी चाहते हो? उसने कहा : मुझे कैसे पता होगा? मैने उसकी दिनचर्या से सम्बन्धित कुछ बातें की और जाने कैसे और कब यह हुआ कि उसका और मेरा बचपन ‘ब्लर’ करने लगा. इसतरह मैने उस बच्चे की कहानी लिखी या अपनी ही कहानी उस बच्चे के नाम से लिखी या क्या पता किसी तीसरे की कहानी हो जिसे मैं शिद्दत से जीना चाहता रहा होऊँ.

जाहिर सी बात है, कहानी में एक लड़का है, कबीर, जो स्कूल नहीं जाना चाहता है. डरता है कि जिस शिक्षक ने उसे पीटने की बात कही थी, आज वो किसी ना किसी बहाने मारेंगे. हुआ यह था कि शिक्षक ने कई चीजे गलत पढ़ा दी थीं, जैसे उन्होने एक अंग्रेजी वाक्य का मतलब ही गलत बताया था. वाक्य था : ही रंस हिज शॉप. इसका अर्थ उन्होने बताया था : वह अपनी दुकान तक दौड़ता है. दूसरे, हिन्दी भी वही पढाते थे जिसमें एक कविता आती है : बसंत के चपल चरण. इसका भावार्थ उन्होने बताया था ; बसंत चप्पल पहन के घूम रहा है.

कबीर को क्या पड़ी थी कि शिक्षक से पंगा ले पर एक दिन उसका भारी बस्ता, जिसमें क्रिक़ेट बॉल, शतरंज, लूडो और साँप – सीढ़ी के अलावा कुछ किताब कॉपी भी मिली. पिता ने सारी गलती पकड़ ली और अगली सुबह स्कूल पहुंच गये. शिक्षक को प्रधानाचार्य ने भला बुरा कहा और उस दिन से वह शिक्षक रोज किसी ना किसी बहाने कबीर को मारते पीटते हैं, मुर्गा बनाए रखते हैं, कक्षा मे मजाक उड़ाते हैं और सारा काम उससे ही कराते हैं.

वही कबीर, आज स्कूल जाने से डर रहा है. रोज चाहता है कि सूरज ही ना निकले. ना दिन होगा, ना स्कूल खुलेगा, ना वो स्कूल जाएगा और मार खाने से बच जाएगा. आज अभी वो सोच ही रहा था कि काश सूरज ना निकले, तभी चारो तरफ अन्धेरा छा गया. सूरज जो आधा निकल चुका था वो वापस डूब गया.

इस तरह यह कहानी आगे बढ़ती है. जब मैने उस लड़के को यह कहानी दी तो उसने सहमते हुए पूछा कि इसमें आपका नाम नहीं आयेगा ना ! मैं बच्चे की मासूमियत समझ गया. मैने हँसते हुए कहा; यह मैने तुम्हारे लिए लिखी है और तुम इसे अपने ही नाम से दिखाना.

जैसे मेरी इस बात का भी क्लाईमेक्स बाकी हो कि पिछले हफ्ते वसीम मेरे घर आया और उसने मुझे कहानी लौटा दी. कहा : इतना अच्छा मैं अभी नहीं लिख सकता. जब मैं लिखूंगा तब आपको दिखाऊंगा. हो सकता हो, ऐसा उसने किसी के कहने पर किया हो पर है तो अभी बच्चा ही, और बच्चे कहने, बताने पर ही तो सीखते हैं.

2 comments:

नीरज बसलियाल said...

बढ़िया कहानी वही होती है , जो बच्चों की आँखों से देखी जाती है... बहुत बढ़िया |

बाकी लेखक नाम से प्रसिद्धि तो हमें भी अपने दोस्तों के दोस्तों में मिलती है | लोग पढ़ते भी हैं .. शायद :)

मनोज पटेल said...

शानदार, कबीर की कहानी पूरी पढ़ने की इच्छा है.

सचिन जी को बहुत-बहुत धन्यवाद कि अब आपसे कुछ न कुछ नियमित पढ़ने को मिलता रहेगा.