Friday, August 19, 2011

निमारी संस्कृति पर पहली फिल्म : ऐसा देश है मेरा

( मेरे लिए आरिफ हमीद मित्रवत शिक्षक रहे हैं. सिनेमा देखना, उस पर लिखना पढ़ना अन्य जगहों से सीखा, पर सिनेमा निर्माण का अगर कुछ ककहरा होता है तो उसे आरिफ हमीद जी से ही जाना. इनके साथ मैने पहली 
डॉक्यूमेंट्री की थी, जिसके सिलसिले में स्क्रिप्ट, सम्पादन और कैमरे के व्याकरण को आरिफ जी ने बखूबी बताया. अब वही आरिफ अपनी पहली 'फीचर' फिल्म के साथ आ रहे हैं, और हम उनके इस कदम का तहेदिल से इस्तेकबाल करते हैं. फिल्म 'ऐसा देश है मेरा' का निर्देशन आरिफ साहब का ही है. दशकों तक रंगमंच से जुड़े आरिफ का 'सिनेमाटिक मूड' इस जमाने की प्रचलित भव्यता के खिलाफ है. सरलता उनकी 'फ्रेम' है. इस फिल्म के लिए अथाह शुभकामनाएँ. 

फिल्म पर यह परिचयात्मक टिप्पणी शेषनाथ पाण्डेय की है. शेष, धारावाहिकों की दुनिया से जुड़े हैं और किसी भी दिन यह सूचना धमक सकती है कि शेष फिल्मों के लिए लिख रहे हैं. 

फिल्म के क्लिप्स यहाँ देखें : http://piujitharodesmovie.com )
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ऐसा देश है मेरा : काश कि ऐसा हो.   


म्यूज़िक,मस्ती, हंगामा और बड़े बजट वाले बॉलिवुड के इस बिकाउ सुर के बीच अपने समय और उसकी संस्कृति की बात करना क्या एक कोरी लफ़्फाजी हो जायेगी? यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब लोग दबंग और सिंघम जैसी हिट फिल्म से नायक और स्टारडम की वापसी को लेकर फूले नहीं समा रहे है. लेकिन इससे अलग कोई फिल्मकार छोटी बजट में और बिना स्टार के अपनी बात कहने की चेष्टा करता है तो उसे क्या कहा जाय. उसके साहस की तारीफ़ की जाय या उसे दुस्साहसी या बउरहा करार देकर किनारा कर लिया जाय. हम किनारा करे या उन्हें कंधे पर बैठाए लेकिन वास्तविक फिल्मकार हर दौर में फिल्म बनाते रहे है और बनाते रहेंगे. सबसे बड़ी बात यह कि उनके इस दुस्साहिक कारगुज़ारी को लोगो ने ना सिर्फ़ सराहा है उससे बॉलिवुड समृद्ध भी हुआ है.  

इसी कड़ी में अपनी स्टाइल से बिना हंगामा किए आरिफ़ हामिद दर्शको के लिए ऐसा देस है मेरा ला रहे है. आरिफ़ ने एक दशक से ज्यादा खुलकर रंगमंच किया है जिसमें अंधायुग और महाभोज जैसी काव्यात्मक और औपन्यासिक कृतियाँ शामिल है. यहीं नहीं आरिफ़ ने ढाई सौ के करीब डॉक्यूमेंट्री भी बनाई है. आरिफ़ के अनुसार पर्दे पर नायक या खलनायक की वापसी और विदाई नहीं होती एक फिल्मकार का आत्म विश्वास और उसका भरोसा ही अपने समय की कथा को दर्शाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. आज से दो-तीन साल पहले एक पर एक कॉमेडी फिल्म हिट हो रही थी. इस भेड़ चाल में एक एक फिल्म के तीन-तीन पार्ट तक बनाए गए और मज़मून यह की सब के सब औसत से ज्यादा सफल रही और अब जब एक ऐक्शन फिल्म हिट हुई नहीं कि सब इसके पीछे पड़ गए. दरअसल यह बाजार के दबाव के बीच हमारी कमजोरी को दर्शाता है. हमें अपने उपर भरोसा नहीं हो रहा है कि हमें करना क्या है और हम कर क्या रहे है.किसी भी सिनेमा या कला के लिए यह खतरनाक स्थिति है.

आरिफ़ लंबे समय से मुंबई में मौजूद है और सिनेमा के कई पक्षों पर बारीकी से काम करते हुए इस देश के सामाजिक सांस्कृतिक अस्तित्व को फिल्माने के कोशिश में लगे हुए है. उनके कला से जुड़ाव का जो अनुभव संसार बना है उसी को आगे बढ़ाते हुए वो अब दर्शको के लिए अपनी डेब्यू फिचर फिल्म ला रहे है.   

ऐसा देस है मेरा में गाँव है सोनखेड़ी. सोनखेड़ी ऐसा गाँव नहीं है जहाँ विदर्भ की तरह किसान आत्म हत्या कर रहे है. या सूखे या बाढ़ से बदहाल गाँव जहाँ के लोग अन्न जल के लिए छछन रहे है. बात यहाँ आती है कि फिर इस गाँव की बात बताने की जरूरत ही क्यों आन पड़ी? इसके जवाब में आरिफ़ कहते है –“ भले ही सोन खेड़ी के किसान आत्महत्या नहीं करते. लेकिन खेती का जो स्वरूप बदला है और किसानी महंगी हुई है और उस पर बाज़र का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है कि सरकार भी मुँह छिपाकर बिचौलिए की झोली भर रही है वैसे में इस ज़िदादिल सोनखेड़ी से यह कह कर किनारा कर लिया जाय कि यहाँ कोई बदहाली नहीं है. कोई हंगामा नहीं हो रहा है. और जगहों पर कितने-कितने,कैसे-कैसे हंगामे हो रहे है. तो यह सोनखेड़ी भी एक दिन विदर्भ की तरह हो जाएगा. ऐसे में मेरी मंसा बस यह है कि हमारे पास जो ताक़त बची है उसे और बरबाद होने से बचाए और उनकी ज़रूरतो का तात्कालिक समाधान निकाला जाय. इसीलिए मैंने बिना हंगामा किए सोन खड़ी के लोगो के माध्यम से बात कहीं है. और ऐसा भी नहीं है कि सोन खड़ी की बात कहते हुए हम किसी जन संघर्ष का विरोध कर रहे है.हम किसी भी हाल में सूरत बदलना चाहते है. और इसी भाव से हमने सोनखेड़ी की छोटी मगर गहराई में कहीं बड़ी समस्या को उठा रहे है.

सोनखेड़ी के किसान सीधे-साधे है जैसा कि हर गाँव के होते है और उसका मुखिया उतना ही चतुर चालाक. वहाँ के किसान हाड़ तोड़ मेहनत करते है. किसी तरह अपनी जीविका चलाने भर अन्न और सब्जियाँ पैदा करते है लेकिन उनके पैदावार का सही मूल्य बिचौलिए की वजह से नहीं मिल पाता. गाँव का मुखिया और बीस साल तक मुखियागिरी करने के बाद भी किसान के सबसे आधारभूत समस्या से आँखे चुराकर बैठा हुआ है क्योंकि वो मंडी का सेक्रेट्री है. ऐसे में सोनखेड़ी के मुखिया का ही लड़का जो अपने पिता की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए पढ़ाई करने गया था,लौट कर आता है. बिचौलियों के बीच पिस रहे किसान के लिए मुक्ति की राह तलाशता है.

गाँव का पद इस बार आरक्षित है और लड़के(नायक) का कृत्य मुखिया और उसके द्वारा बनाए गए उम्मीदवार के अंगेस्ट जा रहा है..  लड़के को फिर से शहर भेजने की बात होती है जो वहाँ के किसानो को नागवार लगती है. वे लड़के को गाँव से जाने देना नहीं चाहते है क्योंकि उनकी जो सबसे बड़ी सम्स्या थी उसका वो हल कर रहा है. इसी ताने बाने के बीच चुनाव होता है और चुनाव में लड़का चुप है. फिर भी परिणाम एकदम अप्रत्याशित. कैसे हो गया यह क्यों हो गया. इसके साथ कई और सवाल है और जवाब भी. यह अप्रत्याशित परिणाम लोकतंत्र के तथाकथित लंबरदारो को ठेंगा दिखाता है. 

ऐसा देस है मेरा बस किसानो की मुक्ति की राह नहीं है इसके कई सेड्स है जैसे गाँव के रिचुअल्स उससे जुड़ाव और उसका हो कर रह जाना. आरिफ़ के अनुसार हिंदी सिनेमा में नीमारी संस्कृति(यानी नर्मदा के संस्कृति)को पहली बार दिखाया गया है.

आरिफ़ के अनुसार कुल मिलाकर जो बदलाव हो रहे है और बदलाव के बीच हमारे गाँव जो कि इस देश की असली ताक़त है के छूटने और हमारी जड़ो का जो स्वाभिमान और संस्कृति है उस पर ध्यान देने की कोशिश है सोनखेड़ी और यही हमारी फिल्म है ऐसा देश है मेरा.”

नायक के भूमिका राज सिंह चौधरी(गुलाल में अभिमन्यू सिंह के किरदार) और मधुरिमा तुली(जो अब तक दक्षिण की फिल्में कर रही थी) ने लीड भूमिका की है. और सहायक किरादारो में संजय स्वराज,एहसान खान ,मेहनाज़ सर्राफ़ रवींद्र आदि है. फिल्म में एक खास बात है कि आरिफ़ ने इस फिल्म में गाँव के किसानो से अभिनय कराया है.

सिनेमेटोग्राफी कनन सामेन का है 
विकास विश्वकर्मा ने और संगीत दिया है.फिल्म में पाँच गीत है जिसे शब्दबद्ध किया है अरूण सातले ने. अरूण सातले से गीत शब्दबद्ध के बारे में आरिफ़ कहते है –“अरूण इंदौर के गाँव से है और वे आज भी गाँव में ही रहते है. मुझे वहाँ के लोक को लेना था इसलिए मैं ऐसे आदमी से गीत लिखवाना चाह रहा था जो उससे जुड़ा हो. इस लिहाज से अरूण ने कमाल का काम किया है. इस फिल्म के लिए लिखे हुए गीत से हमारी फिल्म रिच होती है. गीतों को स्वर राज हसन,ऋतू पाठक,लता सिंह,मधु श्री, विकास विश्वकर्मा, वैशाली वैद्य और नवाजूद्दीन ने दिया है. निमारी संस्कृति को अपने धड़कनो में शामिल कर के नर्मदा सी बहती इस फिल्म का इंतजार है. 

4 comments:

sheshnath pandey said...

फिल्म के साथ हमारी शुभकामना है... नई बात के जरिए इस फिल्म को प्रमोट करने के लिए चंदन तुम्हें बहुत बहुत धन्यवाद...

Aparna said...

All the best wishes for the movie & it is now an awaited one. Gud luck

addictionofcinema said...

आरिफ जैसे लोग आज उस जगह की ज़रूरत हैं जहाँ सिनेमा एक अच्छे दौर के शैशवकाल में है लेकिन दबंगई के धमाल और तीसमार खान के जलवों में आंख मूंदे कुछ ना देखने समझने का खराब अभिनय कर रहा है. आरिफ जैसे लोग उस माध्यम की उम्मीद हैं जहाँ सुभाष घई जैसे निर्देशकों को शोमैन का तमगा दिया जाता है और दबंग जैसी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार. शेषनाथ ने बहुत आत्मीयता से फिल्म का परिचय दिया है जिसके लिए वे बधाई के हकदार हैं.लेकिन हेडिंग में मेरे ख्याल से निमाई संस्कृति से ज्यादा किसानों की बात दिखाई देनी चाहिए थी क्योंकि वही मुख्या बात है. चन्दन को अच्छी पोस्ट के लिए बधाई

addictionofcinema said...

आरिफ जैसे लोग आज उस जगह की ज़रूरत हैं जहाँ सिनेमा एक अच्छे दौर के शैशवकाल में है लेकिन दबंगई के धमाल और तीसमार खान के जलवों में आंख मूंदे कुछ ना देखने समझने का खराब अभिनय कर रहा है. आरिफ जैसे लोग उस माध्यम की उम्मीद हैं जहाँ सुभाष घई जैसे निर्देशकों को शोमैन का तमगा दिया जाता है और दबंग जैसी फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार. शेषनाथ ने बहुत आत्मीयता से फिल्म का परिचय दिया है जिसके लिए वे बधाई के हकदार हैं.लेकिन हेडिंग में मेरे ख्याल से निमाई संस्कृति से ज्यादा किसानों की बात दिखाई देनी चाहिए थी क्योंकि वही मुख्या बात है. चन्दन को अच्छी पोस्ट के लिए बधाई