Sunday, March 16, 2014

नरेन्द्र मोदी बनारस पर आरोप की तरह लगे हैं

बनारस, स्वप्न द्वारा यथार्थ को लिखा हुआ प्रेमपत्र है. मुचड़ा हुआ, उनींदा, गुम हुआ चाहता हुआ प्रेमपत्र. तारीख ने, बनारस की मर्जी के बगैर, फिर से उसे खोज निकाला है.

नरेन्द्र मोदी बनारस पर आरोप की तरह लगे हैं. लोग (कुछ लोग ) ऐसे मतवाले हुए जा रहे हैं कि मोदी के बजाय बनारसियों को बधाई दे रहे हैं. ऐसे अन्दाज में कि मानो कह रहे हों, बहुत बनारस बनारस किए रहते थे, लग गए न किनारे ?  रविवार की सूनी सुबह, दो बधाई सन्देशों के बाद मैं जब खुद को शर्मिन्दा और निरुत्तर पा रहा हूँ तो एक ख्याल यह भी आ रहा है कि बनारस को कैसा लग रहा होगा ?

गनीमत है कि यह अभी आरोप है. कलंक नहीं. किसी न किसी नगर को यह जहर पीना था इसलिए भी शायद बनारस ने खुद को आगे किया हो. बनारस का समय अगर शरीर धर ले तो शर्तिया चुनाव का दिन उस शरीर का कंठ बनेगा. बनारस ने सबक सिखा दिया तो वह दिन नए जमाने का नीलकंठ कहा जायेगा. लोग ( कुछ ) नीलकंठ को समय की संज्ञा सरीखे याद रखेंगे.

चुनाव के समय तक, तीस हजार करोड़ के अनुमानित चुनावी खर्चे ( व्यवसाय ) पर नजर टिकाए शिकारी कुत्तों   ( सम्पादित, कृपया इसे पढ़े - नजर टिकाए मीडिया कॉर्पोरेट्स ) ने अगर अरविन्द केजरीवाल की असामयिक सामाजिक हत्या न कर दी तो वो, अपनी सीमाओं के बावुजूद, नरेन्द्र से बेहतर विकल्प हैं.

तस्वीर नाग नथैया की है. बनारस के प्रमुख उत्सवों में से एक यह, कृष्णलीला का एक अंश है, जिसे हर वर्ष मनाया जाता है.



4 comments:

shruti kumud said...

यह यथार्थ अतियथार्थ मे बदले ,तब तक बनारस को ज़हर ठिकाने लगानी की अपनी भूमिका तय कर लेनी चाहिये .

Jitendra Verma said...

ek avashyak uttar banaras ki or se!

Manoj said...

जरूरी पोस्ट...

Aparna said...

बहुत सटीक शब्दों में आवश्यक बात कही गयी है !