Monday, April 14, 2014

इस महीने की किताब: अजाने मेलों में



प्रमोद जी की भाषा में कहें या यों कह लें कि कहने की कोशिश करे तो बात कुछ यों होगी: कईसे एगो मुहाविरा जीवन में सच होते दिखता है एक्कर निमन नमूना है परमोद जी की किताब. मुहावरा ई है कि बटुली के एगो चावल टोअल जाला. एक्दम्म से अईसे ही..... प्रमोद जी की एक ही कहानी हंस में पढ़ी थी और मुरीद हो गया. तभी से इनकी एकाधिक कहानियाँ या संकलित कथेतर गद्य पढ़ने का इंतजार था. बाद में उसी कहानी का जिक्र बेहद आदरणीय ( उनका ज्ञान तो इतना है कि उन्हें प्रात: स्मरणीय भी कहें तो अतिशयोक्ति न हो ) श्री वागीश शुक्ल ने किया. उसी प्रमोद जी की किताब अजाने मेलों में को "हिन्दी युग्म" ने प्रकाशित किया है. 

इस किताब की मेरी प्रति, दुआ की तरह, रास्ते में है. मार्फत होम शॉप 18

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (15-04-2014) को "हालात समझ जाओ" (चर्चा मंच-1583) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Mukesh Kumar Sinha said...

दो दिन पहले आई है मेरे पास, अभी पढ़ी नहीं ......... वैसे बेहतरीन है, ये मैं कह सकता हूँ !!