Monday, October 26, 2009

शर्म तुमको मगर नहीं आती.

(यह टिप्पणी युवा आलोचक डॉ.कृष्णमोहन की है।)

‘‘समकालीन जनमत’’ के अक्टूबर 2008 अंक में मिर्ज़ा ग़ालिब पर लिखे नीलकांत के लेख ’हम सुख़नफ़हम हैं ग़ालिब के तरफ़दार नहीं’ पर एक टिप्पणी मैंने संपादक को भेजी थी। बातचीत में इसका ज़िक्र रामजी राय, प्रधान संपादक से भी किया था, जिसका उन्होनें स्वागत किया था। के.के. पाण्डेय, प्रबन्ध संपादक ने पत्र मिलने की सूचना फोन पर दी थी। इसके लगभग एक साल बाद ’’समकालीन जनमत’’ का नया अंक आया है। इसमें इस देरी अथवा पिछले अंक की सामग्री के बारे में पाठकों के लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं है। शायद यह पत्रिका अपने पाठकों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं महसूस करती। वरना कोई वजह नहीं थी कि ‘57 की क्रान्ति का शायर’ मानकर जिस ग़ालिब पर इसने अंक केंद्रित किया था, उसके बारे में प्रकाशित इतनी भ्रामक बातों के प्रति ज़िम्मेदारी का रत्ती भर भाव न होता। यही नहीं, उस लेख के साथ जो संपादकीय टिप्पणी छपी उसने सम0 जनमत के संपादक मण्डल के दिमागी दिवालिएपन को ही ज़ाहिर किया। इसकी कुछ पंक्तियाँ देखें-
‘‘नीलकांत जी ने इस लेख को काफी मेहनत से लिखा है। साहित्य और इतिहास को किस तरह से पढ़ा जाना चाहिए यह इसका उदाहरण तो है ही, अपने समय से लेकर आज तक निर्विवाद रूप से लोकप्रिय उस्ताद शायर को आधुनिकता और प्रगतिशील जीवनबोध के पैमाने पर देखने की यह गंभीर कोशिश है।... गालिब को दर्शन का कितना ज्ञान था, इस पर बहसें होती रहेंगी। लेकिन उनका संवेदनात्मक ज्ञान कितना गहरा था, वह किस हद तक मार्क्स के विचारों के समतुल्य जा ठहरता है, पाठक नीलकांत के इस लेख में देख पाएंगे।’’
हाथ कंगन को आरसी क्या। आइए पहले मेरी टिप्पणी के हवाले से इसके कुछ चुनिंदा अंशों को देख लें। मेरा पत्र इस प्रकार था-

महोदय,
‘‘समकालीन जनमत’’ के अक्टूबर 2008 के अंक में छपे नीलकांत के लेख ’हम सुख़नफ़हम हैं ग़ालिब के तरफ़दार नहीं’ पढ़कर घोर निराशा हुई। जिस तरह खींचतान करके वे ग़ालिब के अशआर को सतही राजनीतिक खाँचों में फिट करते हैं, काव्यप्रेमी पाठकगण ख़ुद ही उस पर ग़ौर करेंगे। यहाँ मैं सिर्फ़ एक शेर की आपत्तिजनक व्याख्या का प्रतिवाद करना चाहता हूँ, और उससे पहले कुछ शेरों के पाठ को दुरुस्त करना । पहले ग़लत पाठ देखें-
(1) है कहाँ तमन्ना का दूसरा क़दम या रब
हमने दस्त-ए-इम्काँ को एक नक्श-ए-पा समझा (पेज-16)
इसका दूसरा मिसरा इस तरह होना चाहिए-
हमने दस्त-ए-इम्काँ को एक नक्श-ए-पा पाया
(2) जिसमें सौ-सौ बरस की हूरें हों
ऐसी जन्नत को क्या करे कोई (पेज-18
(इसे ग़ालिब का शेर बताया है लेखक ने, जबकि यह यह दाग़ देहलवी का शेर है।)
इसका पहला मिसरा ऐसे होगा-
जिसमें लाखों बरस की हूरें हों
और दूसरे मिसरे में ‘को’ की जगह ‘का’ आ जाएगा ।
(3) है कोई ऐसा जो ग़ालिब को न जाने
आदमी तो अच्छा है पै बदनाम बहुत है (पेज-19)
इसके दोनों मिसरे बदलकर इस प्रकार हो जाएंगे-
होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को न जाने
शायर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है
(4) हमको है उनसे वफा की उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है (पेज-21)
इसका पहला मिसरा होगा-
हमको उनसे है वफ़ा की उम्मीद
इसी रौ में दा़ग़ देहलवी का एक और लोकप्रिय शेर ग़ालिब के नाम से आ गया है-
दी मुअज्जिन ने अज़ां वस्ल की शब पिछले पहर
हाय! कमबख़्त को किस वक्त खुदा याद आया
इसका पहला मिसरा इस प्रकार होगा-
दी मुअज्जिन ने अज़ां शब-ए-वस्ल को पिछले पहर
ये सभी उदाहरण उन शेरों के हैं जो काव्यप्रेमियों की जु़बान पर चढ़े हुए हैं और पहली. नज़र में ही इनकी ग़लती मालूम हो जाती है। दूसरी छोटी-मोटी गलतियाँ दर्जनों हैं जिन्हें प्रूफ़ की ग़लती मानकर यहाँ मैं छोड़ रहा हूँ।
व्याख्याओं में सबसे आपत्तिजनक व्यवहार ग़ालिब के इस शेर के साथ हुआ है-
क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन
ह़मको तकलीद-ए-तुनुक ज़रफि-ए-मंसूर नहीं (पेज-19)
लेखक कहता है- ‘‘उग्र वामपंथ एक बचकाना रोग है, लेनिन ने कहा था। मंसूर अपने ओछे अहंकार के चलते सूली पर चढ़ा दिया गया। ग़ा़लिब कह़ते हैं कि मेरा अस्तित्व भी असीम है, किन्तु मुझे मंसूर का बचकानापन मंजूर नहीं है। 57 का मंसूर अगर्चे बचकानेपन का शिकार हो गया, तो भी काबिले तारीफ था।’’ (वही)

यहाँ निवेदन यह है कि 1857 और उससे प्रेरणा लेने वाले वाम आन्दोलन का अवमूल्यन करने की जल्दबाज़ी में लेखक को ध्यान ही नहीं रहा कि शेर के दूसरे मिसरे में ‘तकलीद-ए-तुनुक’ (कम अनुसरण) और ‘ज़रफि-ए-मंसूर’ (मंसूर की गहराई) अलग-अलग शब्द -युग्म हैं। इसका एकमात्र अर्थ होगा कि ‘हममें मंसूर की क्षमता का अभाव है, इसलिए हम अपने दरिया का थोड़ा ही अनुसरण कर पाते है।’ ( अगर इसकी जगह ‘तुनुकज़रफि-ए-मंसूर’ होता तो उसका अर्थ मंसूर की कम गहराई अथवा ओछापन किया जा सकता था।) क़तरा और दरिया के रूपक को अंश और संपूर्ण के किसी भी रूप पर लागू कर सकते हैं। मंसूर जैसे शहीद को बार-बार ओछा कहकर लेखक ने अपने ही ओछेपन को गालिब के मत्थे मढ़ने की कोशिश की है। इस प्रकार उसने दरअसल, शहादत को एक मूल्य के रूप में नकार दिया है। 1857 के शहीदों के लिए अलंकृत शैली में जो कुछ उसने कहा है, वह भी उसकी इस हरकत से संदिग्ध हो उठता है।

कृष्णमोहन.

मित्रों,
अगर यह ‘प्रगतिशील जीवनबोध और संवेदनात्मक ज्ञान’ है तो घड़ियाली आँसू बहाना किसे कहते हैं! 1857 पर क़ब्ज़े की जल्दी में यह टिप्पणी लिखकर ‘समकालीन जनमत’ के संपादक ने साबित कर दिया कि उसका ज्ञान भी ‘किसी हद तक मार्क्स के विचारों के समतुल्य जा ठहरता है।’ अब कौन किससे कहे-
काबे किस मुँह से जाओगे ग़ालिब
शर्म तुमको मगर नहीं आती।

9 comments:

Pratyaksha said...

खुशआमदीद .. ब्लॉग की दुनिया में

प्रत्यक्षा

अखिलेश शुक्ल said...

यह जानकार अत्यधिक प्रसन्नता हुई की आप ब्लाग पर रोज लिखेंगे। साहित्यिक पत्रिकाओं की समीक्षा पढ़ने के लिए मेरे ब्लाग पर अवश्य ही पधारे आप निराश नहीं होगें यह मेरा वादा है।
अखिलेश शुक्ल
संपादक कथाचक्र
for reading hindi literature magazine
http://katha-chakra.blogspot.com

डॉ .अनुराग said...

पता नहीं नया ज्ञानोदय में या कथादेश किस में मैंने गालिब पर बड़ा शानदार लेख पढ़ा था .खैर ब्लॉग की दुनिया में आपकी आमद सुखद है

sidheshwer said...

ब्लाग की दुनिया में स्वागत है आपका!
आपकी कहानियाँ पढ़ता रहा हूँ ..
अब आपका ब्लाग भी पढ़ते रहना है !

ashutosh dubey said...

chandan ka abhinandan!

राजकिशोर said...

नीलकांत के लेख पर आपकी टिप्पणी शानदार लगी। शुक्रिया। जहां तक ओएम की बात है, ये सुधरने से रहे। इसलिए कभी-कभी लगता है, इनसे क्या बहस करनी !

Miss PalanPur said...

Plz.............
Thoda Short & Sweet likha kijiye taki hum jaise "Aalsi" log bhi Apki Rachnao ka Lutf utha sakein............

chandan said...

Miss PalamPur, Alasi log hi to badi aur kathin rachnayae padhte hai.

Anonymous said...

नयी बात:बेशर्म को शर्म नहीं आती

अक्तूबर २००८ में मेरा एक लेख 'समकालीन जनमत' में 'हम सुखनफ़हम हैं गालिब के तरफ़दार नहीं' छपा था. कुछ पाठकों से भिन्न कृष्णमोहन की प्रतिक्रिया एकदम अलग है.अपनी टिप्पणी में लिखते हैं," पढ़कर घोर निराशा हुई". इस घनघोर निराशा का इलाज निबंध-लेखक के पास तो नहीं है. फिर भी टिप्पणीकार ने इसी घोर निराशा के "दौरे में' कुछ शेरों के पाठ को दुरुस्त करते हुए "सिर्फ़ एक शेर की व्याख्या का प्रतिवाद" किया है.जिस शेर पर टिप्पणी कार को सबसे ज़्यादा आपत्ति हुई है, वह इस प्रकार है-
"क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन
ह़मको तकलीद-ए-तुनुक ज़रफि-ए-मंसूर नहीं "
अली सरदार जाफ़री के द्वारा संपादित 'दिवान-ए-गालिब' के पेपरबैक संस्करण में "तकलीद-ए-तुनुक ज़रफ़ि-ए-मंसूर" का अर्थ "मंसूर के ओछेपन का अनुसरण" किया गया है. टिप्पणीकार का दिया गया उपहार 'बेशर्मी' और "ओछापन" मैं उसे वापस करता हूं.ताकि वह इनसे अपना मत्था अलंकृत कर सके.
खुशी है कि टिप्पणीकार ने कुछ शेरों के गलत पाठ को ठीक कर दिया है.उसका यह श्रम और सजग पाठ सराहनीय है. इससे पाठकों का भला होगा. मैंने अपने लेख में "लाखों बरस की हूरें हों" लिखा था, लेकिन छापे में "सौ सौ बरस की हूरें" क्यों कर आ गया, इसे प्रूफ़ रीडर जानें. प्रो. अकील साहब ने कहा था कि यह शेर 'दाग' देहलवी का है. लेख छपने से पहले इस फ़न के जानकार कई लोगों को मैंनें दिखाया था, लेकिन उनमें से किसी ने इन गल्तियों की ओर इशारा भी नहीं किया. श्री नामवर सिंह भी इस लेख को इलाहाबाद से दिल्ली ले गए थे, लेकिन उनसे यह कहीं गुम हो गया.
इन दिनों हिंदी में पाठ-प्रक्रिया में गड़बड़ियां आ रही हैं. इस पर ध्यान देने की सख्त ज़रुरत है, टिप्पणीकार ने इसे गम्भीरता से महसूस किया है. चेखव ने आलोचकों की तुलना घुड़मक्खियों से की है, जो घोड़े के अंडकोष को बेधती रहती हैं, जिससे उसमें स्फ़ूर्ति बनी रहती है. कृष्णमोहन की टिप्पणी इस दृष्टि से अत्यंत उपयोगी और सार्थक है.
हाय वो लब हिला के रह जाना
अभी कुछ बात कर नहीं आती.
नीलकांत, देवनगर, नारायणपुर, लीलापुर रोड, झूंसी, इलाहाबाद