Saturday, August 7, 2010

माफी क्या होती है? (अपशब्द विवाद के बहाने)

इत्तिफाकन यह पोस्ट भी एक साहित्यिक बुजुर्ग को ही सम्बोधित है. विभूति नारायण राय को. पर इस पोस्ट में जिनसे घृणा बरती गई हैं वो हैं दोमुहे लोग जिन्होने विभूति को डिफेंड करने की कोशिश की और विभूति को इस अन्धेरे में रखा कि कहीं ना कहीं वो सही हैं.

अपशब्द के इस्तेमाल के बाद माफी मांग ली गई है ऐसे जैसे बड़ा भाई छोटी बहन की शादी किसी शराबी-जुआरी से करा, बहन का विश्वास नष्ट करके माफी मांग ले. अगर गलती करने का अधिकार सबको है तो सजा पाने की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिये. गलती के हिसाब से ही सजा का प्रावधान है. लालची लोग जितनी मर्जी खुद को नीचे गिरा लें पर बगैर वाजिब सजा के लगातार गलतियाँ करते जाने के पक्ष में इस्तेमाल सूक्तियाँ और कवितायें तो क्या, बड़े बड़े तर्क भी ओछे पड़ जायेंगे.

इस माफीनामे पर मेरा सवाल बस इतना है : जिस तरीके से भारतीय विश्वविद्यालयों का संघीकरण हो रहा है और वहाँ के अबुद्ध शिक्षक आर.एस.एस. की शाखाओं में जाना अपने जीवन का चरम उद्देश्य मानने लगे हैं वैसे मे कल को कोई कुलपति जातिविरोधी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे दे और जनता में आक्रोश भर दे तो क्या एवजी में माफी काफी होगी? और क्या वो चालाक कुलपति इसे तर्क के तौर पर नहीं उछालेगा कि जब एक कुलपति को कुंठित-बयानबाजी के लिये माफ किया गया तो मुझे क्यों नहीं? मैं नहीं समझता कि ऐसा करते हुए वो गलत कह रहा होगा?

विवाद से परिचित लोगों को यह जानना चाहिये कि विभूति जी द्वारा माफी किस ऐंठ के साथ मांगी गई है? जितना दु:ख उस अपशब्द के इस्तेमाल का है उतना ही दु:ख इस लाचारी का भी कि कोई इंसान कुछ संस्थानों/संगठनों के सहारे सत्ता को कैसे अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेता है और आम अमरूद साहित्यिक जनता ठगा महसूस करती है. वरना वृन्दा करात, जो रामदेव की दवाईयों के खिलाफ आग उगल रही थी, ऐसे ही चुप नहीं हो गई होंगी. अब तक जिम्मेदारी का बोझ सम्भाले एक संगठन खुलेआम कुलपति के बचाव का रास्ता बताता है. और जिस तरह इन्दिरा गान्धी के जमाने में भारत में हो रही हर बारिश और सूखे का दोषी पाकिस्तान था उसी तरह धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में बयान देने वाले लोग ईश्वर की प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके है, जो कभी गलती नहीं करता.

विभूति नारायण राय को यह इंटरव्यू वापस ले लेना चाहिये. बाकायदा घोषित करके. तब उनकी माफी का कोई मतलब होगा. विभूति जी, आज आप जो भी है वो पाठकों की बदौलत हैं वरना आपके आई.पी.एस होने के नाते जो लोहे स्टील आदि के .... आपके इर्द गिर्द हैं, जो आपके इस अपशब्द प्रयोग के पक्ष में तमाम तर्क दे रहे हैं वे अधम नीच लोग आपके रिटायर होते ही किसी दूसरे आई.(पी.एस या ए.स) को पकड़ लेंगे. यह मैं सबसे न्यूनतम की बात कर रहा हूँ, विभूति जी. आगे आप जाने भी गये अगर कभी इतिहास में तो अपनी ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ या ‘शहर में कर्फ्यू’ के लिये ही जाने जायेंगे, कुलपतीत्व के लिये नहीं.


मैं समझता हूँ कि इस्तीफे या बर्खास्तगी से ज्यादा बड़ी बात होगी जब ये खुद से ही सामने आये और इस साक्षत्कार को वापस लें. ‘डिसऑन’ करें. यह कुलपति के बतौर एक बड़ी नजीर पेश होगी वरना यह गुमान तो उन्हे छोड़ ही देना चाहिये कि वे अपने पक्ष में तर्क देकर खुद को सही साबित कर ले जायेंगे. ऐसा हो नही सकता क्योंकि ऐसा है ही नहीं. हिन्दी भाषा की जितनी लेखिकाओं को मैं जानता हूँ वे ऐसी हरगिज नहीं हैं. उन्हे अपने लिखे शब्दों पर ही इतना भरोसा है और होगा कि दूसरे किन्ही हथकंडों की जरूरत ही नहीं.

गलती हो जाती है पर उसे स्वीकारने से आपका कद बढ़ेगा. आपको इस बात के लिये माफी नहीं मागनी चाहिये कि आपकी बात से किसी को ठेस पहुंची है. अपनी भाषा से आप किसी को ठेस पहुंचा सके इसके लिये बहुत विनम्रता और भाषा के रियाज की जरूरत होती है. यह जो लेखिकाओं या लेखको का गुस्सा है यह ठेस से नहीं आपकी गलती से उपजा है. इसलिये महोदय आप अपने कहे शब्द के लिये माफी मांगिये.

नया ज्ञानोदय पत्रिका की टीम को भी इस आशय की घोषणा करनी चाहिये कि अगले संस्करण से यह इंटरव्यू बाहर हो रहा है या बाजार से पत्रिका वापस मंगाई जा रही है. इसके लिये पर्याप्त प्रयास होने चाहिये.

मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि बेवफाई की सजा माफी कत्तई काफी नहीं होती है. हो सकता है हम अपनी कमजोरी के कारण माफ करने के अलावा कुछ ना करने पायें क्योंकि हर वो आदमी(स्त्री या पुरुष) जो बेवफाई या विश्वासध्वंस करता है कभी यह मानता ही नही कि उससे गलती हुई है( बेवफा प्राणी और कुछ हो ना हो मौकापरस्त जरूर होता है, नौकरी या दूसरे लालच के लिये कहीं भी लोट या बिछ जाने वाला) और विभूति जी ने अपने पाठको तथा मित्रों का विश्वास तोड़ा है, भले उनके मित्र उनसे लाभान्वित होने की आशा में कुछ कह न रहे हों.

इस पूरे मसले ने जो महत्वपूर्ण पर्दाफाश किया है वो है सम्बन्ध और साहित्य. साहित्यिक दुनिया इतनी संकुचित हो चुकी है कि हर आदमी एक दूसरे को व्यक्तिगत तौर पर जानता है. पर जानने का यह मतलब भी निकाल लिया गया है कि अगर हम आपकी किसी बात का विरोध करें तो आपके पूरे जीवन का विरोध कर रहे हैं. साहित्य से लोकतंत्र गायब हो रहा है. मतलब अगर मैं गलत हूँ तो जो मेरा घोषित मित्र है वो मेरे पक्ष में बोलेगा और जो शत्रु है वो विपक्ष में. मुझे आश्चर्य हुआ जब लोग विभूति जी के वकालत में आगे आये. उन दोमुहों ने दुहरा नुकसान किया. पहला मैं उपर बता चुका हूँ और दूसरा यह कि कहीं ना कहीं वे विभूति को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हुए कि आप सही हैं. इसलिये ही उन्होने शुरुआती जिद में अपने आप को डिफेंड किया. हमें सम्बन्धो और उससे मिलने वाले चन्द पुरस्कारों वाली सोच के दायरे तोड़ने चाहिये. इससे अपना कम अपने उस मित्र का ज्यादा भला होगा जिसका शालीन विरोध हम कर रहे होंगे.

45 comments:

प्रभात रंजन said...

चंदनजी आपने बहुत अच्छा लिखा है. बहुत सारगर्भित. आपसे इसी साहस और वैचारिकता की उम्मीद थी.

Rangnath Singh said...

तुमसे सहमति और समर्थन भी। एक सृजनधर्मी के रूप में तुमसे ऐसे ही नैतिक साहस की उम्मीद थी।

संजीव गौतम said...

shhandaar aapne badi baariki se aur bebaaki se likha hai. main aapko sajda karta hoon.

girirajk said...

another act of bravery and artistic integrity.

शशिभूषण said...

हर बार की तरह आपने अपना पक्ष साफ़ साफ़ बता दिया है.सहमत हूँ.
पर फिर वही राजेन्द्र यादव की एक पुरानी बात आज लड़ाई सही और गलत के बीच उतनी नहीं है जितनी अपनी तरह से सही लोगों के बीच.
विरोध तो उनका भी है ही जो हर हाल में दोनों की बरखास्तगी ही नहीं चाहते.तटस्थों को ललकार देना हमेशा सही ही नहीं होता

गिरीश बिल्लोरे said...

जी ये तो वही हुआ सांड लड़ते हैं बाड़ी तोड़ने के लिये ही .

गिरीश बिल्लोरे said...

उनके समर्थकों ने मुझे भी दुत्कारा है पर बेहया लोगों मुद्दे पर कोई ज़वाब नहीं दिया इसे क्या कहेंगे चन्दन जी ग्यन रन्जन जी से बात करनी है कल बुलाता हूं उनको इस पर अपना मन्तव्य देने के लिये तब तो सुधरेंगे लोग

कुमार मुकुल said...

आपका अंदाजे बयां सही लगा इसे कारवां पर डाल रहा हूं

mgarg said...

sahitya aur stree ke vishay men kuchh kehte hue bhasha kee maryada ka palan atyant aavashayak hai. Ek kulpati se adhik lekhak ke liye.
Uske ullanghan ke liye Rai Saheb ko svayam pratikar karna chahiye.
Isteefa den, ya beech ka raasta khojen, par mafi vakai mafi honee chahiye leepa poti nahin.
Vaise chhinal shabd ka angrezi arth prostitite nahin slut hai jo chhinal hi ki tarah ek gaali hai. Isliye aur bhi apattijanak.
Pata nahin kyon devnagri lipi men aaya nahin so roman men sahi
Mridula Garg

Bodhisatva said...

आपकी कमी बहुत जादा खल रही थी चन्दन जी...आपने सबकी उम्मींद जिंदा रखी...धन्यवाद!!!!
पता नहीं क्यों मगर ऐसा लगता है की विभूति नारायण जैसे लोग सर के बाल बचने के लिए माफ़ी मांग भी ले तो भी अंदर से हमेशा खुद को ही सही मानेगे...इसलिए इन्हे और इनके पालतू सूरमाओ को इतनी आसानी से माफ़ी नहीं मिलनी चाहिए...कम से कम ऐसा कुछ कहने के किये जिंदगी भर अफ़सोस करे...
जहा तक मित्रों के विपक्ष में बोलने का सवाल है तो सही तरीके से हर उस चीज का विरोध करने का हक है हमे जिसे हम गलत मानते है..मगर फेसबुक और ब्लॉग जैसे मंच पर ये सही तरीका गायब हो चला है.
इसीलिए आपजैसे लोगो की जरुरत है...जो सही है उसे बचने के लिए और जो गलत है उसे हटाने के लिए !!

विशाल श्रीवास्तव said...

BRAVO CHANDAN!

शशिभूषण said...

चंदन दुबारा आना पड़ा.पहली बार जल्दी में था.रात ज्यादा हो गई थी.
आप कह रहे हैं-कल को कोई कुलपति जातिविरोधी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे दे और जनता में आक्रोश भर दे तो क्या एवजी में माफी काफी होगी?
दूसरी जगह आपका मत है कि-अपनी भाषा से आप किसी को ठेस पहुंचा सके इसके लिये बहुत विनम्रता और भाषा के रियाज की जरूरत होती है.
यानी आप भाषा में खुद को एक मुकाम पर पहुँचा हुआ मानते है.तब बताइए कि किसी भी कुलपति के चाहे वह संघी ही क्यों न हो उसके जातिविरोधी होने में क्या बुरा है?अर्थग्रहण के आधार पर यानी आपके शब्द चुनाव को मुख्य बनाकर आपको भी जाति समर्थक मानकर माफ़ी से बाहर कर देना चाहिए?

दूसरी बात आप लोकतंत्र के हिमायती हैं तो क्या विरोधी मतों के लिए आपके पास अधम,नीच,चमचे आदि ही विशेषण हैं?क्या यह भाषाई हिंसा नहीं?(विभूति जी, आज आप जो भी है वो पाठकों की बदौलत हैं वरना आपके आई.पी.एस होने के नाते जो लोहे स्टील आदि के .... आपके इर्द गिर्द हैं,जो आपके इस अपशब्द प्रयोग के पक्ष में तमाम तर्क दे रहे हैं वे अधम नीच लोग आपके रिटायर होते ही किसी दूसरे आई.(पी.एस या ए.स) को पकड़ लेंगे-आपके शब्द).

आपकी तीसरी बात-हिन्दी भाषा की जितनी लेखिकाओं को मैं जानता हूँ वे ऐसी हरगिज नहीं हैं. उन्हे अपने लिखे शब्दों पर ही इतना भरोसा है और होगा कि दूसरे किन्ही हथकंडों की जरूरत ही नहीं(आपके शब्द)
याद कीजिए अभी कुछ महीनों पहले ही आपने तहलका के अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि मैत्रेयी पुष्पा वह लेखिका हैं जिन्हे बेवजह चर्चा मिली है.बताइए बेवजह चर्चा किन्हें क्यों और कैसे मिलती है?बताते हुए मत भूलिएगा कि मैत्रेयी पुष्पा मेरी पसंदीदा लेखिका हैं.
मैं फिर कोट कर रहा हूँ ओंकारनाथ श्रीवास्तव को कि लोकतंत्र में बहुमत से ज्यादा महत्व मत का होता है बशर्ते वह सुचिंतित हो.
यह कहते हुए मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि यह आपका विरोध नहीं आपकी सायास आक्रामकता का है.

डॉ .अनुराग said...

एक नजर यहाँ डालिए चन्दन जी....इस मुद्दे पर काफी बहस हो चुकी है ...एक आम ..पाठक लेखको से इतर कैसे सोचता है ....ये भी जानना चाहिए ....

चन्दन said...

@शशिभूषण,
इत्तेफाक से सावन चल रहा है. इस महीने में काँवरिये लम्बी लम्बी पदयात्रायें करते हैं. जिसे पूरी करने के लिये शक्ति की जरूरत होती है. अब ‘शक्ति की जरूरत होती है’, सम्झने के लिये आपको उतना शक्तिशाली होने की या पदयात्रा करने की जरूरत नहीं है. उसी तरह मैने कहीं नहीं लिखा है कि भाषा मे मैने वह मुकाम पा लिया है. आप पोस्ट को एक बार फिर से पढ़ जाईये. मैने इस आशय की एक लाईन भी नही लिखी है जिससे यह साबित हो कि मैने भाषा का वह उंचा मुकाम पा लिया है. मैं चाहता तो यह तर्क भी दे सकता था ‘’कोई आपसे यह कहे कि किसी विश्वविद्यालय में लेक्चरशिप की नौकरी पाने के लिये नेट या जे.आर.एफ पास करने से काम नही चलता, उसके लिये लामबन्दी, गोलबन्दी तथा अक्षम्य अपराध को भी कुतर्क से सही साबित करने की जरूरत होती है.तो इसे कहने वाला जरूरी नही कि नेट पास हो या रीढ़हीन हो, वो अपने परिचितो की कारस्तानी देख के भी कह सकता है. वे परिचित जो बारह घंटा पहले आपसे सहमति दिखाये और बारह घंटे बाद विरोध.’’ पर नहीं दे रहा हूँ.

विरोधी मत वाली आपकी बात अद्भुत है. पूरे स्त्री लेखन पर ‘बिलो द बेल्ट’ वार करने वाले तथा उसके पक्ष में बयान देने वाले, तर्क देने वाले आपके लिये सिर्फ विरोधी मत के हैं? इस पर मेरी राय जान लीजिये: मत विरोधी तब होता है जब आप अपने पक्ष या विपक्ष के विचार सम्मान के साथ रखते हैं. फिर भी अगर आपको लगता है कि विभूति जी ने जिस शब्द का इस्तेमाल किया और जो लोग उनके तर्कपोषण में आगे आये, वे लोग अपना मत सम्मान के साथ लेकर चैनलों और पत्रिकाओं में आये तो आप उन्हे विरोधी मत मानिये मेरे लिये वह घृणित है.समूची स्त्री जाति के खिलाफ गाल बजाने वाले आपकी तर्क क्षमता से जरूर प्रभावित होंगे.

बेवजह चर्चा मिलने की बात का मतलब शरीर का इस्तेमाल ही नहीं होता. आप गजब है कि मैत्रेयी के प्रशंसक होते हुए भी (विभूति के बयान का इशारा समझते हुए भी) विभूति के पक्ष में हैं. मैत्रेयी के लेखन से मेरी समस्यायें यों हैं कि वो घटनाओं का वर्णन भर होता है उसमे कहानीपन नही होता. पर उनमे या दूसरी स्त्री लेखको की रचनाओं में मैं यह दोष नही देखता जो आपके प्रिय कुलपति ने दिखाया है. आप अपनी प्रिय रचनाकार को विभूति निगाह से देखते हैं यह दु:खद है और निन्दनीय भी.

अजेय said...

vaah !

शशिभूषण said...

चंदन,हाँ आपने खुद को भाषा के किसी मुकाम तक पहुँचा हुआ नहीं बताया है.आपने उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से जवाब दिया है जो भाषा आधारित ठेस को विश्लेषित कर रहे हैं.यानी आपने स्थापित गलती को भाषायी तमीज़ से अलगाने की चालाक समझ सामने रखी है.जिसमें यह देखा जा सके कि विभूति का शब्द ऐसी गलती का नतीज़ा है जिसे माफ़ नहीं किया जा सके.मैं यह कह रहा था कि आपने जातिविरोधी शब्द का प्रयोग अल्पसंख्यक विरोध के साथ कर दिया है वह गलत है.जबकि आप शब्द प्रयोग की मानसिकता पर ही अपना पक्ष तय कर रहे हैं.अगर मानहानि न होती हो तो अब भी दुरुस्त कर लें.

मैं चीज़ों को कई बार ही पढ़ता हूँ क्योंकि मेरी कोशिश होती है कि खुद को स्थगित करके पहले लेखक की बात समझी जाए.सो ज़रूरत आपको मेरी टिप्पणी दुबारा पढ़ने की है.

मैं वैसी किसी शक्ति का आराधक नहीं हूँ जिसका अमूर्त तंज आप कर रहे हैं और आप यह तो मानेंगे ही कि स्लेट,जे आर एफ़,एम फिल होने के बावजूद लेक्कचरर नहीं हूँ तो गोलबंदी,लामबंदी,अक्षम्य अपराधों को कुतर्कों से सही साबित करनेवाला नहीं होऊँगा.

अपने विरोधी मत के संबंध में जिसे आप अद्भुत कहकर खारिज कर रहे हैं निवेदन कर लूँ कि साथियों के ब्लाग पढ़ने की आदत भी डालिए.कथाकार कुणाल सिंह के ब्लाग पर एक प्रस्ताव के नीचे हस्ताक्षर सूची है उनके नाम गौर से पढिए वे वरगला लिए जानेवाले भेड़चाल के लोग नहीं हैं.उनके मत और दिए हुए प्रमाण हैं.मैं ऐसे ही लोगों की बात कर रहा हूँ.पर लगता है आपने केवल जनसत्ता में प्रकाशित सूची ही देखी है.

मैं आपकी इस बात से असहमति और दुख ज़ाहिर करता हूँ कि आप मुझे विभूति का पक्षधर कह रहे हैं.मैंने कहीं,किसी से उनका पक्ष नहीं लिया.फेसबुक के प्रोफाइल और आपसी चैट में मैंने रवींद्र कालिया को भी उतना ही बड़ा दोषी कहा है.उन्होंने गलत किया है.पर माफ़ी मांगने का हक़ उनसे उसी तरह नहीं छीना जा सकता जैसे अफ़जल गुरू को भी माफ़ी याचिका दाखिल करने का हक़ दिया गया.अभी कुछ दिनों पहले कमला प्रसाद जो फोर्ड फ़ाउंडेशन का पैसा लौटा चुके हैं उन्होंने भी बर्खास्तगी के लिए हस्ताक्षर किए हैं.इसे समझिए.लगे हाथ नामवर सिंह को भी बरखास्त कर देने की आज की अशोक वाजपेयी की मांग पर भी गौर करिए.यह एक पूरा का पूरा समय है भाई.इसमें सिर्फ़ आप ही अंतिम और सही नहीं हो सकते.

मैं मैत्रेयी को विभूति की निगाह से नहीं देखता.इसकी ज़रूरत ही नहीं है.हाँ उनमें कहानीपन नहीं है यह आपका नितांत आपका मत है.यदि मैं इस पर अभी आपत्ति कर दूँ तो आप न मेरा मुह बंद कर सकते हैं न ही चरित्रहनन करने लग सकते हैं.हज़ारों लोग हैं जो उन्हें अच्छी कहानीकार मानते है.मैं समझता हूँ आपमें असावधान,आक्रामक,एकतरफ़ा शब्द प्रयोग की कमज़ोरी मौजूद है(मैं इसे औरों की तरह आपकी रणनीति नहीं मान सकता यह कमज़ोरी ही है).कोई इसी को आधार बनाकर आपके चरित्रहनन पर उतर आएगा तो मैं उसके साथ भी नहीं होऊँगा.

बाक़ी मैं आपसे सहमति जता ही चुका हूँ.

Anonymous said...

वीरबालक चन्दन, तुमने नया धन्धा खोल लिया है. आज तुम्हारी तारीफ करने वाले लोग है पर जब तुम्हारे साहित्यिक बाप कालिआ, अखिलेश, कुनाल, कृष्णमोहन, वन्दना राग कोई गलती करेंगे तब तुम्हारी वीरता देखी जायेगी.

तुम्हारा घमंड तुम्हे बर्बाद कर देगा. माफी कैसे नही करोगे? तुम्हारे भाई बहन या प्रेमिका नहीं है क्या? उनकी गलती को बेवफाई कहोगे? शर्म करो.

Anonymous said...

another act of bravery and artistic integrity.
shashi bhooshan dwivedi

himansu said...

yeh dogle charitra ka kaun hai jo baar baar apni ochhi ghatiyape se baaj nahi aa raha hai.. tum dogle insaan aur tumhari aukat bhi itni ki naam ke saath to tum apni neechata dikha nahi sakte.. Chandan ka sahityik baap kaliya hai ki nahi, ye to pata nahi kyoki humari sanskriti me baap ek hi hota hai baki aur shrestho ko guru ki sangya di jati hai.pr tere anda-ze-bayan se lagta hai ki tere kai baap hai. pratyek field me tere baap(........) maujud hai. Chandan ne apni veerata kuchh muddo pr to dikhayi hi hai.. e bhi satya hai ki tum jaise desh ki najayaj aulaad hr ek mauko pr chandan jaiso ko khojenge.. tum us samay kaha rahoge aur abhi kaha ho? tum dogle charitra ke insaan ke baat pe kya chandan ko khara utarna chahiye...mai tumse puchhana chahta hu..?

Himansu Chaturvedi

Shrikant Dubey said...

@ शशिभूषण जी :
यहां सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया दे डालने की कोई प्रतियोगिता नहीं चल रही, जो किसी ब्लाॅग पोस्ट पर झट पट एक राय दे देना आपने अनिवार्य समझ लिया। बात जब एक गंभीर मसले पर जारी है, और आप उस पर अपनी एक गंभीर प्रतिक्रिया भी देना चाहते हैं, तो ऐसे में आपको पूरे प्रकरण को समझ लेने और अपना स्टैंड क्लियर कर लेने के लिए जरूरी पूरा समय लेना चाहिए। यूं, आइडियली आपका दूसरा कमेंट ही (अगर वाकई आप यही कहना चाहते थे) आपका पहला कमेंट होना चाहिए था।
आगे, जो लोग कई सारी जगजाहिर वजहों से, बल्कि ज्यादा सही यह कहना होगा कि स्वार्थों की खातिर, एक पूरी कम्यूनिटी पर आधारहीन और अश्लील टिप्पणी किए जाने का भी समर्थन कर रहे हैं, उनके लिए ‘नीच’ और ‘अधम’ शब्दों का प्रयोग कहीं से भी हिंसक नहीं है। हमारे समाज में हमेशा ही ऐसे लोग रहे हैं, जिनके कृत्यों के आधार पर ये शब्द ही उनके लिए उपयुक्त विशेषण हैं। और फिर अगर खुद आप ऐसे नहीं हैं, तो आपको ‘चमचा’ शब्द से भी (जिसे कि असल में पोस्ट में लिखा भी नहीं गया है) कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि यह शब्द भी अपनी प्रासंगिता के कारण ही अब तक चलन में है।
@ चंदन :
जिन लोगों में खुद अपने नाम के साथ सामने आने का साहस नहीं है, उनकी किसी भी राय को छापने की जरूरत नहीं है। क्योंकि वे अपने एनानिमस होने का फायदा उठाते हुए अभद्रता की हद तक जाकर भी अतार्किक और बेशर्म हो सकते हैं। हो सके तो इसे एक नियम की तरह फालो करिए कि पाजिटिव या नेगेटिव, चाहे जैसा भी कमेंट हो, वह उसे लिखने वाले की पहचान के साथ आए, तभी छपे।

चन्दन said...

@ शशिभूषण, लाईये अब इसे खतम ही करते हैं:

आपने कोशिश की है पर मेरे शब्द प्रयोग की गलती पर ही अटक गये हैं. अफजल की माफी का अच्छा उदाहरण रखा है. उस बेचारे शक्स का इस्तेमाल आपने अपने कुतर्क के लिये कर लिया इसके लिये मैं अफजल से क्षमाप्रार्थी हूँ. आप क्या इस तर्क से इंकार करेंगे कि शक्तिशाली और शक्तिहीन लोगो की माफी का अर्थ अलग अलग होता है? शक्तिशाली माफी को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं तो अशक्त माफी को आखिरी या उससे ठीक पहले वाली सांस की तरह. अब अगर इससे आपको ऐतराज हो तो फिर कुछ कहना व्यर्थ है... अफजल की माफी के लिये बोलने वाले लोग दरअसल यह चाहते हैं कि उसे फांसी न हो पर मैं नहीं समझता कि वे उसे बरी कराने के पक्ष में है. मैने बात वाजिब सजा की उठाई है. वहाँ तो आपकी निगाह नहीं गई होगी. क्या आप भी यही चाहते हैं कि अगर अफजल गुनाहगार है तो उसे फांसी की जगह कोई दूसरी सजा भी ना दी जाये जैसे कैद के कुछ वर्ष? और वो bhi tab jab vo गुनहगार हो.

मैं साथियों का ब्लॉग पढ़ता हूँ या नहीं इसे आप अपने ही ब्लॉग पर मेरे द्वारा किये गये कमेंट्स से जान सकते हैं. मैने कुणाल का ब्लॉग भी पढ़ा. वो उनका पक्ष है. उन्होने जो बात उठाई है वो दूसरे मीडिया हाउसेज द्वारा प्रयोग की जाने वाली गरिमाहीन भाषा को लेकर है जिससे मेरा मुद्दा कहीं मेल नहीं खाता. आपने जाने किस समझदारी में तुलना की है? दूसरों के ब्लॉग नहीं पढ़ता तो शायद कभी जान नहीं पाता कि कुछ युवा युवापीढ़ी को मनुष्यविरोधी और विज्ञापनबाज कहे जाने का नंगा और नीच समर्थन करते हैं. आप मेरी बात पर खफा क्यों हुए यह तो नहीं पता पर मैने भी बर्खास्तगी या इस्तीफे से अलग बस इसकी बात रखी है कि विभूति या कालिया उस इंट्रव्यू से जुड़ी कुछ घोषणाये करे: उसे वापस लेने का, उसे दुबारा प्रकाशित नहीं करने का या हो सके तो उसे डिसऑन करने का. इतनी तो जायज मांग बनती है..या यह भी गलत है? शक्तिशालियों की माफी मंगाई का कोई औचित्य नहीं होता.

अब आप ही देखिये ना! बतौर रचनाकार मुझे मैत्रेयी का लिखा पसन्द नहीं है फिर भी मैं उनके समर्थन में खड़ा हूँ और आप प्रशंसक होते हुए भी..

शशि, आप मुद्दे से बातों को भटका रहे हैं. शक्तिशाली लोगो द्वारा मांगी गई माफी अपने आप में काफी नहीं है – मेरी राय यही है. आप लिख चुके हैं कि माफ नहीं करोगे तो क्या करोगे(इससे भी यही जाहिर होता है कि मैं दूसरों के ब्लॉग पढ़ता हूँ.) हो सकता है अपनी कमजोरी के नाते विश्वास ध्वंषियों के खिलाफ मैं कुछ कर ना पाऊँ, अच्छे अच्छे महान इंसान मेरी इस कमजोरी का फायदा उठा ले गये और बाकयदा अपनी धूर्तता के समर्थन में तर्क देते हुए, पर गलत को गलत कहता रहूँगा, आप चाहे जितना मर्जी गाल बजा लें.

आप मुद्दे की बात करिये. और अगर नहीं कर सकते तो मेरी कमजोरियों की तरफ ध्यान दिलाने के बजाय अपने उसी स्टैंड पर कायम रहें जिसमें आपने कहा है कि मेरी यह सारी आक्रामकता सायास है. सायास क्या है या क्या नहीं इसे आप ही अकेले नहीं समझ रहे हैं. पर मेरी इन्ही कमजोरियों से मुझे यह मालूम होता जा रहा है कि कौन कैसा है? यह कितनी खूबसूरत कमजोरी है इसे भी तो देखिये जो ऐसे में मित्रता का ढोंग रचने वालों का फाश कर रही है. ऐसे में मैं चाहूंगा कि मेरी यह कमजोरी सदा बनी रहे.

Anonymous said...

शशिभूषण की प्रतिक्रिया सराहनीय है.

मनोजरंजन

shesnath pandey said...

गलत सही जो हो रहा है वो सामने है..... और सब अपनी बात कह रहे है.... लेकिन बात से ज्यादा लोगो ने अपनी आपसी विद्वेष और कुंठा को सामने रखा है.... सही कहने के बजाय कौन क्या कह रहा है... या मेरी टिप्पड़ी पर क्या कहा जा रहा है इस बात पर लोग ज्यादा बल दे कर निहायत ही गैर जरूरी.... अश्लिल और बेवकूफो वाली भाषा का प्रयोग कर रहे है... इस वजह से मैं इस संबन्ध में कुछ और कहूँ.... कुणाल और सुशिल के ब्लाग पर हस्ताक्षर करने जा रहा हूँ....

Anonymous said...

Chandan aapne hmesha jo v stand liya hai wh niji swartho, bhashayi-sahityik prapancho se pare vastwik aaloknatmk sahityik aur upaukta manviy sarokaro k tahat liya hai.Yah SARAHNIYA KADAM hai aur MAIN AAPKE SAATH hu.Ab Vibhutiji, Ravindraji k saath-saath inse sambdh sansthan aur inke samarthak sabhi pashno k ghere me hai...kisi v nirarthak vagjal se pare.Jaisa k aapne kaha hi hai jhuthe mitra aur samarthk hmesha nuksandeh hote hai, FAJIGAT me pde log ab jarur samjhenge.

VIJAYA SINGH

himansu said...

शशिभूषण जी, आप बिला वजह परेशान हुए जा रहे है. चन्दन ने कही नहीं लिखा है की उन्हें मत्रैयी पुष्पा नहीं पसंद है तो आप भी पसंद ना करे. आप बहुत ही मासूमियत दिखाते हुए बात को दूसरी दिशा में घुमा ले जा रहे है. मसलन, इसे ही देखिये, चन्दन ने लिखा है 'वैसे मे कल को कोई कुलपति जातिविरोधी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे दे और जनता में आक्रोश भर दे तो क्या एवजी में माफी काफी होगी?' जिसका तात्पर्य है की उनके जाति को लेकर जिन्हें हमारी संस्कृति ने जाति पर गर्व करना नहीं सिखाया है, उन्हें गाली देना (किसी चमार को चमार कह देना, बुरा लग्न चाहिए की नहीं ईमानदारी से आप बताये ). लेकिन इसके जवाब में आपने क्या लिखा है देखिये 'तब बताइए कि किसी भी कुलपति के चाहे वह संघी ही क्यों न हो उसके जातिविरोधी होने में क्या बुरा है?'. मतलब आप जवाब देने की हड़बड़ी में 'खिलाफ बयां देना' और 'जाति विरोधी होना' को एक मान बैठे है.

यह भी आप की लिखी हुई पंक्तियां है 'हम दूसरी बात आप लोकतंत्र के हिमायती हैं तो क्या विरोधी मतों के लिए आपके पास अधम,नीच,चमचे आदि ही विशेषण हैं?क्या यह भाषाई हिंसा नहीं?' क्या 'विरोधी मत' और माँ को लगा के गाली देना, आपकी शब्दवाली में सामान है. देखिये दुर्भाग्य यह है की हम इन सबो को आत्मगत इस्तेमाल करते है, जैसे की अभी आप कर रहे है.. लेकिन मजे की बात ये है की चन्दन का विरोध आप कर रहे है और उन्होंने आपके लिए ऐसा कोई सब्द ईस्तेमाल नहीं किया है. यहाँ तात्कालिक उदहारण है की आप गलत है ऐसा कहते हुए की चन्दन के पास विरोध करने वालो के लिए ऐसे ही शब्द है.

यहाँ देखिये आप क्या कह रहे है 'हाँ उनमें कहानीपन नहीं है यह आपका नितांत आपका मत है.यदि मैं इस पर अभी आपत्ति कर दूँ तो आप न मेरा मुह बंद कर सकते हैं न ही चरित्रहनन करने लग सकते हैं.हज़ारों लोग हैं जो उन्हें अच्छी कहानीकार मानते है'. और मैं कहता हु कि यह भी नितांत आपका मानना है और चन्दन ने कही नहीं लिखा है की आप मैत्रयी पुष्पा को अपना पसंदीदा लेखक ना माने.

आप यहाँ बहुत ही दोयम दर्जे की बात कर गए है. चन्दन यहाँ 'चरित्रहनन' जैसी चीजों का विरोध कर रहे थे और आप उन्हें ही ऐसा दिखा रहे है कि खुद वही इसमें व्यस्त हो. आपने आरोप लगाया है कि तहलका के किसी अंक में इस लेखिका के लेखन को पसंद नहीं करने कि वजह से चन्दन इन लेखिकाओ को गाली दिए जाने के विरोध का भी हक खो दिए है.( ये आपका कहना है ) चन्दन ने इसका विरोध किया है कि माना कि एक पाठक ( या कह ले लेखक ) होते हुए किसी लेखिका का लेखन उन्हें पसंद ना आया हो पर उसके खिलाफ अगर अपशब्द का इस्तेमाल कोई कर रहा हो तो चन्दन उसका विरोध तो कर ही सकते है (क्यों नहीं कर सकते ?). और आप यहाँ लिख रहे है कि चन्दन आप से कह रहे है कि आप भी उस लेखिका को बुरा मानिये और औरो को भी इसके लिए बाध्य करिए.

आप ब्लॉग कई कई बार पढ़ते है, आपकी ब्लॉग पर सक्रियता देखकर पता चल जाता है. लेकिन, कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए है आप. सोचिये जरा. अगर चन्दन बड़े लोगो कि माफ़ी को महज खानापूर्ति मानते है तो सही मानते है. क्योंकि ये सब हथकंडे है इन सत्ता में चूर लोगो के. अब आप कि समझ में ये क्यों नहीं आया, ये समझ से परे कि बात है. ये तो सारा देश समझता है, सारी जनता समझती है और तो और ये सत्ता में चूर लोग भी समझते है. पर आप इतने मासूम क्यों बने बैठे है.!

शशिभूषण said...

श्रीकांत जी
मैं कभी नहा धोकर खाना खाता हूँ.कभी खाने के बाद भी नहा लेता हूँ.ऐसा करके मैं उन लोगों की नज़र में निहायत ग़लत आदमी हूँ जो खाने के पहले पूजा पाठ को भी सही मानते हैं.डाक्टरों का कहना है कि इसमें कोई समस्या नहीं.इसी आधार पर मैं कभी बीमार भी नहीं पड़ा.ठीक-ठाक श्रम भी कर लेता हूँ.मतलब आप समझ गए होंगे कि मैं कब-कब राय दूँ यह मैं ही तय करता हूँ.चंदन जब तक ऐसी कोई घोषणा नहीं कर देते कि मैं कितनी बार उनका ब्लाग देखूँ कब प्रतिक्रिया लिखूँ या नहीं तब तक इसमें भी मैं अपने मन की ही करूँगा.सो मैं कितना प्रतियोगी हूँ आप समझ गए होंगे.मेरा कौन सा कमेंट करेक्ट है यह तय करने का अधिकार आपको है और वह मेरी तरफ़ से सुरक्षित है.बस इतना ध्यान रखें कि सार्वर्भौम साबित हो जाने से पहले तक वह आपका ही मत है
मैं समझता हूँ कि जैसे चंदन को किसी मसले पर लिखने का हक़ है वैसे ही मुझे भी लिखने और राय रखने का हक़ है.वे अगर ज्यादा सफल हों तो इस विशिष्टता से भी वह मुझमें कोई हीन भावना नहीं भर सकते.वरना तो मैं चंदन का प्रशंसक ही हूँ.इससे भी मैंने कोई उपलब्धि नहीं पाई और अब असहमति जताने के पीछे भी कोई छुपा मकसद नहीं है.यह विवाद से ज्यादा संवाद है कि भिन्न विचारों के लोग एक दूसरे को कभी कभार आहत करते हुए भी कम से कम परस्पर बात करते हैं.
मैंने जब किसी का समर्थन किया तो मुझे याद नहीं उससे क्या बख्शीश मांगने चला गया और जब विरोध किया तो क्या खो जाने की परवाह की.
मैं सोचता हूँ मित्रता विरोध और समर्थन से बड़ी चीज़ होती है.पर विरोध से मित्रता छीजती है यह दुनियावी सच है.तालस्ताय ने कहा है कि गाढ़ी मित्रता में भी तारीफ़ की ज़रूरत होती है और वह मित्रता के पहिए को चलाने में ग्रीस का काम करती है.पर जो अपना हर क़दम मील का पत्थर मानकर चलते हैं वे विरोध और समर्थन के प्रति ज्यादा सतर्क होते हैं.यह आप भी जानते होंगे ही.
चंदन,आपने लिखा.मैने पढ़ा.मैने सवाल किए आपने जवाब दिया.इसमें कौन कितना सही गलत है समय और दूसरे भी तय कर रहे होंगे.उनका यह हक़ रखना ही होगा.अब अभी देखिए आप कह रहे हैं कि लाइए खतम कर देते हैं साथ ही एक बहस तलब बात सामने रख दी.क्या सचमुच बात पूरी हो गई?नहीं.इसे आप समझते हैं.

फिर दोहरा दूँ कि मैं मैत्रेयी के खिलाफ़ नहीं हूँ.उनको पढ़ने उनपर काम करने में हमने(कविता के साथ) कितना समय श्रम दिया है किस तरह के विरोध सहे हैं यह कभी बताऊँगा.
जितने निर्णायक आप हो जाते हैं दरअसल लोग उतने कमसमझ नहीं हैं.यही कहूँगा.

Anonymous said...

शशिभूषण की बातों पर कुछ बातें...
अवांतर जाते हुए खाने और नहाने के संदर्भ मे :
अगर दिनचर्या के ही टर्म में आपको ज्यादा समझ आता है, तो मैं बता दूं कि आपका दो बार आकर कमेंट लिखना नहाने और खाने जितनी अलग चीजें नहीं थीं, और यह उनके क्रम की भी बात नहीं थी। बात दरअसल सिर्फ खाने की थी, और ऐसी थी कि जैसे एक जगह पर खाद्य और दूसरी जगह पर अखाद्य खाने की हिमायत की जा रही हो। आप ही के दोनों कमेंट परस्पर विरोधी थे।
सहमति और असहमति के बीच कंफ्यूजन पर :
एक बार जो कहा कि हर बार की तरह आपने अपना पक्ष साफ साफ बता दिया है, चंदन। सहमत हूं। तो यह सहमति चंदन की किस बात से थी? बिना स्पष्टीकरण के तो यही माना जाएगा कि चंदन की हर बात से। आगे, दूसरे अवतार में आप खुद ही सिलसिलेवार चंदन की एक एक बात से असहमति दिखाते हो, ब्लाग पढ़ने वालों के सामने तो दूर, पहले आप खुद के लिए यह निर्धारित करो कि आप किससे सहमत हो और किससे असहमत?
पक्ष के बारे में :
हो सकता है कि आपके इस तरह के लच्छेदार तर्कों से किसी को कोई नया वाक्य विन्यास अथवा उद्धरण देने की एक घिसी पिटी शैली भर मिल जाए वर्ना अब तक आपकी किसी भी बात का कोई कांक्रीट मतलब नहीं निकला है। अभी जबकि अलग अलग तर्कों के बावजूद समूची बहस वी एन राॅय के इस कुकृत्य के पक्ष और विपक्ष में होने वालों पर चल रही है, आपका पक्ष अभी तक साफ नहीं है।
लोकतंत्र और आपके मूल अधिकारों पर :
मैंने जो लिखा, अभी उसे फिर से, और कुछ ज्यादा सतर्कता के साथ पढ़ा। लेकिन मेरी बात का कोई भी शब्द आपके अधिकारों और स्वतंत्रता के बीच आड़े आता नहीं दिखा। मेरा कहना सिर्फ एक मित्रवत सुझाव भर था, कि अपने बात को जेनुइन और वनजदार बनाए रखने के लिए, जरूरी है कि उसके जगजाहिर होने से पहले उस पर अच्छे से होम वर्क किया जाय, वर्ना हालत उन फ्रस्ट्रेटेड ब्लागर्स की सी हो जाएगी जो अपनी ही कविताएं छापने के लिए ब्लागिंग का कारोबार चलाए जा रहे हैं। आगे जहां तक आपके इच्छा और उस पर अमल करने की स्वतंत्रा का सवाल है, तो नहाने से पहले या बाद में खाने के क्रम में आप एक विकल्प नहाने के साथ खाने का भी जोड़ सकते हैं। मुझे या किसी को कानूनन भी कोई आपत्ति नहीं होगी।
एक अंतिम सवाल :
आगे, अफजल गुरू जैसे अशक्त और वी एन राय जैसे सशक्त को एक ही कैटेगरी में खड़ा करने की आपकी बात को लोगों द्वारा कैसे लिया जाना चाहिए?

जीमेल प्रोफाइल में कुछ दिक्कत के नाते ये कमेंट एनोनिमस के प्रोफाइल से डाल रहा हूं.

श्रीकांत दुबे

Bodhisatva said...

चन्दन जी आप बिलकुल सही जगह चोट करते है और इस बात का यकीं मानिये की हमे आपकी बहुत जरुरत है ताकि हम उनसे लड़ सके 'जो गलत है'
मैं एक बहुत ही साधारण सा पाठक हू हिंदी का इसलिए जब बड़े महारथी चर्चा करते है तो समझ समझ के कमेन्ट करता हू. वैसे वो लोग जादा अजीब लिखते है जो साहित्य में अभी कदम रखने की कोशिश कर रहे हो और सीधी बात को जबरदस्ती घुमा घुमा के लिखते है (मार्शल आर्ट्स के व्हाइट बेल्टर बहुत जादा कूदते है लेकिन ब्लैक बेल्टर शांत और साधारण बात करते है). वैसे प्रथम दोष मेरी समझ का ही होगा. यहाँ काफी देर बाद कई बाते कहना जरुरी लगा सो लिख रहा हू.
चन्दन जी ऐसा लगता है की हिंदी साहित्य में इतने जादा फ्रस्टू है की उनकी मनोवैज्ञानिक कोउन्सेल्लिंग के लिए एक अलग ब्लॉग बनाना पड़ेगा वरना आपके ब्लॉग पर इसी तरह हेन-तेन लालटेन बाते करते रहेंगे और उसमे क्लिष्ट भाषा प्रयोग करके मन की भड़ास निकलते रहेंगे. इनके ब्लॉग पर लोग इनको नहीं पढते होंगे अगर आपके ब्लॉग पर न देखे तो. वैसे भी इनको पढ़ के आम आदमी को कोई फायदा होगा नहीं क्योकि इनको शायद यही नहीं पता की ये क्या कहना चाहते है तो हम क्या खाक समझेंगे.
मुझे उनसब जीवो से हमदर्दी है जो नेट और जे आर एफ जैसे तुच्छ उपाधियो के बावजूद गद्दी की कोई चाह नहीं रखते. परन्तु अब उनकी जुझारू कोशिशो को देख के लगता है की इस बार कही न कही कुर्सी पक्की है. वैसे भी विश्वविद्यालयों में पैसे देकर उनको ही सुनना पड़ता है जिनकी कोई नहीं सुनता.
शेषनाथ ने सही कहा की यहाँ व्यक्ति जादा महत्वपूर्ण है मुद्दा नहीं. कौन कह रहा है इस आधार पर प्रतिक्रिया दी जा रही है,क्या कह रहा है इससे जादा मतलब नहीं लगता.
मैं ये मानता हू की शायद मेरी समझ बहुत जादा विकसित न हो मगर ये बात तो किसी के भी समझ में नहीं आएगी की अगर गलत को गलत कह दिया गया तो क्या गलत हो गया. चन्दन ने ब्लॉग में हमेशा सीधी बात की है लेकिन न जाने कितने पाठक-विहीन प्राणी है की बिना मौसम नाचने लगते है और मौहौल खराब करते है. लेकिन उम्मीद है की ये सब जल्दी खत्म होगा और लोग मुद्दे पर बात करेंगे व्यक्तियों पर कम.

शेखर मल्लिक said...

मुद्दे की बात इतनी है कि, विभूति नारायण राय और कालिया जी ने वास्तव में साहित्य के क्षेत्र में अनर्गलता, अर्थात जो सही नहीं है, को प्रश्रय दिया है. इस बात के, लिये मेरा विरोध है. साहित्य की गरिमा मनुष्य की गरिमा से सीधे जुड़ी होती है. अत: इस पर आघात और उनके दृष्टिकोण के लिए निन्दा होनी चाहिए.

Anonymous said...

शशिभूषण और चन्दन पांडे के बीच हुई बहस ने एक बात स्पष्ट कर दी कि इस बहस का श्रोत कहीं न कहीं मैत्रेयी पुष्पा हैं. एक प्रतिभाहीन रचनाकार , जिनके उपन्यास कभी भी पचास पेज से आगे पढ़े ही नहीं जा सके. यह बात केवल मैं नहीं कह रहा बल्कि हजारों से सुनी गई है. मैत्रेयी ने जो भी पाया है उसकी एक लंबी कहानी है. हिमांशु जोशी से लेकर चित्रा मुद्गल तक उनकी साहित्यिक जुगाड़ का शिकार रहे. चित्रा ने कहीं लिखा भी है. राजेन्द्र यादव और मैत्रेयी एक दूसरे की विवशता हैं. साहित्य से अधिक कुछ है जो हिन्दी जगत जानता है. कुछ छुपा नहीं .

शशिभूषण ने उस सचाई को अनजाने में ही स्वीकार कर लिया कि कविता के साथ मिलकर उन्होंने (संभव है आपने भी) मैत्रेयी के लिए कितना श्रम किया. स्पष्ट है कि यह श्रम उनकी रचनाओं के लिए ही किया गया होगा, जिसके विषय में कभी कमलेश्वर ने दैनिक हिन्दुस्तान के अपने स्तंभ में लिखा था कि मैत्रेयी पुष्पा नामक लेखिका के लिए पांच लोग लेखन कार्य करते हैं. साहित्य में मैत्रेयी पुष्पा का अपना कुछ भी नहीं , सब दूसरों का है. लेकिन यह सब एक ऎसे साये में छुपा हुआ है कि किसी का साहस नहीं कि उस ओर उंगली उठा सके. विभूतिनारायण राय ने आम महिला लेखिकाओं के लिए अनुचित शब्द का प्रयोग किया , उसकी भर्तसना होनी ही चाहिए. ऎसा नहीं कि वह सचाई बयान नहीं कर रहे थे, लेकिन वह सचाई सभी की सचाई नहीं थी. पिछले वर्षों भोपाल के एक कथा कार्यक्रम में एक सम्पादक ने पीने के दौरान एक हिन्दी कथा लेखिका के समक्ष एक ऎसा निन्दनीय प्रस्ताव रखा जिसे सुनकर उपस्थित लेखक भौंचक थे, लेकिन पीने में शामिल वह लेखिका मंद मंद मुसका रही थी.

राय के साक्षात्कार पर हाय तोबा मचाने वाले लेखक अपने गिरेबान में झांककर देखें कि उनकी सोच क्या है. अपराधी को पत्थर मारने का हक उसे है जिसने कभी अपराध न किया हो.

मैं न साहित्यकार हूं और न ही मेरा विभूतिनारायण राय से कुछ लेना देना है, मैं साहित्य में रुचि रखने वाला मात्र पाठक हूं. लेकिन हिन्दी की सभी गतिविधियों से परिचित हूं और इस बात से भी कि मैत्रेयी पुष्पा एक बेहद कुंठित लेखिका का नाम है (यदि उन्हें लेखिका माना जाए). पूंजी के बल पर वह न केवल साहित्यकारों को उनकी औकात बताना जानती हैं, बल्कि कालिया और विभूति को पदस्खलित करवाने के लिए अब तक कितना धन खर्च कर चुकी होंगी इसका अनुमान लगाया जा सकता है. एक कहानी छपवाने के लिए जब वह सम्पादक की पत्नी को उपहारों के ढेर पहुंचा सकती हैं तब वह क्या नहीं कर सकतीं. आप लोगों ने उन जैसी कुंठित लेखिका को लेकर खूब माथा-पच्ची कर ली अब इस प्रसंग को समाप्त करे वही अच्छा.

संजीव पाराशर

parag mandle said...

मित्रो, इस मुद्दे को वैचारिक ही रहने दिया जाए, व्यक्तिगत न बनाया जाए। असहमति व्यक्त करने के लिए लांछन लगाना जरूरी नहीं होता।
मैं चंदन से सहमत हूँ कि वीएन राय को अपना साक्षात्कार वापस लेने की घोषणा करनी चाहिए, उनकी घड़ियाली माफी पर्याप्त नहीं।
कुणाल के ब्लाग से पता चलता है कि कालिया जी ने भी माफी मांगी है। इसे खुले दिल से स्वीकार किया जाना चाहिए।
और एक बात......वीएन राय के साक्षात्कार का जो एक पृष्ठ अभी तक देखने को मिला है, उसमें उनकी अभद्र टिप्पणियों के अतिरिक्त कुछ मुद्दे उठाये गये हैं। उनकी अभद्र टिप्पणियों के विरोध का अर्थ ये नहीं कि उनके द्वारा उठाये गये किसी सही मुद्दे को भी सिरे से खारिज कर दिया जाए। बेहतर हो अब यह चर्चा व्यक्तिगत स्तर से उठाकर मुद्दों पर केंद्रित की जाए।

शशिभूषण said...

मैं ये मानता हू की शायद मेरी समझ बहुत जादा विकसित न हो मगर ये बात तो किसी के भी समझ में नहीं आएगी की अगर गलत को गलत कह दिया गया तो क्या गलत हो गया(बोधिसत्व के शब्द)
बोधिसत्व जी मैं सचमुच बता नहीं सकता कि किसको पढ़कर आप बात को ठीक तरह से कहना सीख जाएँगे.अभी तो आपके बारे में पहली पंक्ति ही लागू हो रही है.आपको नाम लेकर कहना था बंधु.किशोर ऐसा ही तो करते हैं किसी को अपना सबसे प्रिय मानते हैं और बाक़ी सबसे छीन लेना चाहते हैं.

श्रीकांत जी आपको जवाब देना तो आता है लेकिन इसमें यह भावना मिली हुई है कि अब मैं आ गया हूँ तो जय हमारी ही होगी.मुझे सचमुच ताज्जुब हो रहा है कि आप जैसा मित्र-प्रतिबद्ध सह-तार्किक चंदन के पिछले स्टैंड के समय कहाँ खोया था.आपका कोई पछाड़ू तर्क उस समय आया होता तो क्या बात होती?

अब कुछ बातें रख दूँ जिससे आपको यह समझने में आसानी हो जाए कि मैं किस तरफ़ हूँ(हालांकि चलन तो इसका है कि जो अपनी तरफ़ का नहीं है वह साला कहीं का नहीं है.तर्क काट देने वाला तो दुश्मन होता है या कम से कम होते जाने का फाश हो रहा है.ऐसा नहीं होता तो आपके लिए कोई भ्रम की बात नहीं थी कि मैं किस तरफ़ हूँ)
1-मेरा पहला कमेंट है-हर बार की तरह आपने अपना पक्ष साफ़ साफ़ बता दिया है.सहमत हूँ.
पर फिर वही राजेन्द्र यादव की एक पुरानी बात आज लड़ाई सही और गलत के बीच उतनी नहीं है जितनी अपनी तरह से सही लोगों के बीच.
विरोध तो उनका भी है ही जो हर हाल में दोनों की बरखास्तगी ही नहीं चाहते.तटस्थों को ललकार देना हमेशा सही ही नहीं होता
अंतिम दो लाइनों को अगर ग़ौर से देखें तो मेरे द्वारा दूसरे कमेंट का औचित्य समझ में आ जाएगा.मेरा पक्ष भी वही है.मैं उनके साथ हूँ जो हर हाल में कालिया और विभूति की बर्खास्तगी ही नहीं चाहते.लेकिन उनके इस कृत्य के निंदक हैं.यानी तटस्थ हैं.ऐसा हर बार हुआ है कि कुछ क्रांतिकारी आते हैं और आरपार की लड़ाई शुरू कर देतें है.फिर चैन से दूसरे समझौतों में लीन हो जाते हैं.सो आप मुझे ग़लत कह सकते हैं कि मैं बीच में हूँ लेकिन तब आपको बताना पड़ेगा कि पिछली बार कब आर पार की लड़ाई में थे.यह समझ पाने में आपको जो असुविधा हुई उसके लिए मुझे खेद है.आप कतई कोई घिसी पिटी शैली न अपनाएँ.आप तो स्पैनिश जानते हैं वही से कोई शैली साधें यहाँ के भदेसों को उसे ताड़ने में ही इतना समय लग जाएगा कि कोई आपत्ति ही नहीं कर पाएगा.

मैं चंदन के इस तर्क से सहमत हूँ कि नया ज्ञानोदय का दूसरा संस्करण यदि आता है तो उसमें यह साक्षात्कार न हो.यही समस्या का उचित हल है.और कालिया जी के नया ज्ञानोदय में रहते हुए भी यह हो सकता है.
चंदन विभूति को संबोधित करते हुए कहते हैं कि-इसलिये महोदय आप अपने कहे शब्द के लिये माफी मांगिये.मैं इससे भी सहमत हूँ.चंदन एक संगठन का बिना नाम लिए कहते हैं कि वह विभूति के समर्थन में आ गया है इससे भी सहमत हूँ.सारी सहमतियाँ बताने का कोई मतलब नहीं है.
मेरी उनसे असहमति कहाँ है बता चुका हूँ.पर लगता है इन दिनों जो चंदन से असहमत है वह आपको बेहद आपत्तिजनक लगता है और उसकी सारी बातें सारहीन भी आपको लगती हैं.चंदन की हर बात में गूढ़ मतलब खोजना आपको अपना आपद धर्म लगता है.चूकि सारा मामला ही बेवफ़ाई से शुरू हुआ है इसलिए कोई तो वफ़ा पेश करेगा ही वरना मेरी भी कोई बात आपको गौर करने पर मजबूर करती.पर शायद आपको अभी मित्रता का प्रमाण देना अधिक सही लग रहा है.
2- चंदन कहते हैं कि दूसरों के ब्लॉग नहीं पढ़ता तो शायद कभी जान नहीं पाता कि कुछ युवा युवापीढ़ी को मनुष्यविरोधी और विज्ञापनबाज कहे जाने का नंगा और नीच समर्थन करते हैं.मैं उनसे ऐसे लोगों के ब्लाग सहित नाम जानना चाहता हूँ.वे नाम बताएँ ताकि उनकी बात की बैधता ज़ाहिर हो.
3-श्रीकांत जी आप सुझाव भी क़रीब क़रीब ठीक दे लेतें हैं लेकिन लगता है उन्हें न माननेवालों से नाराज़ हो जाते हैं.हालांकि इसे आप तुरंत खारिज कर देंगें कि देखिए चंदन ने मेरा सुझाव नहीं माना कि बेनामी कमेंट न लगाओ तो भी साथ डटा हुआ हूँ.तो चलिए मैं भी आपको सुझाव दे देता हूँ कि आपका अपना ब्लाग है तो उसे भी जगाओ.आपने भी छोटी जोत के किसानों की वह हालत देखी होगी जो बड़े किसानों की दोस्ती में उनके ही खेतों में पहले बोनी कराने पहुँचे रहते हैं.पत्नी बच्चों को समझ ही नहीं आता कि अपनी खेती छोड़े रहनेवाले इस शख्स को हो क्या गया है.यह सलाह देने की गुस्ताखी मैंने इसलिए की कि आपने मुझे फ्रस्ट्रेटेड ब्लागर हो जाने से आगाह किया है.बात सिर्फ़ इतनी भी है कि आप बेवजह चोट न करें.वरना मुझे भी पता है कि कवि-कथाकार हैं
तो संवेदनशील हैं भी.और दुनिया में आपको भुरी लगनेवाली बातों की भी कमी नहीं है.

बातें खत्म नहीं हुई हैं पर अभी इतना ही.अफजल वाली बात ज़रा लंबी है सो इसका उचित अवसर आएगा.इस उम्मीद में

addictionofcinema said...

दो दिनों तक ये सोचता रहा कि लिखूं क्या, ये किस बात कि बहस हो रही है. चन्दन तुमने लिखा क्या है और ये एक से एक धुरंधर और शानदार भाषा के मालिकान क्या लिख के बहस को कहाँ का कहाँ ले जा रहे हैं. कुछ समझ नहीं आता कि ये बहस किस बात पे है. शशिभूषण जी कि बात करूँ तो क्यों करूँ, मेरे सर पे बाल बहुत कम बचे हैं और इन कीमती बालों को कैसे कुतर्कों कि सिलाई उधेड़ने में गवां दूं. उन्हें तुम्हारी सायास आक्रामकता पे दिक्कत है, किसी को तुम्हारी हिंसक होती जा रही भाषा पे दिक्कत है. हिंसक होते जा रहे समाज और समय में जहाँ रचने जैसे काम में लगा एक आदमी औरतों के लिए ऐसे शब्द कहता है, तुम्हारी भाषा निहायत सुन्दर और खरगोश के रोयें जैसे गद्य वाली क्यों नहीं है ? तुम क्या ये अंट संट लिखते रहते हो ? तुम किसी से डरते क्यों नहीं बे ? लोग इसे सहन नहीं कर पा रहे और तुम्हारी हर पोस्ट में बिंदु खोजते हैं जहाँ तुमसे असहमत हुआ जा सके. कठिन है पर जहाँ चाह वहां राह. आदरणीय शशिभूषण जी को और कुछ नहीं दिखा, न तुम्हारा प्रतिरोध, न तुम्हारा विरोध, न तुम्हारी प्रक्टिकल मांग, उन्हें सिर्फ ये दिखा कि तुम अपनी भाषा को इतना सक्षम मानते हो,,,,? तुम्हारी ये हिम्मत ? शशिभूषण जी आप दूसरों को ब्लॉग पढने कि नसीहत क्यों दे रहे हैं. यहाँ मौजूद हर इंसान मेरे ख्याल से ठीक ठाक पढता है. आपकी कहानी भी कथादेश में '...एक दिन का प्रेम' पढ़ी थी और अच्छी लगी थी. आपका ब्लॉग भी देखा और ये भी देखा कि अपने बड़ी हिम्मत कर के ये कहा है कि वी एन राय और रविन्द्र कालिया ने गलती की है....फिर अपने ये रोना भी रोया है कि माफ़ नहीं करेंगे तो क्या करेंगे. आप यहाँ जो कुछ भी लिख रहे हैं उसमे सिर्फ और सिर्फ चन्दन से असहमति जताने के लिए लम्बे चौड़े उद्धरण और शानदार वाक्यांश प्रयोग किये हैं. आप वी राय कि बर्खास्तगी के लिए इतने उदाहरण और उद्धरण क्यों नहीं देते. एक लाइन में क्यों लिख देते हैं कि 'बाकि आपसे सहमत हूँ ही'.
या फिर आपके ही शब्दों में
"""""मैं समझता हूँ कि जैसे चंदन को किसी मसले पर लिखने का हक़ है वैसे ही मुझे भी लिखने और राय रखने का हक़ है.वे अगर ज्यादा सफल हों तो इस विशिष्टता से भी वह मुझमें कोई हीन भावना नहीं भर सकते.वरना तो मैं चंदन का प्रशंसक ही हूँ""""
चन्दन ज्यादा सफल हैं या कम इस बात का मुद्दे से क्या लेना देना है सरकार और किसने कहा की वो आपके भीतर हीन भावना भर रहे हैं ?
फेसबुक हो या कोई भी ब्लॉग, अभी तक मुझे एक आदमी की बातें समझ में आई हैं वो हैं पराग मांडले. सारी बातें वो मुद्दे कि कर रहे हैं और सलीके से कर रहे हैं लेकिन शायद वो नहीं जानते कि सही बातों को सही तरीके से लेने का चलन कम होता जा रहा है. उन्होंने एक बात ये भी कही थी कि सवाल व्यक्ति का नहीं प्रवृत्ति का है. वी एन राय आज मान लीजिये बहुत बढ़िया शब्दों में भी माफ़ी मांग लें तो कौन सा उनकी या उनके जैसे लोगों कि मानसिकता बदल जाएगी.
विमल चन्द्र पाण्डेय

Anonymous said...

जनाब चन्दन पाण्डे जी,

आप इतना साहस नहीं कि एक पाठक की प्रतिक्रिया को प्रकाशित कर पाते. पाठकों को उस पहलू से भी परिचित होने देते जो आज तक दबा ढका है, लेकिन आपको भी खतरा होगा कि कहीं राजेन्द्र यादव नाराज न हो जाएं. पाठकों की अदालत में जाने के और भी तरीके हैं क्योंकि मैत्रेयी पुष्पा जैसी लेखिकाओं की असलियत भी पाठकों तक आनी ही चाहिए, जो दूसरों की प्रतिभा और श्रम के बल पर आज लेखिका बनी घूम रही हैं.

मेरी प्रतिक्रिया न प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद.

संजीव पाराशर

चन्दन said...

@ सन्जीव पाराशर जी, कमेंट मॉडरेशन में प्रॉब्लम था. आपके दोनो कमेंट अब शो हुए हैं इनबॉक्स में. वरना आप देख ही रहे हैं अनॉनिमस नाम से भेजी गई कैसी कैसी प्रतिक्रियायें प्रकाशित हो रही हैं, आपने तो फिर भी किसी अपशब्द का प्रयोग नहीं किया है.

Aparna said...

first all Welcome Chandan after a long time at your blog.... I am not very much aware about the Incident but by people's comments and what u had written I can make out the Incident a bit....

Its a brave step of yours that you always take a step ahead for an incident which actually need attention of the youth & the readers.... As far as sorry matter is concern, forgiveness is not a bad weapon.... The way he's asking sorry, he should be forgiven in the very same fake way but the heat of anger against him should not go out because being at a reputed post, he's not at all supposed to use any language....He should be rather more effective by his words.......

Anyways...... I am with Chandan for acting in a brave manner for a good attitude & understanding of people regarding the use of language in our daily life....

Anonymous....... first all of all, y u always come with your so hidden name???? anyways, jahan tak apne Chandan ke premi, bhai, behan kee baat kee hai to apko iska tanik bhi adhikaar nahi hai kee aap kisi kee personal life mein kisi bhi shabd ka prayog karein..... He's very Simple guy & if he believes something as a wrong, its same for all (no matter what relation that person carry).... He's open to forgive if Sorry would have been true..........

Bodhisatva said...

बहुत सारे लोग यही महसूस कर रहे है की अब अति हो गयी और उर्जा का दुरूपयोग हो रहा है.चन्दन जी जब भी विराम लगाना चाहे लगा सकते है क्योकि लोग घालमेल करके मुद्दे से बहुत दूर जा रहे है. बहस हर बात पर हो मगर एक समय में एक ही बात पर हो तब ठीक है. वैसे भी शशिभूषण अब बैकफुट पर आ गए है.

@शशिभूषण > मेरी किशोरावस्था याद दिलाने के लिए धन्यवाद!
I take it as a compliment!!
मुझे लगता भी नहीं की मैं विचारों से कभी आपकी तरह बुजुर्ग हो पाउँगा.
कोशिश करूँगा की अपनी बात कहना सीख लू और अच्छी तरह से और इसके लिए जो पढ़ना है वो मुझे पता है. हाँ ये नयी बात पता चली की अगर ऐसा लिखना हो की साला अपने आप को भी न समझ में आये तो आप को पढ़ना पड़ेगा, समझने की औकात तो खैर अभी आप में भी नहीं होगी.
माफ कीजियेगा अगर आहत हो तो मगर आपकी छवि मजेदार बन गयी है. अब अगर सारे दोस्त चाय की दुकान पर बैठे हो और कोई कह दे “anonymous!” तो बिना बोले सब मुस्कुरा देते है.
अब के बाद अगर कोई अचानक बोल देगा, ”शशिभूषण!” तो मुझे लगता है बिना कुछ और बोले सब के सब हँसी से लोट पोट हो जायंगे.

चन्दन said...

यह सूचित करते हुए दु:ख हो रहा है कि अब कोई भी व्यक्तिगत राग द्वेष वाली टिप्पणी प्रकाशित नहीं की जायेगी. यह एक मंच है और मंच के सम्मान में हम बात विषय पर करेंगे, विषय से जुड़ा अगर आपका कोई स्वार्थ है तो उस पर. पर्ंतु अपमानजनक टिप्पणी करने से आपका कम, मेरा भी कम, नई बात ब्लॉग की प्रतिष्ठा की हानि ज्यादा है.

सूचनार्थ: ‘समय सबका हिसाब रखता है और लेखन में ईमानदारी’ इन दो बातों को मैं सूत्र की मानिन्द इस्तेमाल करता हूँ. आप सब चिंतक इस या दूसरे विषय पर सुलझी राय बात के साथ आयेंगे इसका सबसे ज्यादा विश्वास आपको नहीं, मुझे है.

Anonymous said...

कुणाल और चन्दन,

अपने आका की गुलामी मे तुम दोनो ने साहित्यिक मर्यादाओं का नाश कर दिया. अपराधी हो तुम लोग. तुम दोनो इस प्रश्न का उत्तर तैयार रखो, इतिहास पूछेगा कि तुमने अपने अपने ब्लॉग पर एक ही समय और एक ही दिन क्यो एक जैसा ही लिखा? कुणाल तुम हस्ताक्षर ले रहे हो और चन्दन तुम बर्खास्तगी की माँग को कमजोर करने के लिये रास्ते सुझा रहे हो? फिर तुममे और प्रय़ण क़ृष्ण में क्या फर्क बाकी बचा?
यह हिन्दी का दुर्भाग्य है कि तुम दोनो इस भाषा के लेखक हो. तुम लोग हिन्दी के शरीर पर कोढ़ हो.

भविष्य में तुम दोनो की कोई रचना नहीं नहीं पढूंगा.

संदीप पाण्डेय said...

चंदन, इस पोस्ट को एकदम शुरू से फॉलो कर रहा हूं। व्यक्तिगत राग द्वेष वाली टिप्पणियां प्रकाशित नहीं करोगे यह सुखद है लेकिन इस पर एकदम शुरूआत से अंकुश लगाया जाना चाहिए था। यह कैसी तानाशाही प्रवृत्ति हमारे समय में जोर मार रही है कि जो हमारे साथ नहीं है वह दुश्मन के साथ है। शशिभूषण,बेनामी, श्रीकांत और बोधिसत्व की चर्चा जब बेमतलब और बेमकसद होते हुए निरंतर छिछली होती जा रही थी तभी तुम्हें हस्तक्षेप करना चाहिए था। अब पूरा नंगापन सामने आ जाने केबाद तुम टिप्पणियों को रोक कर भी क्या कर लोगे। जिसे जितना मवाद बहाना था उसने अपनी अपनी भाषाई योग्यता से बहा दिया है। बातचीत, बहस और असहमतियों
का सुर अगर विनम्र हो तो उसका यह अर्थ कतई न लगाया जाए कि पराजित व्यक्ति अपनी मानसिक दिलासा के लिए किला लड़ा रहा है। इस भाषाई आतंकवाद के बाद तो मैं भी कहीं अपनी मर्जी की टिप्पणी करने से डरूंगा। क्या पता कौन सी बात किसे बुरी लग जाए और वह मुझे शब्द बाणों से छलनी करना शुरू कर दे। ध्यान रहे कि एक आदमी की सिर्फ मजे लेने के लिए की गई टिप्पणी दूसरे के लिए
बेवजह दिमागी खलल का कारण बन सकती है। अपने साफ सुथरे ब्लाग को निजी कुंठाओं के निपटारे का मंच मत बनने दो उसके लिए कई मुहल्ले हैं इंटरनेट पर।

girirajk said...

Tumne abhi tak virodh mein chal rahe abhiyan mein sign nahin kiya hai. kyon?

JITENDRA PANDIT said...

ज्ञानोदय के विवादित अंक को बाजार से वापस मंगवाने का बहुत बड़ा शेरेय चन्दन पाण्डेय को जाता है, बधाई

चन्दन said...

@ गिरिराज जी, सबसे पहले धन्यवाद कि आपने मेरे लिखे को पसन्द किया. आपके ‘एप्रीशियेशन्स’ हमारे लिये अत्यंत महत्वपूर्ण है. आज की ताजा खबर देखके आपको भी अत्यंत खुशी हुई होगी कि जिस लेख को आपने ‘another act of bravery and artistic integrity’ माना है उसमें सुझाये गये हरेक सलाह को पत्रिका ने मान लिया है. क्षतिपूर्ति तो सम्भव कहाँ पर उसके लिये बढ़ाये गये कदम का स्वागत आप भी करेंगे इसका बुनियादी यकीन है.

‘अभी तक हस्ताक्षर नहीं किया’ का मतलब समझ में नहीं आया?

girirajk said...

@ Abhi tak ka matlab "comment likhne ke waqt tak" tha. Tumne pahli maafi ka virodh kiya tha aur ummeed hai ki doosree ka bhi karoge. tumhare sahas aur lekhan ki tareef karna mere liye ek lekhak ke taur par karaniya karm raha hai. abhi tumse dono fronts par aur zyada ki ummeed hai. amen!

चन्दन said...

गिरिराज जी,

मैने हस्ताक्षर से जुड़ी अपनी राय आपको फोन पर स्पष्ट कर दिया था और आप सहमत भी थे. पर अभी गाली गलौज के लिये मशहूर धक्का बस्ती के सवाल से लगा कि उत्तर लिखित मे ही देना होगा वरना मैने उत्तर दिया हुआ मान लिया था. कालिया और विभूति के लिये प्रति आप सबका विरोध का तरीका एक तरीका है, वो सबसे अच्छा तरीका भी हो सकता है पर अंतिम नहीं. कोरी माफी के खिलाफ मैं अब भी हूँ पर अंक वापस लेना ‘रियलाईजेशन’ भी है. मेरे लिये यह महत्वपूर्ण है. हस्ताक्षर अभियान में सिर्फ इस्लिये शामिल नही हुआ जा सकता कि लोग क्या कहेंगे या पूरी दुनिया कर रही है तो तुम कौन हो? मेरे अपने पॉईंट्स हैं, मैने आपसे बात चीत में रखा भी है. किसी पत्रिका द्वारा अपने अंक वापस लेने की घोषणा को मामूली मानते हैं?