Thursday, August 19, 2010

लोर्का की पुण्यतिथि पर

19 अगस्त 1936 के अभागे दिन महान कवि फेदेरिको गार्सिया लोर्का की निर्मम हत्या हुई थी. उनके आखिरी दिनों की याद ही सिहरन पैदा कर देती है. इस दु:खद दिन पर इस अनूठे कवि को याद कर रहें हैं – हिन्दी के महत्वपूर्ण कवि - कथाकार उदय प्रकाश. लोर्का की कविता तथा जीवन पर लिखा उदय का यह अत्यंत महत्वपूर्ण आलेख हिरावल पत्रिका के वर्ष 1978 के अंक दो में छपा था. लेख के साथ लोर्का की दो कविताओं के अनुवाद हैं जो, जाहिर सी बात है, श्रीकांत का हैं.

इस पोस्ट की सारी तैयारी श्रीकांत की है. ये कवितायें और लेख मह्तव्पूर्ण है पर उतना ही महत्वपूर्ण श्रीकांत के वे तमाम प्रयास हैं जिसके तहत उन्होने इस लेख को तलाशा. पत्रिका के सम्पादक श्री शिवमंगल सिद्धांतकर से सम्पर्क किया. वे भी चकित थे कि कौन हैं ये लोग जो उतने पहले छपे लेख की तलाश में हैं. बेहद कम समय में श्रीकांत ने इस लेख को ‘कम्पोज’ किया. कविताओं का अनुवाद किया. श्रीकांत का आभार.

गाय
(‘लुईस लाकासा’ के लिए)

पेड़ से लटका दी गई
अधमरी गाय और तेज हवा
उसकी सींगों पर वार करने लगी।
थूथन पर लगा छींका
सनने लगा खून से।

लार से बनती मूंछों के नीचे
गाय का थूथन मधुमक्खिों का छत्ता बन गया।
एक सफेद चीत्कार ने समूची सुबह को
खड़ा कर दिया पैरों पर।

रौशनी और शहद के श्रोत जैसी,
गोशालों में, अपनी अधबंद आंखों में रंभाती रहीं दूसरी गाएं,
मरी हुईं और जीवित भी।

पेड़ की जड़ें और चाकू पर
धार लगाता बच्चा,
सब जान गए,
कि अब खाई जा सकती है गाय।

धूमिल पड़ने लगी रौशनी
और गाय की ग्रीवा भी।
उसके चारो खुर
थर्राने लगे हवा में।

चांद, और पीले चट्टानों वाली रात तक को
पता चल गया,
कि जा चुकी है
राख से बनी गाय।

कि वह जा चुकी है रंभाते, चिघ्घाड़ते
और गुजरते हुए
आकाश के शख्त ध्वंशावशेषों से
और वहां से भी,
जहां नशे में धुत लोग
मृतकों का नाश्ता करते हैं।


मौत
(‘इशिदेरो दे ब्लास’ के लिए)

कितनी शिद्दत से?
कितनी शिद्दत से चाहता है घोड़ा
कि वह कुत्ता बन जाए!
कितनी शिद्दत से चाहता है कुत्ता
कि वह बुलबुल हो जाए!
कितनी शिद्दत से चाहती है बुलबुल
कि वह बन जाए भौंरा!
कितनी शिद्दत से चाहता है भौंरा
कि वह घोड़े में तब्दील हो जाए!

और घोड़ा?
कितनी तेजी से झटक लेता है गुलाब से पराग के तीर!
और कैसे तो जाग उठता है
उसके मोटे होंठ के अंतरे से
गुलाब का भूरा रंग!

और गुलाब?
कैसा तो एक झुंड, रौशनियों और किलकारियों का
जुड़ा हुआ, अपने धड़ में जमी मिश्री से!

और मिश्री?
कैसे तो खंजर, जो दिखते रहते हैं हर वक्त
खुली आंखों के सपने में!

और खंजर?
कैसे तो फिरते हैं, नग्न,
अस्तबलों के बाहर की चांदनी में
लगातार, नाजुक लाल गोश्त खोजते!

और मैं,
छज्जों के किनारों पर ढूंढता हुआ
कैसे तो आग के फरिश्ते!
खुद होते हुए भी वही!

पर इन मेहराबों के पलस्तर
कितने भव्य,
कितने अनदेखे,
कितने महीन
बिना शिद्दत के भी!

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फेदेरिको गार्सिया लोर्का की रक्तगाथा: उदय प्रकाश

जब भी रचना और कर्म के बीच की खाई को पाटने का सवाल उठाया जाएगा, फेदेरिको गार्सिया लोर्का का नाम खुद ब खुद सामने आएगा। बतलाना नहीं होगा कि रचना और कर्म की खाई को नष्ट करते हुए लोर्का ने समूचे अर्थों में अपनी कविता को जिया। यह आकस्मिक नहीं है कि पाब्लो नेरूदा और लोर्का की रचनाशक्ति फासिस्ट शक्तियों के लिए इतना बड़़ा खतरा बन गईं कि दोनों को अपनी अपनी नियति में हत्याएं झेलनी पड़ीं। फासिज्म ने मानवता का जो विनाश किया है, उसी बर्बरता की कड़ी में इसका यह कुकर्म और अपराध भी आता है जिसके तहत उसने इन दोनों कवियों की हत्या की। लोर्का को गोली मार दी गई और नेरूदा को... नेरूदा और लोर्का गहरे मित्र थे।

चिंतकों और साहित्यकारों का एक तबका है, जो मामूली जीवन अनुभवों से साहित्य को परहेज की सलाह देता है। एक और समूह है जो जीवन अनुभव, समाज और राजनीति को साहित्य से जोड़ता तो है, लेकिन महज बौद्धिकता के धरातल पर... भाषा के माध्यम से... लफ्फाजी के जरिए। जाहिर है, वास्तविक अनुभव की दरिद्रता में, सिद्धांततः युग और समाज का साहित्य के साथ जरूर संबंध मानते हुए भी इन रचनाओं के संप्रेषण के लिए जो कुछ होगा, उसमें ‘रेटरिक’ अधिक होगा। एक तथ्य और है : अपने परिवेश के व्यापक जीवन को सीधे सीधे आत्मसात न कर पाने वाला रचनाकार द्रष्टा रचनाकार होता है; कमेंट्रेटर होता है। ऐसे कमेंट्रेटर की रचना में अगर फतवों, सपाटबयानी, सरलीकरणों, और गैर जिम्मेदार वक्तव्यों की भरमार हो, तो यह बहुत आश्चर्यजनक नहीं है; गैरजरूरी हिंदी कविता में जिस तरह के फतवों और सरलीकृत मुहावरों का उपयोग होता रहा है, उसका मूल कारण यही है। वास्तविक अनुभवों की दरिद्रता में ऐसा रचनाकार जिस संकट के सामने खुद को रू ब रू पाता है, उस संकट को वह अभिव्यक्ति का संकट कहता है। और उससे बचने के लिए भाषा का अतिरिक्त आश्रय लेता है। नतीजतन वास्तविकता का अति वास्तविकीकरण होता है। और ‘रिटरिक’ की भरमार होती है। दरअसल यह संकट अभिव्यक्ति का संकट नहीं सार्थक अनुभव की हीनता का संकट है। नेरूदा और लोर्का जैसे रचनाकारों के सामने अनुभव का ऐसा संकट कभी नहीं रहा। इसीलिए उन्होंने अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाए। नेरूदा जीवन के सबसे अधिक सक्रिय काल में चिले से निर्वासित रहें। और बाद में फासिस्ट जुंता के शिकार हुए। लोर्का को फ्रांको समर्थक विस्टापो के फासिस्ट गुर्गों ने गोली से उड़ा दिया। अपने युग जीवन और परिवेश में होने वाले तेज रद्दोबदल के साथ उनकी संपूर्ण संबद्धता ने उनके लिए स्वयं ही अनुभवों का इतना विशाल भंडार इकट्ठा किया कि अपनी रचनाओं में कहीं भी उनके गैर ईमानदार होने का प्रश्न न रहा। शायद यहां यह कह देना वाजिब ही होगा कि कोई भी कवि अपनी रचनाओं में तभी ईमानदार रह सकता है, जब वह अपने जीवन में भी ईमानदार हो। लोर्का और नेरूदा की रचनाओं में इसीलिए समाज के बड़े से बड़े संकटों, दुर्घटनाओं, षड़यंत्रों, परिवर्तनों और फसादों की ऐसी खामोश हलचलकारी पक्षधरता अभिव्यक्त मिलती है कि अतिवास्तविकीकरण के खतरे से उनकी रचनाएं अपने आप बच जाती हैं।

लोर्का की पूरी जिंदगी और उसका समग्र रचना संसार निरंतर संघर्ष, जय-पराजय, उत्साह और हताशा, संकल्प और संदेह, जिंदगी और मौत के पड़ावों से भरी हुई एक यात्रा है। इतने वर्षों बाद. जबकि लोर्का को गोली मार दिए जाने के बाद भी परिस्थितियां अभी बहुत बदली नहीं हैं, चिले में अब भी हत्यारी फासिस्ट जुंता सत्ता में है। स्पेन में अब भी फ्रांको के वंशधर अपने नाजी मंसूबों को अमल में लाने की साजिश में व्यस्त हैं। भारतीय शासन व्यवस्था अपनी हिलती हुई चूलों को संभालकर हिरावल क्रांतिकारियों को भारी तादाद में जेलों में भरे हुए है। ऐसे में लोर्का को याद करना बहुत प्रासंगिक हो जाता है। शायद लोर्का को याद करना अपने भीतर छिपे हुए किसी ईमानदार आदमी को चीख के पुकारने के जैसा है! आज भी अपनी रचना और अपने कर्म, दोनो मे एक साथ ईमानदार हो जाने वाले व्यक्ति के सामने लोर्का की नियति शेष बचती है।
क्या फेदेरीको गार्सिआ लोर्का का नाम एक प्रासंगिक और खामोश, समकालीन चीख की तरह नहीं लगता?

लोर्का की एक कविता है :

“मुझे महसूस हुआ
मैं मार डाला गया हूं।
उन्होंने चायघरों, कब्रों और गिरजाघरों की
तलाशी ली,
उन्होंने पीपों और आलमारियों को
खोल डाला।
सोने के दांत निकालने के लिए
उन्होंने तीनों कंकालों को
खसोट डाला।
वे मुझे नहीं पा सके।
क्या वे मुझे कभी नहीं पा सके?
नहीं।
वे मुझे कभी नहीं पा सके।

लेकिन वे शिकारी कुत्तों की तरह अपने फासिस्ट आका के इशारों पर लोर्का की जान लेने के लिए लगातार उसके पीछे लगे रहे। लोर्का कभी उनसे लड़ता हुआ, कभी घायल होता हुआ, कभी उन्हें मारता हुआ, कभी छुपता हुआ, भागता हुआ, कभी उनका मजाक उड़ाता हुआ... लगातार लिखता रहा। लेकिन जान जोखिम खेल का अंत तो कभी न कभी होना ही था। जुलाई 1936 में, ‘उन्हें’ एक मौका मिला, और ‘उन्होंने’ लोर्का को दबोच लिया। नेरूदा ने अपने संस्मरण में लिखा है: “फेदेरिको (लोर्का) को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। एक बार नाटक के सिलसिले में किसी यात्रा से लौटने के बाद उसने मुझे एक विचित्र घटना के बारे में बतलाने के लिए बुलाया। किसी गांव में, जो रास्ते से अलग हटकर था। ‘कास्तिले’ के इलाके में अपने ग्रुप ‘ला बार्राका’ के साथ वह अपना कैम्प लगाकर उस गांव के बाहरी छोर पर पड़ा हुआ था। यात्रा की थकान के कारण लोर्का रात में सो नहीं सका। वह बिलकुल तड़के ही उठ गया और अकेले ही बाहर घूमने के लिए निकल गया। यह ऐसा ही इलाका था जो किसी भी परदेशी या यायावर के लिए अपने पास, भयानक... चाकू की धार जैसी ठंड रखता है, कुहरा सफेद थक्कों के रूप् में बिखरा हुआ था जिसमें सारी चीजें मुर्दा, प्रेतों जैसी दिखलाई पड़ती थीं”।

“एक बहुत बड़ी जंग खाई लोहे की जाली, टूटी हुई मूर्तियां और खंभे सड़ती गलती पत्तियों पर पड़े हुए थे। लोर्का किसी पुरानी जागीर के टूटे हुए फाटक के पास खड़ा था, जिसके सामने सामंती जमींदारी का एक खूब घना बगीचा था। वक्त, एकाकीपन का बोध और इस पर इस भयानक सर्दी ने इस सन्नाटे को और भी तीखा कर दिया था। अचानक फेदेरिको ने खुद को कुछ बेचैन सा महसूस किया, जैसे इस भिनसार में से कोई वस्तु निकल आने वाली हो, जैसे अभी कुछ घटने वाला हो। वहां एक गिरे हुए टूटे फूटे खंभे के मुहाने पर वह बैठ गया”।

“तभी इस भग्नावशेष के बीच में से घास की पत्तियों को चरने के लिए एक नन्हा सा मेमना बाहर निकल निकल आया जैसे कोहरे का देवदूत हो। इस सुनसान निर्जनता को मानवीय सा बना देने के लिए वह कहीं से भी बाहर आ गया था, जैसे कोई नर्म मुलायम सी पंखुड़ी उस जगह के सन्नाटे पर अचानक गिर पड़ी हो। लोर्का अब अधिक देर तक खुद को अकेला नहीं मान सका।

तभी सूअरों का एक गिरोह भी उस जगह आ पहुंचा। चार या पांच जानवर थे, अध बनैले सूअर, अपनी आदिम बर्बर भूख और चट्टानों जैसे खुरों के साथ। ...और तभी फेदेरीको ने एक खून जमा देने वाले दृश्य को देखा, सूअर उस मेमने पर टूट पड़े और फेदेरीको के भयावह डर को और भी भयंकर बनाने के लिए उस मेमने को टुकड़ों टुकड़ों में चींथ डाला और उसे लील गए”।
उस निर्जन स्थान पर घटने वाले इस खूनी दृश्य ने फेदेरिको को विवश कर दिया कि वह तत्काल अपनी यात्री नाटक मंडली को वापस सड़क पर लौटा ले जाए। गृह युद्ध के तीन महीने पहले, जब उसने मुझे यह रोमांचक कहानी सुनाई, वह तब भी इस घटना के डर और भयावहता से मुक्त नहीं हुआ था। बाद में मैंने देखा स्पष्टतः.... साफ-साफ, कि वह घटना उसकी अपनी मौत का ही एक परिदृश्य थी, उसकी अपनी अविश्वसनीय ट्रैजिडी का पूर्वाभास।”
(पाब्लो नेरूदा, मेमॅयर्स, पृ. 123-124)

लोर्का की कुछ कविताओं को पढ़ते हुए उनमें किसी बर्फ जैसी उदासी और अवसाद का अहसास होता है। मृत्यु के साथ लोर्का का परिचय बचपन में ही हो गया था जब कि वह फालिज में मरता मरता बचा था। इसीलिए उसकी स्मृति में मृत्यु की कोई घनी छाया किन्हीं अंधेरे कोनों में छुपकर खड़ी रहती थी। जब वह लिखता था तो उस छांह और अंधेरे के रंग अक्षरों के साथ घुल मिल जाते थे। लोर्का की सर्वोत्तम कविताओं में से एक “पांच बजे दोपहर” उसके दोस्त ‘इग्नासियों सांचेस मेखियास’ की मृत्यु पर ही लिखी गई थी, जो सांड के साथ युद्ध में मारा गया था। इग्नासियो ‘बुल फाइटर’ था। संभव है लोर्का ने इग्नासियो की मृत्यु पर अपनी ही नियति का पूर्वाभास और स्वयं अपनी ही स्मृति की उस छांह और अंधेरे के रंगों और महक को कविता लिखते समय महसूस किया हो। लोर्का कहता था स्पेन मृत्यु का देश है, मौत के लिए खुला हुआ मुल्क.... एक मरा हुआ आदमी, किसी दूसरी जगह की तुलना में स्पेन में ही अधिक जिंदा होता है। स्पेन, एक ऐसा देश, जहां वही महत्वपूर्ण होता है जिसका अंतिम गुण मृत्यु हो।
(हबाना और ब्यूनस आयर्स में दिए गए भाषण का एक अंश)

स्पेन की दमनकारी, बर्बर फासिस्ट शक्तियों ने उसे चैन नहीं लेने दिया। वह अपने युग के इस दर्दनाक दौर में लगातार जागता रहा और लिखता रहा। वह बुरी तरह थक चुका था। उसकी एक कविता है :

“मैं सोना चाहता हूं।
मैं सो जाना चाहता हूं जरा देर के लिए,
पल भर, एक मिनट, शायद
एक पूरी शताब्दी... लेकिन
लोग यह जान लें
कि मैं मरा नहीं हूं...
कि मेरे होठों पर चांद की अमरता है,
कि मैं पछुआ हवाओं का अजीज दोस्त हूं...
...कि,
कि... मैं अपने ही आंसुओं की
घनी छांह हूं...”

अपने नाटकों और कविताओं में लोर्का ने जितने भी पात्रों को निर्मित किया उनमें से अधिसंख्य की नियति थी - मौत। लोर्का उन पात्रों को एक सड़क पर लाकर खड़ा देता था जिसकी मंजिल मौत ही होती थी। अपनी एक बहुत प्रारंभिक कविता, जिसे उसने अपनी युवावस्था में लिखी थी, “एक और स्वप्न” है। उसमें लिखा है, जितने भी बच्चों की नियति में लिखी है मृत्यु, वे सब मेरे सीने में हैं। सचमुच वे सारे बच्चे, एक न दिन मर जाने वाले बच्चे, उसके ही सीने में थे। धीरे धीरे, पूरी निकटता के साथ मोम की तरह पिघलते हुए उनके अस्तित्व को महसूस करते हुए वह लिखा करता था। अपनी एक अद्भुद कविता “बैलेड आफ सिविल गार्ड” में लोर्का ने एक भयावह दुःस्वप्न की रचना की है। इस दुःस्वप्न के केंद्र में भी है - मौत। इस कविता में जिप्सियों का एक नगर है। कंगूरों, मेहराबों, फानूशों, बिजलियों और ध्वजाओं से सजा-धजा उत्सवधर्मी नगर। लेकिन मुस्कानों, संगीत और नृत्य के इस उल्लासपूर्ण नगर के भाग्य में वही है, यानी - मौत। रात में सिविल गार्ड उस नगर में प्रवेश करते हैं। वे बच्चों और स्त्रियों को संगीनों और बरछों से छेद डालते हैं। सिविल गार्ड सारी रात अंधेरे में सांपों की तरह रेंगते हुए विनाश करते रहते हैं। वे कंगूरों को ढहा देते हैं, ध्वजाएं फाड़ डालते हैं, फानूशों और रोशनियों को तहश नहश कर डालते हैं। जब सुबह का धुंधलका शुरू होता है, तब तक यह सजा धजा नगर धूल में मिल जाता है। इस शहर के हर दरवाजे और गली के हर मोड़ पर मासूम बत्तखों के खून गिरे होते हैं। लोर्का उसे देखता है। वह कविता के प्ररंभ से ही जानता है कि सीमेंट और इस्पात का यह ठोस नगर एक दिन मर जाएगा।

लोर्का का यह डरावना दुःस्वप्न भी, दुर्भाग्य से झूठ नहीं हुआ। स्पेन में सारी रात इसी तरह सिविल गार्ड सांप की तरह रेंगते रहे और जब सवेरा हुआ तो सड़कों पर, घरों में, पार्कों में, हर जगह बच्चों और स्त्रियों की लाशें बिखरी पड़ी थीं। चिले में भी ठीक ऐसा ही हुआ। ‘हेवलाक एलिस’ और ‘रिल्के’ की रचनाओं के केंद्र में भी मृत्यु है। रिल्के ने एक लड़की, जो मर जाने वाली थी, उस पर कविता लिखी ‘जब तुमसे शरू की अपनी जिंदगी तब तक तुम्हारी मृत्यु बड़ी हो चुकी थी’। बाद में अस्तित्ववादियों ने, अल्बेयर कामू ने, अपनी रचनाओं में मृत्यु को चित्रित किया। अस्तित्ववादी दार्शनिक हेडेगर ने भी मृत्यु को मनुष्य के अस्तित्व का अनिवार्य लक्षण माना था। लेकिन लोर्का के पास मृत्यु की अनिभूति का मतलब जीवन से विरक्त उदासीनता नहीं, जीवन का नकार नहीं, बल्कि ठीक इसे विपरीत है। यहां मृत्यु के प्रति जागरूकता जीवन और कर्म के प्रति जगरूकता को और पैना बनाती है। लोर्का पर लिखते हुए उसके समकालीन, प्रसिद्ध स्पेनिश कवि ‘सालिनास’ ने भी माना है कि अगर जीवन की घटनाओं से मृत्यु की उपस्थिति के अहसास को घटा दिया जाए तो जीवन एक सपाट फिल्म की तरह हो जाएगा। ऐसी फिल्मों की घटनाएं मुर्दा होती हैं क्योंकि वहां पर मौत की उपस्थिति और डर को हम महसूस नहीं करते। मृत्यु के साथ अपनी जिंदगी के अनिवार्य अंतर्सम्बंधों को समझ कर ही व्यक्ति अपनी जिंदगी को पहचान सका है। लोग सामान्यतया जीवन चुनते हैं... बिना अपनी मृत्यु के बारे में जागरूक हुए। लोर्का ने अपनी मौत को चुना : ठीक उसी तरह जिस तरह उसने एक खास तरह की जिंदगी को चुना था। लोर्का कभी मौत को भूलता नहीं था। उसकी कविताएं भी इसीलिए इतनी जीवंत और सप्राण हैं कि वे भी मृत्यु को भूलती नहीं। एक कहावत है कि मुर्दा नहीं मरता। जो मरा हुआ है उसकी मृत्यु क्या होगी। लेकिन लोर्का के पात्र बार बार मरते हैं क्योंकि वे जिंदा हैं। लोर्का की कविताएं जिंदा कविताएं हैं। यह एक विचित्र बात है कि मृत्यु पर लिखी जाने के बावजूद उसकी रचनाएं जिंदगी के प्रति आस्था पैदा करती हैं।

लोर्का का जन्म 1918 में ग्रानादा के पश्चिम के एक छोटे से गांव ‘फुएंते बकेरोस’ में हुआ। उसकी मां स्कूल टीचर थी और पिता मध्यम किसान। लोर्का सबसे पहले संगीत की ओर आकर्षित हुआ। बचपन में ही एक बीमारी ने उसके चलने फिरने और बोलने पर असर डाल दिया। हकलाहट भरी आवाज के बावजूद संगीत के प्रति उसका लगाव उसकी अदम्य जिजीविषा और आस्था की ओर संकेत करता है। बहरहाल, अपनी शारीरिक खामियों के बावजूद लोर्का एक अच्छा पियानोवादक बना। प्रसिद्ध संगीतकार ‘दे फाला’ उसका मित्र था और आदर्श भी। इतना ही नहीं, लोर्का की हकलाहट ने उसके कविता पाठ पर भी अपना असर डाला था। कोई दूसरा कवि होता तो हीनता बोध के मारे अपनी कविताओं का पाठ छोड़ देता। लेकिन लोर्का ने इसी हकलाहट में से अपनी एक आकर्षक ‘स्टाइल’ का आविष्कार कर लिया। यह ‘स्टाइल’ इतनी लोकप्रिय हुई कि उस दौर के युवा कवियों में इसका क्रेज हो गया था। दोष मुक्त कंठ कवि भी लोर्का स्टाइल में अपनी कविताएं पढ़ा करते थे। 1919 में वह मैड्रिड चला गया और बहुत थोडे़ समय में ही कवि के रूप में, वक्ता के रूप में, प्रतिभाशाली संगीतज्ञ के रूप में और चित्रकार के रूप् में प्रसिद्ध हो गया। उसने अपने इर्द गिर्द दोस्तों का एक जत्था तैयार कर लिया था जिनके साथ वह कैफे, नाइट क्लबों, खुली जगहों में बहसें और झगड़े किया करता था। 1919 में उसने ‘लिब्रो दे पोएमास’ प्रकाशित किया। 1927 में उसके द्वारा लिखे गए नाटकों के मंचन में भरपूर सफलता मिली। 1927 में ही उसके चित्रों की प्रदर्शनी हुई। 1928 में ‘जिप्सी बैलेड्स’ का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ। ये ‘बैलेड्स’ स्पेनी भाषा के लोगों में दूर दूर तक लोकप्रिय हुए। उसे हर बार हर क्षेत्र में सफलता मिली। 1929 - 30 में उसने क्यूबा और अमरीका की यात्रा की। 1931 में जब वह लौटा तब तक स्पेन में व्यापक राजनीतिक परिवर्तन हो चुका था। राज्यतंत्र का पतन हो गया था, राजा भाग निकला था और गणतंत्र की स्थापना हो चुकी थी। उसने अपने अपको फिर से काम में डुबो दिया। इस बीच उसने कई नाटक लिखे। 1933 - 34 में वह फिर यात्रा पर निकला। ब्यूनस आयर्स तथा अनेक अन्य जगहों पर उसने क्लासिकल स्पेनिश नाटकों का प्रदर्शन किया।

लोर्का और नेरूदा दोनों ही स्वतंत्र, और स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत मानव समुदाय के कवि हैं। उनकी कविताएं मनुष्य को स्वतंत्र करने की बेचैनी के तनाव में कसी हुई कविताएं हैं। वे सच्चे अर्थों में, मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो ‘विश्व चेतस्’ कवि हैं।

लोर्का मूलतः कवि था लेकिन बाद में वह नाटककार के रूप में भी उतना ही प्रसिद्ध हुआ। वह एक्शन पर विश्वास करता था। उसने कोई व्यवस्थित विश्वविद्यालयीय शिक्षा नहीं प्राप्त की थी। ग्रानदा विश्वविद्यालय में उसने दाखिला जरूर ले लिया था लेकिन वह पूरी शिक्षा पद्धति के लिए ‘मिस फिट’ था। गप्पें मारना और आस पास के गांवों में घुमक्कड़ी करना, गांवों के सांस्कृतिक रूपों की छानबीन करना, लोकगीतों की धुनों में रम जाना उसकी आदतें थीं। लोर्का के भीतर ‘आंदालूसिया’ अपनी संपूर्ण परंपरा, लोक संस्कृति, संगीत और संकटों के साथ उपस्थित था। उसने व्यावहारिक स्तर पर निरंतर श्रम और संघर्षों के माध्यम से ही अपने कलात्मक अनुभव और शिल्प अर्जित किए थे। प्रारंभिक दिनों में उसे एक नाटक ‘बटरफ्लाईज स्पेल’ में खेदजनक असफलता का मुंह देखना पड़ा था। यह असफलता उसे सारी जिंदगी याद रही और उसे लगातार खरोंचती रही। इसके बाद लोर्का कभी असफल नहीं हुआ। अपनी मौत को चुनते हुए भी। 1936 में जब लोर्का को गिरफ्तार करके ग्रानादा की सड़कों पर बाहर निकाला गया और उस ओर ले जाया गया जहां फासिस्ट स्क्वैड उसका इंतजार कर रही थी तब भी वह असफल नहीं हुआ था। असफलता उसके लिए थी ही नहीं। वह जनता का कवि था। जन कवि। जब जब जनता पर जुल्म ढाए गए लोर्का जख्मी हुआ। जब जब जनता पर गोलियां चलीं लोर्का घायल हुआ। लोर्का जनता को बहुत प्यार करता था। जनता भी उसे अपने दिल में रखती थी। इसीलिए पाब्लो नेरूदा ने लिखा था, वे लोग जो लोर्का की जनता के सीने गोली दागना चाहते थे, उन्होंने लोर्का को मारते हुए बहुत सही चुनाव किया था।

लोर्का की रचनाओं में स्पेन अपने विशिष्ट, उत्पीड़ित, और शोकाकुल रूप में माजूद है। स्पेन की जातीय सांस्किृतिक परंपराएं लोर्का के लहू में थीं। शायद लोर्का से ज्यादा स्पेन और लैटिन अमरीका की पहचान किसी और रचनाकार को नहीं हो पाई। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि लैटिन अमरीकी देशों की बदली हुई आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थतियों का सामाजिक यथार्थ परंपरिक काव्य रूपों में व्यक्त हो ही नहीं सकता था। उसके लिए एक सक्षम, प्रासंगिक राष्ट्रीय फार्म की जरूरत थी जिसमें तत्कालीन जीवन समूची जीवंतता के साथ व्यक्त हो सके। लोर्का ने परंपरिक काव्य रूढ़ियों को तोड़ा। नए सत्य को कहने का तरीका ढूंढा। यही वजह है कि स्पेनी साहित्य के इतिहास से गुजरते हुए लोर्का की रचनाओं पर आकर दृष्टि गड़ जाती है। लोर्का स्पेनी इतिहास की एक विभाजन रेखा है। वह एक युगांत और युगारंभ है।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि लोर्का ने जो नया फार्म ढूंढ़ा वह वस्तुतः बहुत पुराना था। बारहवीं शताब्दी के ‘एपिक फार्म’ को उसने फिर से अपनाया और इसी रूप में अपनी कविताएं लिखीं। लगभग हजार वर्ष पुराने काव्य रूप को अपनाते हुए प्ररंभ में लोर्का आश्वस्थ नहीं था। लेकिन एक रात वह एक शराब घर के बाहर खड़ा था तब उसे वही पुरानी, हजारों वर्ष पुरानी धुन सुनाई पड़ी। कोई अनपढ़ देहाती गिटार बजाकर, सम्मोहक रूप से गा रहा था। लोर्का ने ध्यान से सुना तो वह आश्च्र्यचकित रह गया। एक एक शब्द उसी का था - लोर्का का। लेर्का पर नशा चढ़ गया। वह खुद गा उठा। उसी हजारों साल की भूली बिसरी धुन में उसकी कविताओं को जनता ने अपना लिया था। किसी भी कवि के लिए इससे बड़ा सौभाग्य और क्या हो सकता है?
लोर्का के पहले बहुत से स्पेनी कवियों ने प्राचीन काव्य रूपों की उपेक्षा की थी और आधुनिकता की तलाश में वे योरप और अमरीका की नकल में लगे हुए थे। लोर्का ने आधुनिकता की तलाश दूसरे तरीके से की। वह अतीत की ओर लौटा और प्राचीन काव्य रूपों को परिश्रम और मनोयोग के साथ इस तरह संशोधित किया कि वे समकालीन यथार्थ को वहन कर सकें। उसकी कविताओं में इसीलिए अपेक्षकृत पुराने, आदिम संगीत की लय है। वे गाए जा सकते हैं। अन्दालूसिया के ग्रामीण अंचलों गाए जाने वाले लोक गीतों की लय, उनके बिम्बों और मुहावरों से लोर्का ने बहुत कुछ ग्रहण किया था। वह उन गीतों को अपना बना लेता था, इतना, कि वे उसके निजी हो जाते थे। एक घटना का जिक्र उसके भाई ने किया है। एक बार वह लोर्का के साथ किसी ट्रक में सफर कर रहा था। ट्रक का ड्राइवर मस्ती में कोई लोक धुन गुनगुनाता जा रहा था। लोर्का ट्रक ड्राइवर के गीत में पूरी तरह डूब चुका था। इस घटना के बहुत दिनों बाद जब लोर्का की कविता ‘फेथलेस वाइफ’ प्रकाशित हुई तो उसके भाई ने उसमें उसी ट्रक डाइवर के गीत की एक पंक्ति देखी। संयोग से वह पंक्ति उसे अच्छी तरह से याद थी। बाद में वह उसे दुहराता रह गया। लोर्का ने कहा, यह असंभव है। यह पंक्ति बिलकुल मेरी है। इसे मैने लिखा है। लोर्का झूठ नहीं बोल रहा था। वह पंक्ति उसी की थी। उसने ट्रक ड्राइवर के उस लोकगीत को इतनी गहराई और संवेदनशील आत्मीयता के साथ अपना बना लिया था कि उस गीत की पंक्ति पर अब लोर्का के अतिरिक्त किसी और का अधिकार हो नहीं सकता था।

स्पेन में गणतंत्र की स्थापना के बाद लोर्का ने ग्रानादा विश्वविद्यालय के कुछ विद्यार्थियों के साथ अपनी एक नाटक कंपनी भी बनाई। इस नाटक कंपनी का नाम “ला बार्राक” था। अपनी इस नाटक कंपनी के साथ वह ग्रामीण क्षेत्रों में गया और गांवों में अपने नाटकों का प्रदर्शन किया। वह नाटक को जनता के बीच ले जाना चाहता था। लोर्का की नाट्य रचनाओं को उसकी काव्य रचनाओं से अलग करके नहीं देखना चाहिए। वह एक ही समय में एक ओर लंबे प्रगीत लिखता था, दूसरी तरफ लंबे नाटक भी लिख डालता था। उसके कई नाटक ऐसे हैं जिन्हें ट्रेजिक कविता या प्रगीत कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त उसके कुछ प्रगीत ऐसे हैं जिनमें इतने नाटकीय तत्व हैं कि आसानी से उनका नाट्य रूपांतरण किया जा सकता है। लोर्का कोई पेशेवर रंगकर्मी नहीं था। कविताओं में जो कुछ अनकहा रह जाता था उसे अभिव्यक्त करने के लिए वह दूसरे कला माध्यमों का सहारा लेता था। रंगमंच और संगीत और कविता उसकी एक ही रचना प्रक्रिया के अवयव थे। कभी कभी तो कविता का कोई एक बिंब उसे इतना पसंद आ जाता था कि केवल उसी एक बिंब को साक्षात करने, उसे देख सकने की फिक्र में वह नाटक की रचना कर डालता था।

लोर्का के नाटकों में एक राजनीतिक संदेश निहित होता था जिसे मनोरंजक ढंग से वह दर्शकों के मस्तिष्क में डाल देता था। उसने अपने एक प्रारंभिक नाटक ‘मारियाना पिनेदा’ के माध्यम से क्रांतिकारी संदेश को जनता तक पहुंचाने का कार्य शुरू कर दिया था। ‘आह! ग्रानादा का कितना उदास दिन!’ पंक्ति से प्रारंभ होना वाला यह पूरा “बैलेड” इस नाटक में खप गया था। यह नाटक उन दिनों प्रदर्शित किया गया था जब स्पेन में गणतंत्र की स्थापना नहीं हुई थी और वहां तानाशाही का राज्य था। इस नाटक में प्रेमिका जिस व्यक्ति से प्यार करती है वह व्यक्ति स्वतंत्रतता को संसार में सबसे ज्यादा प्यार करता है। अंत में स्वयं प्रेमिका स्वतंत्रता की आकांक्षा में स्वतंत्रता की प्रतिमूर्ति बन जाती है। तत्कालीन नाट्य-समीक्षकों ने इसे क्रांतिकारी संदेश के खतरों को महसूस किया था और उन्होंने लोर्का के खिलाफ तानाशाही की तरफ से खुफियागीरी की थी। लोर्का फिर भी लिखता रहा और अपना संदेश चालाकी के साथ जनता तक पहुंचाने में लगा रहा। इसी बीच अखबारों में छपी खबरों के आधार पर, सच्ची घटनाओं को अपने नाटकों में उसने प्रस्तुत करना प्रारंभ कर दिया। उसके प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लड वेडिंग’ तथा ‘हाउस आफ बेर्नाल्दा अल्बा’ सच्ची घटनाओं पर आधरित थे। उसकी कविताएं भी जिप्सियों की वास्तविक जिंदगी पर आधारित थीं। ‘आन्दालूसिया’ के किसान परिवारों, उनके शोषण और उत्पीड़न को उसने अपनी रचनाओं का प्रस्थान बिंदु बनाया था। इन रचनाओं ने जनता पर इतना प्रभाव डाला था कि लोर्का शासनतंत्र के लिए खतरा बन गया था। उसकी हत्या हो ही जाती लेकिन बीच के अंतराल में गणतंत्र की स्थापना के कारण वह बच गया।

लोर्का कहता था कि नाटक के दर्शक जब नाटक की किसी घटना को दखकर यह न सोच पाएं कि उन्हें हंसना चाहिए या रोना तब समझना चाहिए कि नाटक अपने मकसद में सफल रहा है। वह अपने नाटकों में एक प्रकार के त्रासद व्यंग्य की स्थिति तैयार करता था। “येरमा” नामक उसका नाटक आज भी स्पेनी भाषाई देशों में लोकप्रिय है।

लोर्का की हत्या फासिज्म के अपराधों के इतिहास का एक सबसे दर्दनाक, खौफनाक, अमानुषिक और जघन्य कुकर्म का पन्ना है। लोर्का से स्पेन की जनता इतना प्यार करती थी कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि उसकी हत्या भी की जा सकती है। नेरूदा ने लिखा है, “कौन विश्वास कर सकता था कि इस धरती में भी शैतान हैं, लोर्का के अपने शहर ग्रानादा में ही ऐसे शैतान थे जिन्होंने यह जघन्यतम अपराध किया।... मैंने इतनी प्रतिभा, स्वाभिमान, कोमल हृदय और पानी की बूंद की तरह पारदर्शिता, एक ही व्यक्ति में एक साथ कभी नहीं देखा। लोर्का की रचनाशीलता और रूपकों पर उसके समर्थ अधिकार ने मुझे हमेशा हीन बनाया। उसने जो भी कुछ लिखा। उस सबसे मैं प्रभावित हुआ। स्टेज में और खामोशी में, भीड़ में या दोस्तों के बीच उसने हमेशा सौंदर्य की श्रृष्टि की। मैंने उसके अतिरिक्त और किसी भी व्यक्ति के हाथों में ऐसी ऐंद्रजालिक क्षमता नहीं देखी। लोर्का के अतिरिक्त मेरा और कोई ऐसा भाई नहीं था जिसे मुस्कानों से इतना ज्यादा प्यार हो। वह हंसता था, गाता था, पियानो बजाने लगता था, नाचने लगता था।”

उसके एक समकालिक कवि ने उसके बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा था। “दूसरे कवि पढ़े जाने के लिए हैं, लोर्का प्यार किए जाने के लिए है।” लोर्का के मन में अपनी उत्पीड़ित, दुखी, संघर्षशील जनता से अथाह प्यार था। और जनता के प्यार का अथाह समुद्र भी उसे मिला था। उसने कहा था, “मैं कविता इसलिए लिखता हूं कि लोग मुझसे प्यार करें।” लोगों ने उससे बेइंतहा प्यार किया। लेकिन फासिस्ट फ्रैंकों के गुर्गों की पाशविक नफरत उसे मिलनी ही थी।

15 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

बहुत अच्छी पोस्ट.....श्री को बधाई और तुम्हें भी....

shesnath pandey said...

श्रीकांत और उदय जी को ढेरो बधाई.... वाकई एक अच्छी पोष्ट है....

Bodhisatva said...

कह नहीं सकता क्या महसूस कर रहा हू ये पढ़ कर...ऐसा कवि भी भला मारा जा सकता है? कभी नहीं...तब तक नहीं जब तक हमारे अंदर ईमानदार आदमी जिंदा है..उसे जिन्दा रखने के लिए लोर्का जैसे चमत्कार की जरुरत है.
चन्दन के सुझाव पर बहुत दिनों पहले एक फिल्म देखी थी ‘अल पस्तिनो’...नरूदा से पहली मुलाकात वही हुई थी...आजतक याद करता हू सोचता हू उस गहराई को..
श्रीकांत और चन्दन, इस पोस्ट के लिए दिल से धन्यवाद!!!

dolly said...

Thanks really its very good post and keep it up....... i think very soon u will be a famous writer

Uday Prakash said...

श्रीकांत जी, पाठकों के अलावा आप मेरी बधाई और आभार स्वीकार करें। १९७७-७८ में, जब मैं छात्र था और उम्र ककत २५ के आसपास थी, तब इसे लिखा था। शिवमंगल सिद्धांतकर जी को हम कुछ लोग'बाबा' कहते थे। उन दिनों जे.एन.यू. में तीन 'बाबा' हम युवाओं के चहेते थे। बाबा नागार्जुन, बाबा नियाज़ हैदर और ये बाबा सिद्धांतकर। पूरे समर्पण के साथ वे और उनका परिवार 'हिरावल' निकालते थे। सर्वोदय एंक्लेव में वे रहते थे। 'हिरावल' के लिए पोस्टर और पत्रिका के ले आउट का काम भी करने में अच्छा लगता था। तब उनके बच्चे छोटे थे। सभी से लगाव था। उनकी एक छोटी सी मियानी याद है, जिसमें चढ़ कर वे लिखते और पढ़ते थे। वर्ना बच्चे उनके शरीर से लिपटे रहते। उनकी पत्नी शीला सिद्धांतकर से उन दिनों हम सभी को वह आत्मीय छांह मिलती थी, जो कहीं और दुर्लभ थी। अब तो वे नहीं हैं। कैंसर में गुज़र गयीं। 'बाबा' का एक तौलिया भी याद आता है, जिसमें इंकलाब के 'एंब्लम' थे। छोटे-छोटे हंसिये और हथौड़े किसी पैटर्न में बने हुए। इस आलेख को मैंने इतने वर्षों बाद पढ़ा, आपके परिश्रम के कारण। लगभग ३२-३३ सालों के बाद। कुमार विकल को इस लेख के कई अंश पूरे के पूरे याद थे। वह एक बिल्कुल दूसरा समय था। दिल्ली में मेरी नौकरी लगवाने के लिए वे मेरे साथ कई बार पूरे -पूरे दिन भटकते रहे हैं। आज आपने स्मृतियों का एक मुहाना खोल दिया है। Thanks ..really..!

इलाहाबादी अडडा said...

बहुत अच्छी पोस्ट
बधाई

sulabh said...

एक सार्थक पोस्‍ट के लि‍ए आभार।......पर आपने पोस्‍ट का आरम्‍भ जि‍स पंक्‍ति‍ से कि‍या है, वही अशुद्ध है।

शशिभूषण said...

समृद्ध करनेवाली प्रस्तुति.ऐसा ही एक कवि पंजाबी में भी हुआ.पाश.नेरूदा,लोर्का और पाश खुद को बचाये रखने,दुनिया को प्यार करने के लिए पढ़े जाते हैं.
आभार...

सुशीला पुरी said...

“मैं सोना चाहता हूं।
मैं सो जाना चाहता हूं जरा देर के लिए,
पल भर, एक मिनट, शायद
एक पूरी शताब्दी... लेकिन
लोग यह जान लें
कि मैं मरा नहीं हूं...
कि मेरे होठों पर चांद की अमरता है,
कि मैं पछुआ हवाओं का अजीज दोस्त हूं...
...कि,
कि... मैं अपने ही आंसुओं की
घनी छांह हूं...”
....................

इस पोस्ट के साथ उदय जी के संस्मरण पढ़कर एक अनोखी दुनिया मे चली गई । बहुत -बहुत आभार !

shashi said...

bahut achhi post. shrikant ko badhai.

Suresh mehra said...

लोर्का पिछली शताब्दी के महानतम कवि हैं. जीवन में रचना और कर्म की एकता के बेजोड़ उदाहरण.

सिर्फ लफ़्ज़ों को कुशलपूर्वक बरत लेने की साधना के सहारे यह लेख लिखा गया है. इसमें कुछ उपयोगी जानकारियां हैं, बेशक, लेकिन लेख केवल लफ्फाजी का उदाहरण है. हर लफ्फाज़ लेखक कहलाने का अधिकारी नहीं हो जाता. उदय को लोर्का का नाम भी लेने का कोई नैतिक हक़ नहीं. अपने जीवन में वे बताएं एक भी कोई ऐसा कर्म जिससे उन्होंने लोर्का जैसा पवित्र और मासूम नाम लेने का अधिकार अर्जित किया हो.

अपने गंदे जातिवादी, सामंती और अहंकारी होठों से यह नाम उच्चार कर उन्होंने इसे कलंकित और अपवित्र किया है.

सुरेश मेहरा

Shrikant Dubey said...

आप सबको आपकी प्रतिक्रियाओं के लिये धन्यवाद. खास तौर पर उदय जी को, जो कि लेख के कंपोजिशन में मेरे द्वारा रह गयीं प्रूफ की अक्षम्य गलतियों के बावजूद मुझे बधाई का पात्र समझे. सच कहूं तो लोर्का के बारे में उदय जी का लिखा पढते हुए मै खुद ही इतना खो गया था कि, कंपोजिंग के हिस्से का ज्यादातर वक़्त मैंने उसे फिर से पढने में ही लगा दिया. अंत में हम सब की ओर से ‘हिरावल’ पत्रिका के संपादक ‘श्री शिवमंगल सिद्धांतकर’ जी का आभार, जिनके पास उदय जी का यह लेख पत्रिका के अंक के साथ मौजूद था और मांगे जाने पर उन्होंने तनिक भी संकोच किए बगैर हमें सौंप दिय. आप सब की सराहनाओं ने मुझे ऐसे और भी काम करते रहने को प्रेरित किया. पुनश्च : शुक्रिया!!

श्रीकांत

Uday Prakash said...

यही घृणा लोरका को जीवन भर मिलती रही। फ़ाशीवाद झूठ और घृणा की खाद पर ही जन्म लेता है। आप सबका बहुत बहुत आभार।

विशाल श्रीवास्तव said...

धन्यवाद चन्दन इसे पढवाने के लिए
मैं इसका लिंक कई लोगों को मेल किया है...

वंदना शुक्ला said...

बहुत दिनों बाद इतना अच्छा लेख पढ़ा |अच्छा इन अर्थों में कि इस लेख में बगैर किसी अतिवादिता और छद्म के इतनी विविधता,बारीक विश्लेषण और ये सब सत्यता पर आधारित था कि लेख का अंत आते आते लगा की एक फिल्म देख रहे थे |इससे पहले पढ़े गए इस तरह के लेखों में या तो सिर्फ जानकारियाँ ,जीवन वृत्त या सिर्फ घटनाएँ थीं ये लेख उनसे बहुत अलग और महत्वपूर्ण है |न सिर्फ लोर्का का जीवन ,उनकी ख़ास कविताओं और उनके समय का इतिहास बल्कि उनके समकालीन अन्य कवियों/लेखकों की भावनाओं को उनके क्रतित्वों और कथनों के ज़रिये पाठक को उनकी मनःस्थिति व् उस समय व् स्थितियों विशेष से जोड़ता |इस लेख को पढ़कर वो तमाम असमंजस दूर होते हैं जो वर्तमान के खोखले आदर्शवाद और साहित्यिक ''क्रांतिकारी ,जन आंदोलनों की पैरवी करते नितांत अर्थहीन और शब्द जाल से गुंथे कुछ वाक्य भर हैं कह सकते हैं की आत्मा विहीन साहित्य |हमने म्रत्यु को आध्यात्म,दर्शन या शोक के विषय के रूप में ही जाना है म्रत्यु को उत्सव या मनुष्य के जीवन के अनिवार्य लक्षण के रूप में नहीं |..इस शानदार लेख के लिए धन्यवाद ...