Tuesday, November 10, 2009

ब्लाईंड लव्स: एक फिल्म जो मुझे नहीं देखने दिया गया।

दिल्ली से मैं चार घंटे की दूरी पर रहता हूँ और मन की कहूँ तो बड़ी उम्मीद से मैं स्लोवाक फिल्मोत्सव के बहाने दिल्ली आया। फिल्म के नाम ने आकर्षित किया था: ब्लाईंड लव्स। करनाल से चलते हुए मैं सोचता रहा, काश फिल्म की कहानी प्रेम के तमाम गुत्थियों से उलझी पुलझी हो। जैसे दीवानापन, त्याग, ईर्ष्या, धोखा, तमाम। एक जगह रास्ते मे जब बस देर तक रुकी रही तो मैने बस ड्राईवर से भी कहा: जल्दी चलो, भाई, प्रेम कहानी छूट जायेगी। उसी दिन भारत आस्ट्रेलिया का क्रिकेट मैच भी दिल्ली मे हो रहा था, और सड़क इतनी जाम थी कि कोई ना पूछो।

ऑटोरिक्शा वाला मनभर किराया लेकर तैयार हुआ। शीरीफोर्ट के रास्ते मे जहाँ भी जाम मिलता, वो रिक्शे वाला, मेरा यार, दस रूपये किराया बढ़ा दे रहा था। मैने भी सोचा – चलो आज यही सही और एक शानदार फिल्म के लिये इतना खर्च किया जा सकता था। हालाँकि कुछ जगहो पर हम किसी बहाने से ही जा पाते है। सामने वाले को आप सीधे सीधे आने का प्रयोजन भी नहीं बता सकते, वो लोगो को पसन्द नहीं आता, लोगो को बोझ लगता है, और मैं सिर्फ फिल्म देखने आया था।
फिल्म का समय हो चुका था जब मैं सेक्योरिटी चेक के लिये खड़ा था। मेरा बैग देखकर गार्ड ने कहा: लैप टॉप ‘अलाउ’ नहीं है। मैने कहा: दिमाग ठिकाने है तुम्हारा या लगाना पड़ेगा? अपनी बात कहते कहते मुझे हंसी आ गई। ये भी कोई बात हुई भला? मैने उससे कहा: अन्दर जाने दो यार, इस फिल्म को देखने मैं करनाल से आया हूँ। उसने कहा: आप लैपटॉप गाड़ी मे रख दे, अगर अन्दर किसी ने देख लिया तो मेरी नौकरी छिन जायेगी। मेरे पास गाड़ी कहाँ थी जो मैं लैपटॉप रख आता! फिर भी मुझे लगता रहा कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि लैपटॉप के होने से फिल्म ना देखने दिया जाये। उस गार्ड की नौकरी बची रहे इस खातिर मैने उसके अधिकारियों से बात की। उन्होनें मामले को बेहद आसानी से निपटाया: कुछ भी हो जाये, आप लैपटॉप लेकर अन्दर नहीं जाओगे। उन्होने उस बेचारे गार्ड जितना भी समय नहीं लिया।

मैं देखता रहा। मेरे सामने लोग अन्दर जा रहे थे। मैं इस तर्क को समझ नहीं पा रहा था। अगर लैपटॉप लेकर अन्दर नहीं जा सकता तो कोई एक जगह ऐसी बनाई जानी चाहिये थी जहॉ इस लैपटॉप महाशय को रखा जा सके। समय इतना कम था कि मैं कहीं दूसरी जगह भी नहीं जा सकता था। अंतत: मुझे बिना सिनेमा देखे लौटना पड़ा। अपने तमाम गुस्से के साथ मैं बाहर आया। बाहर आकर मैनें मन ही मन यह इच्छा जाहिर की कि काश यह एक सामान्य फिल्म निकल जाये। इस फिल्म मे वह सब वहो ही नहीं जिसकी इच्छा लिये मैं एक सौ चालीस – पचास किलोमीटर आया था। मैं सोचता रहा कि काश यह डॉक्युमेंट्री फिल्म निकल जाये। काश सीरी फोर्ट मे अजीबोगरीब नियम लगाने वाले का लैपटॉप खो जाये, तमाम।

ऐसे निराशा के पल कठिन होते हैं और इनसे उबरना भी। मैं वहाँ कुछ भी नहीं कर सकता था। अशक्त, निरुपाय। मुझे इस बात का बेहद दुख है।

.......पर अगर विषयांतर की इजाजत हो और थोड़ा कहने पर ज्यादा समझने के लिये आप राजी हों तो एक बात कहता हूँ ...... फिर ‘अलादीन’ के चिराग ने हमारी शाम को रौशन कर दिया। कोई ना कोई फिल्म देखने के लिये ही हमने अलादीन देखी।

8 comments:

Anonymous said...

Blind Loves
Slovak Republic (Documentary)


An Artileria production. (International sales: Autlook, Vienna.) Produced by Marko Skop, Frantisek Krahenbiel, Juraj Chlpik, Juraj Lehotsky. Executive producers, Romana Vargova, Lukas Bonk. Directed by Juraj Lehotsky. Screenplay, Lehotsky, Marek Lescak.

With: Peter Kolesar, Iveta Koprdova, Miro Daniel, Monika Brabcova, Zuzana Pohankova, Marko, Elena, Laco, Gabika.

Engrossing, beautifully crafted docu "Blind Loves" features four non-sighted subjects repping a range of age and experience. They demonstrate and discuss their passions and anxieties while managing independent lives. First feature-length title from Slovak helmer Juraj Lehotsky boasts loads of low-key visual humor in its witty production design. Some charming moments play like Georges Melies crossed with Jan Svankmajer. Touching yet totally unsentimental pic has already scored domestic distribution. A quality find for specialist webs and niche arthouse, it will screen at additional prestige fests in coming months.

First and longest episode intros Peter, a middle-aged music teacher, and his serene, sweater-knitting wife, and includes delightful, surreal animation. Second follows confident Marko, a member of Romany minority, and his difficult romance with timid, partially sighted Monika. Third concentrates on capable housewife Elena who practices bathing and changing a doll while confiding her hopes and fears about impending motherhood. Rounding out the package is pretty, text message-addicted teen Zuzana who longs for her first real relationship. Artful compositions, strong sound design and music provide further links between the segs. Tech credits are top notch and trim running time just right.

Camera (color), Juraj Chlpik; editor, Frantisek Krahenbiel; sound (Dolby SR), Marian Gregorovic, Krahenbiel. Reviewed at the Cannes Film Festival (Directors' Fortnight), May 17, 2008. Original title: Slepe lasky. Running time: 77 MIN.

chanda bhai yadi is review tak pehle hi pahuch chuke ho to delete kar dena.
amit

somyaa said...

Aaj aapki kahani padhi Dainik Bhaskar mein.. Mauhar . Aachi lagi. Likhtey rahiye ek inspiration milta hai !
Take care!

Amit said...

aaj dainik bhaskar me aapki kahani bahut acchi thi.badhai.
aaj kal mere dimag me ek khayaal chal raha hai ki --jo log duniyaa-daari nahi karte un logo ka samuh hai -communism.......amit

ashutosh said...

muhar,chhoti par behad sundar kahani hai.meri badhaee swikaren.par isse jyada achi chijon ka bharosa aap se hai.

अंशुमाली रस्तोगी said...

भाई चंदन ब्लॉग पर आ गए हो। शुभकामनाएं। तुम लिखते रहो हम पढ़ते रहेंगे।
आशा है ठीक होगे।

Vimla Bhandari said...

आपकी रचना मुहर दैनिक भास्कर में पढी, अच्छे लेखन पर बधाई. आज आपका ब्लॉग देखा. हिन्दी जगत में आपका स्वागत एवं शुभकामनाएं

Anand Pandey said...

Bro, if you say I can share the movie with you. I guess that restriction was due to probable security breach but they should have arranged a baggage deposit room.

चन्दन said...

Anand kya aap varanasi waale hai? aashish ke classmate!

I want to see this film.

security is not a problem. problem is in attitude.