Friday, November 27, 2009

सत्येन्द्र दुबे का भांजा होने का भार और 27 नवम्बर

सत्येन्द्र दुबे। मसखरी राजनीति ने शहीद और इंकलाब जैसे मूल्यवान शब्दों को मजाक बना कर रख दिया है वरना आज मैं सत्येन्द्र के लिये इस शब्द का प्रयोग जरूर करता। जानने वाले जानते है कि एक बेहद बूढ़े प्रधानमंत्री की स्वप्निल सड़क परियोजना से अगर किसी को सर्वाधिक नुकसान हुआ तो वे सत्येन्द्र दुबे जी थे। इक्कतीस साल की कुल उम्र उन्हे मिली, जिसमे उन्होने आदर्श जीवन जिया। परिवहन मन्त्रालय की जिस परियोजना मे सतेन्द्र दुबे ‘’प्रोजेक्ट डाईरेक्टर” थे और जिस धोखाधड़ी के खुलासे करने के कारण उनकी गया(बिहार) में 27 नवम्बर 2003 को सरेराह हत्या हुई उनदिनों कहने भर का एक फौजी, परिवहन मंत्री था जो बाद मे मुख्यमंत्री भी बना। मेरे पिता को उनकी हत्या के बाद भी लगता रहा कि वो हत्यारों को सजा दिलवा देंगे। मुझे उनकी मासूमियत के लिये घोर अफसोस है।

सत्येन्द्र दुबे मेरे मामा लगते थे। चाची के भाई। ऐसे मे मेरा बचपन अजीब सी तुलनाओं मे बीता। मामा के बारे मे किस्से थे जो खूब मशहूर थे – सत्येन्द्र 20 से 22 घंटे पढ़ता है(ऐसा अक्सर मुझे सुना कर कहा जाता था)। मुझे गिल्ली डण्डा खेलते देख गाँव का कोई भी शुभचिंतक मुझे सुना देता था – इस उम्र मे सत्येन्द्र को पढ़ते रहने से चश्मा लग गया था। यह सुन कर मैं खेलना छोड़ देता था। मुझे रजाई मे देख चाचा कहते थे – सत्येन्द्र तो तकिया भी नहीं लगाता है। यह तब की बात है जब मामा ने आई.आई.टी की परीक्षा पास कर ली थी। बाद उम्र में आई.ई.एस हुए। आई.ए.एस भी क्वालिफाई किया और यह आज भी रहस्य है कि फिर भी उन्होने आई.ई.एस ही क्यों चुना?

उनकी लगन इतनी मशहूर थी कि हम कभी यह अपेक्षा भी नहीं करते थे-वो हमारे घर आयेंगे। उनके तो उनके, हमारे गाँव के कितने ही भोले लोग इस इंतज़ार मे थे कि जब सत्येन्द्र की नौकरी लगेगी तो वो उन सबका भी उद्धार करेंगे। इस बीच जब भी कभी वो हमारे गाँव आये मैं उन्हे छुप के देखता था – ऐसा क्या है इनमे जो लोग इनसे मेरी तुलना करते हैं।

बात तब की है, जब मैं साहित्य से जुड़ चुका था। जानता तो किसी को नहीं था पर पढ़ता खूब था। साहित्य से पहला परिचय ही यह बता गया कि यही मेरा उद्देश्य होने वाला है। साहित्य तथा दोस्तो का प्यार मुझे इस बात का दिलासा देता रहा कि मैं भी जीवन में कुछ कर सकता हूँ। मैं अपनी पहली कहानी लिख रहा था और कहीं ना कहीं मेरी निगाह सत्येन्द्र मामा पर भी थी। मुझे लगता था कि किस्से कहानी मुझे इतना बड़ा कद देंगे जितना कि खुद मामा का सामाजिक कद।


तभी वो हादसा हुआ।

मैं अपनी पहली कहानी पूरी करने वाला था कि एक सुबह तड़के पापा आये। उनकी आवाज में डरावनी उदासी थी। इससे पहले पापा को मैने आज तक उदास नहीं देखा था। उन्होने कहा तो कुछ भी नहीं, हिन्दुस्तान अखबार का पटना संसकरण और इंडियन एक्सप्रेस का अखबार मेरी ओर बढ़ा दिया। वहीं यह मामा की हत्या की दुखद खबर छपी थी। अम्मा बहुत रोई थी। बहुत। कुछ मामा के लिए, कुछ बूढ़े नाना नानी के लिए और दूसरे आश्रितों के लिये। नाना ने उनकी पढ़ाई के लिये अपनी दुकान तक बेच दी थी।
मैने अपनी कहानी स्थगित कर दी थी। साल भर बाद मेरी नितांत पहली कहानी लिखी गई।

अगर प्रख्यात कथाकार उदय प्रकाश से कुछ उधार लूँ तो बड़ी उम्मीद से कहना चाहूँगा कि मामा आप अभी है। हमारे आस पास। बस घर के किसी कोने मे आप, नेल कटर की तरह, खो गये हैं जो ढूढ़ने से भी नहीं मिल रहा।




34 comments:

गौरव सोलंकी said...

ओह! :(

संदीप पाण्डेय said...

ओह चंदन यह तुमने क्या बता दिया। सत्येंद्र के मरने पर मैं भी रोया था। घंटों दोस्तों से बहसें की थीं कि क्या व्यवस्था से टकराने वाले हर आदमी की अंतिम नियति यही है आज. वैसे तो सत्येंद्र कभी पराये नहीं लगे लेकिन आज तुमसे उनका रिश्ता जानकर दुख और भी घना हो गया।
26/11 के अमीर और बिकाफ शोक में डूबे देश को सत्येंद्र की याद दिलाने के लिए शुक्रिया
उनके साहस को सलाम और अश्रुपूरित याद

Ashok Pandey said...

चंदन जी, आपके दर्द को हम समझ सकते हैं..और सच तो यह है कि आपका दर्द हमारा भी दर्द है। जीटी रोड के किनारे हमारा गांव है और हमने स्‍वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में व्‍याप्‍त घोर भ्रष्‍टाचार का नजारा अपनी आंखों से देखा है, बल्कि एनएच के मेंटेनेन्‍स में अभी भी देख रहे हैं।

अभी तो हम किसानी में रमे हैं, लेकिन उन दिनों हिन्‍दुस्‍तान के पटना कार्यालय में संपादकीय विभाग में पहले पन्‍ने पर काम करता था। हमलोगों ने बड़े दुखी मन से कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ व ईमानदार इंजीनियर स्‍व. सत्‍येन्‍द्र दूबे की गया से आयी हत्‍या की खबर लगायी थी। मुझे याद है..बाद में स्‍व. दूबे के हत्‍यारों व गवाहों के गायब होने, भाग जाने व आत्‍महत्‍या कर लेने जैसी खबरें भी लगानी पड़ीं। साफ लगता था कि जांच में लीपापोती की जा रही है। मन में लावा-सा फूटने लगता था अखबार में उस तरह की खबर लगाते वक्‍त। उसी समय सीबीआई जांच से हमारा भरोसा हमेशा के लिए उठ गया था।

भ्रष्‍टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए शहीद होनेवाले उन कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ अभियंता को हमारी हार्दिक श्रद्धांजलि।

anurag said...

cant say a word, man! I was one of them who were shocked.

Let me say a word..HERO..he is my hero.
Please write in much detail about Late Sri Stayendra dubey, we will be thankful to you.

Pooja said...

मैं उन दिनों कालेज थी थ्ज्ञी जब यह हादसा हुआ था। तब जागरुकता इतनीं नहीं थी वहां कि गहराई से किसी से बात की जा सके इस बारे में। अखबार में उनके मरने की खबर और उसके बाद थोथे विमर्श पढ़ती रही।
एक तर्क है कि भगवान अच्छे लोगों को जल्दी बुला लेते हैं। सत्येंद्र दुबे के हत्यारों ने भी शायद यही कहा होगा उन्हें मारे के बाद।
वे हमारे नायक हैं क्योंकि उन्होंने जो किया वे हम कभी चाह कर भी नहीं कर सकते
सत्येंद्र दुबे जैसे लोग पैदा नहीं होने चाहिए कम से कम हमें शर्म से तो मुक्ति मिलेगी

aravind said...

मैं गया का ही रहने वाला हूँ। मुझे अपने शहर पर शर्म पर आती है। आपने याद दिलाया तो लगा-रो पड़ूँगा। उन्हे विनीत श्रद्धांजलि।

Anonymous said...

aise hajaro log marte hai roj, chandan ji. kis duniya me hai aap? itna bhavuk hone kee jarurat nahi hai. aap ne likha hai ki kahani lekhak hai to apane shabdo kaa koi jaadu dikhaiye aur har roj maare jaa rahe satyendra dubey jaise logo ko bachaiye.

Manas Jha said...

As a friend and well wisher I share your grief...but this is not your grief alone but it is a point for the whole country to stop and ponder over ...I also feel that this happened in Bihar so there was not such a huge hue and cry over it, as people in the country associate Bihar with these incidents...things could have been different if it had happened in any so called progressive state,and a lot of media coverage would have been given to this incident...i think the order of the day is a more proactive media and above that a more concerned aam-junta...you may call it an ideal scenario but we have the Jessica Lal case in point, where a similar precedent has been set .

रंगनाथ सिंह said...

स्तब्ध हूँ ,क्या कहूँ

Uday Prakash said...

बहुत ही मार्मिक ! 'मोहन दास' फिल्म सत्येंद्र जी और सफ़दर को समर्पित है। १९९० में सफ़दर की हत्या के बाद उसकी स्मृति मे एक कविता लिखी थी, उसे आज फिर से दुहरा रहा हूं :
''वे सिर्फ़ हड्डियां और सिर्फ़ त्वचा नहीं थे कि मौसम के अम्ल में गल जाएंगे
वे फ़कत खून नहीं थे कि मिट्टी में सूख जायेंगे
वे कोई नौकरी नहीं थे, कि बर्खास्त कर दिये जायेंगे

वे जडे़ हैं हज़ारों साल पुरानी
वे पानी के सोते हैं
धरती के भीतर भीतर पूरी पृथ्वी और पाताल तक वे रेंग रहे हैं
वे अपने काम में लगे हैं जब कि हत्यारे खुश हैं कि हमने उन्हें खुश कर डाला है

वे किसी दौलमंद का सपना नहीं हैं कि
सिक्कों और अशर्फ़ियों की आवाज़ से वे टूट जायेंगे

वे यहीं कहीं हैं
वे यहीं कहीं हैं

उनके लिए रोना नहीं
रो कर उन्हें खोना नहीं....''

Uday Prakash said...

सुधार-संशोधन .....''जब कि हत्यारे खुश हैं कि हमने उन्हें खत्म कर डाला है...!''

Aparna Mishra said...

Wht to say Chandan!!!!!I am quite in shock & dnt b Maudlin as this happens with gud people here..The 1 who try to serve counrty, will face this....This is a mortifying situation tht v r a part of tht counrty which used to be an ICON for truthfullness is facing & gng thru such nuisances & v here r jst discussing,waiting 4 another case to happen as this is our Democracy....but I agree with Manas as its a fact tht if this wud hv been an incident of any metro city,then the media wud hv been more active & useless too.....
I m sorry Chandan,but u shud start fighting to stop more Dubeyji's case to happen by ur HATHIYAAR, i mean Words............
Tk cr.........

ashmantak said...

ANONYMOUS ji..."S.K.DUBEY" jaise log is duniya mein bahut kam aatein...waise aapka comment "rang de basanti" movie se inspired lag raha hai.....chandan ji ki ek aur achhi koshish..

chandan rai said...

सत्येन्द्र दूबे के जाने की पीड़ा को बिहार का होने के नाते काफी नजदीक से महसूस किया है। दुख तो था ही, लेकिन आपसे नजदीकियों की जानकारी मिली तो यह और गहरा गया। ईमानदार लोगों के लिए बिहार में रहकर काम करना यों भी चुनौतियों भरा रहा हैै।बिहार के लोग आए दिन की जिंदगी में इसे महसूस करते हैं। मजबूरी है कि ऐसे लोगों के बीच रहने की कला उन्होंने सीख ली है। कहीं कोई विरोेध नहीं होता। माफिया राज का विरोध करने पर नतीजा इसी तरह का कुछ होता है और यह सरकारी संरक्षण में ही होता है। यह वहां के लोगों की नियति बन चुकी है। सत्येन्द्र जी जैसे लोग ही आदशZ खड़ा करते हैं। नेलकटर की उपस्थिति कमरे में तो है ही,हालांकि थोड़े समय के लिए गुम जरूर हो गया है। यों भी आपके जीवन में मामा जी का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। तो साहित्य में भी नायक के रूप् में ऐसे लोगों को जीवित रखें यही आशा है। ये दुख अकेले आपका नहीं। पूरा भारत आपके इस दुख में ‘शरीक है।

Suchita said...

i must say i hv answer 2 1 of ur question chandan ji n dat is Satyendre ji was meant to be an engeenier dats y he didn't opted for I.A.S kyuki he knew vry well dat wat for he was meant to be...N infact ppl of such gr8 character r never born to get lost somewere in deep memories but to make us remind dat life is full of complications still we do wat v wanna do n dats d fighter spirit wich motivates every1 who knows what is correct n true to human life so he was here to give us d example of life after death in our memories and somewhere near to us deep inside d human soul....v deeply respect a person who is true to his own n dats wat life is meant to be..hats off to u Sir

डॉ .अनुराग said...

ईमानदार लोगो का जाना पूरे देश को खलता है....यूँ भी ईमानदारी अब विलुप्त चीजो में शुमार है...ऐसे धुनी इन्सान किसी खास मिटटी के बने होते है ...उन्होंने आई ए. एस का रास्ता इसलिए चुना होगा क्यूंकि इस सेवा में वे शायद देश के लिए कुछ बेहतर करना चाहते होगे...दुःख ओर हैरानी इस बात की है सबको मालूम है क्यों हत्या हुई किसने करवाई...फिर भी समाज ईमानदारी की यही परिणिति कह कर ठंडी सांस भर के छुटकारा पा लेता है ....या दो चार जगह उन्हें अमर करार दे कर अपने कर्तव्य की इत्तिश्री मान लेता है ..जिम्मेवारिया उनके जाने के बाद शुरू होती है .....ऐसे शानदार लोग जब असमय इस तरह से जाते है ... क्रोध हताशा ओर बहुत कुछ होताहै

PD said...

श्रधांजली देने और अफ़सोस जताने के अलावा और हम कर भी क्या सकते हैं? खुद को अक्सर ऐसे मौकों पर असहाय महसूस करता हूं..

हां मगर आपके एक सवाल का जवाब मेरे घर में ही उपस्थित है.. आपने लिखा की आई.ए.एस.छोड़ कर वे आई.ई.एस. का चुनाव क्यों किये होंगे.. मेरे अपने बड़े भैया भी आई.ई.एस.हैं और आई.आई.टी. से ही निकले हुये.. उन्होंने भी आई.ए.एस. इसलिये छोड़ा था क्योंकि उनका मानना था कि इंजिनियरिंग की पढ़ाई के बाद आई.ए.एस. बनना देश के साथ धोखे के समान है..

Rohit said...

सत्येन्द्र को हम भूल चुके थे। जबकि उनकी हत्या के वक्त मैने कितना कुछ सोचा विचारा था। वे हमारे नायक थे। उनके हत्यारे कहाँ है? आपके हमारे बीच। और वो किसी दूसरे सत्येन्द्र के इंतजार मे हैं।

rakampal said...

सबकुछ बहुत दुखद था। पर इस पर अफसोस करने के बजाय इस घटना से सीख लेने की जरूरत है।

YOGENDRA AHUJA said...

Priy Chandan Ji,

Bahut stabdh aur udaas karne wala alekh hai. Satyendra Dubey ki hatya ko lekar man mein jo ek sthai dukh hai, wah ise padhne ke baad aur gahra ho gaya, aur nijee bhee, kyonki mujhe yah jankari nahin thee ki ve apke mamaji the.

Krodh, hatasha aur dukh is tarah ke ehsaason ke beech hoon. Satyndra Dubey ko yaad karke bhee aur isliye bhee ki hatyaon ka silsila ruka naheen hai.

YOGENDRA AHUJA

nandjee said...

hi bhaiya
ye to bahut hi gambhir baat aapne uthayi hai. aapko to pata hi hoga ki unki murder ke samay hi film "Rang De Basanti" aayi thi. usme bhi 5 log desh sudharne chale the lekin kya hua murder. ab to is desh me ya to corrupt aadmi ( jise aaj ke dino me sarif insan kaha jaata hai) ya marne ke liye taiyar raho.

par ab humlog kya kar sakte hai,
kuchh yaad unhe bhi karlo jo laut ke ghar na aaye.........


Nand Kumar Ajad
M.Tech Student
Indian Institute of Science Bangalore

Suyash Suprabh said...

मैंने कहीं पढ़ा था कि वह समाज अभागा होता है जिसे नायक की ज़रूरत होती है। शायद बर्तोल्त ब्रेख्त के गैलीलियो नाटक में। हमारा समाज तो इतना अभागा है कि उसे सत्येंद्र और चंद्रशेखर (जिनकी सीवान में हत्या कर दी गई था) जैसे नायकों को भुलाने में शर्म भी नहीं आती है।

ऐसे लोग जिनका खून अभी पानी नहीं हुआ है उन्हें सत्येंद्र की शहादत से हमेशा प्रेरणा मिलती रहेगी। उनके जैसे लोग परिवर्तनकामियों के दिलों में हमेशा जीते हैं। और सच मानिए, उनकी शहादत कभी व्यर्थ नहीं जाएगी। समाज का बड़ा हिस्सा भले इतिहास के हर काल में विचारहीन दिखता हो लेकिन इसका अपेक्षाकृत कमज़ोर दिखने वाला हिस्सा ही अंत में प्रगति की मशाल अपने हाथों में थामकर आगे चलता जाता है...

रागिनी said...
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रागिनी said...

दिल दहला देने वाली पोस्ट. दुःख को साझा करना भी बहुत मुश्किल होता है. दुबे जी को मेरी श्रद्धांजलि, वे हमारी पीढ़ी की प्रेरणा हैं. और हाँ .... बहुत संकोच के साथ एक बात - पोस्ट के आरम्भ में ही "मशखरी" शब्द का प्रयोग है, आप एक बड़े कहानीकार हैं- लेखक है - स्पेलिंग की यह गलती ठीक नहीं लग रही- कृपया उसे "मसखरी" कर लीजिये.

शशिभूषण said...

चंदन,एक दुख ऐसा होता है जिसे शब्दों में नहीं कहा जा सकता.एक बात ऐसी होती है जो दुख बनकर भीतर उतर जाती है.मेरा मन भर भर आ रहा है.आपने कितना कम कहा है यहाँ.पर मैं महसूस कर रहा हूँ इतना ही कह पाने की तक़लीफ़.अनकहे की करुणा...यह सच है कि सत्येंद्र दुबे को पूरी तरह कभी नहीं मारा जा सकेगा.मैं सोचता हूँ ऐसा करना चाहता हो कोई तो यहां आए और मुझे भी मार डाले.पर मैं मार भी डाला गया तो सिर्फ़ सत्येंद्र दुबे का एक और छोटा सा हिस्सा अनुपस्थित हो जाएगा बस...उदय प्रकाश जी की कविता हम सब निबल,विकल लोंगों की हत्यारों को चुनौती है.

शरद कोकास said...

सत्येन्द्र दुबे को आपकी कलम के माध्यम से और करीब से जानने का अवसर मिला ... सत्येन्द्र दुबे ने अन्याय के खिलाफ जो आवाज़ बुलन्द की है वह गूंजती रहेगी ..।

सागर said...

बहुत देर से इस ब्लॉग पर आया... मैं बी. ए. प्रथम में था उस वक़्त लेकिन ज़ेहन में आज भी यह घटना ताज़ा है... सहारा समय को साप्ताहिक थी ने उस वक़्त विस्तृत जानकारी दी थी इस पर... एक ईमानदार आदमी जिसने प्रशासन की पोल खोली उसकी साथ ऐसा... "मुझे उनकी मासूमियत के लिये घोर अफसोस है।" इससे बड़ी उदासी और क्या हो सकती है ?

arun choudhary said...

ye sayad koi nai baat nahi k hum sab itne swarthi ho gaye hein ki humein apne siwaye sochne ka waqt he nahi h........hum sab chahte hein ki desh mein saheed paida ho,magar apne ghar mein nahi padosi k yahan...ye bhi ek vidambana he h k Dubey ji ki hatya us jagah hui, jahan se sadiyon pahele pehli baar manavta ko ahinsa ka paath mila tha..........GAYA......Chandan ji laikhak ka to pura samajh he ghar,kutumb hota h......rishte naate mein bandhne waale to samaj k baare mein kitna sochenge.......Dubey to kabhi Manjunath jaise log qatal kiye jaate hein,aur hum shradhanjali de kar khamosh ho jate hein.........ek sidhi se baat h hum sudhrenge to jug sudhrega.........lakein prashan ye h k sudharna kon chata h???????

anurag vats said...
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anurag vats said...

http://www.youtube.com/watch?v=oiGSKT9m9SE&feature=player_embedded

कुलवंत हैप्पी said...

मैंने अभी इन पर लिखा एक लेख पढ़ा, उनके साथ जो हुआ, वो देश के हाकमों पर ही नहीं बल्कि मूक दर्शक बन चुके समाज पर भी सवालिया निशान लगता है?

Anonymous said...

वो लेख कोई और नहीं, यही वाला था।

Amitabh Thakur said...

आपकी बातों में अथाह दर्द और गहरे है. सत्येन्द्र दुबे रोज़-रोज़ पैदा नहीं होते, ये हम सभी जानते हैं. हम में से अधिकतर लोग उसकी तरह नहीं हैं, यह भी सत्य है. पर हम सत्येन्द्र जी की और उनके कार्यों की तहे दिल से इज्ज़त कर सकें, यह भी बड़ी बात होगी.
हम लोगों ने उनके सम्मानार्थ ये पेटीशन शुरू किया है. आप लोगों की सहभागिता प्रार्थनीय है-

http://www.petitiononline.com/manju/petition.html

अमिताभ ठाकुर
आइ० आइ० एम० lucknow
94155-34526

sumit shukla said...

tumse poot ab ate kha hai
des k liye yuva jan lutate kha hai
sare yuao k liye misal ho ap
fat jana chhiye sara gussa aise apradhik pravattiyo par apni tarah se
kam se kam aise misal log dikhate kha hai