Monday, November 23, 2009

क्या हम ऐसे ही देश के वासी हैं?



कोई सुने तो शायद ही विश्वास करे कि भारत के सबसे अग्रणी विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ इतना अमानवीय सलूक किया गया। एक मामूली विवाद जिसमे जेनयू के छात्रों का एक जरा भी दोष नहीं था, पुलिस ने अपराधियों को बचाने के लिये निर्दोष छात्रों पर लाठी चार्ज किया जिसमे पचास से उपर छात्र घायल हुए है। पन्द्रह की हालत गम्भीर है। सबसे पहले हम निर्दोष छात्रों के स्वस्थ होने की प्रार्थना करेंगे फिर आगे की बात।
घटना कुछ यों घटी: चार बिगड़ैल रईसजादे, जिन्हें उनके घर आंगन से नीचता और बुराई की शिक्षा ही मिली हुई है, जेनयू आये। 24×7 ढाबे पर शराब पिया(जाहिर है कुछ खाया भी होगा)। फिर शराब और ताकत के नशे मे चूर होकर छात्रों से बद्तमीजी किया। छात्र जो आजकल सेमेस्टर परीक्षाओं की तैयारी मे लगे है, पहले तो इनकी “तमीजदार” हरकतों पर ध्यान नहीं दिया पर जब वे एकजुट होकर इसका विरोध किये तो ये चार गुंडे भाग निकले।

गुंडों के पास कार थी इसलिये इनकी रफ्तार के नीचे आने से बाल बाल बचे लोगों ने विश्वविद्यालय सुरक्षा को फोन मिलाये। जेनयू मेन गेट पर जब सुरक्षाकर्मियों ने इन्हे रोका तब इन चार गुंडों मे से एक ने पिस्टल दिखाया। पिस्टल देखते ही बड़ा दरवाजा बन्द करा दिया क्योंकि मेन गेट पर एक नहीं दस पन्द्रह सुरक्षाकर्मी रहते है। जैसे ही मेन गेट बन्द हुआ एक अंतहीन कहानी शुरु हो गयी जिसमे, अगर अब तक के इतिहास को देखें तो कल के दिन से मीडिया और मीडिया के जरिये समाज के दूसरे लोग छात्रों को ही गलत साबित करेंगे।

चूकि विश्वविद्यालय सुरक्षा अजेंसी निजी कम्पनी के हाथ मे है इसलिये इनके सारे अधिकार दिल्ली पुलिस के पास गिरवी हैं। इन्होने तुरंत दिल्ली पुलिस को बुला लिया और “महान” दिल्ली पुलिस ने आते ही अपना काम शुरु कर दिया – उन चार गुंडों को बचाने का काम। खबर है कि चारो बेहद शक्तिशाली घराने से हैं। दिल्ली पुलिस कितनी ताकतवर है या दिल्ली पुलिस का एक हाईस्कूल पास सिपाही(साथ मे अधिकारी भी थे) कितना ताकतवर है इसका अन्दाजा इस बात से लगा सकते है कि छात्रों तथा सुरक्षाकर्मियों के लाख आग्रह के बावजूद दिल्ली पुलिस की महान सत्त्ता ने एफ.आई.आर मे पिस्टल को पिस्टल नहीं लिखा। कभी उसे खिलौना बन्दूक लिखा तो कभी लाईटर लिखा तो कभी कुछ लिखा।

बहरहाल छात्रों की मांग बस इतनी थी कि इन चार गुंडों की शिनाख्त हो। पता तो चले कि ये हैं कौन जिनके अमीर खानदान की गुलामी दिल्ली पुलिस तक कर रही है, जो आराम से जेनयू मे बन्दूकें लहराते दिखाई पड़ते हैं? पर दिल्ली पुलिस ने यह नहीं होने दिया। और अंतत: जो हुआ वो यह कि सैकड़ो निर्दोष छात्र, अपनी मामूली मांग के बदले, पुलिस की बेरहम लाठियों से पीटे गये। आंसू गैस के गोले छोड़े गये। हवाई फायर हुआ। खबर यह भी है कि कुछ छात्र गोली का शिकार हुए हैं। मैं चाहूंगा कि ये खबर अफवाह बन जाये। नौजवानों की मृत्यु की खबर से वीभत्स कोई दूसरी खबर नहीं होती है।
उन चार गुंडों को बचाने मे लगी पुलिस इस कदर मुस्तैद थी कि घटना स्थल पर तीन वैन लाठी-बन्दूक से लैस पुलिस पहले ही बुला ली गयी फिर दो वैन आर.ए.एफ (rapid action force) भी बुला लिया गया। जहॉ पुलिस अपने सारे काम शातिरपने के साथ पूरी कर रही थी, वहीं छात्र अपनी बात किसी तक पहुंचा नहीं पा रहे थे, मसलन “ताकतवर” मीडिया भी घटना स्थल पर सात बजे के बाद पहुंची है, जबकि छात्र कुछ गुंडों के शिनाख्त की यह लड़ाई दिन के दो बजे से लड़ रहे थे।

विश्वविद्यालय के नख दंत विहीन सुरक्षाकर्मियों के पास हथियार की जगह वॉकी-टॉकी है। ऐसे मे छात्रों के पास बस एक ही हथियार था कि वो मेन गेट खुलने ना दें। पुलिस का सारा जोर इसी पर था कि मेन गेट खुले और दिल्ली पुलिस (ए.सी.पी. रैंक तक के अधिकारी घटना स्थल पर थे) अपने मालिकों के मुस्टंडे बच्चों को लेकर भाग निकले, कुछ रिश्वत पानी का इंतज़ाम हो, कोई प्रोन्नति मिले।
उन चारो को पुलिस की गाड़ी, जो मेन गेट के अन्दर थी, मे रखा गया था। आप छात्रों के अनुशासित और मानवोचित विरोध का अन्दाजा इस बात से लगा सकते है कि वो चारो मेन गेट के इस पार थे जहॉ छात्रों की तादाद पांच सौ से उपर थी, फिर भी कोई शारीरिक क्षति उन गुंडों को छात्रों ने नहीं पहुंचाई।

पुलिस की मुस्तैदी का दूसरा नमूना यह निकला कि मीडियाकर्मियों तक को उन चार “बहादुरों” की तस्वीर उतारने की इजाजत नहीं दी गई। छात्रों के पास शाम के आठ बजे तक कोई नेता तक नहीं था। हालांकि जो खबरे, अभी रात के दो बजे तक आई है कि जिस नेता से उम्मीदें थी, जब वो सामने आया तो छात्र अपनी लड़ाई और मनोबल दोनो हार गये।क्या आपको लगता है कि ऐसे लोगो का नाम लेना जरूरी है?

अभी निहत्थे छात्र अपनी मांग मनवाने की कोशिश कर ही रहे थे कि अचानक से मेन गेट खुल गया और लाठी चार्ज का आदेश हो गया। पिटने वाले तो अपनी पूरी उम्र इसे बतायेंगे पर जिन्होने ने दूसरो को पिटते हुए देखा उनका कहना है कि एक-एक छात्र को पाँच-पाँच पुलिस वाले पीट रहे थे। छात्राओं तक को नहीं बख्शा गया है। खबरों के अनुसार पचास से उपर छात्र जख्मी हुए हैं। उन चार गुंडों को पुलिस ने इसी बीच बाहर निकाल लिया। कल से उन गुंडों के पक्ष मे दलीले मिलनी शुरु हो जायेंगी। जो कुछ नहीं कहेगा वो भी इतना तो कहेगा ही कि – जेनयू के लड़को को ऐसा करने की क्या जरूरत थी? कुछ लोग देश के इन बेहतरीन विद्यार्थियों को पढ़ने और पढ़ते रहने की सलाह देंगे। विश्वविद्यालय के सुरक्षा नियम कुछ और कड़े हो जायेंगे जो कि छात्रों को ही परेशान करेंगे।

अब जबकि उन चार अमीर गुंडों की पहचान नहीं हो पाई है तो कायदे से सरकारी महकमा इस पूरे वारदात को झूठा भी करार दे सकता है। मीडिया को सरकारी विज्ञापन पाने का बेहतरीन मौका छात्रों ने खुद लाठी खाकर दिया है। खुद के शरीर पर लाठी खा कर पुलिस वालों को प्रोन्नति पाने के काबिल बनाने वाले छात्रों के प्रति आप क्या सोचते हैं? मैं घटना स्थल पर निहायत निजी कारणों से मौजूद था, अपने जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अभिलाषा को असफल होते देख अब मेरे पास लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था, पर जब जेनयू के मेन गेट का नजारा देखा तो निजी दुख को कुछेक पल के लिये किनारे कर वहा मौजूद छात्रों से मिला, सुरक्षाकर्मियों से मिला, पुलिसवालों से बात की। पाया कि छात्रों की मांग बिल्कुल जायज थी।

14 comments:

अजय कुमार झा said...

कमाल है कि दिल्ली में ऐसा हुआ ...मीडिया तो ऐसी खबरों के लिये हलकान रहती है ...अब भी बहुत कुछ नहीं बिगडा..इसकी शिकायत उच्च अधिकारियों से सीधा ही की जा सकती है

अजय कुमार झा

RAJ SINH said...

हम अंग्रेजों के वक़्त की भी गुलामी से ज्यादा गुलामी में जी रहे हैं .ये ' पुलिस ' किसके लिए है ,कोई शक ?

Pradeep Jilwane said...

मीडिया (खासकर इलेक्‍ट्रानिक)और पुलिस दोनों ही बारे में अब क्‍या कहा जाए. कुछ नया तो कह नहीं सकते. दोनों की छवि बद से बदतर होती जा रही है. यदि इन दोनों के चरिञ में सकारात्‍मक सुधार आ जाए तो फिर ऐसे रईस मवालियों पर लगाम कसना आसान होगा. खैर यह अच्‍छा है आप अपनी पोस्‍ट पर इस तरह की समस्‍याओं को लेकर उपस्थिति हो रहे हैं.

ऋषभ उवाच said...

शर्मनाक. और वीभत्स भी.
क्या गुंडों की कभी शिनाख्त होगी!

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Thanks Chandan Bhai for remembering me,You have told the truth and the worst thing is that happens time and again in our country.
Its really pathetic that a free and so called govt hurts its youth for no reason.Its a shameful thing.
Pl keep writing and in due course tell me where to get it.
With regards,
dr.bhoopendra rewa

संदीप पाण्डेय said...

सबकुछ बहुत निराश करने वाला है चंदन लेकिन अप्रत्याशित कुछ भी नहीं। पुलिस की समझदारी और सहिष्णुता पर कभी शक नहीं रहा। मेरा कोई मित्र जेएनयू में नहीं रहता लेकिन मैं अक्सर वहां खाना खाने जाता रहा हूं मुनीरका के अपने पत्रकार मित्रों के साथ्। दुखद बात यह है कि कल रात राज.शिल्पामय हो रहे चैनलों पर इस बारे में कोई खबर तक नहीं थी।

शशिभूषण said...

मुझे इस बात का गहरा संतोष है,गर्व भी कि आपने हस्तक्षेप किया.अपनी भूमिका निभाई.यह एक उम्मीद की शुरुआत भी है कि आप कोरे लेखक नहीं हैं.जो पुलिस पिस्टल को पिस्टल नहीं खिलौना बंदूक,लाइटर लिखती है उसी ने तो हर तरह के साहस को कमज़ोर कर रखा है.पुलिस हमारे यहां का सबसे कमज़ोर मोर्चा है.जिसे भी निरापद वारदात करनी होती है इसी रास्ते आता है.मीडिया तो खैर देर सबेर खबर बेच ही लेगा.पर एक बात तो रह ही गई इस सबमें.आपके वहां होने की निजी वजह?...यह भी उदास कर गया.

चन्दन said...

शशिभूषण भाई साहब, पुलिस दुनिया की सबसे ताकतवर चीज है। आप एक घंटे मात्र के लिये उनकी चपेट मे आ जाये, जीवन भर याद रखेंगे। उनके पास अधम भाषा और ठंढी क्रूरता का असीम भण्डार है! पुलिस तंत्र को लेकर मेरे पास सोचने का एक नया कोण है, अपनी कहानियों के माध्यम से ले आउंगा।

शशिभूषण said...

चंदन,अभी गौर किया तो लगा पुलिस तंत्र इस शब्द में बड़ी व्यंजना है.तंत्र,पुलिस के साथ होकर जैसे सरकारी गवाह(डंडा) बन जाता है.तुम तो जैसे एक ही शब्द को सघन करके चमका देते हो. इसी से कौंधा ठंडी क्रूरता. खयाल आ रहा है यही तो है पुलिस की ताक़त का मंत्र है.

शिरीष कुमार मौर्य said...

चन्दन अभी ये ज़रूरी पोस्ट देखी. शशि से सौ फीसद सहमत.

योगेन्द्र मौदगिल said...

घोर अफसोसजनक....

Anonymous said...

Chandan! U really showed the other face of the JNU situation.... "Pen act like a Sword", i am sure one day ur words will act like a Sword & the things which are facing IGNORANCE by the People will cum into limelight to work for...... Our forces are definitely Strong in using their powers but they usually forget their moral duties..... Hopefully Writers like u make them Awake soon...........

patented said...

This incident once again proved the efficiency and integration of delhi police.. whether it's recent JNU case or the case of manu sharma... Delhi police has always been loyal to few WORTHY people... As they say CITIZENS FIRST... and a normal delhite is not even consider dat... Good going!!!

prafull said...

Ascharya hai ke J N U me aisa hua. Or ye sach bhi hai news me maine aisa hi dekha tha.Ye to pura desh janta hai ki police in tanashahon ki ghulam hai,jis tarah bolenge nachegi magar aap student hain aap hi in Wardi wale gundo ko inka kam yaad dila sakte hain.Or chandan ji aapne sahi tarika apnaya.sacchayi sabke samne ani chahiye chahe kisi bhi kimat par.Keep going we are with you always…