Monday, May 24, 2010

निकानोर पार्रा की कविता

एक तात्कालिक ट्रेन की योजना
(सांतियागो और पुएर्तो मोंत के बीच)

तत्काल की उस ट्रेन में
इंजन खड़ा होगा गंतव्य (पुएर्ता मोंत) पर
और उसकी आखिरी बोगी
सफर के प्रस्थान बिंदु (सांतियागो) में होगी
इस की ट्रेन का फायदा यूं होगा
कि यात्री पुएर्तो मोंत ठीक उसी क्षण पहुंच जाएगा
जब वह चढ़ेगा सांतिआगो में
ट्रेन की आखिरी बोगी में
आगे सिर्फ इतना करना होगा
कि ट्रेन के भीतर ही टहलना होगा
साजो सामान के साथ
जब तक कि पहली बोगी न आ जाए

एकबार इस प्रक्रम के पूरा हो जाने पर
उतरा जा सकेगा ट्रेन से
जो कि हिली तक नहीं है
पूरे सफर में

नोट : इस तरह की ट्रेन
बस एक ही ओर की यात्रा के लिए चलेगी



निकानोर पार्रा

(अनुवाद श्रीकांत का है. श्रीकांत अब दिल्ली आ चुके हैं और नई जगह पर बसने की शुरुआती आपाधापी के बाद इन्होने सुन्दर अनुवादों का “थैंक्सलेस” सिलसिला फिर शुरु किया है.)

5 comments:

shesnath pandey said...

गझिन सी यह कविता अपने समाप्ति तक इतना दृश्यमान होती है कि हम अदभुत की एक लंबी आह भरते है....

Aparna said...

Sabse pehle Srikantji ka Delhi mein Swagat!!!!!

Yah bahut hee sundar anuvaad hai........

Anonymous said...

Well done Srikant

Anonymous said...

Dhayawaad!!

vidrohi said...

Shrikant ko Delhi pahunchne ki badhai. Dilli ab door nahi rahi.Ummid hai sukoon hai Delhi mein Jaanleva garmi ke wabjood.kushi huyi bahut dinon ke baad aapke kaam ko dekhkar. Pahle kavita ko samajhne ki koshish karta hum.mujhe lagta hai ki ye ruki huyi train hai jo itni lambi hai ki do jagahon ko jodti hai.jisme bina train ke hile dule train mein hi andar ek taraf se dusre taraf chalkar gantavya tak pahuncha ja sakta hai.
Agar sahi samjha to aisi trains chahiye hamare shahron mein,jahan ek jagah se dusri jagah jana ek mushkil kaam hai. Aur agar maine galat samjha to,ummid hai koi sajjan jinhone is kavita ko samjha ho mujhe samjhayein.