Friday, July 2, 2010

कुम्भकर्ण का विरोध पत्र

तहलका के पठन पाठन अंक में साहित्यिक संसार के आदरणीय बुजुर्गों ने जिस प्रतिबद्धता और जिस ताकत से समूची युवा उम्र, समूची युवा रचनाशीलता को नकारा है वो दु:खद है. पहले लगा कि जीवन में कुछ भी नही करने वालों की राय मान ले और इन सम्माननीय बुजुर्गों की बातों को दरकिनार कर अपने में मगन रहें. फिर अपना ही मन धिक्कारा कि क्या कोई भी कुछ भी बोल सुन के चला जायेगा और हम अपने व्यस्त और ‘महत्वपूर्ण’ होने के तथाकथित भ्रम के कारण चुप रहेंगे? यही सब सोच विचार कर मैने अपनी यह प्रतिक्रिया ‘तहलका’ को दी है. यह जानते हुए कि यही लोग गुरुजन हैं, इनसे ही सीखा है कि गलत का प्रतिरोध करो. खास कर ज्ञानरंजन जी और काशीनाथ जी की कहानियों से तो पढ़ने लिखने की शुरुआत ही हुई. पर जीवन कभी कभी ऐसे मुहाने पर ला छोड़ता है कि रास्ते चुनने पड़ते हैं. इसलिये ही यह विनम्र विरोध पत्र:

कुम्भकर्ण का विरोध पत्र

तहलका द्वारा साहित्य पर केन्द्रित अंक का स्वागत. साथ ही तहलका का आभार, जिसके जरिये हमें युवा कथाकारों की रचानाओं और रचनाशीलता पर हिन्दी कथाजगत के बुजुर्गों की महत्वपूर्ण राय तथा एक जैसे ‘सुविचार’ जानने को मिले. युवा पीढ़ी की आलोचना होनी चाहिये,अक्सर लोग यही करते हैं, पर क्या उस आलोचना की भाषा की कोई मर्यादा नही होनी चाहिये? बुजुर्गियत की अचूक और कुठाँव मार झेल रहे इन अग्रज कथाकारो की बात और भाषा को सच मान लें तो कोई तर्क नही बचता जिसे आधार बना कर युवा लिखते रहें. अगर दिनेश कुमार द्वारा सम्पादित उस लेख का भरोसा कर लें तो हम युवाओं को अब तक अपने लिखे के अपराध का प्रायश्चित करना होगा. तानाशाह बन जाने की इच्छा पाले इन बुजुर्गों की तमन्ना पूरी करने के लिये क्या कहानी लिखना छोड़ देना ही कामचलाउ सजा होगी या कहानी के इन जमींदारों के महल के आगे हमारे आत्मदाह ही पर्याप्त होंगे – इसे जब तक कोई पता लगाये, तब तक मैं इनके महान विचारों के दूसरे कोने अँतरे खंगालता हूँ.

विश्वनाथ जी का यह कहना कि नये रचनाकार एक जैसे रच रहे हैं, बहुत गहरे आशय देता है. इनके लिये काला अक्षर भैंस बराबर कहने की हिमाकत तो मैं नही कर सकता पर भैंस का ही उदाहरण लें तो कह सकते हैं सारी भैंसे,अपने झुंड में, हमारे लिये तो एक जैसी ही होती हैं पर जो ग्वाले हैं, जिन्होने अपना जीवन दूध व्यवसाय को समर्पित कर दिया है, जो बीसियों साल से अपनी साईकिल पर दूध के बाल्टे रामनगर से बनारस लाते है, रोज, बिला नागा, वो बन्धु दूर से देख कर ही बता सकते हैं कि अमुक भैस की क्या खासियत है और तमुक की क्या? यह दरअसल ‘इंवॉल्वमेंट’ कहलाता है. जैसा माहौल तैयार हो चुका है उसमें आसानी से त्रिपाठी जी मेरी बात का बुरा मान जायेंगे. उनके चमचे उन्हे मेरे खिलाफ भड़कायेंगे पर वो अगर अपनी आत्मा से बात करें तो पायेंगे कि उन्होने सबकी कहानियाँ पढ़ी ही नही है. और पढ़ी है तो उन्हे बताना था कि यह एक-सा पन किस किस कहानियों में उन्हे मिला.

इनकी ‘नंगातलाई का गॉव’ पढ़ कर खासा प्रभावित हुआ और एक कार्यक्रम में इन्हे सुनने गया. कार्यक्रम हजारी प्रसाद द्विवेदी पर था जो, सुनने में ही भर आता है कि, इनके गुरु थे. हजारी प्रसाद जी के सारे उपन्यास हमने पढ रखे हैं और आज तक यह समझ ही नही पाए कि अपने पूरे जीवन में चालीस से पचास कहानियाँ भी नही लिखने वाले ‘महान’ बुजुर्गों ने हजारी प्रसाद जैसे रचनाकार को किस चालाकी से पूरे परिदृश्य से ही गायब कर दिया है? उम्मीद थी कि त्रिपाठी जी इस चालाकी के खिलाफ बोलेंगे पर वो पूरी गोष्ठी में यही बोलते रह गये कि हजारी प्रसाद जी की धर्मपत्नी द्वारा बनाये गये दाल,भात और चोखे का स्वाद कितना असाधरण होता था. उनके हाथ का अचार कितना अच्छा होता था. तालियाँ, जैसा कि उनके बजने की रवायत है, बजती रहीं.

आप स्वाद में इस कदर उलझे पड़े है सर जी कि आपको पता ही नही - हम उन कहानीकारों की श्रेणी से नही आते जो टारगेट बना कर एक कहानी स्त्री विमर्श पर, अगली कहानी दलित विमर्श पर और फिर अगली कहानी साम्प्रयादियकता पर(जिसमें यह निश्चित है कि वो प्रेम कहानी ही होगी और हिन्दू बहुलता का ख्याल रखते हुए पुरुष पात्र हिन्दू होगा तथा स्त्री माईनॉरिटी ग्रुप से होगी, इसे गदर सिंड्रोम कहते हैं, जिसे पढ़ते हुए हिन्दू और ‘सॉफ्ट हिन्दू’ आँख मूँद मूँद कर यह सोचते और सोच कर खुश हो लेते है कि गनीमत है जो मुसलमान नायक नही है वरना वो हिन्दू की लड़की के साथ यह सब करता...).सर जी, स्त्री हमारी कहानियों में प्रमुखतम पात्र के तौर पर आती है. वह स्त्री अपने सारे निर्णय खुद लेती है. ऐसे ही दलित भी आयेंगे और जब आयेंगे तो सवर्ण कुकर्मियों के लिये विलाप से अलग दूसरा कोई चारा नही बचेगा. आपको हमारे लेखन पर पछताने की जरूरत नही है जैसा कि श्रद्धेय कथाकार काशीनाथ जी इन दिनों लगातार पछता रहे हैं.

डॉक्टर काशीनाथ जी की हालत उस अमीर इंसान की हो गई है जिसकी दी हुई खराब कमीज को उसके गरीब मित्र ने साफ सुथरा कर, इस्त्री लगा पहन लिया था. अब वो दोनो जहाँ भी जायें, लोग गरीब मित्र के कमीज की तारीफ कर दें तब फिर बेचारा अमीर मित्र तुरंत कहता- ये कमीज मैने ही इसे दी है. इनके पछतावे से हम डरे हुए हैं. अगर किसी बुजुर्ग लेखक को अपने लिखे का इस कदर पश्चाताप हो तो हमारा दु:ख जायज है. जिसने पूरा जीवन, कम से कम कहा तो यही जायेगा, रचते हुए गुजार दिया उसे एकाएक अपने लिखे पर शक होने लगे तो उस बेचारे लेखक के लिये कितनी दु:ख की बात है. हम नही चाहते कि आप अपनी दूसरी रचनायें भी दुबारा पढ़े ताकि आपको यही समस्या अपनी कहनियों के बारे में घेर ले. रही बात आपके वागर्थ वाले लेख की तो कहाँ फंसे पड़े हैं महाराज? किसी के लिखने से कोई कहानीकार स्थापित होता है भला! आपके साथ ही ज्ञानरंजन जी भी लिखने वाले थे,पर उन्होने नही लिखा तो क्या हमने लिखना बन्द कर दिया? पर आपको यह जरूर बताना चाहिये कि आप कौन सी विज्ञापन विधि से अपरिचित थे जिससे हम परिचित हो गये हैं? ये कोई अन्धा भी जानता है कि जिस दौर में आप लोग साहित्य साहित्य खेल रहे थे वह हिन्दी साहित्य का स्वर्णिम दौर था और जिसे आप सब ने यों ही बीत जाने दिया. आपके समय पत्रिकाओं की लाख प्रतियाँ छपती थी, दो घंटे की मास्टरी के बाद लिखने के नाम भर पर उस समय के लोगों को कितना अफराद समय मिलता था?

हम पर बाजार का कोई दबाव नहीं है गुरुवर. जब भी यह खबर मिलती है कि हम युवा रचनाकारों की किताबों के तीसरे या चौथे संस्करण आ रहे हैं तो मुझे हैरानी इस बात की होती है कि क्या इतने पाठक हैं? पाठक के कम होते जाने का जो सिलसिला, जाने कैसे, हिन्दी कहानी पर आप लोगों के शासन काल से शुरु हुआ वो बदस्तूर जारी है और इस सच से हम खूब वाकिफ हैं. बाजार का असर तो तब होता जब पाठक बढ़ते. उल्टे इससे हमें यह सबक मिला कि जो भी लिखो ईमानदारी से लिखो क्योंकि जो पाठक ऐसे समय में भी साहित्य के साथ है वो बहुत जेनुईन है, वो समझदार है, उसके कंसर्ंस हवाई नही है. हमारा पाठक दिन में तारे देखना पसन्द नही करता, उसे ठोस सच्चाईयॉ जानने का जुनून है. रही अपनी बात तो अगर हम युवा आपको अपना कलेजा चीर के भी दिखा दें तब भी आपको यकीन नही होगा कि सिर्फ और सिर्फ अच्छी रचना ही हम सबका मकसद है. आपको भरोसा वैसे ही नही होगा जैसे किसी धार्मिक को इसका भरोसा नही होता कि ईश्वर नही है, जैसे किसी अफसर को इस बात का भरोसा नही होता कि घूस लेना अपराध है. मुझे उदय प्रकाश की डिबिया याद आ रही है.

हमारी इस चिंता से जाहिर होता है कि हम मनुष्य विरोधी नही है जैसा कि ज्ञानरंजन जी ने सत्य उद्घाटित करने के अन्दाज में बताया है.. पर ये हमारे इतने प्रिय कथाकार हैं कि एक बार तो ‘बेनेफिट ऑफ डॉऊट’ इन्हे देना ही होगा और इनकी स्थापना माननी होगी कि यह सचमुच की नई और युवा पीढ़ी मनुष्य विरोधी है.. पर इसे मानते ही दु:खद समस्या खड़ी होती है.क्योंकि यह विश्वास करने का कोई कारण नही है कि ज्ञान जी को यह ‘रिवेलेशन’ अचानक से हुआ होगा, पहल जैसी अनोखी पत्रिका के सम्पादक की वैज्ञानिकता पर जायें तो इन्हे ये बात हमारी रचनाओं को इधर उधर पढ़ कर पहले ही मालूम पड़ गई होगी कि यह पीढ़ी हिंसक और मनुष्य विरोधी है. फिर भी आपने हमारी कहानियाँ अपनी पत्रिका पहल में प्रकाशित किया. क्यों? क्यों फिर आपने पहल जैसी नामधारी और प्रतिबद्ध पत्रिका के पाठकों, जिसके पाठक, जिनमें मैं भी एक हूँ, पहल को एक किताब का दर्जा देते हुए उसमें छपी एक एक रचना पढ़ जाते हैं, के साथ ऐसा खिलवाड़ किया?

सर, कहीं ऐसा तो नही कि आपने कहानी प्रकाशित करने से पहले ही उसके मनुष्यविरोधी और क्रूर होने को जान लिया हो और इस उम्मीद में कहानियाँ प्रकाशित किये हो कि लोग हम युवाओं पर हसेंगे, हमारे लिखे का मजाक उड़ायेंगे. पर हो इसका उल्टा गया. लोगों ने उन कहानी में मनुष्यता के सार्थक चिन्ह ढूंढ लिये होंगे. तब हार पीछ कर आपने इस सत्योघाटन का जिम्मा लिया हो. जो भी हो, हम बहुत दु:खी हैं यह जानकर कि पहल जैसी सचमुच की अच्छी पत्रिका में छपने की हमारी क्षमता नही थी. फिर भी आपने...? आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप आगे कि किसी बात चीत को ऐसे तोड़ मरोड़ देंगे जिससे आप, हमें मनुष्यविरोधी घोषित करने के अपने तुर्की फैसले, पर कुछ भी कहने से बचे रहे. आप हमारा यकीन करिये हम आपसे पूछेंगे ही नही कि आखिर हम सब मनुष्य विरोधी कैसे हो गये? हमें खूब पता है कि हम ऐसे हर्गिज नहीं है.

संजीव जी से खौफ खाते हुए, डरते हुए अगर यह मान लिया जाये कि हम विवादस्पद और खराब लोग हैं तो उन्होने ही इस राज का भी सनसनीखेज खुलासा किया है कि ऐसे भी कहानीकार हैं जिन्हें संजीव जी तो जानते हैं पर वो कम चर्चित है या उन सचमुच के अच्छे कहानीकारों का रास्ता हम जैसे विवादास्पद और विज्ञापनबाज (काशीनाथ जी के पछताये शब्दों में) कहानीकारों ने छेंक रखा है. तो फिर आपने ऐसा ‘अपराध’ क्यों कर दिया संजीव जी? आपको तहलका ने मंच दिया. यहाँ से गूंजी आवाज बहुत ज्यादा फैलेगी यह आपको पता तो था फिर आपने भी उन अच्छे युवा रचनाकरों को गुमनाम रहने दिया. आपको यहाँ, तहलका के इस बेहतरीन मंच पर, उनके नामों की घोषणा करनी चाहिये थी ताकि वो आगे आ सके. पर आपने नही किया और बड़ी चालाकी से आपने उन बेहतरीन नगीनो को गुमनामी के अन्धेरे मे डूबे रहने के लिये छोड़ दिया? यह जान बूझ कर किया गया और ज्यादा सघन ‘अपराध’ है संजीव जी जिसके लिये थीसिस फेंकने की भी जरूरत नही पड़ी.कितने चालाक हैं आप! कहीं रवीन्द्र कालिया जी ने आप सबों की गहरे कहीं डूबती नब्ज पर तो हाथ नही रख दिया यह कहते हुए कि- नई पीढ़ी के आने के बाद पुरानी पीढ़ी असुरक्षित हो गई है.

हम युवा लोग तो आप सबकी कहानियों/कविताओं/ उपन्यासों को पढ़ते, दुहराते, तिहराते बड़े हुये हैं. आप सब लोग, कम से कम मेरे लिये, द्रोणाचार्य सरीखे हैं. पर आपकी चाहत ययाति बन जाने की दीख रही है. आपकी बातों से तिरस्कार और बे-ईमानी की बू आ रही है. मेरी प्यारी भोजपुरी में जिसे चोरहथई कहते हैं. इसलिये ही मैं कहना चाहता हूँ कि मोल जीवन और गोल भाषा के आदी हो चुके आप लोगों ने जिस गोल-मोल अन्दाज में सकारात्मक प्रचुर अपवाद का जिक्र किया है मैं उसमे से एक नही होना चाहता.खासकर जैसे अकाट्य सत्यों के पक्ष में आप खड़े हुए हैं उसे जान कर तो हर्गिज नहीं. मुझे यह भी यकीन है कि आप अपने पैने शाब्दिक नाखून लेकर मेरे पीछे पड़ जायेंगे. आपके स्टील, लोहे, चाँदी और नकली सोने के चमचे मुझे उचित-अनुचित तरीकों से नुकसान पहुँचाने मे भिड़ जायेंगे. मेरी भाषा/कहानी में तम्बाकू की अमर गन्ध की तलाश कर उसे खारिज करने में लग जायेंगे पर इन सब के बावजूद अगर आप सब ही हिन्दी के अवधराज हुए तो विभीषण के प्रति सच्ची सहानुभूति रखते हुए भी मैं अपने लिये कुम्भकर्ण का किरदार चुनता हूँ.

46 comments:

दीपक 'मशाल' said...

सही कहा आपने

आशुतोष पार्थेश्वर said...

बुजुर्गों की बातों का इतना बुरा नहीं मानते, भाई !

माधव said...

well said

विमलेश त्रिपाठी said...

ये साठ पार के लोग हैं चंदन.. तुम्हें याद होगा कि वागर्थ के दोनों युवा विशेषांकों में जिन काहनियों की अधिक चर्चा हुई थी, वो तुम्हारी, कुणाल, मेरी और अन्य कथाकारों की कहानियां थीं.... अरे भाई मुझे तो नहीं लगता कि वह ट्रेक जो हमारा था, उसे हमने कहीं से भी छोड़ा है... और जब हमारी कहानियों को मनुष्य विरोधी कहा जाता है, या काशीनाथ जी अपने कहे पर पछता रहे हैं तो मुझे तो यही लगता है कि ...ये साठ पार के लोग हैं.... मतलब नहीं समझे..??? अरे ये सठिआए लोग हैं.... हमें तो लिखना है और वही लिखना है जो हम झेल-देख रहे हैं...
हम कौन से दरख्त हैं ये कल बताएगा... एव मस्त!!!!

girirajk said...

brilliant!

anurag vats said...

purani peedhi apne pure ''rangoboo'' men zahir ho rahi hai...zyadatar buzurgon ne ek waqt ke bad padhna band kar diya hai...is trah unmen samjah ki apaar roodhiyan paida ho gai hain...unki rachna aur raajneeti chunki buri tarah flop ho chuke hain isliye ab we samjh kii roodhiyon kii raajneeti karne utar aaye hain...tehlka men inke bayan padhkar meri yah dharna pusht hui hai ki ab tuglaki faisle sunane wale bujurgon kii tadad badh rahi hai...yah achha hai ki nai peedhi ise note kar rahi hai aur uske sabse samarth rachnakaron men se ek chandan pandey ne tehlka ke visheshaank kii sabse achhi kahani likhne ke baad usi ke naye ank men apna yah virodh-patr chapwaya...yah is baat ka soochak hai ki naye men vinamrta ke sath-sath paryapt ladakoopan bhi hai...

Udan Tashtari said...

अपना ज़ज्बा बनाये रखो..आगे बढ़ते चलो. अनेक शुभकामनाएँ.

Pramod Singh said...

ज़रा सा, थोड़ा सा, कितनी सी, इतनी सी तो है हिन्‍दी साहित्‍य की दुनिया, ठीक-ठीक काशी का अस्‍सीयो जितनी जगह की छेंकाई नहीं करती..
कितनी निकलती है एक 'बेस्‍टसेलर' की कापी, पांच हज़ार?राजधानी तक का एक बड़का साहित्यिक हीरो आंख मूंद ले, उसकी विदाई में कितना पब्लिक इकट्ठा होगी, डेढ़ सौ? साल भर में बाबू तीन ठो हुआं और दो यहां रेलवेवाला समय-सारिणी की तरह साहित्‍य-सूचकांक निकल जाता है तो इसपे इतना आपलोग हाथ और गोड़ पटकने लगते हैं? बिस्‍सनाथ जी अऊर कासी जी जुवापीढ़ी का पीठ पर तारीफ़ी का हाथ टेक दिये होते, आपका चेहरा पे मुस्‍की आ जाता तो ये दुनिया, दुनिया की सबले हसीन जगह हो जाती? ऐसी अदायें (या कैसी भी) सिर्फ़ अदायें ही होंगी, वो हिन्‍दी को कहीं ले नहीं जा रहीं, कल को समय आएगा तो आप भी अपने बाबू-बच्‍चा को पठन-पाठन बास्‍ते हिंदी इस्‍कूल नहींये भेज रहे होंगे, फिर?
बिना हीरोगिरी अपनाये विनम्रता से लिखते जाने की शोभा में ही यह जुवा-समय, अच्‍छा न हो, अपने को शोभित किये रहे?

Anonymous said...

Chandan maine TAHALKA to nhi pda lekin aapke vocharo aur stand lene ki kshamata ki tarif to karni hi hogi.Naye rchuakar behatarin hai bas jarurat hai ekjut hone ki.Yah mauka Swartha sukh aur bhavishya bhay se bahar aane ka hai, Puratan Mahanta k chhadm ko nkarne ka hai.VIJAYA

Rangnath Singh said...

इन सभी लेखकों में निराशावाद जड़ जमा चुका है। यदि उनकी बातों में आंशिक सच्चाई हो तो भी पूरे परिदृश्य को इस कदर खौफनाक दिखाना उनके नकारात्मकता को ही दर्शाता है। पुराने लागों को सोचना चाहिए कि हर पीढ़ी अपने हिस्से का संघर्ष करती है। हमारी पीढ़ी भी वही कर रही है। इस संघर्ष के उतार-चढ़ाव भी होंगे। यह तो हर समय रहा है। इन वरिष्ठ लोगों को सोचना चाहिए कि यही पीढ़ी है जो इन अग्रजों को जिंदा रखे हुए है। अगली पीढ़ी इनके संग क्या सलूक करेगी किसी को नही पता !!

Rangnath Singh said...

http://vipakshkasvar.blogspot.com/2010/06/blog-post_24.html

हमारे बुजूर्गों के आशीर्वचन को इस लिंक पर जाकर पढ़ा जा सकता है। उस लेख से वही विवादास्पद अंश लगाए गए हैं जिनमें हिन्दी के स्वनामधन्य लेखकों की मसिहाई छलक-छलक गई है।

Anonymous said...

चंदन,

पाठक की अहम राय यह भी रही है कि हिन्दी के नए लेखक की त्वचा जरूर कसी हुई है लेकिन दिमाग वही झुर्रीदार है। वह अवसरवादी है, जुगाड़ू है, रचना से ज्यादा अपनी रेटिंग के चक्कर में रहता है, हर मठ में माथा नवाता है और हर नए गिरोह में बैठने से पहले अपने शामिल बाजे के तार कसता है। विरोध वगैरा झेलना उसके बस का नहीं। वह हांजी हांजी छाप सेलिब्रिटी हो जाना चाहता है।

लेकिन पहली बार। फिर दोहराता हूं पहली बार। इस भ्रम को तोड़ने के लिए बधाई, चंदन।

सभी पुराने एक जैसे नहीं है। उनमें में कई बेहद खुले और समझदार है। लेकिन जिनके पास पत्रिका, मठ या माइक है उनमें से ज्यादातर मगरूर होकर अल्ल-बल्ल बोलने लगे हैं। उन्हें लगता है कि कुछ नाम उवाच कर या छोड़ कर वे इस उपमहाद्वीप की आबादी के मष्तिष्कों पर शिलालेख लिख रहे या पोचारा लगा रहे हैं।

इस मुगालते पर सिर्फ हंसा जा सकता है।

काश कुछ दिन आलोचक, समीक्षक और कुंठित व्याख्याकार अपनी दुकानें बंद रखते और सिर्फ कहानियां छपतीं। न कहानी के आगे कुछ न पीछे। बाकी पढ़ने वालों पर छोड़ दिया जाता।

वैसे मुझे लगता है कि इन हालात में बिना किसी अपेक्षा के बस लिखते जाने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है।

Anil yadav

Rajesh said...

चन्दन जी आपने ठीक किया | इन्हें ऐसे ही तार्किक जवाब की जरुरत थी | देखिएगा अब ये बुजुर्ग आपकी यहाँ उठाई गई बातों का तार्किक उत्तर देने की बजाए इधर-उधर की बातें करेंगे, बल्कि करवाएंगे | जैसे की युवाओं को सिर्फ लिखने से मतलब रखना चाहिए, उन्हें राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए, बुजुर्गों की इज्जत करनी चाहिए, समय हर फैसला कर देगा वगैरह-वगैरह |

ये अच्छा है की आपने इसका प्रतिवाद किया लेकिन अन्य "युवा" कहाँ हैं ? कहीं वो अपवादों की लिस्ट की तरफ आतुर निगाहों से तो नहीं देख रहे | अब तो जिसका नाम उस लिस्ट में आएगा, वो हम पाठकों की निगाह में संदिग्ध हो जाएगा |

श्री-श्री १००८ काशी-विश्वनाथ जी महाराज से मेरा कहना है की क्या आप लोग अब संस्मरण लिखने के लायक भी नहीं रहे जो पूरी नई पीढ़ी के खिलाफ फतवे जारी कर रहे हैं | क्या आप अपने बच्चों को भी ऐसे ही हतोत्साहित करते हैं | अगर कोई 'अपवाद' थे तो उनके नाम का उल्लेख न करना क्या बौद्धिक बेईमानी नहीं | कालिया जी ने बिलकुल नब्ज पर ऊँगली रखी है, दरअसल आपलोग असुरक्षित हो गए हैं, इसलिए हिंदी-साहित्य से अपने माफिया-राज का अंत होते देख गैंगवार शुरू कराने पर उतारू हैं |

राजेश कुमार

devendra goswami said...

भाई साहब खिस्याई बिल्ली खम्भा नोचे. यह बुजुर्गों की कुंठा है जो नयी पीढ़ी की सोच और रचनाधर्मिता को पचा नहीं पा रही है. नयी पीढ़ी तकनीक सक्षम है, उनके अन्दर लिखने का जूनून है. चिंता की कोई बात नहीं है मित्रों बस इसी तरह आगे बढ़तेरहो

शरद कोकास said...

चन्दन, यह जायज़ अभिव्यक्ति है ।
अभी मैने इन सबके वक्तव्य पढ़े नहीं हैं लेकिन तुमसे सहमत हूँ । और इस बात से भी अब हमे इन सबके बीच चयन करना होगा कि साहित्य के हितैषी कौन हैं ।
ऐसा हर दौर में होता आया है लेकिन अब पहचानने की क्षमता बढ़ गई है और चुनौतियाँ भी पहले से ज़्यादा हैं ।
अब यही कि साफ साफ कहना ज़रूरी है ।

addictionofcinema said...

मैंने तो पहले ही कहा था की ये होगा और जल्दी ही होगा और आगे इससे भी बुरी मानसिक दशा होने के आसार हैं तथाकथित बुज़ुर्ग लेखकों के. इसमें न पड़ने का मतलब ये नहीं की कोई कुछ भी कहे और हम चुप बैठे रहें, हम करें अपना काम और वो काम इनके लिए सबसे करारा जवाब होगा जो की मिल भी रहा है. और इनके अल्लम गल्लम के विरोध में न बोलने का मतलब ये नहीं की नयी पीढ़ी व्यस्त होने का दिखावा कर रही है यार चन्दन, वो सचमुच बहुत व्यस्त है और साहित्य को सिर्फ किताबों और पत्रिकाओं तक ही सीमित नहीं है, वो अपनी लड़ाई को अपने जीवन में भी उतारता है जो पहले के कम ही रचनाकार करते थे. याद करो वो लाल झंडे वाली कहानियां जो एक खास दौर में हर लेखक ने लिखीं और एक जैसी लिखीं और सिर्फ लिखीं और कुछ नहीं. यहाँ साला आर टी आई पे काम करते करते ये हाल है की कई सरकारी प्रतिष्ठानों से धमकियाँ आ रही हैं और सच मानो इसमें मज़ा आ रहा है. अपनी नौकरी के साथ साथ एक्तिविस्म और साथ में पढना और उसके साथ लिखना भी ...सब इतना कठिन है की इन बकवासों और खब्ती बुढ्हो के पीछे वक़्त बर्बाद करने का बिलकुल वक़्त नहीं है साथी. अपना काम किया जाये और ऐसे की अपने साथ कुछ साहित्य और पाठकों का भी भला हो
विमल चन्द्र पाण्डेय

addictionofcinema said...

कुल मिलकर मैं कमोबेश प्रमोद सिंह के विचारों से सहमत हूँ. सीधी बात नो बकवास ये है की किसके पास समय है फालतू बातों पे ध्यान देने का. हमारा निर्णय कोई outdated कहानीकार या आलोचक नहीं कर सकता, वो वक़्त करेगा. इन लोगों ने अगर तारीफ की होती तो क्या हम इतने खुश होते जितने नाराज़ हैं बुराई करने से. ज़ाहिर है नहीं क्योंकि ये पीढ़ी वाकई पूर्ववर्ती पीढ़ियों से अलग है और ये अलगनेस क्या है, ये येही है यार

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

Wonderful and very creative response Chandan.

विशाल श्रीवास्तव said...

यार चन्दन ग़ालिब का ये शेर याद आ रहा है -

रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए
धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए

यहाँ धोने का अपना पुरबिहा अर्थ लेना...
और परेशां मत हो तुम अच्छा लिखते हो लिखते रहो
मैं खुद भी परिकथा में अभी छपी अपनी कविताओं पर हमले झेल रहा हूँ...

आभा said...

चंदन आप की कहानी नया पढ़ती हूँ, बात करती हूँ। बातें दो ही तरीके से ली जा सकती हैं ,एक तो चैलेंज और अच्छे से अच्छा लिखले का ( जैसे हम जब भी अपने पिता को कुछ लिख कर दिखाते तो कभी पिता से यह नहीं सुना की बहुत अच्छा हर बार और अच्छा करो बस.. जरबुताता है मन ,पर करें क्या , दूसरा पक्ष कि साहित्य में यह पक्ष विपक्ष चलता है , सभी जानते है.:)

rahul said...

bhai chandan, blog ke kisi post per pahli baar pratikriya de raha hun. tehelka me dinesh kumar ke aalekh me apne bujurgon ki rai dekh kar dukh aur krodh dono aaya.thesis ke kaam me vyast hun.nahi to jawab dene ki bari gahri ikcha thi.der se hi likhunga per is per likhunga jaroor.baharhaal prtirodh ka swar dirj karne ke liy shukriya aur badhai dono.bas hum is baat ka khayal rakhe ki prtirodh vyakt karte hue bhasa ke star par thodai savdhani barte.

मनोज पटेल said...

बहुत बढ़िया चन्दन | बधाई आपको इस बोल्ड स्टैंड के लिए | अच्छी बहस की है आपने | नई पीढ़ी को मनुष्य विरोधी कहने वाले ज्ञानरंजन ने युवा लेखकों को पहल में न केवल छापा है, बल्कि प्रशंसात्मक टिप्पणियों के साथ छापा है | पहल'88 में खुद आपकी कहानी "मित्र की उदासी" के साथ आपका परिचय देने के बाद उन्होंने कहा है " (चन्दन पाण्डेय ने) कुछ ही कहानियों से अपना ध्यान आकर्षित किया |........ पहल, चन्दन पाण्डेय का अभिवादन करती है |" 'जंक्शन' के साथ पहल'90 में छपी अपनी टिप्पणी में तो वो यहाँ तक कह गए हैं की "चन्दन पाण्डेय की आगामी राह आसान नहीं है | प्यार करने वाली और झपट्टा मारने वाली ताकतों के बीच वे रच रहे हैं और लेखकीय समझदारी के साथ आगे बढ़ रहे हैं |" चन्दन, अपने साथियों की अपेक्षा आपके पास चुप लगा जाने के जादा कारण मौजूद थे लेकिन आपने उचित ही सत्य का पक्ष चुना है |

पता नहीं ज्ञानरंजन जी को ये मनुष्य विरोधी होने का इल्हाम अब जाकर कैसे हो गया | मेरे पास लखनऊ से प्रकाशित 21 दिसंबर, 2008 के राष्ट्रीय सहारा में छपा ज्ञानरंजन जी का एक साक्षात्कार है जिसमें समकालीन रचना परिदृश्य पर पूछे गए एक सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "ऐसा नहीं है की नए रचनाकार ठीक नहीं लिख रहे हैं | उनमें काफी नयापन भी है और एक नई समझ भी, लेकिन उनकी भूमिका और महत्व को रेखांकित करने वाला कोई नहीं है | यह उनका दुर्भाग्य है की उनकी रचनाशीलता को पहचानने वाला कोई आलोचक हिंदी में नहीं है | समकालीन परिदृश्य में जो संकट दिखाई देता है, वह रचनाशीलता का संकट नहीं, बल्कि आलोचना का संकट है |"

यह संकट अब बुजुर्ग लेखकों और VRS ले चुके संपादकों के माध्यम से भी प्रकट हो रहा है | आदरणीय ज्ञानरंजन जी अब आखिरी वक्त में मुस्लमान होने चले हैं इसलिए जादा प्याज खा रहे हैं |

Manoj Patel

niranjan dev sharma said...

Chandan Bhai, Aapki baat se sehmat hoon.Yani content se, structure se nahin.Pratikriya lazmi hai par uksau patrkarita ki bhasha ki jaghe yadi vivekpurn aur dhardaar aalochnatmak tippani hoti to adhik kargar hoti aur sahi arthon main vinamr nivedan bhi. 'sansanikhej'
sahitya ka dharam kaise ho sakta hai - Niranjan

krishna said...

hi,chandan ji.. aapke pahle ke sabhi post padhe hain maine , aur aap ekdam sateek likhte hain ..bahut bahut bahut bahut accha likhte hain aap.

जनविजय said...

मैं चन्दन की बातों से पूरी तरह सहमत हूँ कि बुजुर्ग पीढ़ी अब पढ़ती नहीं है और फ़तवे जारी करती रहती है। बिना पढ़े ही किसी भी विषय पर कुछ भी कह देना इनके बाएँ हाथ का खेल है। इस तरह की बातों का पूरा-पूरा विरोध होना ही चाहिए। इसके अलावा हिन्दी साहित्य में एक बारीक राजनीति भी चलती है । सिर्फ़ उन्हीं लोगों
को चमकाया जाता है जो आसपास रहते हैं और तथाकथित आलोचकों या बुजुर्गों
का झोला उठाकर चलते हैं। आपने कहानी की बात की है, लेकिन कविता में भी यही-सब चलता है । करीब दो वर्ष पहले मैंने एक कविता लिखी थी । यह कविता सम्पूर्ण हिन्दी जगत पर लागू होती है। कविता इस प्रकार है :

अच्छे कवियों को सब हिदी वाले नकारते
और बुरे कवियों के सौ-सौ गुण बघारते
ऐसा क्यों है, ये बताएँ ज़रा, भाई अनिल जी
अच्छे कवि क्यों नहीं कहलाते हैं सलिल जी

क्यों ले-दे कर छपने वाले कवि बने हैं
क्यों हरी घास को चरने वाले कवि बने हैं
परमानन्द और नवल सरीखे हिन्दी के लोचे
क्यों देश-विदेश में हिन्दी रचना की छवि बने हैं

क्यों शुक्ला, जोशी, लंठ सरीखे नागर, राठी
हिन्दी कविता पर बैठे हैं चढ़ा कर काठी
पूछ रहे अपने ई-पत्र में सुशील कुमार जी
कब बदलेगी हिन्दी कविता की यह परिपाटी

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

chandan se kuchh asahmatyan bhi hain.
pahla yh ki wh bhains wali upma thik nhi. yuwa lekhak bhains nhi hain, chandan hon to we apni janen
dusra yh ki nye lekhak manushyavirodhi nhi hain, iske ek-do udaharan bhi unhe dena chahiye, Nangatalaee ka gawn achchhi kitab hai, gyanranjan aur kashinath singh singh ne achchha likha hai, hm udayprakash kee bhainsen hain,--yh sb kah dene se nye likhak manushya pakshadhar nhi man liye jayenge.
nye lekhek bujurgon se kyon khisiya rhe hain, jb unhone khud hi apna chhod kisi auron ke padhne men maja nhi aata....jai ho!

डॉ .अनुराग said...

सिर्फ इतना जानता हूँ ....के सचिन की जब आलोचक कड़ी आलोचना करते है .....वे अगले दूसरे या तीसरे मेच में शतक लगा देते है .....ओर जम कर खेलते है ......यही एक तरीका है .......

Anonymous said...

ये सिर्फ दबाते नहीं हैं रचनाकारों को सुपारी लेकर ख़त्म कर देते हैं. इनका इतिहास रहा है. अब मौके हाथ में नहीं रहे तो यह बौखलाहट है.

Anonymous said...

dr anurag se sahamat hoon. lekin chandan ke sath to theek ulta ho raha hai. tehalka ke usee ank me ek behad hee ubaau apathaniya aur ghatiya kahanee chhapee hai inakee. ek bat aur, kaliyaji ki itanee chamachai kyon? chandan kya aap kaliya jee ne yuvaon ke sath jo dhokha kiya us par bhee kuchh kahenge? suna hai ki aap sanjiv se isliye khapha hain ki unhonne aapakee kahanee lauta dee? yakeen nahee hota ki sach ka pakshdhar ek kathakar aisa kar sakata hai. isliye aap hee se poochhata hoon, yah sach hai kya?

shivratn tekarival

Amarjeet said...

tekrival ji yu to loktantra me sbko bolne ka adhikar hai.. achha hai lutf uthaiye iska lekin sir ye batayenge ki kisi manch pr bolte hue hume kin bato kya dhyan rakhna chahiye..

Agar aap sachmuch me sahityik gatividhio si wakif hai to jaha se e khabar aapne payi hai ki sanjeev ne chandan ki kahani chhapne se mana kr diya tha ( isme kitni sachai hai, ye chandan hi bata sakte hai aur sanjeev bhi sayad)aur chandan isi liye unka virodh kr rahe hai.. to mahodya ye bhi to pata karte apne unhi vishwasniya sutro se ki chandan ne Gyanranjan ka virodh kyo kiya..

Agar Pahal ka wo ank aapne padha hoga jisme chandan ki kahani aayi thi to aap payenge ki Gyan ji ne unhe kaise visheshan se nawaja tha. to sahab is virodh ke pichhe ki kahani bayan krne me sharm aa rahi thi kya aapko ya isliye bacha le gaye kyoki aap ka palada kamjor pad jata..

mitra aap jaise log hi satya ki ladai ko kmjor krte hai.. itihaas utha ke dekh lijiye humesha aap jaise log maujud rahe hai.. jo kmjor hote hue bhi mauke pr pala badal lete hai.

aur kehna na hoga kathakaro ki nayi fauj me Chandan ki apni alag aur khas pehchan banayi hai. aur unhe nazar andaz krna Sanjeev ke bs ki baat nahi hai.. agar aapke is bahumulya khabar me jara bhi sachai hai to aapko ye pata krna chahiye ki chandan ki kahani lautane ke peechhe Sanjeev jaise dhakad sampadak ki kya mansa thi. waise mujhe andaja hai ki chandan bahut sare sampadako ka kahani dene ka pyara sa dawab jhelte honge aur Sanjeev ki to khair....
Hare Prakash ji, aap kahne se kya hota hai.. na sahi bhains, gaya (cow) to banana hi padega.. sir ye aapke bade-bujurgo ki ikchha hai.. nai peedhi ke log manushya-virodhi hai. is aashirvaad ko bhul na jaie.. waise aapse kuchh khas ki umeed thi.. chaliye hota hai kabhi kabhi..

Chandan ji aakhir me apko badhai.. ye daring sb me nahi hota hai.. ye cheeje aapko auro se alag karti hai..

Ravi bisaria said...

Kewal sahmati chhap rahi hai. Virodh wali pratikriyayein gayab hai. Yah achcha loktantra hai.

चन्दन said...

@ रवि, सारी प्रतिक्रियायें छप रही हैं.

Anonymous said...

CHANDAN AAP YAH KYA BAKVAS KAR RAHE HAIN. AAPAKE BLOG PAR IS TARAH KA CHOOTIYAPA ACHHA NAHEE LAG RAHA. BHAI, SANJEV NE KAUN SA KISI KA KHET HADAP LIYA HAI KI UNHE AAP CHALAK KAH RAHE HAIN. SANJEEV TO HINDI LEKHAKON KEE US DHARA KE PRATINIDHI HAIN JO CHALAKI JANATE HEE NAHEE. VARNA SANJEEV AAJ HANS KE NAUKARI NAHI KAR RAHE HOTE. UDAY PRAKASH KEE TARAH 'BEROJGARI' KA MAJA LE RAHE HOTE. LAGATA HAI AAP JAISE AATMMMUGDH LOG SIRPH APANEE YA APANE PAR CHHAPI CHEEZ HEE PARHTE HAIN. SAMBHAV HO TO ANYATHA KE ANK DEKHIYE, SANJEEV JEE NE KAISE SAMAKALEEN KAHANEE PAR SERIES LIKHI HAI. VAHAN UNHONE JIN LEKHAKON KA JIKRA KIYA HAI UNA ME SE KAI YUVA HAIN HO SAKATA HAI UN ME SE KAIYON KO AAP JANATE BHEE NAHON. TAHALKA KE IS MANCH NE UNHE KOI LEKH LIKHANE KE LIYE AAMANTRIT NAHEE KIYA THA. SANJEEV KO TO SHAYAD YAD BHEE NAHEE HO GA KI TAHALKA SE KAB KOI AAYA YA PHONE PAR HEE UNAKEE CHHOTEE SEE TIPPANI LE LEE. AAP SAMAJHDAR VYAKTI HAIN CHEEZON KO TATASTHA AUR VIVEKSAMMAT NAJARIYE SE DEKHIYE. SANJEEV, GYAN RANJAN AUR KASHINATH KE PASANG ME BHEE AANE KE LIYE AAPAKO AUR AAPAKEE PEERHEE KO DASHAKON LAGENGE. MAT BHOOLIYE KI SOORYA PAR THOOKANA ANATATH KHUD PAR HEE THOOKANA HOTA HAI.

SHARAD RANJAN DAS

रहिमन said...

चन्दन आपका यह लेख पढ़कर मुझे अशोक वाजपेयी का अज्ञेय पर लिखा वह लेख याद आया – बूढ़ा गिद्ध पंख क्यों फैलाये? आपके इस लेख से आपको कुछ तात्कालिक नुकसान जरूर होंगे पर यह ऐतिहासिक महत्व का आलेख बना है. इतने साहस और अपने आप को दाव पर लगा कर यह लेख लिखने के लिये साधुवाद!

Anonymous said...

ये तुम लोग क्या बकवास करते हो। कोई काम-धाम नहीं है क्या। लगता है कि तुम लोगों का पेट काफी भरा है इसलिए जुगाली करने में काफी मजा आ रहा है। जरा ये सोचो कि तुम लोग जिस आम आदमी और ये और वो, का दंद-फंद करते हो, उसका ढ़ेला भी भला होता है क्या। हिंदी कहानी और युवा की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पुरानी पीढ़ी की तरह सिर्फ लिख रही है, फ्रंट पर उसकी कहीं मौजूदगी नहीं है। तो तुम्हें और क्या कहा जाए। गल्प रच कर तुम लोगों ने ऐसा क्या नया कर दिया है, जो पुरानी पीढ़ी से अलग हो। -रविशंकर

amit said...

“आलोचना की भाषा की कोई मर्यादा होनी चाहिए”, इस पंक्ति को लिखने वाले चंदन पाँडे क्या अपना फ्रस्ट्रेशन लिखते हुए इस पंक्ति का मतलब नहीं समझते?
“बुजुर्गियत की अचूक और कुठाँव मार झेल रहे...”, ये लिख कर चंदन पाँडे क्या ये कहना चाहते हैं कि बुजुर्ग होना किसी प्रकार से हेय है या चंदन पाँडे ये कहकर उम्र बढ़ने का जो नकारात्मक भाव होता है, उसे गहराना चाहते हैं? दरअसल ये चंदन की खुद की चुकी अभिव्यक्ति है।
चंदन पाँडे के ‘नया’ में क्या नया है? हिंदी की अगर बात छोड़ ही दें तो अंग्रेजी के चर्चित-पुरस्कृत किंतु घटिया साहित्य से प्रेरित कहानी के समरूप कहा जाए या समतुल्य? विश्वनाथ जी ने गलत नहीं कहा कि सब एक जैसे रच रहे हैं, अपवाद होते हैं लेकिन चंदन पाँडे खुद कह रहे हैं कि वो अपवाद नहीं हैं। इसके अलावा चंदन के ही शब्दों में काले अक्षरों के बराबर वाली भैंसों के दुधारूपन की हकीकत को ग्वाले बेहतर समझते हैं।
मजेदार बात ये है कि चंदन पाँडे को अपनी श्रेणी खुद तय करनी, बतानी पड़ रही है। इससे भी ज्यादा मजेदार बात ये है कि एक ओर तो वह कहते हैं कि मैं उन कहानीकारों में से नहीं हूँ, जिनकी कहानियों में ‘ये, ये , ये’ है, फिर कहते हैं कि मेरी कहानियों में ‘ये, ये’ है, और ‘ये’ आएगा।
चंदन पाँडे ने ये कह कर, कि किसी की वजह से कोई कहानीकार स्थापित होता है भला, बढ़िया मजाक किया है। अब आखिर चंदन पाँडे भी तो स्थापित हुए न भला। और विज्ञापन गुरू को विज्ञापन विधि बताने की हिमाकत कौन कर सकता है भला!
अगर पहले लोगों के पास कहानी लिखने का समय रहता था तो अब क्या हो गया! वाकई मोबटरिंग (मोबाइल बटरिंग) बहुत समय खाऊ पद्धति है!
चंदन पाँडों को ‘नंगातलाई का गाँव’ और ‘काशी का अस्सी’ जैसा कुछ अलग शिल्प खोजने के लिए जीवन भर सिर पटक-पटक मरना होगा, आत्मदाह से क्षणमात्र में मुक्ति उनके भाग्य में नहीं है। ज्ञानरंजन ने अपने जीवन में जो किया, उस पर बोलने लायक अभी चंदन पाँडे का मुँह नहीं खुल पाया है, ये वैसे ही है जैसे कोई बच्चा बोलना सीखने से पहले ही आँय-बाँय बकने लगे।
चंदन पाँडे ने जो किसी योद्धा का शहीदाई अंदाज अपनाया है, उससे और कुछ हो न हो, ये तो जरूर है कि चंदन पाँडे अपने इन कृत्यों से कुछ दिनों के लिए चर्चा में आ जाएंगे। मैनेजमेंट की पढ़ाई का इस्तेमाल चंदन अपनी ब्रांडिंग में बढ़िया तरह से कर रहे हैं।
तहलका ने भी पता नहीं कैसे अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी छाप दिया।

Garima said...

चन्दन जी, सर्वप्रथम आपको नया कहानी के लिये बधाई. कर्ज की समस्या को सही अर्थों में नये तरीके से देखने की अच्छी कोशिश की है आपने.
यह बहस जब से शुरु हुई तब से मैं पढ़ रही हूँ. हिन्दी की छात्रा होने के नाते इसकी जानकारी है कि हर वरिष्ठ पीढ़ी नयों पर अन्यावश्यक आक्रमण करती है. पर तहलका में जिस भाषा का इस्तेमाल बुजुर्गों ने किया है वो अशोभनीय है और अपमानजनक है. थोड़ी तल्खी आपकी भाषा में भी है पर उसमें आपने किसी अपमानजनक शब्दावली का प्रयोग नही किया है. यही आपकी विशेषता है. जो लोग आपका विरोध कर रहे हैं वो तर्कपूर्ण बात नही कर रहे है. वो जिस तत्परता और तेजी से आपके खिलाफ बोलने आये हैं उसी तेजी से अगर मनुष्यविरोधी या विज्ञापनबाज आदि का विरोध किये होते तो इनकी बौखलाहट परिभाषित होती. इसका अर्थ यह भी है कि आपका जो विरोध कर रहा है वो कहीं ना कहीं पूरी युवा पीढ़ी को मनुष्यविरोधी कहे जाने से खुश है. इसलिये आपसे अनुरोध है कि आप मन लगाकर लिखते पढ़ते रहें.

गौरव सोलंकी said...

सब के जवाब देना खोखली दीवारों पर सिर मारने जैसा हो सकता है इसलिए मैं अमित से कहना चाहूंगा कि कोई भी रचना कितनी भी महान हो, उसका रचनाकार इंसानी खूबियों और कमियों वाला एक साधारण इंसान होता है. लेकिन यह आदत बना दी गई है कि काम से ज्यादा उस व्यक्ति की बात करो. नई कहानियों से ज्यादा नए कहानीकारों की और चन्दन के लेख से ज्यादा उसकी मैनेजमेंट की डिग्री की. काशी का अस्सी से ज्यादा महान काशीनाथ सिंह नहीं हो सकते और अभी मेरे ऊपर भी एकतरफा होने का आरोप लगेगा, इसलिए यह भी जोड़ दूं कि मेरी नजर में कर्मभूमि या गबन प्रेमचंद से और दिल्ली की दीवार या पॉल गोमरा का स्कूटर उदय प्रकाश से बड़े हैं. अगर कोई अमित आकर कहते हैं कि "ज्ञानरंजन ने अपने जीवन में जो किया, उस पर बोलने लायक अभी चंदन पाँडे का मुँह नहीं खुल पाया है" तो वे घोर निराशावादी व्यक्ति हैं और उसी परंपरा से आते हैं जो यह मानती है कि आने वाला कल बीते हुए कल या आज से खराब ही होगा. यही सोच उन वरिष्ठ लोगों की है जिन्होंने तय कर लिया है कि उनके स्वर्णिम युग के बाद अब सब बाजार से ही नियन्त्रित होगा. लेकिन कोई बताए तो कि वो बाजार है कहाँ? मैं बहुत सारे युवा लेखकों को जानता हूं जो अद्भुत प्रतिभावान हैं लेकिन उन्हें पैसे की जरूरत है. अगर उस बाजार का रास्ता कोई बताए तो वे कम से कम कुछ दिन ठीक से जी तो लें. जिस बाजार में हिन्दी या साहित्य की एक ढंग की किताब तक ढूंढ़ पाना बहुत मेहनत का काम है, उसके लिए कोई लिखना भी चाहे तो क्या कमा लेगा सर जी?

anurag said...

@ गौरव जी, आप भी किसका जबाव दे रहे हैं? अब ऐसे दिन आ गये कि अमित जैसों को भी गम्भीरता से लेना होगा. जैसी टिप्पणी इन्होने चन्दन पर की है उससे जाहिर होता है कि वे बुजुर्गों द्वारा की गई अपमानजनक टिप्पणियों से काफी खुश हैं. ये भी मानते होंगे कि अगर काशी ने विज्ञापनबाज और ज्ञान ने मनुष्यविरोधी कहा तो सही ही कहा. वैसे अमित नाम के शक्स की प्रोफाईल देखिये – इनके नाम का ब्लॉग है जो 2008 मे बना है यह दिखा रहा है और दो सालों से उस पर कोई पोस्ट छपी ही नही है. अब आप इस इंसान की गम्भीरता का जायजा ले सकते हैं. आप एक बात नोटिस कर लिजिये कि चन्दन जी के इस तर्कपूर्ण और साहसिक लेख के बाद उन लोगों में कितनी तेजी से हलचल हुई है जो यो तो नौकरिया कर रहे हैं, पर महाविद्यालयों या विश्वविद्यालयों की नौकरी चाहते हैं. वो यहाँ पर छद्म नाम से कमेंट करते होंगे और अपने बॉस लोगों को फोन कर कहते होंगे: सर, मैने चन्दन के खिलाफ बहुत कड़ी टिप्पणी कर दी है, अब तो मुझे नौकरी मिल जायेगी? चन्दन की कहानियाँ आने वाले समय का आईना हैं, इसे समझने में इन्हे काफी मेहनत करनी होगी.

@ चन्दन जी, आप इन मौकापरस्तों की बातों से ना घबराईये, इस लेख के बाद आपकी छवि हम सब के मन में कई गुना बढ़ गई है.

Anonymous said...

gaurav solanki ji ,aap log yeh sub kya likhte rehto ho. aaj ke samaaj ko dekhiye. kahani kya kahin bhi kisi bhi field me yuava ka arth kya hai. woh aisa kya naya kur raha hai. ye yuva yuva karke bahut suspicion create kur rahe ho aaplog. wahi rahul gandhi ka hauwaa jaisa. ye sahi hai ki tippani kathore kee gayi hai lekin hindi sahitya ka sabse kamjor hissa yahi hai ki woh jyadatur kisi bhi roop me resistance front pur nahi rahi.sahitya manoranjun bana rahega to uska koi mutlub nahi. baat kamane ki nahi commitment kee hai. management pudhkur social work to ho nahi rahi hoga bhai ji. bharat jaise desh me likhna kya sirf manoranjun kee dristi se kitna prabhavi hai.aap log to mujhse jyada padhe likhe ho.gaurav baboo aap hi socho. ravi shankar

Anonymous said...

रविशंकर, अब तुम्हारी नौकरी पक्की समझो, चन्दन के इस लेख ने तुम लोग का वो काम बना दिया जिसे तुम लोग पांच छ साल से चप्पल घिस घिस के बना पर ढेर बनारसी मत बनो. चन्दन मैनेजमेंट करके सोसलवर्क नही कर रहा है तो तुम कौन सा कर रहे हो? चन्दन की तो अभी कहानी भी छपी अगर वो अच्छा नही है तो तुम ही कुछ् महान लिख देते. आज जिस तरह उछल उछल के चन्दन को गाली दे रहे हो और पाठ पढ़ा रहे हो जरा उसी तरह उस तुम्हारे ही शब्दो मे “कुछ कठोर’ पर भी अपनी राय रख देते. पर वो तो तुम्हे नौकरी दिलाने वाले लोग है, कैसे करोगे? चन्दन एक इंसान है और कमी होगी कुछ ना कुछ, पर जो काम वो कर रहा है उसके बाद तुम जैसे नौकरी ढूढ़क उसके पासंग भी नही ठहरते.

अमित, चन्दन किसी पर बोलने लायक है या नही यह तो तय होना बाकी है पर तू तो चन्दन पर बोलने लायक नही ही है.

चन्दन, जब इन चापलूसों को जबाव देने की हिम्मत नही थी तो ऐसा शान्दार लिखने की जरूरत क्या थी? तुम्हे अपना पक्ष रखना चाहिये..

अशोक चौबे

addictionofcinema said...

चन्दन गुरु. बहुत हो गया. तुमने अपनी बात लिखी और सही समय पे लिखी जिसका कुछ युवा रचनाकारों ने जो तुमसे सहमत थे समर्थन किया, जो नहीं सहमत थे समर्थन नहीं किया. अब सूरज की इतनी शानदार कविता आ जाने के बाद भी यहीं पे कमेंट्स की संख्या बढ़ रही है वहां नहीं तो ये चिंताजनक बात है. तुम्हारा ब्लॉग पढने लिखने वाला गंभीर टाइप का ब्लॉग है, सूरज की कविता के बाद कुछ और अच्छा आना चाहिए, कायदे की बहस की जगह छीछालेदर होने लगी है. इस ब्लॉग को मोहल्ला मत बनाओ.

Bodhisatva said...

सही बात है विमल, चन्दन का ब्लॉग पढ़ कर खुशी मिलती है. मैं भी इस कमेंट्स की लाइन को नहीं बढ़ाना चाहता था मगर एक बात दुबारा कहने के लिए रुक गया.
Window 98 बहुत अच्छा operating system था मगर अब उसकी डिस्क सिर्फ चाय के कप रखने के काम आती है ताकि चादर पर दाग न लगे. बेकार में इसे वापस कंप्यूटर में डालने से कोई फायदा नहीं.
"Monument से प्यार है तो अच्छी बात है लेकिन उसमे घर बनाने लगेंगे तो उसका बेडा गर्क होगा और अपना बंटाधार !!!
सुखिया दास कबीर है, दुखिया सब संसार !!!"

Kashinath said...

किसी भी बात को पूरी तरह बिना जाने कूद पड़ना मूर्खता से अधिक लड़कपन का लक्षण है. ये लेख अगर किसी साहित्यिक पत्रिका में लिखे किसी लेखक के लेख का उत्तर होता तो अच्छा होता न की एक समाचार पत्रिका में फ़ोन करके लिए गए सवालों का जवाब पर ......चन्दन तुम अच्छे कहानीकार हो , बोलते समय भाषा का ध्यान रखना इसलिए ज़रूरी नहीं है की तुम किसी बुज़ुर्ग से मुखातिब हो बल्कि इसलिए की तुम रचनाकार हो
काशीनाथ सिंह

Anonymous said...

chandan,
aapke dwara likhaa kumbhakarna ki virodh patra humne padha.samalochana karne ka hak to har lekhak ka hai par alochana me shistata bhi hona aavashayak hai khas kar wo agar bujurgon ka ho,kyoki in bujurgo ki batay gaye path par chalkar hi aaj hum likhne ki yogya bane hai.aapke virodh patra me agar thodi vinamrata hoti to wo ruchikar hota,aap jayse gyani lekhak se yahi ummid hai.vimalendu se baat hui uske vichar bhi is khetra me yahi hai

Anonymous said...

wo lekhak hi kya jinki koi nayi rachna aane par purana lupt ho jaye,pathak jab lekhak ki koi bhi rachna prathambaar padhta ho to wo uske liye nayi hi hoti hai aur ak baar hi kyu kai baar padhke bivinna dristikon se uski alochnaye hoti hai,tabhi to RABINDRANAATH TEGOR ki rachnao par aaj bhi alochna hoti hai ise agar hum chhichhla kahen to hum khud bhi bahut gahere paani ke nahi rahe jayenge raha sawal bahas ki hum kisise bahas nahi kar rahe hai hum aapke paathak hai aur aapke lekh par apna vaktabya aap ko presit kar rahe hai.aapki is rachna ko padhne me mujhe der ho gai islie mujhe kshama kare