Thursday, January 13, 2011

रवीन्द्र आरोही की कहानी : प्रश्न 1 (घ) - नीचे दिये गये चित्र को ध्यान से देखो और एक कहानी लिखो.

( रवीन्द्र आरोही युवा कहानीकार हैं. जर जमा चार कहानियाँ प्रकाशित पर उससे जो इनकी पहचान सामने आती है उसे अगर भविष्य में प्रक्षेपित करते हुए कहें तो रवीन्द्र की मशहूरी भाषा के "सार्थक" प्रयोग और अपने तेज तर्रार विट के लिये होने वाली है.. ...यह कहानी अपने डिटेल्स के कारण खास बन पड़ी है.. ..) 

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प्रश्न (1) घ : नीचे दिए चित्र को ध्यान से देखो और एक कहानी लिखो।


उत्तर - जंगल-जंगल बात चली है पता चला है वाले दिन थे. हैलीकॅाप्टर आकाश में बहुत नीचे तक उड़ते थे. हमारे पास एक जोड़ी पंख थे. पंख ऐसे कि जैसे पंख होते हैं. सचमुच के पंख की तरह झूठमूठ के पंख और अक्सर घर से भाग जाने का मन करता था. इतनी खुशियाँ, इतनी तरह की कि मारे खुशियों के कभी-कभी मर जाने का मन करता. रोना हमें उस तरह याद नहीं था जैसे जरूरी चीजें याद रहतीं. जरूरी में भी कुछ इतनी जरूरी कि शाश्वत होतीं मसलन सूरज जरूरी में शाश्वत था और हमें उसकी याद नही आती थी. मां का चेहरा इतना जरूरी की शाश्वत. आँखे बंद कर हम सचिन का चेहरा खींच लेते पर मां का चेहरा नहीं हो पाता.मुंदी आँखों में छीमी छुड़ाती़, कपड़े सूखाती़, टिफिन माजती मां दिखती पर खाली अकेली मां, मां की तरह खाली अकेली कभी नही दिखती.

हमारी जिन्दगी में स्कूल इस तरह मौजूद था कि वह अलग से याद नहीं था. कहानियां इतनी कि हर कहानी में हम थे. कहानियां अलग से न हम भूल पाते न याद रह पातीं. तमाम उलझनें, परेशानियों और व्यस्तताओं में भी हर दिन इतवार टाइप दिन थे जो सरपट भागती रेलगाड़ी की तरह सीटी बजाते हुये अचानक ही बीत जाते.

जिस तरह क्रिकेट एक खेल है़, केविन पीटरसन एक खिलाड़ी है़, साइटिका एक रोग है ठीक उसी तर्ज पर कानपुर एक शहर है - जहां कभी महामारी नहीं फैली - शहर से बाहर अनारबाग नामक एक कस्बा है. अनारबाग नामक कस्बे मे अनारबाग मिडिल स्कूल नामक एक स्कूल है जहां मै और नितिन पाँचवी कक्षा में साथ-साथ पढ़ते थे. कक्षा पांच तक आसमानी शर्ट और छाई रंग का पैंट पहना जाता लडकियां आसमानी फ्रॉक पहनती. छह से आठ तक सादी कमीज और हरे रंग का पैण्ट थी. नितिन की दीदी भूली सादी समीज और हरे रंग की सलवार में कक्षा सात में पढ़ती.

भूली का एक पैर छोटा था दूसरा जितना होना होना चाहिए उतना ही था. पहला पैर बायाँ पैर था. बायें पैर की चप्पल मोटी थी. दाहिने की जितनी होनी चाहिये उतनी ही थी. बायें पैर की चप्पल में अलग से चमड़े का मोटा सोल ठुका हुआ था कि दोनो पैर बराबर लगे. जब वह चलती थी तो बायीं तरफ थोड़ी झुकती थी. उसके बायें पैर की पायल के घुंघरू दाहिने पैर की पायल के घूघरू के अनुपात में ज्यादा जोर से बजते थे. उसे चलते देख कर लगता था कि बायीं तरफ अभी मुड़ जायेगी. उसे दाहिने भी मुड़ना होता तो बाईं तरफ झुक कर मुड़ती. अगर दाहिना पैर छोटा होता तो सड़क पर चलते वक्त गाड़ी वालों को लगता कि सामने जा रही लड़की अब दाहिने तरफ मुड़ने वाली है और गाड़ी वाले अपनी गाड़ी धीमी कर लेते. उसकी लिखावट कर्सिव होती थी.हर अक्षर बाई ओर झुके होते थे. परीक्षा की कॉपी जाँचते घड़ी सुधीर मास्टर अक्सर अपनी कलम धीमी कर लेते.

नितिन मेरा दोस्त था और हम कक्षा पाँच में पढ़ते थे. हमारे और भी दोस्त थे मतलब हम कुल पांच दोस्त थे पर नितिन हम सब में खास था क्योंकि वह बहुत तेज दौड़ता था और उसे बहुत सपने आते थे. हममें से किसी का भी नितिन से झगड़ा होता तो आगे आकर सुलह हमें ही करनी पड़ती थी. माफी हमें ही माँगनी होती. सॉरी हम ही बोलते. हम में से कोई भी नितिन को खोना नहीं चाहता था. स्कूल में आकर वह हमें पिछली रात के सपने सुनाता और हम खेलना-कूदना छोड़कर टिफीन की पूरी घण्टी भर सपने सुनते और कभी-कभी क्लास में भी. छु़ट्टी के वक्त तो हम उससे सपने सुनते-सुनते ही घर वापस आते. तब के दिनों में हमें सपने नहीं आते थे और हमे सपने के प्रति बहुत लालसा थी.

उसी ने हमें बताया कि उसके पास एक जोड़ा पंख है जिसे वह तकिए में छुपा कर रखता है और रात को पंख लगाकर वह कहीं भी उड़ सकता है. पंख वाली बात उसके घर में तक किसी को पता नहीं थी. भूली को भी नहीं जो रात में उसके पास सोती थी. छु़ट्टी के वक्त कभी रास्ते में भूली मिल जाती तो हम सब से कहती कि नितिन तुम सबको सपने सुना रहा है न, इसकी बात मत सुनो यह झूठ बोलता है. इसे सपने नहीं आते हैं. सब बना-बना कर बोलता है. इस पर नितिन चिढ़ जाता और भूली को लंगड़ी बोलता और कहता कि मैंने सपना देखा है कि तेरा पैर कभी ठीक नहीं होगा और तू मर जाएगी. भूली रोने लगती. हमें बुरा लगता पर हम सब उसे कुछ बोल नहीं पाते. भूली लंगडाते-लंगडाते रोती और नितिन को मारने के लिए दौड़ती.

नितिन भाग जाता. हम सब उसके पीछे भागते. भूली जब दौड़ती तब अपनी बाईं हथेली से बायें घुटने को जोर से पकड़ लेती और रोते-रोते दौड़ती. उसकी गर्दन की सारी नसें तन जातीं और नीचला होंठ दाहिनी तरफ लटक आता और चेहरा ईंट-सा झंवा जाता और वह एक लम्बे अपाहिज कराह के साथ सड़क की बाईं ओर ठस से बैठ जाती. सारी लड़कियाँ उसे घेर लेतीं. सड़क से जाते हुए साइकिल, मोटर-साइकिल वाले रूक-रूक कर पूछते -क्या हुआ हैं और चले जाते. फिर भूली उठ कर धीरे-धीरे घर तक आती. नितिन मार खाने की डर से देर शाम घर लौटता.

नितिन को फिर कभी अपने पर पछतावा होता तब वह धीरे से कहता कि भूली के मरने वाली बात मैने झूठ कही थी और यह भी कि उसका पैर जब वह बड़ी हो जाएगी तब ठीक हो जाएगा.

फिर नितिन अगले दिन स्कूल देर से आता.और उसे आता देख हम सब खुश हो जाते. धीरे-धीरे पूरा स्कूल जान गया था कि नितिन को सपने आते हैं और वह सबको सुनाता है. वह पूरे स्कूल में हीरो बन गया था.जब वह देर से स्कूल आता तो पूरा स्कूल समझ जाता कि नितिन ने रात को जरूर कोई बड़ा सपना देखा होगा. और देखते-देखते देर हो गई होगी. इसीलिए आज देर से स्कूल आया.

उस दिन शहर में कोई हलचल नहीं थी. शहर दूब की तरह शान्त था और सुबह की धूप में शुरूआती जाड़े की बची हुई गरमी थी. क्लास रूम के बाहर कदम्ब के पेड़ के नीचे खुले में हमारी पांचवी की क्लास लगती थी. खुले मैदान में पेड़ के नीचे क्लास लगने पर भी - मे आई कम इन सर- बोलना होता था. कोई भी, जो देर से आता, कदम्ब की छाँव के बाहर खड़ा होकर - मे आई कम इन सर बोलता. नितिन देर से और पीछे से आया था. पीछे पूरब था. सूरज की छाँव हमारी पीठ पर पड़ती थी.सूरज की छाँव इसका धूप थी.हमारी पीठ खुले मैदान के क्लास रूम में पूरब की दीवार थी. हम सब दीवार से पीठ टीका कर बैठते थे और मास्टरजी को पता भी नहीं चलता था.

नितिन ने लगभग हमसे सट कर खड़ा हो कर पूछा - मे आई कम इन सर ? यह पूछना पूछने की तरह नहीं था, बोलने की तरह था.मास्टरजी ने बोलने की तरह कहा - बैठ जाओ. वह हमारे पीछे बैठ गया. वह लगभग क्लास के बाहर बैठा था. मास्टरजी ने फिर कहा -अन्दर बैठो. सभी लड़के थोड़ा-थोड़ा आगे सरक गये. नितिन अन्दर आ गया. पेड़ की छाँव के बाहर बैठने पर क्लास रूम के बाहर बैठना होता था. बाहर बैठने पर वह कभी भी भाग सकता था या वहीं बैठे-बैठे वह कुछ खेल भी सकता था या अन्दर के लड़को को बाहर से हाथ बढ़ाकर मार भी सकता था. बाहर से बाहर जाने पर - मे आई गो आउट सर - बोलना पड़ता था. आगे सरकते-सरकते जब सूरज की पूरी छांव खत्म हो जाती तब शाम के चार बज गये होते थे. क्लास रूम अन्धेरे में बंद हो जाता था और हमारी छुट्टी हो जाती.

वर्ष चौरासी के इकतीस अक्टूबर का वह बुधवार था. दुनिया के कैलेण्डर में यह दिन इसलिए खास नहीं था कि वह हमारी छमाही परीक्षा का पहला दिन था और पहली परीक्षा हिन्दी की थी. खास इसलिए था कि नितिन उस दिन भी देर से आया और मास्टरजी के पूछने पर उसने बताया, रात वह लम्बा और बड़ा सपना देखता रहा सो सुबह देर से उठा. सपने में उसने आकाश में चील, कौवों -से मंड़राते हजारों हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर देखे. पूरे देश में हजारों लाखों लोगों को मरते-भागते चीखते-चीत्कारते देखा. जगह-जगह गाड़ी और घर फूंकते आदमियों को देखा और कुछ देर बाद लम्बी बेहोशी में अपने शहर को देखा - मास्टरजी ने बीच में रोक कर कहा कि उस लम्बी बेहोशी को कोमा कहते हैं और यह बेहोशी तुम शहर के लिए कह रहे हो तो उसे कर्फ्यू कहो .

 फिर नितिन ने कहना शुरू किया - और आगे देखा कि मास्टरजी, आप कदम्ब के पेड़ के नीचे खड़ा होकर कह रहे हैं कि सब बच्चा लोग घर भाग जाओ, आज परीक्षा नहीं होगी. दो-तीन दिन बाद होगी.और तुम सब घर जाकर घर में बंद हो जाना, बाहर मत निकलना, नमस्ते! आपके मुंह से निकला नमस्ते, उस दिन का आखरी शब्द था. जैसे अपनी किताब के चौथे पाठ -हमारे बापू- में गांधी ने ‘हे राम’ कहा था.

परती आकाश - सा वह खुला दिन था और हम भागते हुए घर चले आये थे. भूली भी भागते-भागते आई थी. हमारा स्कूल पांच दिन तक बंद रहा. परीक्षा से ही हमारे स्कूल की शुरूआत हुई और वह हिन्दी की परीक्षा थी. छमाही परीक्षा में पास-फेल का कोई डर नही था फिर भी परीक्षा नजदीक आते ही नितिन हम सब से घर से भाग जाने की बात कहता था. पैदल कलकत्ता भागने की बात अक्सर कहता.नितिन, यदि भूली होता तो पैदल कलकत्ता भागने की बात नही कहता, सिर्फ स्कूल से पैदल घर आने भर तक की बात कहता.नितिन छोटे-छोटे अलग तरह का बाल कटवाता. हम सब चुपके- चुपके उसके बाल की नकल करते.मेरे घुंघराले बाल थे और वह कहता कि घुंघराले बाल वाले लोग रेलगाड़ी से कट कर मर जाते है. उसके पिता के भी बाल घुंघराले थे और वह उसी तरह मरे थे.नितिन के बाल घुंघराले नहीं, छोटे-छोटे झाड़ीनुमा बाल थे. छोटे-छोटे झाड़ीनुमा बालों के नीचे एक छोटी खोपड़ी थी जिसे भूली कहती – शैतान की खोपड़ी - छोटी खोपड़ी के भीतर छोटे से दिमाग में पैदल कलकत्ता भाग जाने वाली बात स्थायी रूप से विद्यमान रहती थी.

परीक्षा में हिन्दी के प्रश्न-पत्र का अंतिम प्रश्न - चित्र देख कर कहानी लिखो वाला होता. अक्सर वह चित्र उलझा-उलझा होता था. हम अक्सर इस प्रश्न से बचते और सोचते कि यदि प्रश्न में कहानी लिखी हुई होती और उस पर चित्र बनाने को कहा जाता तो कितना अच्छा होता. हम अपने पेंसिल बॉक्स के रंगों से एक चित्र बनाते. एक रंगीन चित्र. रंगीन कहानी के रंगीन चित्र. और किसी से भी कह सकते कि कहानी गोल होती है और रंगीन भी. हमारे पेंसिल बॉक्स में जितने रंग होते कहानियां उतने रंगो की होतीं, पर ऐसा नहीं था, हमारे सामने सिर्फ उलझी हुई ब्लैक एण्ड व्हाइट एक भद्दी-सी तस्वीर होती और चित्र में कहीं भी विद्यालय होता तो हम विद्यालय पर लेख लिख देते. कहीं कोने में खड़ी गाय होती तो लिख देते- गाय दूध देती है.

नितिन के साथ ऐसा नही था. वह ये प्रश्न बड़ी आसानी से कर लेता और वह दूसरे प्रश्नों के उत्तर याद करने से बच जाता. वह चित्र को देखता और उत्तर में उससे मिलता-जुलता कोई पुराना देखा हुआ सपना वहाँ टाँक देता. चित्र वाले प्रश्न में उसे सबसे ज्यादा नम्बर मिलते. जैसे, इस बार की परीक्षा में लिखा कि सड़क किनारे एक स्कूल था. स्कूल में छमाही परीक्षा हो चुकी थी सिर्फ पाक कला की परीक्षा बाकी थी. वह शनिवार का दिन था. स्कूल के सभी लड़के-लड़कियां और मास्टर खुश थे. स्कूल के बाहर डेक में पग घुंघरू बाँध मीरा नाची थी वाला गाना बज रहा था. चारो तरफ शोरगुल हो हल्ला. लड़के बाजार से दौड़-दौड़ कर सामान लाते. लड़कियां दूसरी कक्षा के क्लास रूम में मिट्टी के चुल्हे पर खीर-पूड़ी-आलू की सब्जी बना रही थीं. पूरा स्कूल खीर की तरह मीठा-मीठा महक रहा था. मास्टर लोग आकर लड़कियों को समझा जाते, बता जाते. कोई लड़की किसी को खीर चखाती, कोई किसी को तरकारी चखाती.

हेडमास्टर को एक लड़की खीर चखाने ले गई. हेडमास्टर ने खीर खाकर पानी लाने को कहा.लड़की पानी ले कर आई.लड़की ने पूछा –सर, खीर कैसी लगी? हेडमास्टर ने पानी पीकर लड़की के सर पे हाथ रख कर कहा, बहुत अच्छी बनी है.तुम बनाई? लड़की ने कहा, हम सबने मिल कर बनाई. हेडमास्टर ने लड़की को और करीब लाकर उसके गालो को सहलाते रहे और उसके परिवार का हाल-चाल पुछते रहे. फिर हेडमास्टर ने दरवाजा बंद कर लड़की को अपनी गोद में बिठा लिया. लड़की ने कहा, हमें जाना है.हेडमास्टर ने कहा और क्या-क्या बना लेती हो?

लड़की ने कहा- खिचड़ी, हमें जाने दो.

और?

चोखा - हमें जाने दो.

चटनी - हमें जाने दो.

भाजी - हमें जाने दो.

चाय - हमें जाने दो.

सब्जी - हमें जाने दो.

घर बुहारती हूं - हमें जाने दो.

घर लिपती हूं - हमें जाने दो.

भात बनाती हूं - हमें जाने दो.

सिलाई करती हूं - हमें जाने दो.

खून! हमें जाने दो.

और चारों तरफ की शोरगुल के बीच उस बंद कोठरी में बेहोशी के पहले की दम तोड़ती एक लम्बी अपाहिज कराह कि आ बाप हमें जाने दो. देखते-देखते स्कूल के बाहर बहुत लोग जमा हो जाते हैं.हेडमास्टर रेल हो जाता है. पास के सदर अस्पताल में लड़की दम तोड़ देती.

सुबह स्कूल बंद रहता.कई दिनो तक बंद रहता.स्कूल के बाहर चारों तरफ पूड़ी सब्जी, खीर बिखरी होती.कुत्ते इधर-उधर घुमते रहते.सूंघ कर छोड़ देते.पूरा स्कूल श्राद्ध-सा महकता रह जाता.

नितिन की यह कहानी इतनी चर्चित हुई की अगले दिन के अखबार में हू-ब-हू ऐसी ही छपी. परीक्षा के पन्द्रह दिन बाद हमारा स्कूल खुला.नितिन उस दिन नहीं आया. दूसरे-तीसरे किसी भी दिन नितिन वापस स्कूल नहीं आया. हम हर रोज उसका इन्तजार करते रहे. हम हर रोज उसके घर जाते. अलकतरे से पुती किवाड़ एक पुराने ताले से हमेशा बंद रहती. मां कहती, नितिन अपने माँ के साथ मामा के घर गया. मामा के घर नितिन अक्सर गरमी की छुट्टियों में जाता पर इस बार ऐसा नहीं था. पूरे जाड़े के बाद एक पूरी गरमी आई, नितिन नहीं आया.

और देखते-देखते वार्षिक परीक्षा आ जाती है. जिस तरह घर के पते में सिनेमा हॉल, मंदिर और नीम या बरगद का पेड़ शामिल थे. ठीक वैसे ही आम के मौसम में परीक्षा का मौसम शामिल था. परीक्षा के दिनों में पूरा स्कूल कलकतिया आम-सा गमक उठता. तब वार्षिक परीक्षा के पेपर लाल और पीले थे.और फिर प्रश्न 1 का घ चित्र देखो और कहानी लिखो.तब हम नितिन को बहुत याद करते.

चित्र में एक नारियल का पेड़ था.बहुत दूर एक अपरिचित-सा पेड़ होता, बहुत दूर तक फैले खेत और खेतों के बीच एक चुराये गए समय-सी शांत पगडंडी और उस पर भागते हुए हम बडे़ हो जाते.उस आदमी-सा जो उस प्रष्न पत्र के चित्र में होता.

वह आदमी, चित्र वाला आदमी, जिसके बाल छोटे-छोटे झाड़ीनुमा होतेए थोड़ा-थोड़ा नितिन की तरह लगता.चित्र वाला आदमी हाथ में सुटकेस लिए चित्र में कहीं जाता हुआ दिखता. चित्र में आदमी की बाईं तरफ हरसिंगार का एक छोटा पेड़ होता. हरसिंगार के छोटे-से पेड़ पर एक छोटी गौरैया चहकती हुई बैठी दिखती. चहकती हुई गौरैया के खुले चोंच के सामने एक बड़ा खुला नीला आकाश दिखता. चहकती गौरैया के चित्र में चहकना चित्र नहीं होता.

चित्र वाला आदमी थोडा़ दुखी-दुखी, संतुष्ट और सुलझा हुआ लगता. उसकी पूरी जिन्दगी में आने वाले पेंच सुलझे हुए लगते. उस चित्र वाले दुखी-दुखी, संतुष्ट और सुलझे हुए आदमी के सामने चील, गौरैया और तितली तीन जीव रख दिए जाते या तीनों के सिर्फ नाम बतलाकर पूछे जाते या तीनों के चित्र बनाकर पूछे जाते कि बतलाओ, इन तीनों के पंख के बारे में तुम क्या सोचते हो? तब वह पिछले किसी सपने से उसका उत्तर ढूढ़ कर लाता और कहता कि चिल का पंख उसकी ताकत है जिसका इस्तेमाल वह सिर्फ शिकार के लिए करती है. गौरैया का पंख विशुद्ध उड़ने के लिए है. वह इसका उपयोग सिर्फ उड़ने के लिए करती है. उसका पंख उसका जीवन है क्योंकि वह एक चिड़िया है.

और चील?

वह एक शिकारी है.

तितली का पंख एक फरेब है. जो न शिकार के लिए है न उड़ने के लिए. उसका पंख उसकी सुन्दरता है जैसे लड़कियों की नेलपॉलिश होती है. तितली की पंख कोई खुशी है. दो उंगलियो से उसके पंख को पकड़ लो खुशी के बर्क उंगलियों में आ जाते और उन्हे गुस्सा तक नही आता.

इस तरह चित्र में आदमी के सामने रूकी हुई बस का चित्र होता. वह चित्र वाली बस तब कहीं नहीं जाती जब तक चित्र वाला आदमी उसमें चढ़ नहीं जाता.फिर बस कलकत्ता चली जाती.

पीछे छूटे रह गये हरसिंगार के पेड़ से एक गौरैया गाती हुई छुटी रह जाती कि सब के पंख जरूरी होते.



और कहानी खत्म हो जाती.

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लेखक से सम्पर्क : 09681197617 ; arohi.nirmal@gmail.com 

3 comments:

नीरज बसलियाल said...

कहानी के अन्दर कहानी, उसके अन्दर कहानी ...
अच्छी लगी ये कहानी

durgesh said...

रविंद्र आरोही की कहानी पढी...मेरे लिये सब बिलकुल नया था...मुंबई की ये प्रदूषित शाम उतनी सर्द तो नही है..पर मै कांप रहा हू....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

हम बी कोशिश करेंगे!
लोहड़ी और उत्तरायणी की सभी को शुभकामनाएँ!