Saturday, January 8, 2011

गौरव सोलंकी की कहानी : कद्दूकस

( आज राजस्थान पत्रिका के बंगलौर संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर ही एक नाम दिखा/चमका. लगा कि दिल्ली में ही हूँ क्या? वह नाम, कथालेखन की दुनिया में दूज के चाँद की तरह बढ़ रहे गौरव सोलंकी का था और सूचना इस युवा साथी के आज ही के दिन पुरस्कृत होने की थी. ( राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक सम्मान, कथा के लिये, द्वितीय पुरस्कार ).. यहाँ प्रस्तुत रचना ही पुरस्कृत की गई है. गौरव तथा अन्य पुरस्कृत साथियों को बधाई.. )      
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कद्दूकस


कद्दूकस मुझे बहुत प्यारा लगता था. उसे देखकर हमेशा लगता था, जैसे अभी चलने लगेगा. बहुत बाद में मैंने जाना कि कुछ चीजों के होने का आपको उम्र भर इंतज़ार करना पड़ता है. उस से पहले मैंने रसोई में कई काँच के गिलास तोड़े, बोलना और छिपकर रोना सीखा.

मेरी माँ शहर की सबसे सुन्दर औरत थी और हम सब यह बात जानते थे. मैं भी, जो बारह साल का था और चाचा भी, जो बत्तीस साल के थे. ऐसा जान लेने के बाद एक स्थायी अपराधबोध सा हमारे भीतर बस जाता था. हम सब आपस में घर-परिवार की बहुत सारी बातें करते और उस से बाहर निकल आने की कोशिश करते लेकिन आखिर में हम सो या रो ही रहे होते. मैं अकेला था और मेरे भाई बहन नहीं थे. वे होते तो हम सब एक साथ अकेले होते. हमारा घर ही ऐसा था. बाद में मैंने अख़बारों में वास्तुशास्त्र के बारे में पढ़ा तो पता चला कि सदर दरवाज़ा दक्षिण की ओर नहीं होना चाहिए था और रसोई के पूर्वी कोने में जो लोहे की टंकी रखी थी, जिसमें माँ आटा और मैं अपनी कॉमिक्स रखता था, उसे घर में कहीं नहीं होना चाहिए था.

मैं आठवें बरस में था, जब मैंने आत्महत्या की पहली कोशिश की. मैं रसोई में चाकू अपनी गर्दन पर लगाकर खड़ा था और आँगन से मुझे देखकर माँ दौड़ी चली आ रही थी. वह मेरे सामने आकर रुक गई और प्यार से मुझे उसे फेंक देने को कहने लगी. मेरा चेहरा तना हुआ था और मैं अपना गला काट ही लेना चाहता था कि न जाने आसमान में मुझे कौनसा रंग दिखा या माँ की बिल्लौरी आँखें ही मुझे सम्मोहित कर गईं, मैंने चाकू फेंक दिया. फिर माँ ने मुझे बहुत प्यार किया और बहुत मारा. मगर उसने मुझसे ऐसा करने की वज़ह नहीं पूछी. उसे लगा होगा कि कोई वज़ह नहीं है.

मेरी माँ बहुत सुन्दर थी और वह नाराज़ भी हो जाती थी तो भी उससे ज़्यादा दिनों तक गुस्सा नहीं रहा जा सकता था. उसके शरीर की घी जैसी खुशबू हमारे पूरे घर में तैरती रहती थी और आख़िर पूरे शहर की तरह हम भी उसमें डूब जाते थे.

पूरा शहर, जिसके मेयर से लेकर रिक्शे वाले तक उसके दीवाने थे. वह नाचती थी तो घर टूट जाते थे, पत्नियां अपने पतियों से रूठकर रोने लगती थीं, स्कूलों के सबसे होनहार बच्चे आधी छुट्टी में घर भाग आते थे, बाज़ार बन्द हो जाते थे और कभी कभी दंगे भी हो जाते थे.

यह 2002 की बात है. फ़रीदा ऑडिटोरियम में माँ का डांस शो था. उसमें तीन हज़ार लोग बैठ सकते थे और एक हफ़्ते पहले से ही टिकटें ब्लैक में बिकने लगी थीं. इसी का फ़ायदा उठाकर महेश प्रजापति और निर्मल शर्मा नाम के दो आदमियों ने ब्लैक में फ़र्ज़ी टिकटें भी बेचनी शुरु कर दीं. वे पचास रुपए वाली एक टिकट दो सौ रुपए में बेच रहे थे और इस तरह उन्होंने पाँच सौ नकली टिकटें बेच डालीं.

शो रात दस बजे था. आठ बजते बजते सब लोग ऑडिटोरियम के बाहर जुटने लगे. नौ बजे से एंट्री शुरु हुई. साढ़े नौ बजते बजते तीन हज़ार लोग अन्दर थे और पाँच सौ नाराज़ लोग बाहर. उनमें बूढ़े भी थे, औरतें भी और बच्चे भी. उन्हें आयोजकों ने अन्दर घुसने नहीं दिया, जबकि वे दावा करते रहे कि उन्होंने दो-दो सौ रुपए देकर टिकटें खरीदी हैं.

यह उनमें से अधिकांश की एक दिन की आमदनी थी और मिस माधुरी का शो नहीं होता, तो वे इससे चार दिन का खर्चा चला सकते थे. वे परिवार वाले थे और उन्हें अब अपने बच्चों और पत्नियों के आगे बेइज्जत होना पड़ रहा था. उन्हें न ही महेश प्रजापति दिखाई दे रहा था और न ही निर्मल शर्मा. सिपाही अब उन्हें धकेलकर परिसर से बाहर निकालने लगे थे. वे कह रहे थे कि उनकी बात सुनी जाए. उनकी बात नहीं सुनी गई. तभी भीड़ में से एक ग्यारह बारह साल के लड़के ने यूं ही चिल्लाकर कहा कि निर्मल शर्मा और महेश प्रजापति स्टेशन पर गए हैं और बाराखंभा एक्सप्रेस से दिल्ली भाग जाने वाले हैं.

पाँच सात मिनट में ही पाँच सौ लोग यह बात जान गए और वे तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ गए. जबकि उनमें से अधिकांश को नहीं पता था कि बाराखंभा एक्सप्रेस कहाँ से आती है और कहाँ को जाती है और उसका वक्त क्या है. वे सब दस बजे तक स्टेशन पहुँचे. वहाँ उन्हें पता लगा कि बाराखंभा एक्सप्रेस के आने का सही वक्त साढ़े चार बजे है, मगर वह सुबह सात बजे तक आएगी. वह अँधेरी रात थी और स्टेशन मास्टर ने अपने जीवन में पहली बार इतने लोग एक साथ देखे थे. उसे लगा कि ये सब लोग कहीं जाना चाहते हैं और वह ख़ुशी के मारे टिकट खिड़की खोलकर बैठ गया. यह जानकर कि ट्रेन सुबह आएगी, भीड़ आधे घंटे में वापस लौट गई.

जाने से पहले उन्होंने सुबह सात बजे से पहले स्टेशन आने का संकल्प लिया और आठ दस लोगों को रात भर वहीं निगरानी के लिए छोड़ दिया. यह बहुत बड़ी बात भी नहीं थी कि दो सौ रुपए पानी में चले गए थे मगर वह तारीख ही ऐसी थी कि बात बड़ी होती जा रही थी. बाद में जब मैंने पागलों की तरह वास्तुशास्त्र पढ़ा तो जाना कि फ़रीदा ऑडिटोरियम और स्टेशन, दोनों के दरवाज़े उनसे ठीक विपरीत दिशाओं में थे, जिनमें उन्हें होना चाहिए था. साथ ही माँ ने उस दिन लाल रंग की स्कर्ट पहनी थी और वह जब शो में आई थी तो उसने पहले बायां पैर स्टेज पर रखा था.

लाल रंग ख़ून का रंग था और यह हम सब भूल गए थे.

वहाँ जो लोग रुके, संयोगवश आरिफ़, इंतख़ाब आलम, नासिर, जब्बार, सुहैल, सरफ़राज़ के पिता, नवाब अली, शौकत और उसका चार साल का बेटा थे. उन्होंने चने खरीदकर खाए और रात में दो दो बार चाय पी. सुबह पौने आठ बजे ट्रेन आई तो नासिर और शौकत को छोड़कर सब बैठे बैठे सो गए थे. रात वाले दस बीस लोग और आ जुटे थे. कुछ बच्चे भी अपने पिताओं के साथ तमाशा देखने आए थे. ज़्यादातर लोग मिस माधुरी का शो भूल चुके थे और बस निर्मल शर्मा और महेश प्रजापति को मार पीटकर घर लौट जाना चाहते थे. शौकत को उसी दिन अपनी ससुराल से अपनी बीवी को लाना था और अब वह जल्दी पीछा छुड़ाकर घर लौट जाना चाहता था. वह जब पानी पीने के लिए प्याऊ की ओर गया तो जब्बार की बहन सबीना उसे देखकर मुस्कुराई. वह किसी दूसरी ट्रेन से बनारस जा रही थी और सुबह से स्टेशन पर खड़ी थी.

जवाब में शौकत भी मुस्कुराया. फिर वह बिना कुछ बोले प्याऊ की टोंटी से मुँह लगाकर पानी पीने लगा. तभी मोहनीश अग्रवाल नाम के एक लड़के ने, जो ट्रेन से उतरकर चाय पी रहा था और जिसने नारंगी साफा बाँध रखा था, समझा कि सबीना उसे देखकर मुस्कुराई है. वह सबीना के पास आकर खड़ा हो गया और बोलने लगा कि नम्बर दे दो और आई लव यू. सबीना घबरा गई और उसने शब्बार पुकारा (उसने शौकत से शुरु किया लेकिन घबराहट के बावज़ूद उसे इतना होश था कि अपने भाई को ही पुकारे). बीस पच्चीस लोग, जिन्हें एक स्कूली लड़के ने रात अपने मन से बनाकर कह दिया था कि निर्मल शर्मा और महेश प्रजापति बाराखंभा एक्सप्रेस से जाएँगे, पागलों की तरह स्टेशन और ट्रेन के डिब्बे छान रहे थे. तभी उन्हें सबीना की पुकार सुनी.

सबसे पहले शौकत उसके पास पहुँचा और उसने मोहनीश अग्रवाल को एक थप्पड़ मारा. जवाब में मोहनीश अग्रवाल ने भी शौकत को थप्पड़ मारा. चाय पी रहे उसके दो तीन दोस्त भी आगे आ गए. वे और आगे आ ही रहे थे कि भीड़ ने उन्हें घेर लिया. निर्मल शर्मा भी उसी तरह तिलक लगाए रखता था, जिस तरह मोहनीश अग्रवाल ने लगा रखा था. भीड़ के ज़्यादातर लोगों ने उसे टिकट खरीदते हुए बस एक नज़र ही देखा था, इसलिए उन्हें लगा कि यही निर्मल शर्मा है और इसीलिए सबीना चिल्लाई है. कुछ लोग सबीना की दाद देने लगे और बाकी मोहनीश अग्रवाल और उसके साथियों को मारने लगे. बाद में जो हुआ, वह यह था कि मेरे शहर के सैंकड़ों लोग अचानक स्टेशन पर आ गए. उनके पास पैट्रोल के गैलन थे और लाठियाँ भी. बच्चे भी थे, जो ट्रेन पर पत्थर फेंक रहे थे. उनमें से कोई ऐसा नहीं था, जिसने मिस माधुरी के शो का टिकट खरीदा था. टिकट वाली ठगी के शिकार तो मोहनीश अग्रवाल को पीटकर ही पेट भर चुके थे. वे सब हैरान होकर देख रहे थे कि ट्रेन चल पड़ी है और भीड़ ने एक डिब्बे में आग लगा दी है.

मैं नहीं जानता कि सब ख़त्म कर डालने पर आमादा वह भीड़ अचानक कहाँ से आ गई थी, लेकिन मुझे लगता रहा कि मोहनीश अग्रवाल वह हरकत न करता और जब्बार, शौकत और बाकी लोग उस समय स्टेशन पर न होते तो शायद कुछ भी न हुआ होता. मोहनीश दो चार फ़िकरे कसता और अपनी ट्रेन चलने पर उसमें चढ़ जाता. सबीना कुछ देर परेशान रहती और भूल जाती. जब्बार उस समय किसी की साइकिल का पंक्चर लगा रहा होता और दोपहर में अपने घर जाकर खाना खाकर आधा घंटा सोता. लेकिन यह सब नहीं हुआ. आगे बहुत सी हत्याएँ और पुलिसिया प्रताड़नाएँ थीं. ख़ून के कई हफ़्ते और अमावस सी नफ़रत. बहुत से रफा दफा केस, सच्चे बयान- जो इतनी बार बदले जाने थे कि झूठे हो जाते. मेरी माँ मिस माधुरी के फिर से कई स्टेज शो और मेरा कद्दूकस के चलने का इंतजार, जिसके चक्कर में मैंने दो-तीन बार उंगलियाँ छिलवाईं. आगे आपके लिए एक कहानी थी जिसके खत्म होने पर आप उसे भूल जाएंगे.
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- गौरव सोलंकी
लेखक से सम्पर्क : 09971853451 ; aaawarapan@gmail.com

5 comments:

नया सवेरा said...

... rochak !!

An-emoticon said...

बेहतरीन... मुझे कहा गया था कि मैं इसे पढ़ूं... नहीं कहा गया होता तो शायद इतनी अच्छी कहानी से महरूम रह जाता.. गौरवजी की ये कहानी सचमुच सम्मान की हकदार है. बधाई उन्हें और धन्यवाद आपका की आपने इसे उपलब्ध किया.

Aparna said...

Nice......

सोनू said...

गूगल से खोजने पर पुरस्कार की ख़बर यहाँ पाई। यह पुरस्कार राजस्थान पत्रिका के रविवारसीय परिशिष्ट में साल भर में छपी बेहतरीन रचना के लिए है। उधर कहानी के लिए आधे या एक पन्ने की ही जगह मिलती है। लेकिन उस पन्ने पर भी नए और स्थानीय लेखक ही ज़्यादा छपते हैं, मशहूर वाले कम। मैंने इस परिशिष्ट की कहानियों का संकलन देखा है। आप जानते ही होंगे कि गौरवजी की यह रचना दरअसल उनकी कहानी रमेश पेंटर और एक किलो प्यार का पहला हिस्सा है। मेरे ख़याल से पत्रिका वाले पूरी कहानी को नहीं छापते होते। गौरवजी ने इस कहानी को तीन पोस्टों में प्रकाशित किया। यह सब बातें इसलिए कर रहा हूँ कि जानना चाहता हूँ कि ब्लॉगर पर एक पोस्ट कितनी लंबी हो सकती है? जैसे मुझे मालूम है कि ब्लॉगर पर कोई टिप्पणी 4096 अक्षर यानी 4kb से ज़्यादा लंबी नहीं हो सकती है। हिंदी ब्लॉगों पर लेख और कविताएँ ही ज़्यादा होते हैं। ज़रा मालूम करके बताइएगा, कि क्या एक पोस्ट में पूरी किताब नहीं दी जा सकती?

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

दंगे कैसे भड़कते है ..बेवजह .. -सुन्दर सार्थक कहानी ..अच्छी पोस्ट है.. ..शेयर करने के लिए धन्यवाद .. आज चर्चामंच पर आपकी पोस्ट है...आपका धन्यवाद ...मकर संक्रांति पर हार्दिक बधाई

http://charchamanch.uchcharan.com/2011/01/blog-post_14.html