Thursday, September 30, 2010

मार्क स्ट्रैंड की कवितायें

आज अंतर्राष्ट्रीय अनुवाद दिवस है और वरिष्ठ अमेरिकी कवि मार्क स्ट्रेंड की इन कविताओं का अनुवाद मनोज पटेल ने किया है.


रोशनी का आना


इस उम्र में भी होता है ऐसा
प्रेम आता है और आती है रोशनी
आप जागते हैं और शमाएं जल उठती हैं खुद-ब-खुद
जुटते हैं सितारे, तकिए पे उमड़ पड़ते हैं ख्वाब
बहती है हवा खुशनुमा

इस उम्र में भी दमकती हैं बदन की हड्डियाँ
और कल की गर्द भर उठती है सांसों में.


एकजुट रखने के लिये


मैदान में
मैं हूँ मैदान की अनुपस्थिति
यही होता है हमेशा
जहाँ भी होता हूँ मैं
मैं ही होता हूँ अनुपस्थित.


अपने चलने से मैं
बांटता चलता हूँ हवा को
यही होता है हमेशा
हवा जल्दी से भर देती है वो जगह
जहाँ से अभी-अभी हुआ हूँ मैं अनुपस्थित.

हम सबके पास अपने-अपने कारण हैं चलने के
मैं चलता हूँ
चीजें
एकजुट रखने के लिये.
.......

3 comments:

shesnath pandey said...

अच्छी कविताएँ है... शांति से गहराई तक पहुँचने की कोशिश लाजवाब है....

शरद कोकास said...

बहुत बढ़िया कवितायें हैं यह मार्क स्ट्रैंड की । मनोज पटेल को इस बेहतरीन अनुवाद के लिए बधाई ।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

doosari kavita ka anuvaad maine bahut pahle kiya thaa jo kabaadkhaana par ab bhi hoga kahiin