Saturday, December 19, 2009

नाम तुम्हारा


बुजुर्गों की एक ही मुश्किल रही
तुमसे अपरिचय उनका ले गया उन्हे
दूसरे कमतर नामों वाले देवताओं के पास
सीने को दहला देने वाली खांसी
खुद को झकझोरती छींक
के बाद लेते हैं वो उन ईश्वरों के नाम
मैं लेता हूँ नाम तुम्हारा

मैं तलाशता हूँ, ईश्वर को नहीं, ऐसे शुभाशुभ मौके
जब ले सकूँ मैं नाम तुम्हारा, पुकारूँ तुम्हे

“जैसे तुम्हारे नाम की नन्हीं सी स्पेलिंग हो
छोटी-सी, प्यारी-सी तिरछी स्पेलिंग”
हाँ, देखो कि तुम्हारे नाम से शमशेर मुझे जानते थे,
पहिचानते थे,
ये तुम हो और शमशेर थे जिनने मेरी बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास रंगीनियाँ भाँप ली थी,
शमशेर थे जो मुझे इसी शरीर से अमर कर देना चाहा-
वो भी तुम्हारी बरकत।

तुम्हारे नाम के रास्ते वे मेरे दु:ख तक आ पहुंचे
खुद रोये और मुझे दिलासा दिया
तुम कौन से इतिहास की पक्षी हुई ठहरी कि
तुम्हारे नाम से शमशेर मुझे जानते थे,
उनकी बेचैन करवटें
मेरे लिये थी, आज भी ‘प्वाईजन’ की लेबल लगी
हंसती दवाओं और मेरे बीच शमशेर हैं,
तुम्हारे नाम से गुजर वो मुझ तक
इस हद तक आ पहुंचे।

तुम मेरे जीवन से कहीं दूर जाना चाहती हो,
इसे जान शमशेर मेरे लिये रोये होंगे,
ये उनकी ही नहीं समूचे जमाने की मुश्किल है,
ये संसार मुझे तुमसे अलग देखना नही चाहता और तुम यह नही


शमशेर ने मेरा तुम्हारा जला हुआ किस्सा फैज को सुनाया होगा
(तुम्हारा नाम [और तुम] है ही इतना अच्छा)
फैज तुम तक आयेंगे और जब कहेंगे कि अब जो उस लड़के के
जीवन में आई हो तो ठहरो के: कोई रंग, कोई रुत, कोई शै
एक जगह पर ठहरे।


मेरे हबीब, फैज़ की बात ऊँची रखना।

.....सूरज
(तस्वीर सूरज की है।)

11 comments:

शिरीष कुमार मौर्य said...

***
इसे कहते हैं उदन्त मार्तंड ! आज के इस सूरज को हमारी बधाई और दर्शन कराने के लिए चन्दन को सलाम.....

सुन रहे हो.......प्रभु जी तुम "चन्दन" हम "पानी".
***

aravind said...

सूरज जी की यह कविता इस बात को दर्शाती है कि हिन्दी कविता का पूर्व संसार कितना समृद्ध है। बहुत अच्छा लिखा है आपने। यही किसी प्रसिद्ध कवि ने लिखा होता तो इस कविता पर पुरस्कारों और लेखो की वर्षा हो जाती। शमशेर और फैज से जोड़ कर कविता लिखना और वो भी सन्दर्भ लेते हुए...भई वाह। आपकी लेखनी को मेरा सलाम।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत सुन्‍दर कविता चंदन जी, धन्‍यवाद.

शशिभूषण said...

मेरी एक कापी है.उसमें कुछ कविताएँ मैं लिखकर रखता हूँ.इसे भी लिख लिया है.ज़्यादा कह पाने लायक अभी नहीं हूँ...एक शब्द याद आ रहा है विरासत.सोचता हूँ इस कविता के बारे में इस शब्द को कैसे कहूँ?

उद्धव said...

छा गये सूरज गुरु। पढ़ कर मजा आ गया। देवरिया का सूरज चढ़ रहा है।
u r rocking man!

अजय कुमार झा said...

वाह जी इस चढते सूरज को हमारा भी सलाम ...इसकी तपिश तो जीवन में उष्मा बिखेर रही है अभी से

वाणी गीत said...

सब लेते हैं ईश्वर का नाम ...मैं नाम तुम्हारा ...
बहुत सुन्दर कविता ...!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अच्छी कविता है भाई!!

और देवरिया का क्या चक्कर है भाई-- हम भी उसी शहर के हैं!

चन्दन said...

@अशोक जी, इत्तेफाकन मैं, सूरज और उद्धव देवरिया के ही रहने वाले हैं। उद्धव खास देवरिया का है तथा मैं और सूरज सलेमपुर तहसील के हैं। उत्साहातिरेक में उद्धव अपने गृह जिले की बात चला बैठा वरना क्षेत्रियता से हमारा कुछ खास लेना नहीं है।

संदीप पाण्डेय said...

खूबसूरत कविता पढ़वाने के लिए धन्यवाद चंदन। ये कविता मन में अटक सी गई है। जानते हो कल देर रात घर आकर मैंने फिर से इसे पढ़ा। अकेले कमरे में रात दो बजे इस कविता से गुजरना ... एकदम अलहदा अनुभव था

Shrikant Dubey said...

लाज़वाब लिखा. अपनी अभिव्यक्ति को अगर शमशेर और फैज़ के इनपुट के बिना
लिखते तो भी ये शानदार कविता थी, लेकिन ख़ास हालात पर दो पारखी सूरमाओं
के नज़रिए का समावेश इसे याद रखने लायक बना देता है. खासकर फैज़ के ज़िक्र
से शुरू और कविता के इबारत की आखिरी पंक्तियाँ ......
"फैज तुम तक आयेंगे और जब कहेंगे कि अब जो उस लड़के के
जीवन में आई हो तो ठहरो के: कोई रंग, कोई रुत, कोई शै
एक जगह पर ठहरे।"
भाई मुझे सोचकर हैरत भरी ख़ुशी हो रही है की आप किसी भी चीज़ को एक नायाब
और अलग नज़रिए से देखते हो... इसे जारी रखिये.. बधाई!!!...

श्रीकान्त दुबे