Sunday, June 6, 2010

वर्षा ऋतु से..

वह मद्धिम करार भी टूट चुका

वर्षा रानी ये जिद छोड़ो
बादलों की धार फोड़ो

तुम्हारी जल पंखुड़ियाँ धरती को सरोबार जब चूमेंगी
सहसा, तुम्हारी बूँदे निगाह बन उसे ढ़ूँढ़ेंगी
जो अब नही होगी वहाँ
आंगन के पार द्वार
पर तैयार

वर्षों वर्षों तक हमने हथेलियों में थामें हाथ
किया स्वागत तुम्हारा तुमने सहलाया खुश
हो बौछारों से हमें पीटा हम थे कि जी उठे
और अब मैं, उन मीनारों में अकेला
जिससे फूटते रास्ते शाखाओं की तरह पर एक भी
अभागी राह उस ओर की नही

बारिश तुम आना
उसे न पाकर लौट ना जाना
बिन बुलाये मेहमान की तरह ही हो
पर वहाँ जाओ जहाँ जरूरत तुम्हारी हो

तुम्हारी राह देखता मै ही नही इमली के कितने पेड़ जिनके
फलने की राह देखती कितनी माएँ
जो तुम्हारे स्वागत के लिये नई और
सुदृढ़ पीढ़ी जनेंगी

वह मेंढक तुम्हारे रंग में रंगा
गीले मन सहित इस कविता में
छलाँग लगायेगा, बतायेगा मुझे
इस वर्ष जब वो ही नही रही
तब तुम्हारे जल का स्वाद

तुम्हारी बाट खोजती हजारहा फसले जो निवाला बन जाने की
आतुरता लिये मुझसे अनगिन बातें कर रही हैं

नाराज ना हो सौन्दर्य ऋतु
मैं तुम्हे बताउंगा प्रेम के नये
रंगरूटों का पता जो करेंगे
स्वागत तुम्हारा
हमसे भी सुन्दर
हमसे भी बेजोड़

वो भी भूली मुझे
तुम्हे नहीं
तुम्हारे स्वागत में उसने बनाई होगी रंगोली
अँजुरी बनाये थामे होंगे दो मजबूत हाथ

तुम आओ
मेरी स्मृतियों तक आओ
बरसते बरसते थक जाओगी तब
हम भाप के जालों के बीच पीयेंगे
कुल्हड की चाय और तुम मेरी स्मृतियों
की सांकल खोल मिल आना उससे

बारिश, अब तुम आओ.

(सूरज की यह कविता समय(!) पर आई है.)

2 comments:

anurag said...

सुन्दर कविता और गजब का आह्वान!!

kundan pandey said...

fantastic....the rythm poet has created in the poem is wonderfull. way of presentaion along with content is good, like the frog which is accepted to jump in poem with rain.. ...awesome...and many thing are remarkable.. so Suraj ji please be continuous on this blog with your poem.. i will wait. again congratulation for good creation.