Wednesday, June 2, 2010

मोरा पिया मोसे बोलत नाहीं...

बीते कल से मेरे अनुज उमंग यहाँ करनाल आये हुए हैं। कल ही शाम को हम काईट्स देखने गये और पाया कि आलोचना की अजीब सी बीमारी भारतीय जन मानस मे घर करती जा रही है। आलोचना होनी चाहिये पर एक पैमाने के साथ। यहाँ तो हो यह रहा है कि जो पत्रकार नही बन पाया वो पूरी मीडिया को पानी पी पी के गाली देता है। जो कवि कहानीकार नही बन सकता और जिसने रचनाकार की पीड़ा का एक अंश भी नही बर्दाश्त किया वो साहित्यकारो को चरित्रहीन साबित करने मे लगा रहता है। जो नेता नही बन पाये उनमे से कई ऐसे मिले जो मन ही मन संसद पर हुए हमले से बहुत खुश थे और यह दुष्ट इच्छा भी व्यक्त की कि काश सारे नेता मारे गये होते। जिन्हे पता है कि सिनेमा की दुनिया से उनका कोई वास्ता नही पड़ने वाला, उससे कोई काम नही निकलने वाला उन लोंगो ने ‘काईट्स’ फिल्म को जम के गरिआया।

यह सच है कि काईट्स महान फिल्म नही है। पर ये जो प्रेरक प्रसंग जैसी फिल्मे बन रही हैं जैसे माई नेम इज सुपर खान और ऑल ईडियट्स, वो भी सामान्य और मनोरंजक फिल्म ही बन के रह गई हैं। दोनो ही फिल्मों मे कितने ऐसे दृश्य हैं जिनके बचकानेपन और बनावटी ब्रिलिएंस पर शर्म वाली झुरझुरी फैल जाती है।

यह सच है कि काईट्स महान फिल्म नही है और इस महानता की उम्मीद लगाये लोगो की चालाक मूर्खता पर दो पल के लिये अफसोस कर ले फिर आगे बढ़े। ये वही लोग हैं जो ऑर्नॉल्ड स्वाज्नेगर और जेम्स बॉंड की निरा बेतुकी फिल्मों की तारीफ मे मरे जाते हैं। ऋतिक, शाहरूख आमिर और अमिताभ की फिल्मों को देखते हुए ओमपुरी और नसीर द्वारा अभिनीत दिमाग झनझना देने वाली फिल्मों की अपेक्षा बेमानी है। सिनेमा से सामाजिक अर्थवत्ता की उम्मीद अपनी जगह मह्त्वपूर्ण है पर इसके मनोरंजक पहलू को कम करके ऑकने का काम वही लोग करेंगे जो जीवन से इतना खुश हैं जिन्हे रोने धोने के लिये टी.वी के धारावाहिको की शरण लेनी पड़ती है।

काईट्स की कहानी में वो धीमापन मौजूद है जो प्रेम कहानियों में होता है जैसे ‘ अ वॉक टू रिमेम्बर, फिफ्टी फर्स्ट डेट्स, स्वीट नवम्बर, इत्यादि’। गाने भी सुनने लायक हैं – ‘इंतजार कब तलक हम करेंगे भला’। सिनेमैटोग्राफी बहुत अच्छी है। और सबसे उपर अपना देवदूत – ऋतिक। चाहे वो कंफ्यूज्ड इंसान वाला किरदार हो या अपनी प्रेमिका को तलाशने की व्यग्रता या प्रेम के खूबसूरत पलों की अदाकारी, सबमें ऋतिक ने अच्छा काम किया है।

बारबारा। ब्यूटीफूल!! उन लोगो की चिंता नाजायज नही है जो विदेशी सुन्दरियों के भारतीय सिनेमा मे दखल से डरे सहमें हैं। आज की तारीख में जितनी नई अभिनेत्रियाँ लग के काम कर रही हैं उनमे से गजब की दीपिका को छोड़ दें तो कोई बारबारा के पासंग भी नही ठरने वाली। फिल्म मे एक दृश्य है कि वे दोनो होटल के कमरे मे बैठे हैं। बारबारा नीली जींस के शॉर्ट्स और झक्क उजले टॉप में है, उस एक सीन मे वो जितनी खूबसूरत दिख पड़ी है और उसके बराबर में बैठा मोस्ट हैंडसम ऋतिक! उनके एक साथ होने वाले इस दृश्य मे जो रूहानियत और मासूमियत है उसके लिये अगर भाषा के भदेस का तनिक सहारा लें तो कहेंगे ‘पैसा वसूल’। ऋतिक में अदाकारी और वो फिटनेस है जो उसे एक दिन इंटरनेशनल लेवल तक मशहूरी देगी। उसके लिये एक अर्धवाक्य फिर दूहरा दूँ- देवदूत लगता है।

औसत से अच्छी फिल्म है। सुन्दर प्रेम कहानी। खटकने वाली चीज यह लगी कि जिस तरह से धोखेबाजी और बेवफाई को ‘ग्लोरिफाई’ किया गया है वो गलत है। इसके बरक्स बाबा भारती का किस्सा याद आता है। जिन्होने डाकू मंगल सिंह को उसके धोखे की बात सबसे बताने के लिये मना करते हैं क्योंकि उन्हे डर है कि कल को फिर कोई घुड़सवार किसी जरुरतमन्द राहगीर की मदद नही करेगा। वैसे यही सुर आजकल पूरे जमाने ने साध रखा है तो फिल्म्कार बेचारा क्या करे? और साथ ही यह भी कि अनुराग बसु से हम अनुराग कश्यप होने की अपेक्षा नही रखते।

पूरी फिल्म में ऋतिक ने शानदार अभिनय किया है। एक बार देखने लायक तो है ही है।

रही बात इस पोस्ट के शीर्षक की तो ये गीत मेरे जीवन के इर्द गिर्द इतना ज्यादा बज रहा था कि लगा जैसे कोई बहुत पुराना गीत हो। पर उमंग ने बताया यह आने वाले समय के राजनीति का गीत है।

39 comments:

Rajeev Bharol said...

किन वैरन कान भरे...
राग दरबारी में ये बंदिश मेरी भी पसंदीदा है.

"जैसे माई नेम इज सुपर खान और ऑल ईडियट्स, .. दोनो ही फिल्मों मे कितने ऐसे दृश्य हैं जिनके बचकानेपन और बनावटी ब्रिलिएंस पर शर्म वाली झुरझुरी फैल जाती है"

मुझे भी ऐसा हि कुछ लगा था "३ ईडीयट्स" देख कर.

माधव said...

bakwas film

anurag said...

रही बात इस पोस्ट के शीर्षक की तो ये गीत मेरे जीवन के इर्द गिर्द इतना ज्यादा बज रहा था कि लगा जैसे कोई बहुत पुराना गीत हो। पर उमंग ने बताया यह आने वाले समय के राजनीति का गीत है। ...
क्या बात है पाण्डेय जी....!!!!

वैसे मुझे भी यह फिल्म ठीक लगी।

दिलीप said...

mujhe bhi film bahut badhiya lagi...houseful aur jaane kaun kaun si bakwaas dekhne ke baad ek sukhad ehsaas tha...hollywood ko takkar deti film thi...par hai to ritik ki film secularwaadi aur underworld kaise chalne denge...bahana chahiye tha flop karwane ka....kites ek aage ki film thi...ritik ka shaandaar abhinay tha...aur barbara ki khoobsoorti....waah....aur nirdeshan me bhi koi kami nahi thi...haan editing me thoda dikkat thi...par achchi film thi....

दिलीप said...

mujhe bhi film bahut badhiya lagi...houseful aur jaane kaun kaun si bakwaas dekhne ke baad ek sukhad ehsaas tha...hollywood ko takkar deti film thi...par hai to ritik ki film secularwaadi aur underworld kaise chalne denge...bahana chahiye tha flop karwane ka....kites ek aage ki film thi...ritik ka shaandaar abhinay tha...aur barbara ki khoobsoorti....waah....aur nirdeshan me bhi koi kami nahi thi...haan editing me thoda dikkat thi...par achchi film thi....

Rangnath Singh said...

"जो कवि कहानीकार नही बन सकता....वो साहित्यकारो को चरित्रहीन साबित करने मे लगा रहता है।"

चंदन तुम्हारी यह पंक्ति अर्थ का अनर्थ कर रही है। फिर भी समझा जा सकता है कि तुम क्या कहना चाह रहे हो। फिल्म के अतिरिक्त तुमने जो अवांतर बातें लिखी हैं वह काफी मनोरंजक लगीं। खैर तुम्हारी अपनी सोच। फिल्म तो मैंने देखी नहीं। इसलिए उस पर कुछ नहीं।

Pooja said...

चंदन तुम्हारी नई पोस्ट में तुम क्या कहना चाहते हो स्पष्ट नहीं हो रहा है। तुम काइट्स के बारे में लिखना चाह रहे हो या किसी दूसरी चीज के बारे में। जरूरी नहीं कि कोई चीज तुम्हें पसंद आ जाए तो तुम उसकी आलोचना करने वाले सारे लोगों का इस तरह मजाक उड़ा दो। हर फिल्म देखने वाला फिल्म बनाना नहीं चाहता है। इसका ये मतलब तो नहीं कि वह खराब लगने पर उसकी आलोचना भी न करे। कवि कहानीकार नेता वाला तुम्हारा उदाहरण समझ से परे है। तुम्हारी सबसे खराब पोस्ट में से एक। केवल लिखने के लिए मत लिखा करा तुम्हें लोग बहुत अपेक्षा से पढ़ते हैं।

shesnath pandey said...

पूजा के कमेंट से हैरान हूँ मैं.... देवदुत की बात तो कम है.... हमें तो ह्रित्विक हर धर्मों के देव की तरह लगता है.... यह बात पचने वाली नहीं है कि दीपिका के अलावा कोई नहीं है... दरअसल इस पैमाने को देखने में हमारे उपर हॉलिवुड का सौंदर्य हावी हो रहा है....

addictionofcinema said...

adbhut comment "KITES" par.....aur wo bhi tumse ? ashcharya me hoon pehli baar tumhare stand par ki tumhe KITES ausat se achhi lagi hai. tumhari lines se udhar le ke kahoon to ye tareef bilkul aisi hai jaise tumhara cinema se kaam padne wala hai haal filhaal aur isliye tumhe ye ghatiya film ausat se achhi lagi hai. Hritik shandar lage hain hamesha ki tarah lekin iske liye dhai ghante is uddeshyaheen bhag daud ko jhelna aa darshak ke liye mushkil hai. khair tumhe pasand ayi film ye jankar ascharya hua, lekin duniya isiliye to itni rochak hai ki yahan kadam kadam pe ascharya bhare pade hain...
Vimal Chandra Pandey

addictionofcinema said...
This comment has been removed by the author.
addictionofcinema said...

ummid hai DHOOM2 me bhi tumhara paisa vasool hua hoga kyonki usme bhi ye shandar devdoot itna hi shandaar lag raha tha...MNIK bhi maha bakwaas film thi aur 3 idiots bhi ausat se thodi hi oopar thi lekin in udahrano se kites achhi ausat se oppar kaise ho jati hai samajh se pare hai...Ghazab ki dipika ke alawa koi Barbara ke pasang bhi nahi theharti ye bhi jankari nayi aur rochak rahi. tumhari is ek post me pichhli sare posts se zyada rochak aur gyanvardhak tathya hain...

kundan pandey said...

ye apni apni pasand ka mamla hai...maine bhi is film ko kuch dine pehle dekha...film mujhe bhi achhi nahi lagi...lekin hritik bande ne paisa wasool karwane me bahut madam ki....film ausat hai....isme koi sandeh nahi hai...khaskr dusara hissa film ko kamjor krta hai...ab is mn ko kaise samjhaya jaye jo hritik se umeed kr hi dalta hai aur jahir hai umeede tutegi to thodi bahut aawaj to hogi hi...hona bhi chahiye...apne tai hritik ne sb kuch achha kiya hai..maslan dance-lajwab ( 6 minute se hi paisa wasul ho gaya), acting- hollywood standard ka...lekin itne se kaam chalta kaha hai! yahi krna tha to har 6 mahine pr ek film lekar aani chaiye thi...ek to 2-3 saal baad aaye umeedo ke patang lekar aur patang katne ke kadwe sach ki duhai dene lage...isase to kaam nahi chalega...mujhe aisa lagta hai....

jaha tk Barbara ki baat hai..appealing to hai bhaia..apne bollywood ke shakahari heroino se kai guna appealing but bollywood ke kisi bhi heroine ki baat krne ke pehle hume bharatiya saundrya ki dakiyanusi aur desh ki sundariyo ke heenta bodh ko samjhana hoga...aaj ke bharatiya sundarta ke concept ko samjhana ho to kripaya Kareena ke pichake hue gaal dekhe. sb kuch spast ho jayega aur mujhe lagta hai Deepika bhi unme se ek hai aur use abhi sabit krne ko bahut kuch baki hai...maine shahrukh ke sath uski ek video dekhi hai dance krte hue adbhut hai wo video khaskr Deepika Padukon...wo shayad Om Shanti Om ke sath shoot kiya gaya tha pr shamil nahi kiya gaya...waise Umang ji to Hritik ke pankha hai fir unhe to film acchhi hi lagi hogi..badhiya hai...

kundan pandey said...

Vimal Bhaia apne to sach me cinema ke addict jaisa hi photo bhi laga rakha hai...

संदीप पाण्डेय said...

रितिक रोशन का लुक भारतीय नहीं हैं. उनकी खूबसूरती में देखने वाले पुराने यूनानी नायक की छवि निरखते हैं. देखने वाली ये है कि सुंदरता के हमारे मापदंड अब भी उपनिवेशकालीन या कहें आर्य हैं। बारबरा मोरी को भारतीय फिल्मों का मेलोड्रामा पसंद नहीं आता है। वे खुद रितिक की पिछली फिल्मों को खारिज कर चुकी हैं। फिर काइट्स क्या है। यह जानना चाहूंगा। बालीवुड में पैसा है आर बारबरा उससे जुड़ने वाली न पहली विदेशी नायिका हैं न आखिरी। गोरी सुंदरी वाली पिछली चर्चित फिल्म थी रोग। उसकी खूबसूरती में भी श्वेत त्वचा के अलावा कुछ याद नहीं आता मुझे।

shesnath pandey said...

इस पोस्ट की लगभग सारी बातों पर सबने अपना कमेंट दिया लेकिन इस पोस्ट का शीर्षक "मोरे पिया मोसे बोलत नाही" कुछ समझ में नहीं आ रहा है... कोई बताएगा.... काइट्स में राजनिति के गीत... कैसे...???

Anonymous said...

शेषनाथ जी कृपया पोस्ट का आखिरी पैरा दोबारा पढ़ें

addictionofcinema said...

Sheshnath ji apke sawal ka jawab hai ki 'ee blog hai bhaiya blog' batarz 'ee eelahabaaad hai bhaiya eelahabaad'..apko to yade hoga sarkar.

shesnath pandey said...

आखिरी पैरा दूबरा पढ़ने के सलाह के लिए शुक्रिया.... लेकिन मैं कुछ ज्यादा बार पढ़ लिया फिर भी समझ में नहीं आया तो अपना कमेंट पास किया... खैर... लेकिन एक मेरा भी इसरार है .. पोस्ट के एक दम शुरू में उमंग की आने की बात है और आखिर में उमंग द्वारा ये बताया जाना कि ये गीत राजनिति का है....क्या इन दोनो सिराओ का आपस में कोई लिंक नहीं है... यह तो एक कहानी की शिल्प की तरह है... शिल्प भले ही न हो लेकिन चंदन इस तरह की बेवकूफी करेंगे क्यों....?

rakampal said...

चन्दन जी, बहुत दिनो बाद ब्लोग पर आया हूँ। सहमति असहमति अलग चीज है पर आपकी भाषा कमाल की है। आप्ने लिखा है कि माई नेम इस सूपर खान, आल इडियट्स, गजब की दीपिका, देवदूत ऋतिक, और फिर “इसके बरक्स बाबा भारती का किस्सा याद आता है। जिन्होने डाकू मंगल सिंह को उसके धोखे की बात सबसे बताने के लिये मना करते हैं क्योंकि उन्हे डर है कि कल को फिर कोई घुड़सवार किसी जरुरतमन्द राहगीर की मदद नही करेगा। वैसे यही सुर आजकल पूरे जमाने ने साध रखा है तो फिल्म्कार बेचारा क्या करे? और साथ ही यह भी कि अनुराग बसु से हम अनुराग कश्यप होने की अपेक्षा नही रखते।“
तथा यह भी- रही बात इस पोस्ट के शीर्षक की तो ये गीत मेरे जीवन के इर्द गिर्द इतना ज्यादा बज रहा था कि लगा जैसे कोई बहुत पुराना गीत हो। पर उमंग ने बताया यह आने वाले समय के राजनीति का गीत है।

बहुत गहराई है आपके लेखन मे। अभी नया ग्यानोदय मे आपके बारे मे तारीफ पढ रहा था।पढ कर लगा कि आपके लेखन को पसन्द करने वाला मैं अकेला ही नही हूँ। सम्पादक ने आपके भाषा की तारीफ मे पुल बान्धे हैं।
मेरी बारह साल की बेटी है- नर्मदा। उसे ऋतिक बहुत पसन्द है और उसकी इच्छा अनुसार ही हम लोग पिछले हफ्ते यह फिल्म देखने गये तो उसकी शिकायत करने वालो से मेरी बेटी डर जा रही थी।
उसे घर जाकर मैं यह लेख पढने को दूंगा ।

राजेन्द्र मीणा said...

भई ! आजकल की फिल्मो को देख के उबकाई सी आती है ....मारधाड़ और एक्शन की भरमार ,,,गीत संगीत तो ऐसे गया जैसे गधे के सींघ ,,,,तीन साल हो गए नई फिल्म देखे ,,, :( :( :(

विशाल श्रीवास्तव said...

प्रिय चन्दन, ब्लागिंग और टिप्पणी करना छोड़े एक अरसा हो रहा है, हाँ कभी कभी पढ़ लेता हूँ। पहले तो हैरानी है कि काइट्स जैसी बकवास फिल्म की तुलना तुम अ वॉक टू रेमेम्बर जैसी फिल्मों से कर रहे हो। दूसरे, गहरी नाराज़गी कि तुमने 'मात्र कवियों' पर निशाना करके एक छोटी बात कही। साहित्य में कविता या कहानी में से कौन सी विधा श्रेष्ठ है या कवि या कहानीकार में से कौन महान है, ऐसी किसी तुलना में मैं विश्वास नहीं रखता पर तुम्हारी इस बात से मुझे हार्दिक दुख पहुँचा है।

AlbelaKhatri.com said...

ab mainj bhi yah film dekhloon toh kuchh samjhoon.....

शिरीष कुमार मौर्य said...

चन्दन पहली बार तुम्हें इतना बोलते देख रहा हूँ. तुम्हारी कहानियां अद्भुत कविताओं की तरह प्रिय हैं मुझे. दरअसल उनमें कितनी तो कविता है. भैया कहते हो तो इस नाते एक अवांतर सलाह दूँ तुम्हें? .......तुमने ज़रूर पढ़ा होगा पर एक बार फिर कुछ दिन शमशेर को पढो प्यारे....मज़ा आएगा तुम्हे.

राजकुमार सोनी said...

चलो अच्छा है अपन अब फिल्म देखने तो नहीं जाएंगे। आपने वक्त तो बचा ही दिया। धन्यवाद।

गौरव सोलंकी said...

पैसा वसूल का ठीक ठीक अर्थ मुझे समझ नहीं आता. मैंने यह फिल्म मुफ़्त में देखी और फिर भी मुझे पछतावा हुआ. पैसे लगाकर देखता तो आगे के खर्चों में कुछ कटौती करके भरपाई करने की सोचता.
यदि ऋतिक और बारबरा की सुन्दरता और अच्छा संगीत ही फिल्म है तब तो किसी फैशन शो का वीडियो भी फिल्म ही समझा जाना चाहिए..और इससे अच्छा उनके वॉलपेपर फिल्म में चला दिए जाते, तब कम से कम कार रेसिंग और ढिशुम ढिशुम तो ना झेलनी पड़ती.
कहीं ऐसा तो नहीं कि आलोचना करने वालों से अलग कुछ कहने के मोह में आप यह सब कह गए. आप इसे 'विशेष' बच्चे की तरह देखते हुए चाहते हैं कि इसकी तुलना बस मसाला फिल्मों से ही की जाए तब भी बॉलीवुडिया रोमांटिक फिल्मों का भी एक स्तर होता है.

चन्दन said...

@ विशाल & शिरीष भईया- आप लोग बिल्कुल गलत मतलब निकाल गये। माफी पर मेरा आशय यह था कि जो इंसान कवि कथाकार नही बन पाता मतलब किसी भी साहित्यिक विधा से नही जुड़ पाता यानी कि एक रचनाकार नही बन पाता.. इसमे कवि के कथाकार बनने की बात ही नही है। ऐसा त्तो मैं कोई बटवारा जानता ही नही हूँ। पूरे पैरा में मैने इसी भाव को दर्ज किया है जैसे जो नेता नही बन पाता..जो पत्रकार नही बन पाता अब इसमे प्रिंट मीडिया के पत्रकार और टी.वी जर्नलिस्ट की कोई तुलना मैने नही खड़ी की है। एक बार पुन: कहूँ कि इसमे कवि के कथाकार बनने जैसी कोई बात नही कहा है मैने। मेरे लिये सारी विधायें एक समान हैं।

ssiddhant said...

Kites khud ko ek damdaar film saabit karne mein asafal saabit hui hai, mujhe to iske sangeet bhi koi dilchasp nahin lagta hai. baharhaal, film ke "Anya" factors mein dilchaspi rakhne waale log iska Videshi sanskaran dekh sakte hain.

Cinematography mein main to Chandan bhaiya ki baat se sahmat hoon aur Hritik ke baare mein mera yahi sochna hai ki wo sach mein International level par abhiny karega ya kar raha hai...

Shubhkaamnayen.

anurag said...

मुझे आश्चर्य हो रहा है कि आप लोग चन्दन की आलोचना किस बात पर कर रहे हैं? उन्होने फिल्म को कही महान नही बताया है, एक औसत फिल्म बताया है, ऐसे मे आप सबो की परेशानी क्या है? चन्दन ने फिल्म एक ऐसी कमी भी बताई है जिस ओर अभी तक किसी स्वनामधन्य आलोचक का ध्यान भी नही गया होगा वो है,” धोखेबाजी का महिमा गान”
शिरिष जी और विशाल जी, आपसे निवेदन है कि इस बात को समझे कि वाक्य में अगर कवि के बाद अर्धविराम होता तो उनकी बात जरा सा सही भी हो सकती थी पर वो दोनो शब्द एक साथ जुडे है और फिर पूरे वाक्य को पढ़ने पर यही लग रहा है कि वो साहित्यकार और रचनाकार पर बात कर रहा है न कि किसी कवि और कहानीकार की तुलना. ना ही विधाओं की तुलना. और फिर आपका कवि मन इतना नाजुक हो गया है?
पूजा जी का यह कहना भी गलत है कि चन्दन लोगो की अपेक्षाओ का ध्यान रख के लिखे.अपेक्षाओ के बोझ तले कितनी प्रतिभाये खत्म हो गई इसका आपको अन्दाजा भी है! चन्दन का लिखा हुआ सभी को पसन्द आये ये सम्भव ही नही है फिर भी वो लिखता है और आज कितने ऐसे साहित्यकार है जो समसामयिक मुद्दो पर लिख रहे हैं. चन्दन हमेशा अपनी राय रखते हैं, यह सम्मान जनक बात है. वरना किसी कवि कथाकार ने हरियाणा के मनोज बबली और झारखंड के निरुपम हत्याकांड पर मौखिक तौर पर भी अपनी राय नही रखी. चन्दन ने लिख कर अपना विरोध जताया.

मै उम्मीद करता हूँ कि चन्दन आप सबका उत्तर देंगे।

चन्दन जी आप लगातार लिखिये!

Pooja said...

अनुराग जी चंदन हमारे मित्र हैं और बेहद प्रतिभाशाली हैं। मुझे लगता है कि वे मानसिक रूप से इतने सक्षम हैं कि थोड़ी बहुत आलोचना सहन कर सकें, दबाव झेल सकें। वे बहुत लोकप्रिय कहानीकार हैं लेकिन उन पर अपेक्षाओं का बोझ उतना नहीं है जितना सचिन तेंदुलकर (चन्दन का पसंदीदा क्रिकेटर) पर रहा है। सचिन और विनोद कांबली का किस्सा तो आपको पता है न। कांबली स्कूली क्रिकेट से लेकर टेस्ट तक के शुरुआती दौर में सचिन से ज्यादा रन बनाते रहे। आलोचक भी उन्हे बेहद प्रतिभाशाली बताते रहे लेकिन हुआ क्या। वे अपेक्षाओं का दबाव नही सह पाए, सचिन ने सह लिया। नतीजा सबको पता है। सो अनुराग जी हमें इतनी छूट तो होनी चाहिए कि हम मित्रों से इतना आग्रह कर सकें। वे गलत जाते लगें तो उन्हें टोक सकें।
काइट्स फिल्म की जिस कमी पर आपको लग रहा है कि चंदन ने पहली बार बात रखी है। वह मुद्दा फिल्म की रिलीज से पहले से ही खूब चर्चा में रहा है। चंदन ने अगर वही विषय उठाया था तो उस पर पूरी मजबूती से लिखना था जैसा कि वे बाकी मुद्दों पर करते हैं।

varsha said...

achchi lagi rajneeti ke geet se kites ki yah udaan.

शिरीष कुमार मौर्य said...

@अनुराग जी - हिंदी की दुनिया में शायद सभी जानते हैं कि मैं एक मूर्ख जीव हूँ पर इतना नहीं जितना अर्धविराम समझा कर आपने मुझे बताया है. मैं कवि कथाकार की बात ही नहीं कर रहा....विशाल कर रहा है क्यूंकि वो अभी हाईबर्नेशन से जागा है, थोड़ा उनींदा है. मैं सिर्फ़ इतना अर्ज़ कर रहा हूँ और वो भी चन्दन से..... कि प्यारे तुम ज़्यादा बोल रहे हो...अपनी विलक्षण प्रतिभा को ऋतिक रोशन की भेंट मत चढाओ ....शमशेर को इसलिए पढो क्यूंकि ...बात बोलेगी हम नहीं....भेद खोलेगी बात ही .....अनुराग आप कौन हो मैं नहीं जानता - आपका प्रोफाइल भी नाट फाउंड दर्शा रहा है......आपने चन्दन को अच्छी सलाह दी है - "चन्दन जी आप लगातार लिखिए" - पर मित्र ये अधूरी लग रही है .... आगे की बात मैं पूरी कर देता हूँ - इन कुत्तों के भौंकने से मत डरिये -

हाथी चढिये ज्ञान का, सहज दुलीचा डार,
श्वान रूप संसार है, भूकन दे झक मार.

तो चन्दन जी आप इस श्वान रूप संसार की चिंता मत करिए....कबीर जिस ज्ञान की बात कर रहे हैं, वह अधुनातन रूप में अनुराग जी आप को दे ही रहे हैं....संसार से किसी कवि कथाकार को क्या लेना....आप तो ख़ूब लिखिए....जैसा अभी लिखा, ऐसा ही लिखिए..

मेरी शुभ कामनाएं.

विशाल श्रीवास्तव said...

यार चन्दन, आश्वस्त रहो, मुझे तुमसे कोई ग़िला नहीं है .... और अगर तुम वाक्य-संरचना को लेकर थोड़ा सतर्क रहे होते तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। बरहहाल, लिखते रहो!

@ अनुराग जी,
वैसे तो मैं भाषा को लेकर शुध्दतावादी नहीं हूँ, पर जब आप बात व्याकरण तक ले ही आये हैं, तो मेरी भी सुन लीजिए-
यदि यह वाक्य यूँ होता
जो कवि-कहानीकार नहीं बन सकता ... (सामासिक-चिह्न के साथ)
अथवा यूँ होता
जो कवि या कहानीकार नहीं बन सकता ...
अथवा यूँ भी होता
जो व्यक्ति, कवि कहानीकार नहीं बन सकता ...
तो भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं थी,
लेकिन भूलवश चंदन ने इसे जिस तरह (जो कवि कहानीकार नहीं बन सकता) लिख दिया है,
उससे वही अर्थ ध्वनित होता है जो मैंने समझा, अत: कृपया भाषा-सम्बन्धी मेरी समझ पर प्रश्नचिह्न न लगायें।

@ शिरीष भैया,
पिछले एक हफ्ते से मैं भी 'कवि' शमशेर को खूब पढ़ रहा हूँ,
इस बात पर गुस्सा भी शायद इसीलिए आया, वरना अपनी क्या हस्ती है .....

चन्दन said...

इस पोस्ट को लिखने के बाद टिप्पणियाँ अभी चैन और ध्यान से पढ़ रहा हूँ और याद आते हुए जैसा पाया कि बहुत पहले मेरे पास एक टी-शर्ट थी जिस पर कोट कुछ ऐसा था- I am bad but not useless, u can use me as bad example. तो इस पोस्ट की भी कुछ खूबियाँ निकल आई. वो इस प्रकार है:

@ विशाल भईया, आप अंतत: इस ब्लॉग तक आये. आपका आगत!

@ शिरीष भईया, आप नाराज भी होते हैं! दरअसल होना भी चाहिये. नाराजगी, साल भर में एकाध बार बुखार की तरह जरूरी है. आपकी सलाह सर आंखो तक. पर क्या है भईया कि गलत निशाना लगाने से ही पता चलता है कि सही निशाना कितनी दूर रह गया और यह भी कि ये जो शिकायती भेड़ चाल करने वाले है,वो इतने शुचितावादी बन जाते है कि जैसे ये लोग दूध से और वो भी ऊँटनी के दूध से धोये गये पुतले हो. ये लोग शायद ही किसी फिल्म की तारीफ करते हों पर उसे देखने सबसे पहले पहुंच जाते हैं, जो फिल्म अच्छी लग गई उस पर चालाक साधुओं वाली चुप्पी साध लेते हैं.

@ गौरव, तुम्हारी खीझ पर मुझे बहुत हंसी आई. मुझे पता है कि बॉलीबुड ने तुम्हारी नाक मे दम कर रखा है जैसे हृदयेश की कहानियाँ (कुछ याद तो आया ही होगा!!). पर एक पुरानी और मददगार कहावत सुनो: मुफ्त के बछड़े के दाँत नही गिनते. जिस दिन तुम फिल्म देखने जाओ उस दिन खूब थक जाओ ताकि पिक्चर पैलेस में जाते ही सो जाओ. समझे!

@ सन्दीप, इसे कहते हैं दूर की कौड़ी! मुझे तो अमिताभ, गोविन्दा, आयशा धारकर, राहुल बोस इत्यादि भी खूब पसन्द हैं, फिर?

@ विमल भईया, आपने इसे दिल पर ले मारा तो उसमे मेरा क्या दोष? मुझे कहाँ पता था कि बिना सर मुड़ाये भी ओले पड़ते हैं। आपके लिये ‘आल द बेस्ट’ से यह टुकड़ा- जस्ट चिल्ल मेरे ....

@ शेषनाथ, तुमने सवाल उठाया है... तुम्हे करारा जबाव मिलेगा...करारा(फिल्म राजनीति का ही डायलॉग). दोबारा मत पूछना कि मैने ऐसा शीर्षक क्यों दिया?(क्लोरोमिंट की तर्ज)

@ कुन्दन, उमंग बाबू को यह फिल्म नही जमीं. कल उसने ‘स्ट्रीट कार नेम्ड डिजायर’ और ‘ द डीअर हंटर’ देखी. मेरे पास जितनी भी फिल्मे करनाल मे पड़ी है उसने उन्हें एक थैले मे रख लिया है और अभी मैने देखा कि ‘स्टोलेन किसेज’ की डी.वी.डी. वो टेबल पर रखे हुए है.

@ अनुराग लाले, तहार ई मजाल! फेर फेर पूजा से सवाल कईलअ त बूझि लीहअ! और यार अपना फोटो लगा लो, खा-म-खा लोग शक करते हैं.

@ और अब, मुझे धोने वाली इस शानदार टीम की जाने अंजाने कप्तान बनी पूजा सिंह: well done abba!! जहाँ भी गलत हो उसे जरूर बताना चाहिये. कहते हैं कि एक रचनाकार को vulnerable होना चाहिये. अपनी आलोचना को स्वीकार करना चाहिये पर उससे पहले यह हो कि साथ के लोग आलोचना तो करे! यही काम लोग नही करते हैं! इसी तरह खरी खरी सुनाने वाले मित्रो मे के.एम, आशीष, प्रभा, अनिल, चन्द्रिका हैं and they are best for me. ये लोग मेरी पचास पचास पन्नो की कहनियों को लिखने के क्रम में खारिज करने में एक सवा पल लगाते हैं पर छपने के पहले वो मुझे सही राय देते हैं. वैसे आजकल तुम्हारी ही नाम राशि वाली एक पंजाबी गायिका पर लेख तैयार कर रहा हूँ. वो गजब का गाती है और उसका पुकार नाम मिस पूजा है.

ये सारी दोस्ताना बाते इसलिये कि आपने अपनी राय रखी पर इस दोस्ताने में एक हल्की बात की बू है जिससे यह एहसास होता नजर आ रहा है कि जैसे आप लोग अपनी राय पर सही हैं और मैने कोई मसखरेपन वाली बात लिख दी है. दरअसल ऐसा हर्गिज नही है. अपने लेखक का मैं बेहद सम्मान करता हूँ और कुछ भी लिखने से पहले अपनी समझ, अपनी राय और अपना स्टैंड दुरुस्त कर लेता हूँ. मैं विनम्रतापूर्वक स्पष्ट कर दूँ कि मैने जो भी लिखा है वो पूरी जिम्मेदारी से लिखा है, शब्दों का चयन सम्पूर्ण विवेक के साथ किया है, आशय यह कि आप सबों द्वारा उठाये गये हर सवाल, हर आशंका का समूल निस्तारण कर सकता हूँ, करारा जबाव दे सकता हूँ.. वो तो बस यह है आप लोगों को उदास होते हुए सोचना मुझे अच्छा नही लग रहा है वरना मैं कोई मसखरा नही हूँ. सिर्फ आपके सवाल का जबाव देना तो फिर भी एक औसत बात है, मैं यहाँ तक बता सकता हूँ कि आपने ही वो सवाल क्यों उठाया है?
आमीन!

Anonymous said...

एक भ्रम यहां बार-बार फैलाया जा रहा है चंदन जी को बहुत पढ़ा जाता है !!

दूसरी जगहों का तो नहीं पता लेकिन ब्लाग की दुनिया में उनकी हालात काफी खराब है !!

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आप सब की सुविधा के लिए मैं एलेक्सा की अभी की रेटिंग्स को सामने रख दिया है। आप लोग इस रेंटिग्स की तुलना दूसरों की रेटिंग्स से कर लीजिएगा जो साहित्य/पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। जो गंभीर ब्लागर माने जाते हैं।(सस्ती लोकप्रियता वाले ब्लाग को छोड़िए। मैं उससे चंदन जी के संजीदा ब्लाग की तुलना नहीं करना चाहता।)

Shrikant Dubey said...

चंदन भैया, इस आलेख से मेरी असहमति तो इसके पोस्ट होने के दिन से ही थी, लेकिन एक बार जब बहस का सिलसिला चल निकला तो फिर मैं उसे ही देखता रह गया। लेकिन अब कुछ कहना जरूरी लग रहा है। पहली बात तो यह कि घटिया आलोचना की प्रवृत्ति पर वार करने के लिए मुझे इस पोस्ट की प्रासंगिकता अब तक समझ में नहीं आई। दूसरे, अगर फिल्म की लें तो आप ही की एक बात याद दिलाना चाहूंगा कि फिल्म अगर औसत दर्जे की है तो फिर उस पर बात कर टाइम क्यूं बरबाद करना (इश्किया के बारे में, तब जब कि उसमें एक कमाल के निर्देशन का मुजायरा था)? आगे, यह जरूरी नहीं कि अच्छा लिखने वाले साहित्यकार इस तरह के फ्रस्ट्रेशन से मुक्त हों (मेरा वास्ता अब तक जितने भी साहित्यकारों से रहा है, अपनी ईमानदार अवस्था में उन सभी को किसी न किसी की बेजरूरी निंदा करते पाया हूं)। एक नेता दूसरे नेता के काम और तकलीफों की कितनी समझ रखता है, इसे भी बहुत करीब से देख चुका हूं।

अंत में बस एक बात और, आपकी समझ और बेबाकपन का प्रशंशक मुझ समेत बहुतेरे लोग हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि उनकी समझ का कोई मतलब ही नहीं। जिसने भी और जो कुछ भी लिखा है, मुझे लगता है कि वह काफी सोच समझ के बाद ही लिखा होगा। लिहाजा मैं उसका सम्मान करता हूं। चंदन भैया, आपकी यह बात, कि 'करारा जवाब दे सकता हूं', अब कुछ और जली प्रतिक्रियाओं को आमंत्रित कर सकती है। बेहतर है इस बहस को विराम दिया जाए। जल्दी से कोई और पोस्ट लगाइए प्लीज...

चन्दन said...

कुछ नया पोस्ट करवाना हो तो अपने अनुवाद तो भेजो भाई!

Anonymous said...

"YOU HAVE YOUR WAY;
I HAVE MY WAY,
AND THE CORRECT WAY???...
..IT NEVER EXISTS !!! "

-- BODHISATVA

Prafull Jha said...

Chnadan jee main apke blogs kafi din se padh raha hun. film utni buri nahi hai jitna k medea wale bata rahe hain.mujhe to ye mnik se behtar lagi.darasal isme samwad hindi me kam the shayad isliye....
Agar yahi hollywood ki hoti to sab khub taariff karte.magar ghar ki murgi daal baraabar.

hindi: bhasa se sahitya tak said...

If you writing a blog which is quite popular, why do you need to comment on a film which whether good or bad will hardly make any difference in the country's development? Readers expect something else from you....