Thursday, June 24, 2010

आविष्कार और आवश्यकता




अब जब बारिश आ गई है, मौसम के कटीलें रोयें जरा नर्म पड़ गये हैं, तो इस तस्वीर को देख कर लोग बहुत कुछ अवॉट बवॉट सोचेंगे, सोचेंगे कोई नकाबपोश है, सोचेंगे हो न हो कोई आतंकवादी है.. और नही तो कोई पुलिसवाला है जो छुप के कहीं छापा डालने जा रहा है(मेरी भांजी प्राची जब बहुत छोटी थी तो अपना चेहरा अपने ही हाथों से ढँक कर समझती थी कि वो सबसे छुप गई है और बहुत ही प्यारी भोजपुरी बोलते हुए पूछती थी – मामा हम कोईजा बानी (मामा मैं कहाँ हूँ) जबकि होती वो ठीक मेरे सामने थी).

पर यह तस्वीर मई के उन दिनों की है जब तापमान बढ़ कर असीम हो चुका था और हमारे बुजुर्ग कहानीकारों की तरह हमसे बेहद नाराज लू का कहना था कि अभी नहीं तो कभी नहीं. ऐसे में जो मुँह में चांदी का चम्मच लिये नही पैदा हुए है उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. उन्हे यह सहूलियत उप्लब्ध नही होती कि ए.सी ऑफिस से निकले तो सीधा चार पहियों वाली ए.सी. में लैंड किये. हमारा तो इंतज़ार ए.सी. ऑफिस के बाहर गुस्सैल सूरज कर रहा होता है यह कहते हुए कि - मुझे यहाँ धूप में छोड़ खुद ए.सी. की हवा खा-पी रहे थे, अब चखाता हूँ तुम्हे मौसम का असली मजा. घर के उबलते हुए कमरे इंतजार कर रहे होते हैं. घड़े का पानी इंतजार कर रहा होता है जिसे घड़े ने अप्रैल में ही पानी ठंढा करने से इंकार कर दिया था. कहीं यह इंतजार ऑरेंज फ्लेवर का ग्लूकॉन डी भी करता है.

दिन में लू के थपेड़े हमारे चेहरे को झुलसा देतें हैं, पीटते हैं जैसे खूब उंचाई से गिरा हुआ आम. गर्म लू ठीक से सांस भी नही लेने देती. और फिर आप ऐसे अनोखे अनोखे और बेचारे बेचारे किस्म के मासूम इंतजाम करने में लगे रहते हैं जैसे इस तस्वीर में पूजा.

खुद की यह तस्वीर पूजा ने रिक्शे पर बैठे बैठे ही उतारी है और इस समय वो कोई मास्क या नकाब नही डाले हुए है. यह एक टिशू पेपर है जिससे इन्होने अपना चेहरा ढँक रखा है. बहुत तेज लू के खिलाफ एक जिद की तरह यह टिशू पेपर टिका है. फिर वो बात शुरु होती है जिसके लिये यह पीढ़ी मशहूर हुई जा रही है और जो बुजुर्गों को बहुत नागवार गुजर रही है. अगर रोने गाने वाली पीढ़ी ने लू के खिलाफ यह क्षणिक उपाय विचारा होता तो उसका गुण गाते(जाहिर है, रोते हुए ही), उस टिशू पेपर को ताउम्र के लिये, प्रेमपत्र की तरह, बचा रखते. पर पूजा ने ठीक इसका उल्टा किया. यह इतिहास में अमर होने की झूठी आकांक्षा रखने वाली पीढ़ी नही है इसलिये ज्यादा स्वंतत्र है और एक एक पल को जीने मे यकीन रखती है..इसलिये लू के खिलाफ यह टिशू पेपर कितना कारगर हुआ यह तो पता नही पर जैसा की तस्वीर से जाहिर है, पूजा ने टिशू पेपर में दो ऐसी जगहों पर सूराख किये जहाँ आँखे टिक रही है ताकि बाहर का भी जायजा जारी रहे.

बिना बताये समझने वाली बात यह है कि यह उपाय हमेशा हमेशा के लिये नही है और ना ही यह कोई उच्शृंखलता दर्शाती है.. यह बस एक खास समय की मुश्किल से बचने के लिये लिया गया क्षणिक सहारा है. बेहद तात्कालिक और उतना ही जरूरी.

4 comments:

डॉ .अनुराग said...

हुम!!! आईडिया बुरा नहीं है ......

रहिमन said...

लगता है आप लोगों की कोई टीम है.जिसमें सूरज, श्रीकांत, पूजा और आप खिलाड़ी हैं. आप सब अच्छा काम कर रहे हैं. पिछली कुछ पोस्ट अच्छी नही लगी थी वैसे यह आपने बहुत अच्छा लिखा है. छोटी छोटी बातों से अफसाना बनाना आप सीख गये हैं.

लू से बचने का यह आईडिया अच्छा है.

Anonymous said...

लू से नहीं बचा जा सकता, ये तो गरीबो को तब लगती है जब वो बिना कुसूर ए सी की हवा खा के बाहर निकलते है. कभी कभी लगता है की ये भी इक साजिश है. शीला जी ने देल्ही में लाल रंग की बस शुरू की है जिसमे गर्मी नहीं लगती और जिसे जादातर लोग बाहर से देख के ही खुश हो लेते है क्योकि उन्हें पता है की उनका उबलता हुआ कमरा उन्हें स्वीकार नहीं करेगा इसके बाद.

- बोधिसत्व

tarav amit said...

गर्मी भी वही है ,लू भी वही है ,टिशू पेपर भी वही! कोई नई बात तो नहीं है लेकिन फिर भी अच्छी लगी !! शायद अंदाजे बयां के कारण !!