Thursday, February 11, 2010

निकानोर पार्रा की कविता: एक अजनबी के लिए खत

जब गुजर जाएंगे साल,
साल जब गुजर जाएंगे और
हवा बना चुकी होगी एक दरार
मेरे और तुम्हारे दिलों के बीच;
जब गुजर जाएंगे साल और रह जाउंगा मैं
सिर्फ एक आदमी जिसने मोहब्बत की,
एक नाचीज जो एक पल के लिए
तुम्हारे होटों का कैदी रहा,
बागों में चलकर थक चुका एक बेचारा इंसान मैं,
पर कहां होगी तुम?
ओ, मेरे चुंबनों से रची बसी मेरी गुड़िया!
तुम कहां होगी?

निकानोर पार्रा। कविता के बंधे अनुशासन से इत्तेफाक नहीं रखने वाले और खुद को अकवि कहने वाले स्पैनिश भाषा के महान कवि। चिली के 'सान फाबियान दे आलीसियो' में 5 सितंबर 1914 को जन्में। कवि, अकवि और रूसी कविताओं के अनुवादक होने के साथ साथ गणितज्ञ भी। फनकारों की भरमार वाले परिवार से बावस्तगी। पाब्लो नेरुदा जिन दिनों कविता का सारा आकाश समेंटे हुए थे उन कठिन दिनों में निकानोर ने कविता की अपनी विशिष्ट राह बनाई।

श्रीकांत का अनुवाद। जल्द ही श्रीकांत लोर्का की कवितायें लेकर आ रहे हैं!!

11 comments:

शायदा said...

बहुत प्‍यारी कविता। बेशक, अनुवाद सुंदर है तभी कविता भाई।

Shekhar Mallick said...

प्रेम की शाश्वतता को शब्द दिए हैं. बहुत खूब. श्रीकांत भाई का पूरा परिचय दें चन्दन भाई. अच्छा काम कर रहे हैं. शुभकामनायें.

Ranjeet said...

शुक्रिया श्रीकांत. बहुत खूब

रंगनाथ सिंह said...

भई श्रीकांत तुमने जो काम शुरू किया है उससे मैं बहुत खुश हूं। यह कहुंगा कि भाई कवियो का तो तुम बहुत ख्याल रख रहे हो। कथा पर भी तुम्हारी नजर है। हम जैसों के लिए कुछ व्यक्तव्य निंबध या आलोचना का भी अनुवाद लाओ तो हमें और भी अच्छा लगेगा।

dahleez said...

sri bahut vyast rahne ke bavajood kavita pari aur tumhen likh bhi raha hoon. tum vakai bahut achhach kaam kar rahe ho. maine aur bhi kavitayaen pari hain.

सागर said...

himmat milti hai aisi kavitaon se.

Shrikant Dubey said...

आप सब को धन्यवाद. रंजीत सर, शुक्रिया के असल हक़दार तो आप हैं, जिनके कीमती इनपुट्स और प्रोत्साहन के बिना यह संभव नहीं हो पाता. रंगनाथ जी, काम तो वाकई बहुत सारे हैं, और ज़रूरी भी हैं, लेकिन उन सब के लायक वक़्त नहीं मिल पाता. लेकिन फिर भी मैं कोशिश करूंगा. सौरभ भैया (dahleez), आपकी व्यस्तताओं की खबर मुझे बखूबी है, उसमे भी आप ये कवितायेँ पढ़ते हैं, ये ही बड़ी खुशी है.

श्रीकांत

Anonymous said...

ek aur behtarin kavita padhne ko mili. tum bahut achha kam kare ho shrikant. tum se aur behtar karne ki umeed v karta hu. ye alag bat hai ki vysatata ke chalte har bar comment nahi likh pata hu. achcha lagta hai jab sath ka koi behtarin kam karta hai. bahut bahut shubhkamnaye...

Indra Mohan Jha

ashish tripathi said...

Kisee samaj ki samriddhi aur jeevaneeshakti ka pata prem ke prati uske vichar aur aacharan se lagta hai.parra mahan kavi hain.yah kavita bahut kam shabdon men prem kee behad nijee aur saghan ANUBHOOTI ko prem men doobe aadmee ki bhasha men vyakt kartee hai.kavita men maujood saghan smratimoolak AINDRIYTA aur KARUNA kavita ko uncha uthati hai.is par bat honi chahiye ki smritimoolak aindriyata aur karun kis tarah kam karte hain.badhaee

ashish tripathi said...

Shrikant bahut achcha kam kar rahe hain.unmen kavita ki gahree aur viksit hotee huee samjh hai.kavita ki bhasha kee tameez bhi,jo kam logon men hoti hai.HINDI SAMAJ ko bahul aavazon aur vivekee swikarsheelata vala banane men aisee kashishon kee bhi ek bhoomika hai.badhee.
Achcha ho ki shrikant kuch lokgeeton ka bhi anuvad Karen taki in kaviyon ke unke lok se sambandh ka bhi khulasa ho.bahut badhee.

फिरदौस, बात बोलेगी हम नहीं said...

bahut badhiya anuwad or achhi kavita padhane ke liye dhanyawad