Tuesday, February 23, 2010

भागना

(बचपन के डर और दु:साहस का यह संस्मरणात्मक आलेख पूजा का है)

चन्दन की पोस्ट ‘गुमशुदा की तलाश का स्वप्न’ पढ़कर मुझे भी अपना कुछ पिछला याद आ गया। मैं भी एक बार मार खाने के डर से घर से भाग गई थी। अगर मुझे ठीक ठीक याद तो मैं उस समय चौथी में पढ़ती थी और नौ या दस की उम्र थी मेरी। उस समय की अपनी याद्दाश्त में मैने ऐसा कोई काम नहीं करती थी जिस पर मुझे डाँट ना पड़ी हो। यह भी हो सकता है कि घरवालों के नजरिये से मैं हर काम को गलत ढंग से करती रही होऊँ। पर अपने हिसाब से मैं हमेशा सही रहती थी।

मुझे लगता कि घर में कोई मुझे प्यार नहीं करता। मेरी इच्छा होती कि दूर कहीं ऐसी जगह जाकर रहूँ जहाँ कोई मुझे जानता पहचानता न हो। लगता कि वहाँ ना तो कोई मुझे पहचानेगा और ना ही डाँटेगा। अकेले जाने में डर लगता इसलिये मैं अपने दोस्तों को भी अपनी प्लानिंग में शामिल करती। मेरी नन्ही उमर के दोस्त ऐसे मौकापरस्त होते कि जिस दिन माँ बाप से डाँट पिटती आकर मेरी योजना में शामिल हो जाते और जैसे ही उधर से थोड़ा प्यार दुलार मिलता वो सब पाला बदल लेते। थक हार कर मैं भी समय का इंतजार करने लगी कि थोड़ी बड़ी हो जाऊँ तो मैं भी अकेले ही निकल जाऊँगी।

हाँ तो बात घर से भागने की हो रही थी। तारीख तो याद नहीं लेकिन वह सर्दियों का कोई गुरुवार था। उस दिन बड़ा बाजार लगता था। और मैं हमेशा जिद करके मम्मी के साथ बाजार जाती। मुझे सब्जी मंडी की भीड़ भाड़ अच्छी लगती है। ये ऐसी जगह है जहाँ से मेरा लगाव कभी कम नहीं हुआ। फल सब्जियाँ ही नहीं मैं तो उनके खरीददारों को देखते और उनका ऑब्जर्वेशन करते हुए भी घंटों बिता सकती हूँ। उन्हे पता भी नहीं चल पाता कि कोई उनका पीछा भी कर सकता है।

मम्मी को उस दिन सब्जियों के अलावा और भी खरीदारी करनी थी और उन्होंने करीब
दो हजार रूपये ले रखे थे। हमारी गाड़ी उसी दिन शादी की बुकिंग से लौटी थी और ड्राईवर को जो किराया मिला था उसने भी मम्मी को वो पैसे पकड़ा दिये। अब चुकि मैने जैकेट पहन रखा था अत: उन रूपयों को रखने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। लेकिन उन्हे क्या पता था कि इन रूपयों के चलते शाम तक अच्छा खासा बखेड़ा खड़ा होने वाला है।

हमेशा उदास रहने वाले बाजार में उस शाम बड़ी चहल पहल थी। लग रहा था मानो इलाके के सभी घरों का राशन एक साथ खत्म हो गया है और वे सब बाजार में आ धमके हैं। तभी मैने देखा कि कुछ औरतों की टोली सनसनाते हुए एक दम मेरे बगल से गुजर गई है। मुझे इसका भी पता चला कि मेरे जैकेट की जेब में किसी का हाथ भी गया है। जब तक मैं सम्भलती वो औरते पता नहीं कहाँ अदृश्य हो गईं। मैंने अपनी जेब टटोली और डर गई। मम्मी से कहा, उन औरतों ने मेरी जेब से पैसे निकाल लिये हैं। मम्मी कुछ बोलती कि तभी उन्हे वहाँ खड़े होकर औरतों पर ध्यान रखने के लिये कह, मैं उन चोरों को ढूढने के लिये दूसरी तरफ चली आई। लेकिन जाऊँ तो कहाँ, मुझे उनका चेहरा भी याद नहीं था। अब याद आ रहा था तो सिर्फ मम्मी और दूसरे घरवालों का चेहरा।मुझे पता था कि अब मैं वो पैसा कहीं से ढूंढ नही पाऊँगी। मुझे लगा कि गलतियाँ मेरा पीछा करते हुए घर से बाजार तक आ गईं हैं।

मैं मम्मी के पास नही गई। शहर में कहाँ कहाँ देर तक घूमती रही। फिर जब रात होने लगी तो बाजार से बाहर निकल आई और अपनी कॉलोनी पहुँची। मेरे डर के बीच मुझे अपनी सबसे अच्छी दोस्त मधु का चेहरा याद आया। मधु झा। मधु से मेरी दोस्ती इसलिये भी थी क्योंकि वो टिफिन में मूंगफली की चटनी जरूर लाती थी। मैं अपने एक या दो पराठे से उसकी मूंगफली वाली चटनी बदल लेती थी। वो मुझे बहुत अच्छी लगती थी। पर आज मामला जरा दूसरा था। उसके घर पर उसके मम्मी पापा थे और छोटा भाई। दोनों एक कमरे में बैठे पढ़ रहे थे।

मुझे देखते ही वो आई। मैं भी सकपकाई हुई उनके साथ पढ़ने बैठ गई। कुछ देर बाद मैने उससे पूछा कि मैं कब तक उसके घर पर रह सकती हूँ? मधु ने कहा तो कुछ नही पर मैने महसूस किया कि आज मधु कुछ ज्यादा ही अपनापे से बात कर रही है। मुझे कुछ खटका हुआ। उसके पापा मुझे देखते ही बाहर निकल गये। मधु की आत्मीयता मुझे झूठी लग रही थी। मेरी छठी इन्द्री ने कहा “पूजा यहाँ से भाग ले”। मैने उससे पानी मांगा और जैसे ही वो पानी लाने गई मैं वहाँ से भी भाग गई। बाद में पता चला कि मेरे भईया, मम्मी सब पहले ही मेरी तलाश में वहाँ आ चुके थे और मेरे आने के बाद उसके पापा उन्ही को इत्तिला करने गये थे।

रात के आठ बज चुके थे। मैं अपने स्कूल भी गई और सोचा कि यहीं रूक जाऊँ लेकिन मन ने वहाँ ठहरने की अनुमति नही दी। वहाँ चौकीदार से थोड़ी देर ऐसे ही कुछ बात करते हुए मं मन ही मन सोच रही थी कि इतनी रात गये कहाँ जाया जा सकता है? उस समय मैं इंसानों से अधिक भूतों से डरती थी। कभी लगता अगर मैं स्कूल में रूकी तो जी हॉरर शो वाला डेविड कब्रिस्तान से आ जायेगा या अनुराधा आकर मेरे गले में दाँत गड़ाकर सारा खून पी जायेगी। फिर मैं वहाँ से अपनी कॉलोनी में आ गई। चुपके से अपने घर के पास रहने वाले अंकल के घर के पास पहुँची। चुपके चुपके उनके घर के बाहर स्थित सीढ़ी से उनके छत पर पहुँची। वहाँ से मेरे घर की छत दिखाई दे रही थी। सर्दियों के मौसम के कारण किसी के छत पर होने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। अब भी उन बातों को याद कर मेरी रूह काँप जाती है कि अगर उन उंची नीची छतों पर कहीं भी मेरा पैर फिसला होता तो मैं शायद अभी भी बिस्तर पर होती।

छत से आंगन में धीरे से झाँका। नीचे कोहराम मचा हुआ था। मम्मी रो रही थी, बगल की आंटियाँ उन्हे शांत हो जाने के लिये कह रही थी। थोड़ी दूर पर रहने वाली मौसी और उनका पूरा परिवार सब के सब नीचे बातचीत कर रहे थे। मुझे यह सब देखकर जाने क्यों हंसी आने लगी। इस बीच मैं यह भी ध्यान दे रही थी कि कहीं कोई छत पर ना आ जाये। मम्मी को रोता देख भी मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं नीचे उतर जाऊँ। रात के दस ग्यारह बज जाने के बावजूद घर पर लोग जाग रहे थे।

सीढ़ी से नीचे जाने पर आंगन और अन्दर वाला कमरा आता था। जहाँ सिर्फ सामान और एक तख्त रखी हुई थी। छत पर ठंढ भी लग रही थी। जब सब इधर उधर हुए तो मैं धीरे से अन्दर वाले कमरे के तख्त के नीचे जाकर छुप गई। मम्मी की बार बार तेज से रोने की आवाज सुन कर मैने फिर से भागने का निर्णय लिया और सोचा, कहीं भी जाऊँगी लेकिन घर नही जाऊँगी। और फिर मैं उतनी रात में छत पर आ गई।

बस मुझसे यहीं चूक हो गई। मेरे बगल के पप्पू भईया मेरी खोजबीन में मची अफरातफरी का लाभ लेते हुए छत के एक कोने में सिगरेट पी रहे थे। उनके घर में किसी को पता नहीं था कि वो सिगरेट या शराब पीते हैं। मैं उनसे बहुत डरती थी। उन्होने मुझे देखा तो एक क्षण के लिये मेरी सांस ही टंग गई और घबराकर मैं छत से सीधे नीचे कूद गई। उन्होने शोर मचाना शुरु किया और फिर ....मुझे घर पहुंचा दिया गया। आगे क्या हुआ उसके बारे में मत पूछिये। बस एक बात कहूँगी कि उस दिन मम्मी ने रोते रोते कहा था, “इस लड़की को भागने की आदत पड़ जायेगी”।

मम्मी की यह बात आशिर्वाद की तरह फली। पढाई और रोजगार के सिलसिले में शहर दर शहर भागते रहना ही वह आशिर्वाद था।

15 comments:

Shrikant Dubey said...

पूजा, घर में बैठे बैठे आपका ये लिखना सामने आ गया. कान पर फ़ोन लगाये था, सो ये सारा किस्सा जैसे का तैसे अपनी बहन को सुना डाला. पूरा सुनने के बाद उसने जो पहली बात कही, वो ये थी कि "अरे ये तो जैसे मेरी अपनी कहानी है. " वो अब से लगभग बारह पंद्रह साल पहले के दिनों में चली गयी और गोरखपुर के एक सब्जी बाज़ार 'गिरधरगंज' का जिक्र करने लगी. थोड़ी तफसील में गयी तो ये बोली की मैं सिर्फ घर से निकल जाने का साहस कभी नहीं कर पायी, वरना बाकी का सारा कुछ हू ब हू महसूस किया है. उम्र में वो मुझ से महज दो साल बड़ी है, और पूरे बचपन साथ रहने के बावजूद मैं उसकी इस फीलिंग से अंजान था. आपकी इस आप बीती ने बड़ा काम किया. लिखने का तरीका भी दिलचस्प रहा.

शुक्रिया और बधाई.

श्रीकांत

aravind said...

दस साल की उम्र और यह कारनामा!
आप अपने जीवन में भी इतनी साहसी होंगी।

chandan pandey said...

पूजा, तुम्हारे ये अनुभव पढ़ते हुए डर लगता रहा। साथ ही वो कहावत भी चरितार्थ होती दिखी कि पूत के पाँव पालने में दिख जाते हैं! पर साथ ही ‘हलो’ फिल्म की याद भी आती रही। यह पूरा वर्णन एक अच्छी फिल्म बन सकता है।

संदीप पाण्डेय said...

चंदन हलो ही क्यों मुझे तो सोलहवां साल, इस रात की सुबह नहीं जैसी वे तमाम फिल्में याद आ गई जो एक रात की पूरी कथा कहती हैं। पूजा का लिखा बाल मनोविज्ञान का दस्तावेज तो है ही साथ ही हर मां बाप को भी इसका पाठ करना चाहिए ।

Aparna said...

How much reality it carries Pujaji?

शशिभूषण said...

सुंदर.अच्छी भाषा.

यह भी सोचें इसे किसी विमर्श कैंप की लेखिका लिखती तो जैकेट से पैसे उड़ानेवाले पुरुष होते.वे बुरी नज़र भी डालते.

इसमें पिता का रोल भी होता उन्हें भले ही छुट्टी लेनी पड़ती.छुट्टी नहीं ही मिलती तो चाचा वगैरह को कार्यभार सौंपा जाता.


सीधे छत से कूद जाने को उसके बाद की कोई बात न बताने को शायद फ़िल्मवाले भी नज़रअंदाज़ न कर पाएँ.

जिस वक्त पढ़ा साथ में हेमंत कुमार की आवाज़ में गाना भी सुन रहा था मैं जनम का बंजारा बंधु जनम जनम बंजारा.यह संयोग ही था

बहुत अच्छा लगा पढ़कर.

chandan pandey said...

संदीप, शायद तुमने अपने सल्लू मिया वाली हलो समझ लिया, चेतन भगत वाली। मैं उस हलो की बात कर रहा हूँ जिसे संतोष सिवन ने निर्देशित किया था। शॉर्ट फिल्म। एक आठ नौ साल की बच्ची है जिसका कुत्ता खो गया है और शहर में दंगा फैला हुआ है। वो बच्ची अपना कुत्ता ढूंढ रही है........

chandan pandey said...

@अपर्णा, संस्मरण में सब कुछ सत्य ही होता है। यह एक विधा है जिसमे हम अपने जीवन के अनुभव बाँटते हैं। यह किस्सा नही होता है।

Pooja said...

अपर्णा जी
आप की टिप्पणी ... आप क्या कहना चाह रहीं हैं. मैं समझ नहीं सकी. आपको लगता है कि यह झूठ है तो झूठ मान लीजिये और अगर आपको लगता है कि सच है तो सच . सारा खेल तो मानने न मानने का है. चन्दन ने आलेख के ऊपर लिखा भी है कि यह संस्मरण है. फिर और कुछ कहने को नहीं बचता है.

संदीप पाण्डेय said...

चंदन मैं सचमुच चेतन भगत वाली हलो समझ बैठा था। उसके पीछे वजह शायद एक रात की कहानी होना था।

Suchita Shukla said...

pooja yaar juz apne types gr8 yaar bhagenge nahi toh cheeze explore kaise karenge... :)

dhongi said...

ITS GOOD BUT I DO NOT UNDERSTAND WHAT YOU WANT TO SAY

dZIYd said...

Lajabab hai tumra yah sansmaran. sach to isse tumare bachpan me sahasi hone or

Bikjash Rao said...

achcha to bachman to tumara khurapat koi kam nahi tha. kewal ghar se bhagna he nahi balki iski planing bhee banaati thi. sansmaran likhne ki tumari bhasha shaily behad romanchak hai or intresting hai . very nice..........

shridhar said...

hi pooja,pura lekh ek bar me padh gyaa....good..mujhko mera bachpan yaad aa gaya aur saath hi saath srikant ka camment pdkr man bhig uta..

Shridhar.