Sunday, February 21, 2010

भेड़िया, मैं

(यह कविता सूरज की है)

मिशालों की जरूरत,
किस्सों की खुराक
और अपने
अपराधों को श्लील दर्ज करने के
लिये सभ्यता ने तुक्के पर ही
भेड़िये को बतौर खलपात्र चुना

इंसान की रुहानी भूख के लिये
घृणित किस्सों का किरदार बना
भेड़िया, जान ना पाया अपना
अपराध, जबकि यह बताने में
नही है किसी क्षमा की दरकार
कि शिकार कौन नही करता

बेदोष, मूक भेड़िये की लाचारी का
बहाना बनाते रहें अपनी आत्माओं
के सौदागर यह जान लें कि शेर
और नेवले शिकारी हों या इंसान,
तरीका भेड़िये से अलग नही होता

वे हम थे जिनने शेर और भालू
की उंची बिरादरी के आगे टेके
घुटने माथा झुकाया और उनकी
प्रतिष्ठा में फूंकने के लिये प्राण
भेड़िये का बेजाइस्तेमाल किया
उसे गुनहगार बनाया, जंगली
जलसों से उसे इतनी दूर रखा
जिससे बनी रहे उसके मन में
दूरी का बेबस एहसास, लगातार

भेड़िये की गिनती फिक्र का विषय
नहीं रही कभी, उसकी मृत्यु पर ढोल
और ताशे हमने ही बजाये

उसकी उदासी पर फिकरे कसे गये
(चुप रहने वालों को कहा गया घातकी)
अपने अपराधों के लिये मुहावरेदार साथी
बनाया भेड़िये को सभ्य मानव ने

इंसानों से छला गया यह जीव सदमें में
रहा होगा सदियों तक, सर्वाधिक बुद्धिमान
प्रजाति द्वारा दिये गये धोखे की नहीं थी
जरूरत, उसे अलग थलग करने के लिये
आविष्कृत हुए किस्म किस्म की हंसी,
खौफ और शब्दों के हथियार

हार नही मानी भेड़िये ने जिसके पास
जीते चले जाने के सिवा नही था कोई
दूसरा या तीसरा रास्ता

इतिहास के सबसे निर्मम और मार्मिक
एकांत में जीवित इस जीव ने साधा
सदियों लम्बी अपनी उदासी को, हम
रोने की उसकी सदिच्क्षा को जान भी
नही पाये

इतिहास के निर्माण में शामिल और
उसी इतिहास से बहिष्कृत भेड़िया
कभी नहीं रोता अपने निचाट
अकेलेपन पर

एक पल के लिये भी नहीं।

10 comments:

डॉ .अनुराग said...

बेमिसाल .......कई बार पढ़ चूका हूँ.....पर

Udan Tashtari said...

अद्भुत!

श्याम कोरी 'उदय' said...

...sundar rachanaa !!!!

अनिल कान्त : said...

behtreen !

हिमांशु । Himanshu said...

"इतिहास के निर्माण में शामिल और
उसी इतिहास से बहिष्कृत भेड़िया
कभी नहीं रोता अपने निचाट
अकेलेपन पर"..

बेहतरीन ! अदभुत रचना !

नीरज मुसाफिर जाट said...

सुन्दर रचना!!!!!

दिगम्बर नासवा said...

उफ्फ ... ग़ज़ब का विद्रोह है इस रचना में ... कमाल के तेवर ... बहुत बार पढ़ी ... हर बार महसूस किया ...

Aparna said...

Mind Blowing!!!! Suraj ji, you are terrific, from where you bring these awesome imagination!!!! Congratulations

अल्पना वर्मा said...

सूरज जी की लिखी इस कविता में विद्रोह के स्वर हैं.
बहुत अच्छी कविता.

Pankaj Upadhyay said...

वाह...कभी खयाल ही नही गया बेचारे ’भेडिये’ पर..
और क्या लिखा है दोस्त..मान गये..