बचपन में स्कूल से लौट जब दादा जी अंग्रेजो के बारे में पूछता था तो वो कुछ भी सही नहीं बता पाते थे. बस इतना ही कहते थे की अंग्रेजो ने बहुत जुल्म किया. ये तो बाद में पता चला कि मेरे दादा जी की ही तरह ज्यादातर लोग कभी अंग्रेजो से मुखातिब हुए ही नहीं/अंग्रेजो के सामने पड़े ही नहीं. परन्तु आजादी की लहर में किस्से भी गढ़े गए. इसके बारे में कभी विस्तार से आउंगा पर अभी यह बताना चाह रहा हूँ कैसे हम अचानक अपने आप को इतिहास बना रही जगहों के आस पास पाते हैं.
करनाल एक बहुत छोटी जगह है और मैं उस दिन अहमदाबाद से लौटा ही लौटा था. मेरे एक असिस्टेंट ने बताया कि आज मनोज बबली हत्याकांड मामले का फैसला सुनाया जाएगा. जानकारी भर के लिए बता दू कि मनोज बबली, करोड़ा गाँव के युगल थे, जिन्होंने अपनी मर्जी से विवाह किया. इनकी निर्मम ह्त्या उस समय कर दी गयी थी जब ये देश की बहादुर पुलिस के संरक्षण में पिपली से दिल्ली जा रहे थे. इन्हें बाकायदा बस से उतार कर, मार कर, नाहर में फेंक दिया गया था.
मैंने जल्दी जल्दी रिपोर्ट वगैरह बनाया, सबमिट किया और कचहरी चला आया. कचहरी तथा आस पास की इमारते भरी हुई थीं. तंज हरियाणवी हर जगह गूँज रही थी. जब फैसला सुनाया गया तो अब लोग चाहे जो कहे(और इन लोगो में मैं पत्रकार बंधुओ को भी शामिल कर रहा हूँ) तो किसी को यकीन नहीं हुआ. एक बारगी तो जो जितना बड़ा बुद्धिजीवी था उसने उतना बड़ा झूठ बताया. पर धीरे धीरे लोगो ने फैसले के पक्ष में अपना पाला बदलना शुरू किया. फैसला था: पांच को फांसी, एक को उम्र कैद, एक को सात वर्ष की सजा.हरियाणे का यह तीसरा मौका है जब किसी को फांसी सुनाई गयी
तालिबान के जिस हिन्दू संस्करण के खिलाप यह फैसला है उसके खिलाफ इस स्तर तक खुद को तैयार करना बहुत साहस का कार्य है वरना आप बाहर से चाहे जितनी हल्की बात माने, पर हरियाणा में रहते हुए आप इन पंचायतो के खिलाफ ऊँची आवाज में बोल भी नहीं सकते. इनके अपने तर्क हैं, जैसे हर धोखेबाज के होते है, हू-ब-हू उसी तरह या जैसे तर्क हत्यारों के होते है. यहाँ के आला पुलिस अफसरान तक ने ऑफ़ दी रिकार्ड इन "ओनर कीलिंग्स" का समर्थन किया है, नेताओं और अन्य रीढ़ हीनो की तो बात ही जाने दे.
मनोज की माँ ,चंद्रपति, का यह बहुत बड़ा संघर्ष रहा है. आज भी गाँव वाले उसे प्रतारित करने का कोइ मौका छोड़ नहीं रहे है.उसे अपनी जमीन पर खेती तो नहीं ही करने दे रहे है बल्कि उस जमीन को पट्टे पर लेने वालो को भी डरा धमका रहे हैं. अपने जीवन में धोखे इत्यादि को अपना उद्देश्य बना चुके लोग भी कह रहे है कि वो बुढिया बेकार में तमाशा कर रही है,अब तो जो होना था वो हो लिया. यह संश्लिष्ट विश्लेषण का विषय है पर खुद को इन सारे प्रवाह के बीच पाकर लगा कि जाना जाए आखिर कुछ लोग ऐसी हिमाकत कैसे कर जाते है? वो कौन सा वकील है जो पैसे इत्यादि पर नहीं बिका? और वो जज? सुश्री वाणी गोपाल शर्मा नाम है उनका. सिर्फ फैसले पर ना जाए, उस फैसले को बारीकी से पढ़ने पर मालूम होता है कि उस इस महिला का स्टैंड क्या है और अपने सामाजिक किरदार को लेकर वो कितनी दृढ प्रतिज्ञ है.
मैंने तय किया है कि मैं इन सबसे मिलूंगा. चारो तरफ जिस अँधेरे की तारीफ़ में इस देश की मीडिया मारी जा रही है( पढ़े टाइम्स ऑफ़ इंडिया के आज और कल के अखबार; वो उन हत्यारों को नायक बनाने का कोई कोर कसार छोड़ना नहीं चाहती है, ढूंढ ढूंढ कर ऐसे ऐसे लोगो के साक्ष्ताकार छाप रही है जो इन हत्याओं को जायज ठहराते है) उसी समय ये जज, ये वकील और वो पत्रकार प्रिंस जिसने सबसे पहले यह खबर लगाई थी, उनसे एक एक कर के मिलना की इच्छा है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया चाहे जितनी मर्जी जोर से कह ले कि फैसले का असर इन पंचायतो पर नहीं पडा है, पर मैंने करीब से लोगो की आवाज बदलते देखा है. अगर बाकी के मामले में ऐसे ही फैसले आये और उन्हें लागू भी किया जाए तो पंचायतो पर ही नहीं पूरे देश पर असर पडेगा. फिर यह समाचार चैनल शानिया और शोएब से ज्यादा पंचायती मामलों पर टी आर पी लूटेंगे. नेता प्रेम के पक्ष में बोलते हुए पाए जायेंगे. धोखेबाज लोग घडियाली ही सही पर आंसू बहाते पाए जायेंगे.