
(अगर आप मानव मन के भय संसार की सीधी अभिव्यक्ति के काईल हैं तो मोहसिन हामिद को जरूर पढ़ें. 1971 और पाकिस्तान में जन्मा यह कथाकार मनुष्य के अकेले होते जाने को अपना विषय बनाता है. यह अकेलापन भी ऐसा कि किसी इंसान के खिलाफ, जाहिर है वह इंसान किसी सभ्य सभ्यता का प्रतिनिधि है, पूरा समय भिड़ गया है. उपरी तौर पर देखें तो वह इंसान दूसरों से ही नहीं बिल्कुल अपने खास लोगों से भी बचता फिरता है जैसे सारी समस्याओं की जड़ वही हो. सामाजिकता मात्र को अपनी आलोचना का साग सत्तू बनाकर लगभग ठप्प पड़ चुके लोग इसे उदार होते होते भी आत्मग्रस्त होने के अलावा कोई दूसरा दर्जा नहीं दे पाते. जबकि इस बात की गिरह मीर ने यों खोली है: साये की तरह हमपे अजब वक्त पड़ा है.
इस समय के बेहतरीन रचनाकारों में से एक मोहसिन हामिद की इस कहानी ‘जिबह’ का अनुवाद मनोज पटेल ने किया है.)
जिबह
मैनें खिड़की के टूटने की आवाज़ सुनी. एयर कंडिशनर चालू नहीं था कि ये आवाज़ दब पाती. मैं बिस्तर से उठा. मैनें सोचा कि काश मैं इस उम्र में न होता. काश कि मैं अपने माँ-बाप जितना बुजुर्ग या अपने बेटे जितना छोटा होता. काश कि मुझे अपनी बीवी से यह न कहना पड़ता कि वह जहाँ है वहीँ रहे और सब कुछ ठीक हो जाएगा. वह भी ऐसी आवाज़ में जिस पर उसे तो क्या मुझे भी भरोसा न हो पाए. हम दोनों नीचे शोरगुल सुनते हैं. मैं पत्नी से कहता हूँ: 'बेहतर होगा तुम कपड़े पहन लो'.
बिजली नहीं है इसलिए रास्ता देखने के लिए मैं अपने मोबाइल की रोशनी का इस्तेमाल करता हूँ. तब तक लकड़ी की सीढियों पर तेजी से चढ़ते क़दमों की आवाज़ सुनाई देने लगती है. मैं अपने बेडरूम का दरवाज़ा बंद कर खुद को भीतर कैद कर लेता हूँ. कई टार्चों की रोशनी में तमाम परछाइयां दौड़-भाग रही हैं. मैं अपने दोनों हाथ ऊपर उठा देता हूँ. मैं ही उनसे कहता हूँ ‘'मैं यहाँ हूँ'’. मैं इसे जोर से कहना चाहता हूँ. लेकिन बच्चे की आवाज़ में फुसफुसाता हूँ, 'सब ठीक-ठाक है'.
मैं फर्श पर पड़ा हूँ. किसी ने मुझ पर वार किया है. मुझे पता नहीं कि हाथ से या डंडे से. मेरा मुंह किसी तरल चीज से भर गया है और मैं एक लफ्ज़ भी नहीं बोल पा रहा हूँ. मेरा गला घुट रहा है और मुझे सांस लेने के लिए अपने जबड़ों को खोले रखना पड़ रहा है. मेरे हाथ पीछे करके दोनों कलाइयां एक-दूसरे से बाँध दी जाती हैं. ये बिजली वाले टेप जैसा लगता है, वैसा ही जैसा बचपन में गली क्रिकेट खेलने के लिए हम टेनिस गेंद के चारो तरफ लपेट दिया करते थे. मैं मुंह के बल पड़ा हूँ और भीषण दर्द की वजह से होश खोने के पहले मेरे मुंह से कुछ अस्फुट से स्वर निकलते हैं.
मैं दो लोगों के बीच में हूँ. वे दोनों मुझे बगलों से थामे हुए सामने के दरवाज़े से बाहर घसीट रहे हैं. मुझे वक़्त का अंदाजा नहीं मिलता लेकिन अब भी रात है. बिजली आ जाने की वजह से गेट की लाइटें जल गई हैं. चौकीदार मर चुका है. वह एक बूढ़ा आदमी था जो दोहरा होकर जमीन पर पड़ा है. उसका चेहरा कितना पतला है, लगता है जैसे हम उसे भूखों मार रहे थे. मैं हैरत में हूँ कि इनलोगों ने उसे कैसे मारा होगा. उसके खून के निशानों को मैं गौर से देखने की कोशिश करता हूँ, लेकिन मेरे पास ज्यादा वक़्त नहीं है.
मुझे लगता है कि वे चार लोग हैं. उनके पास ताम्बई रंग की 81 माडल करोला है. जब मैं छोटा था तो हमारे पास ऐसी एक कार हुआ करती थी. लेकिन यह कार बहुत खस्ताहाल है. वे डिग्गी खोलकर मुझे उसमें पटक देते हैं. अब मैं कुछ देख नहीं पा रहा. मेरे चेहरे का कुछ हिस्सा एक खुरदुरी कालीन पर और बाक़ी हिस्सा अतिरिक्त टायर पर है. इसका रबर मुझसे चिपक रहा है, या शायद मैं ही इससे चिपक रहा हूँ. कार के शाकर खराब हो चुके हैं और हर झटका इसे पटक रहा है. मैं दांतों के डाक्टर के यहाँ होने जैसा महसूस करता हूँ जबकि दर्द पहले से होता रहता है और आपको पता होता है कि अभी और दर्द मिलने वाला है. आप इस दर्द को कम करने के लिए तमाम दिमागी तरकीबों पर सोचते हुए अपनी बारी का इंतज़ार करते होते हैं.
मैं ज्वरग्रस्त महसूस करता हूँ, कंपकंपी लेकर आने वाले तेज मलेरिया बुखार सा जो मुझे नींद के अन्दर-बाहर बहाता रहता है. मैं उम्मीद करता हूँ कि इन लोगों ने मेरे बेटे, मेरी बीवी और मेरे माँ-बाप को जान से नहीं मारा होगा. मेरी बीवी के साथ बलात्कार नहीं किया होगा. मैं उम्मीद करता हूँ कि वे मेरे साथ और जो भी करें, मुझपर तेज़ाब का इस्तेमाल नहीं करेंगे. मैं मरना नहीं चाहता लेकिन अब मरने की बहुत परवाह भी नहीं करता. बस ये चाहता हूँ कि वे मुझे यातना न दें. मैं यह नहीं चाहता कि कोई मेरे अंडकोषों को प्लास से दबा कर पीसे या मेरी आँख में जलती हुई सिगरेट डाल दे. मैं नहीं चाहता कि कार का यह सफ़र कभी ख़त्म हो. अब मैं इसका आदी होता जा रहा हूँ.
वे मुझे सूरज की रोशनी में बाहर निकालते हैं. वे सब मुझसे काफी बड़े, लम्बे-चौड़े हैं. वे मुझे एक ऐसे मकान में ले जाते हैं जिसकी दीवारों से पेन्ट झड़ रहा है और मुझे बाथरूम में बंद कर देते हैं, जिसमें कोई खिड़की नहीं बस एक रोशनदान है. मैनें पैन्ट में ही पेशाब कर दी थी जो अब सूख चुकी है. इसकी वजह से मेरे पैरों में खुजली सी हो रही है. मैं चूं-चपड़ नहीं करता और वहां बैठकर उनका साथ देने के लिए खुद को तैयार करता हूँ. मैं उम्मीद करता हूँ कि मुझे नमाज़ अता करने का ढंग ठीक-ठीक याद होगा. मैं उनसे कहूंगा कि मुझे नमाज़ पढने दें. यह दिखाने के लिए हम एक ही जैसे हैं. लेकिन मैं यह ख़तरा भी नहीं उठा सकता. नमाज़ अता करने में की गई मेरी किसी भी गलती को वो भांप लेंगे और तब तो स्थिति और खराब हो जाएगी. शायद मुझे अपने आप में बुदबुदाना चाहिए ताकि वे सोचें कि मैं मजहबी आदमी हूँ.
अंधेरा होने पर वे फिर वापस आ जाते हैं. वे जिस ज़बान में बात कर रहे हैं उसे मैं नहीं समझ पाता. मुझे यह अरबी या पश्तो नहीं लगती. क्या है यह ? क्या यह चेचेन है ? कौन सी ज़बान है यह कमबख्त ? ये कमबख्त लोग कौन हैं ? मेरी आँखों से आंसू बहने लगे हैं. ये अच्छा है. मैं जितना दयनीय लगूं उतना ही अच्छा. 'जनाब' मैं अधिकतम संभाव्य खुशामदी लहजे में उर्दू बोलने की कोशिश करता हूँ, 'मुझसे क्या खता हो गई ? मुझे माफ़ कर दीजिए'. मेरा मुंह ठीक से काम नहीं कर रहा इसलिए मुझे धीमे बोलना पड़ रहा है. तिस पर भी मेरी आवाज़ से लगता है कि मैं नशे में हूँ, या जैसे किसी ने मेरी आधी जुबां ही काट ली हो.
वे मेरी बातों पर ध्यान नहीं देते. एक आदमी तिपाए पर वीडियो कैमरा व्यवस्थित कर रहा है. दूसरा कार की बैटरी के आकार के एक यू पी एस में तार जोड़ रहा है. मैं यह सब समझ रहा हूँ. लेकिन मैं यह नहीं चाहता. बलि का बकरा नहीं बनना चाहता मैं. वैसा ही जैसा कि हमने ईद पर खरीदा था. वो एक अच्छा बकरा था लेकिन उसकी आँखें मरी-मरी सी थीं. मुझे उसकी आँखें नहीं पसंद थीं. कुछ चबाता हुआ वह बगल से देखने पर अच्छा लगता था. वह एक पालतू की तरह था. हालांकि मैंने उसे कभी पालतू नहीं बनाया लेकिन वह पालतू जैसा ही हो गया था. उसके पैर छोटे थे. इतने छोटे कि वह पत्तियों तक पहुँचने के लिए एक ईंट पर खडा हो सकता था. मेरे माँ-बाप ने एक आदमी द्वारा उस बकरे को मैदान में पटकते देखने की इजाज़त मुझे दे दी थी. उसने एक दुआ पढ़ी थी और बकरे को खुदा के नाम पर कुर्बान कर दिया था.
'रुकिए, ऐसा न करिए', मैं अब अस्पष्ट, बेमतलब आवाज़ में अंग्रेज़ी बोलने लगा हूँ. लफ्ज़ मेरे मुंह से टपक पड़ रहे हैं. मेरा उन पर बस नहीं रहा. वे आंसुओं की तरह हो चले हैं. 'मैनें हमेशा खुद को काबू किए रखा, मजहब के बारे में कभी कुछ नहीं लिखा. हमेशा अदब से पेश आया. अगर मुझसे कोई खता हुई हो तो बताइए मुझे. मुझे जो लिखना हो बताइए. मैं अब कभी कुछ लिखूंगा ही नहीं. अगर आप लोग ऐसा चाहते हैं तो मैं कभी कुछ नहीं लिखूंगा. यह मेरे लिए कोई मुद्दा नहीं है. यह कोई जरुरी नहीं. हम एक ही जैसे हैं. हम सभी. भरोसा करिए'.
वे मेरे मुंह पर टेप चिपका देते हैं और मुझे पेट के बल लिटाकर खूटों से बाँध देते हैं. उनमें से एक मेरी पीठ पर चढ़ जाता है और बाल पकड़कर मेरा सर ऊपर उठाता है. वह कामुक ढंग से यह काम करता है. मैं सोचता हूँ कि क्या पता मेरी बीवी अभी तक ज़िंदा है या नहीं और मेरे न रहने पर क्या वह किसी गैर मर्द के साथ सोएगी. कितने मर्दों के साथ सोएगी वह ? मैं उम्मीद करता हूँ कि वह ऐसा नहीं करेगी. मैं उम्मीद करता हूँ कि वह ज़िंदा बची हो. मैं अब उस शख्स के हाथ में लंबा सा चाकू देख सकता हूँ. वह कैमरे की तरफ देखते हुए कुछ बोल रहा है. मुझसे अब कुछ और नहीं देखा जाता. मैं अपनी आँखें बंद कर लेता हूँ. काश कुछ ऐसा होता कि मेरी छाती अभी फट जाती और मैं तुरंत मर जाता. मैं और नहीं रुकना चाहता.
और तभी मैं यह सुनता हूँ. अपने खून के फव्वारे के तेजी से बाहर फट पड़ने की आवाज़ सुनता हूँ. आँखें खोले मैं अपने खून को फर्श पर रोशनाई की तरह बहते देखता रहता हूँ. मैं रोशनाई देखता रहता हूँ, इससे पहले कि मेरा शरीर उससे खाली हो, मेरा खात्मा हो जाता है.
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किसी पत्रिका से बिना बताये रचना उठाये जाने को अगर ‘साभार’ के केटगरी में शामिल कर सकतें हैं तो यह कहानी ग्रांटा से साभार.