आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेजार है
क्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार है
तीरगी अब भी मजे में है यहाँ पर दोस्तों
इस शहर में जुगनुओं की रौशनी दरकार है
भूख से बेहाल बच्चों को सुनाकर चुटकुलें
जो हँसा दे, आज का सबसे बड़ा फनकार है
मैं मिटा के ही रहूँगा मुफ़लिसी के दौर को
बात झूठी रहनुमा की है मगर दमदार है
वो रिसाला या कोई नॉवल नहीं है दोस्तों
पढ़ रहा हूँ मैं जिसे वो दर्द का अखबार है
खूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो
बेचने की ठान लो तो हर तरफ़ बाजार है
रास्ते ही रास्ते हों जब शहर की कोख में
मंज़िलों को याद रखना और भी दुश्वार है
(कुमार विनोद का परिचय यहाँ)
Showing posts with label कुमार विनोद. Show all posts
Showing posts with label कुमार विनोद. Show all posts
Friday, February 26, 2010
Friday, January 29, 2010
कुमार विनोद की कवितायें

कुमार विनोद शहर अम्बाले की पैदाईश। कवि। गज़लसरा। एक कविता संग्रह प्रकाशित। इसी महीने गज़ल संग्रह “बेरंग हैं सब तितलियाँ” आधार प्रकाशन से प्रकाशित। फिलवक्त कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के गणित विभाग में बतौर असोसिएट प्रोफेसर। इनकी गज़लों पर विस्तृत चर्चा के लिये गौतम राजरिशी पर क्लिक। नई बात पर आज इनकी कवितायें। जल्द ही इनकी गज़लों के साथ हाजिर होते हैं।
सफर में
राह में
गर तुम साथ नहीं
तो कोई बात नहीं
बशर्ते कि
अगले पड़ाव पर
फिर से तुम्हारा साथ हो
पत्नी के लिये कवितायें
ऋण
ऋणी बनाने के लिये
क्या माँ ही काफी नही थी
जो तुम
मेरी जिन्दगी में
यूँ चली आई
तुम और मैं
मेरे लिये
तुम
खुशी में
गाया जाने वाला गीत
दु:ख में
की जाने वाली
प्रभु की प्रार्थना
Subscribe to:
Posts (Atom)