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Saturday, June 25, 2011

महेश वर्मा की छ: नई कविताएँ

कविता और उसकी राजनीति से इतर की बहसों ने कविता को रूप बन्ध और चाक्षुष ऐन्द्रियता के निकट ला खड़ा किया है. जिससे ज्यादातर कविता अपने चुस्त मुहावरेदारी, स्मार्ट भाषा (जिसमें सिनेमाई गीतों से होड़ अधिक है) की वजह से नजर खींचती जरूर है पर अपने विधान से उनकी दूरी खटकती है. मसलन, हम पाते हैं कि कविता का वाक्य हमें विचार से अधिक दृश्य, और वो भी देखा हुआ या कल्पित, तक पहुंचा देता है. जबकि गढ़े हुए आसान दृश्यों से भरे पूरे इस जमाने में होना यह चाहिए था कि कविता खुद को चाक्षुष होने से बचाती. या कह लें कि प्रतीक रचने की कोशिश करती, जैसे महेश वर्मा की कविताएँ.


बतौर कवि महेश की तैयारी इतनी जबर्दस्त है कि वो कविता में लय बँधने ही नही देते. सायास वो कविता को चाक्षुष होने से बरजते हैं. गढ़ने की शर्त पर महेश छवि नहीं, किम्वदंती की राह लेते हैं ( चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं). इनका लगाव जितना कविता के पाठकों से है उतना ही कविता से और यही वजह है कि पाठको के लिए इस्तेमाल “आम फहम तर्क( स्पून फीडिंग)” के सख्त खिलाफ होते हुए स्वयं पाठकों से संयत तैयारी की माँग रखते हैं.

प्रस्तुत हैं महेश की छ: नई कविताएँ. चित्र 'रॉल्फ क्लुएंटर' का.








पानी


अब वही काम तो ठीक से करता , वहाँ भी
पिछड़ ही गया वाक्य सफ़ेद कुर्ते में पान खाकर
तर्जनी से चूना चाटने की तरह कहा जाता
जहाँ उसी आसपास साईकिल अब कौन चढता है
प्रश्न के उत्तर की तरह चलता हुआ ब्रेक इसलिए
नहीं लगा पा रहा था कि रुकते ही प्यास
लगेगी. बिना अपमान के सादा पानी छूंछे
पीकर निकल जाना मुश्किल होते जाने के शहर
में या तो मंत्री हो गए सहपाठी का किस्सा सुनाते
परचूनिए से उधार ले लूं या पत्रकार बन जाऊं के विकल्प
को छोड़ कर कविता लिखना तो ट्यूशन पढ़ाने से भी
कमज़ोर काम कि पीटने के लिए छात्र और दांत
दिखाने के लिए विद्यार्थी की महिला रिश्तेदार भी
नहीं . धूप में साइकिल कहीं रोकने में पुराने पंक्चर
के खुलने का डर तो इस दोगलेपन का क्या
कि जो दरवाजा जीवन से कविता की ओर खुलता
वही दरवाजा कविता से जीवन में लौटने का नहीं .

इस वाक्य ने डरा ही दिया जिसकी चूने वाली मुद्रा
पहले ही बोल चुका जो यूं सुनाई दिया कि कविता में
भी पिछड़ गया, कम से कम वही ठीक से लिखता .

 
 
चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं


जंगल के बीच से किम्वदंती की तरह वह आई प्यास उस
गाँव में और निश्चय ही बहुत विकल थी .

और चीज़ें क्यूं पीछे रहतीं जब छोटी रानी ही ने उससे
अपनी आँखों में रहने की पेशकश कर दी , लिहाजा
उसे धरती में ही जगह मिली जहां की मिट्टी का उदास
पीला रंग प्रेमकथाओं की किसी सांझ की याद दिलाता है .

पहली जो सुराही बनी वह भी प्यास धरने के लिए
ही बनी थी लेकिन कथाएँ तो गलती से ही आगे बढ़ती हैं .

आगे बढ़ती ट्रेन उस पुराने गाँव की पुरानी कथा में
थोड़ी देर को जब रुकती है तो लोग दौड़कर दोनों
हाथों में सुराहियाँ लिए लौटते हैं - कथा में नहीं बाहर
सचमुच की ट्रेन में .

वे भी इसमें पानी ही रखेंगे और विकल रहेंगे,
गलती दुरुस्त नहीं हुई है इतिहास की .

 
 
धूल की जगह


किसी चीज़ को रखने की जगह बनाते ही धूल
की जगह भी बन जाती . शयन कक्ष का पलंग
लगते ही उसके नीचे सोने लगी थी मृत्यु की
बिल्ली . हम आदतें थे एक दूसरे की और वस्तुएँ
थे वस्तुओं के साथ अपने रिश्ते में .

कितना भयावह है सोचना कि एक वाक्य
अपने सरलतम रूप में भी कभी समझा नहीं
जा पायेगा पूर्णता में . हम अजनबी थे अपनी
भाषा में , अपने गूंगेपन में रुंधे गले का रूपक
यह संसार .

कुछ आहटें बाहर की कुछ यातना के चित्र .ठंड में
पहनने के ढेर सारे कोट और कई जोड़े जूते हमारे
पुरानेपन के गवाह जहाँ मालूम था कि धूप
आने पर क्या फैलाना है , क्या समेट लेना है
बारिश में .

कोई गीत था तो यहीं था .

 
 
मिलने गया था


बीच में अपने बोलने के वाक्य ही में डूब जाता फिर कुछ
देर पर उसी डूबने की जगह से उसकी थकन बुदबुदाने लगती . कमरे
में अँधेरा छा जाता .कई सूर्यास्त और साल डूब गए उसके बोलने में,
डूबने में , इतने दिनों के बाद वह लौटा था .
बाहर भी गहराती होगी शाम सोचते उठने के मेरे उद्विग्न से
बेपरवाह उसके बोलने में शत्रुओं , स्त्रियों और समर्थ लोगों पर
हिंसा की असमाप्त नदियाँ , इतना उदास और सांवला
होना था जिनका पानी कि अपने भीतर डुबोने का
दुस्वप्न रचतीं , बहतीं फिर बहना भूल जातीं .
उधड़ी हुई जगहों से रेत और जिंदगी के सूख चुके साल
झरते रहते .

कितना ग़लत था सोचना कि पुराना कवि अपने डूबने में बाहर
कोई जगह खाली करता है नए कवि के लिए ,अपने मरने में
बूढा चित्रकार नौजवान चित्रकार के लिए...और ऐसे ही बाकी सब.
बस थोड़ा असावधान था यह कि आसानी से व्यवस्था
इसका शिकार कर पाई और इतना तो अकेला कर ही पाई
दूसरों को जितना यह होता था बाहर .
जितना यह होता था हमारे भीतर हम इसके भीतर वह भी
डूबा इसके डूबने में, क्या फर्क की ये मात्राएँ अलग अलग ?

ऐसा नहीं तो क्यों उदास कर पाती यह बात मुझको लौटते में
और फिर ये भी कि इससे मिलने जाता ही क्यों ?




इस समय के किस्सागो को समझे जाने की ज़रूरत है

मृतकों के बारे में बताता हुआ वह मनुष्यों से अपने विवश जुड़ाव
को व्यक्त कर रहा है, कमसे कम एक वस्तु तो उन्हें मान ही रहा
है जिसे पहचानता है .

सफ़ेद बर्फ़ जिसमें कोई जीवाश्म भी जीवित नहीं विकिरण भी
नहीं , बताते हुए उसके पास पानी की एक पुरानी (उदास) याद
तो है .

खिड़की के बाहर की स्थिरता जिसमें वायुमंडल की खाली
जगह है और कंटीली झाडियाँ , इसमें ही से आपको ढूंढ लेने
हैं इतिहास और नृविज्ञान के सन्दर्भ.
उसके किस्सों में काफी कुछ दर्ज है भाई अब भी .

 
 
इतिवृत्त


अभी यह हवा है वह पुराना पत्थर
                             (चोट की बात नहीं है यहाँ सिर्फ देह की बात है)
यह सर हिलाता वृक्ष पहले उदासी था

यह कील थी पहले एक आंसू
यह रेत एक चुम्बन की आवाज़ है मरुस्थल भर
हंसी नहीं था यह झरना-
                                        यह आग थी हवा में शोर करती चिटखती
                                         अब इसने बदल ली है अपनी भाषा
चाँद पुराना कंगन नहीं था
कुत्ते के भौंकने की आवाज़ थी

परिंदे दरवाज़े थे पहले और आज
जो दरवाज़े हैं वे दरख़्त थे ; यह
                              सब जानते हैं.

जानना पहले कोई चीज़ नहीं थी
वह नृत्य लय थी : खून की बूंदों पर नाचती नंगे पाँव

शोर चुप्पी से नहीं
रोशनी से आया है यहाँ तक

खाली जगहें सबको जोड़ती थीं.



रेमेदिओस

एक साफ़ उजली दोपहर
धरती से सदेह स्वर्ग जाने के लिए
उसे बस एक खूबसूरत चादर की दरकार थी .

यहाँ उसने कढ़ाई शुरू की चादर में
आकाश में शुरू हो गया स्वर्ग का विन्यास .
यह स्वर्ग वह धरती से ही गढ़ेगी दूर आकाश में
यह कोई क़र्ज़ था उसपर .

उसने चादर में आखिरी टांका लगाया
और उधर किसी ने टिकुली की तरह आखिरी तारा
साट दिया स्वर्ग के माथे पर – आकाश में .

रुकती भी तो इस चादर पर सोती नहीं
इसमें गठरी बांधकर सारा अन्धकार ले जाती
लेकिन उसको जाना था

पुच्छल तारे की तरह ओझल नहीं हुई
न बादल की तरह उठी आकाश में

उसने फूलों का एक चित्र रचा उजाले पर
और एक उदास तान की तरह लौट गई .


( रेमेदियोस द ब्युटीफुल नामक चरित्र, गैब्रियल गार्सिआ मार्खेज के उपन्यास ' एकांत के सौ वर्ष' से है जो किस्से के मुताबिक एक दोपहर चादर समेत उड़ जाती है. )

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( कवि परिचय : अम्बिकापुर में रिहाईश. दर्शन और साहित्य के गम्भीर अध्येता. प्रवीण वक्ता. कविता से अलग अनुवाद कार्य भी.
सम्पर्क : 09713610339 / 09425256497

 

Saturday, June 4, 2011

मनोज कुमार झा की कविताएँ

शब्दकोशों के आसरे कविता में अचम्भा का पुट डालने की अथक और उबाऊ कोशिशों के जमाने में  मनोज की कविताएँ शुभ समाचार की तरह सामने आतीं हैं. अनोखी बिम्ब योजना में माहिर मनोज, हमारे आपके स्वप्नों के कुछ तिनके उठाकर वितान रच देतें हैं. यहाँ मनोज की चार कविताएँ प्रस्तुत हैं. और यहाँ भी छ: कविताएँ.    



कोई भी, कहीं भी


कभी भी हास्यास्पद हो सकता हूँ
इससे भी नीचे का कोई शब्द कहो
कोई शब्द कहो जिसमें इससे भी अधिक ताप हो, अधिक विष
मनुष्यता को गलनांक के पार ले जाने वाला कोई शब्द कहो.

कभी भी हो सकता हूँ हास्यास्पद - घर, बाहर कहीं भी
बच्चे के हिस्से का दूध अपनी चाय में डालते वक्त
कभी भी कलाई पकड़ सकती है पत्नी.
मेरे जैसा ही तो था जो उठाने झुका कोलतार में सटा सिक्का
मैं उसको चीन्ह गया, उस दिन एक ही जगह खरीदे हमने भुट्टे
जब उसको कह रहे हास्यास्पद तो मैं ही कितना बचा.

कभी भी हो सकता हूँ हास्यास्पद -
और यह कौन बड़ी बात है इस पृथ्वी पर
जब हर इलाके में जूठा पात चाट रहा होता है कोई मनुष्य,
सुविधा में जिसे पागल कह डालते हो.


शाप

जो पाँव कट जाते हैं वे भी शामिल रहते हैं यात्रा में,
कट गये हिस्सों से देखो तो दुनिया और साफ दिखती है
नक्शों की लकीरें और गहरी.

दर्शनियाँ जितने आते हैं मरियल या मोटाया हुआ
पुजारी तो बस उन्हें प्रसाद देता है
किसी किसी को ही पहचानता जिससे रिश्ते लेन-देन के,
मगर प्रवेशद्वार पर बैठा भिखारी जानता है सबकी खूबी, सबके ऐब.

प्रार्थना करो, यह शाप न मिले कि
सारे अंग साबूत
मगर जब जल में उतरो तो लगे नहा लिया बहुत देर
और शरीर को अज्ञात ही रह जाये जल का स्पर्श


चमक की चोट


यह वो रोशनी नहीं जो सुस्तकदम आती, बैठ जाती अँधियारे से सटकर
और उसके हाथ की सुई में धागा डाल देती है.
रेत के कण पर पानी का पानी चढ़ाती वस्तुओं के माथे पर चढ़ी है यह ढीठ चमक
नहीं यह सकुचौहाँ चमक जो एक स्वस्थ मनुष्य के नाखून में होती है
यह तो वो चमक जो एक फूँक में मनुष्य को पॉलिथीन की त्वचा में बदल देती है.
आधी रात गये जब करवट बदलते कमर में गड़ रही होती है अधपकी नींद की डंठल
उस वक्त कोई अभागा काँच का केंचुल उतार रहा होता है
फिर हट जाता है साँप की लपलपाती जीभ से मोहक शीशे से दूर
और लौट जाता है चूर उस फाँट में जो अबतक उगी हर सभ्यता में
इन्ही के लिए है.

पुनर्वास

 
यकायक इतना प्रकाश
मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा
होता जाता है चित्त चोटिल और बरसता जाता है प्रकाश मूसलाधार
मुझे प्रकाश के भीतर का दूध वापस दे दो.
किसने फोड़ा इतनी जोर से नारियल कि
 इसके भीतर का पानी धुँआ हो गया
मुझे डाभ के भीतर का जल लौटा दो.
एक नाम, दो नाम , तीन नाम, दस नाम
मुझे नामपट्टिका नहीं ठोस जलमय चेहरा दिखाओ.
इस झाड़ी में कुछ था जो त्वच का गंध बदल देता था
मुझे वो सबकुछ वापस करो - सारे गंध और सारी झाड़ियाँ.

मेरी इन्द्रियाँ मेरी देह के भीतर ही रास्ते भूल गई हैं
मुझे जाने दो अपनी इन्द्रियाँ वापस पाने
और सब कुछ यहीं- इसी देश में, इसी काल में
इसी धूल में, इसी घाम में.

Saturday, April 30, 2011

मनोज की खोज : 1 - रोक डॉल्टन गार्सिआ की कविताएँ

रोटी की तरह कविता

1992 की बात है. या 1993 की. मार्टिन एस्पादा ने राजनीतिक कविताओं का संग्रह तैयार किया और उसका नाम दिया : रोटी की तरह कविता. कहना न होगा कि यह पंक्ति रोक डॉल्टन की कविता 'तुम्हारी तरह' से ली गई है.

रोक डाल्टन (अल सल्वाडोर, 1935 - 1975) एक कवि, लेखक, बुद्धिजीवी और क्रांतिकारी की हैसियत से लैटिन अमेरिका के इतिहास की महत्वपूर्ण शख्सियत रहे हैं. अपने छोटे से जीवन में उन्होंने कुल मिलाकर 18 किताबें लिखीं. मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारों से प्रभावित डाल्टन ने क्रांतिकारी एक्टिविस्ट बनने का भी काफी प्रयास किया जिसे यह कहते हुए नकार दिया गया कि क्रान्ति में उनकी भूमिका एक कवि के रूप में ही है. मेक्सिको में निर्वासन में रहने के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और मौत की सजा सुनाई गई लेकिन वे चमत्कारी ढंग से बच निकले. पर उन दिनों लटिन अमेरिका में सोचने समझने वालों के साथ जो सामान्यत: होता था, ठीक उसी तरह 1975 में उनकी हत्या कर दी गई. 

हम हिन्दी वाले अक्सर "पोलिटकली चार्ज्ड" कविता की बात करते हैं और साथी मनोज पटेल ने ऐसे कवि को ढूँढ निकाला है जिसकी कविताओं से गुजरते हुए हम "पोलिटकली चार्ज्ड" शब्दयुग्म के भाव को पंक्ति दर पंक्ति महसूस करेंगे. हमारा इरादा, रोक डॉल्टन की कविताओं का धनी हिन्दी समाज से परिचय  कराने का, फरवरी का था पर तय हुआ कि इनकी कविताओं के अंग्रेजी संकलन  में मौजूद सभी 142 कविताओं का अनुवाद कर  लिया जाए. हुआ भी यही.

इस परिचायत्मक मेगा पोस्ट के बाद  आपको धड़ल्ले से इनकी कविताएँ पढ़ने को मिलेगी.
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तुम्हारी तरह



तुम्हारी तरह मैं भी
प्रेम करता हूँ प्रेम से, ज़िंदगी,
चीजों की मोहक सुगंध, और जनवरी
के दिनों के आसमानी रंग के भूदृश्यों से.

और मेरा भी खून खौल उठता है
और मैं हंसता हूँ आँखों से
जो जानती रही हैं अश्रुग्रंथियों को.

मेरा मानना है कि दुनिया खूबसूरत है
और रोटी की तरह कविता भी सबके लिए है.

 और मेरी नसें सिर्फ मेरे भीतर नहीं
बल्कि उन लोगों के एक जैसे खून तक भी फैली हैं
जो लड़ते हैं ज़िंदगी के लिए,
प्रेम,
छोटी-छोटी चीजों,
प्राकृतिक भूदृश्यों और रोटी के लिए,

जो कविता है हर किसी की.
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आजादी के आंकड़े


सल्वाडोर के लोगों के लिए प्रेस की आजादी की लागत
20 सेंटावो प्रतिदिन बैठती है
केवल उन्हीं लोगों की गिनती करते हुए जो पढ़ सकते हैं
और जिनके पास बीस सेंटावो से ज्यादा बचे रह जाते हैं
बमुश्किल उतना भर खाने के बाद जितना ज़िंदा रहने के लिए जरूरी है.

बड़े उद्योगपतियों और प्रचारकों के लिए
प्रेस की आजादी
एक श्वेत-श्याम पृष्ठ के लिए हजारों और कुछ रेजगारी की कीमत पर बिकती है
और मुझे नहीं पता कि पाठ्य या चित्र के लिए
प्रति वर्ग इंच की किस दर पर.

 डान नेपोलियन वियरा अल्टामिरानो
और डतरिज और पिंटो और अल मुंडो के मालिकों के लिए
प्रेस की आजादी लाखों की है :
जिसमें शामिल हैं इमारतें
सैन्य सिद्धांतों पर बनाई गईं
जिसमें शामिल हैं मशीन और कागज़ और रोशनाई
उनके उद्योगों के आर्थिक निवेश
जो वे दिन-प्रतिदिन बड़े उद्योगपतियों और प्रचारकों से पाते हैं
और सरकार और उत्तरी अमेरिका
और दूसरे दूतावासों से
जिसे वे गारते हैं अपने मजदूरों के शोषण से
जिसे वे ऐंठते हैं ब्लैकमेल से ( "सबसे नामी आदमी की निंदा
न छापकर या मौकापरस्ती से ऐसा राज छापकर
जो समुद्र की सबसे छोटी मछली को डुबो देगा" )
जो वे कमाते हैं "एकमात्र अधिकार" की अवधारणा से, उदाहरण के लिए
"लव इज" तौलिए... "लव इज" मूर्तिकाएं...
जो वे रोज एकत्र करते हैं
सल्वाडोर (और गुआटेमाला) के उन सभी लोगों से
जिनके पास बीस सेंटावो उपलब्ध होते हैं.

पूंजीवादी तर्कशास्त्र में
 प्रेस की आजादी बस एक और धंधा है
और सबके लिए इसकी कीमत
इसके लिए उसके द्वारा किए जाने वाले भुगतान के समानुपाती है :

लोगों के लिए बीस सेंटावो प्रति व्यक्ति प्रति दिन
प्रेस की आजादी की कीमत,

 वियरा अल्टामिरानो डतरिज पिंटो वगैरह के लिए
लाखों डालर प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन
होती है प्रेस की आजादी की कीमत.

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 27 साल


सत्ताईस साल का होना
एक संजीदा बात है
दरअसल तमाम मौजूद चीजों के बीच
सबसे संजीदा बातों में से एक
देखते हुए दोस्तों की मौत
और डूबते हुए बचपन को
शक होने लगता है
अपने खुद के अमरत्व पर.
..................................................................
  कविता से


मैं तुम्हारा स्वागत करता हूँ कविता
बहुत शुक्रगुजार हूँ आज तुमसे मुलाक़ात के लिए
(ज़िंदगी और किताबों में)
तुम्हारा वजूद सिर्फ उदासी के चकाचौंध कर देने वाले
भव्य अलंकरण के लिए ही नहीं है

इसके अलावा हमारी जनता के इस लम्बे और कठिन संघर्ष के
काम में मेरी मदद करके
तुम आज मुझे बेहतर कर सकती हो

 तुम अब अपने मूल में हो :
अब वह भड़कीला विकल्प नहीं रही तुम
जिसने मुझे अपनी ही जगह से बाँट दिया था

 और तुम खूबसूरत होती जाती हो 
कामरेड कविता

कड़ी धूप में जलती हुई सच्ची खूबसूरत बाहों के बीच
मेरे हाथों के बीच और मेरे कन्धों पर

तुम्हारी रौशनी मेरे आस पास रहती है.
......................................................

यकीन


चार घंटों की यातना के बाद, अपाचे एवं अन्य दो सिपाहियों ने कैदी को होश में लाने के लिए उस पर एक बाल्टी पानी फेंक कर कहा : "कर्नल ने हमें यह बताने का हुक्म दिया है कि तुम्हें खुद को बचाने का एक मौक़ा दिया जाने वाला है. यदि तुम सही-सही यह बता दो कि हममें से किसकी एक आँख शीशे की है, तो तुम्हें यातना से छुटकारा दे दिया जाएगा." जल्लादों के चेहरे पर निगाहें फिराने के बाद, कैदी ने उनमें से एक की तरफ इशारा किया : "वह. उसकी दाहिनी आँख शीशे की है."

अचंभित सिपाहियों ने कहा, "तुम तो बच गए ! लेकिन तुमने कैसे अंदाजा लगाया ? तुम्हारे सभी साथी गच्चा खा गए क्योंकि यह अमेरिकी आँख है, यानी एकदम बेऐब." "सीधी सी बात है," फिर से बेहोशी तारी होने का एहसास करते हुए कैदी ने कहा, "यही इकलौती आँख थी जिसमें मेरे लिए नफरत नहीं थी."

जाहिर है, उन्होंने उसे यातना देना जारी रखा.

........................................... 

अनुवाद : मनोज पटेल

सम्पर्क : manojneelgiri@gmail.com ; http://padhte-padhte.blogspot.com/

Tuesday, March 29, 2011

दुन्या मिखाईल की पाँच कविताएँ

मनोज पटेल ने अनूठे ही अन्दाज में मेरा परिचय विश्व कविता से कराया. विश्व  कविता के बड़े नामों में ही उलझा हुआ मैं था जब मनोज जी ने वेरा पावलोवा, चार्ल्स सिमिक और दुन्या मिखाईल की कविताओं के अनुवाद मुझे भेजने शुरु किए. फिर तो सिलसिला अनवरत है.


दुन्या की कविताएँ किसी ऐसे दु:ख या सघन अनुभूति की तरह सामने आती हैं जिनका सामना हम भरसक नही करना चाहते. जैसे यह कविता – कटोरा(अंग्रेजी में इसका शीर्षक ‘द कप’ है). पाखंड को आप नकारते हैं, शगुन – अपशगुन को आसानी से नकारते हैं पर यह कविता आपको गर्दन पर सवार हो जायेगी जहाँ आप चाहकर इस शगुन – अपशगुन के खेल को आसानी से नकार नही पायेंगे.

खेल कविता पढ़ते हुए मीर के एक शे’र “खुदा को काम तो सौपें हैं मैने सब / रहे है खौफ मुझको वाँ की बेनियाजी का” लगातार याद आता रहा. ऐसे ही तीसरी कविता है – एक आवाज़.

इससे पहले भी मनोज जी  दुन्या की कविताओं के अनुवाद लगातार करते रहे हैं जिन्हें आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं.

                                                      ************




कटोरा

उस स्त्री ने कटोरे को उल्टा करके रख दिया
अक्षरों के बीच में.
एक मोमबत्ती को छोड़कर बाक़ी सारी बत्तियां बुझा दीं
और अपनी उंगली कटोरे के ऊपर रखी
और मन्त्र की तरह कुछ शब्द बुदबुदाए :
ऐ आत्मा... अगर तू मौजूद है तो कह - हाँ.
इस पर कटोरा हाँ के संकेत स्वरूप दाहिनी तरफ चला गया.
स्त्री बोली : क्या तुम सचमुच मेरे पति ही हो, मेरे शहीद पति ?
कटोरा हाँ के संकेत में दाहिनी तरफ चला गया.
उसने कहा : तुम इतनी जल्दी मुझे क्यों छोड़ गए ?
कटोरा इन अक्षरों पर फिरा -
यह मेरे हाथ में नहीं था.
उसने पूछा : तुम बच क्यों नहीं निकले ?
कटोरा इन अक्षरों पर फिरा -
मैं बच निकला था.
उसने पूछा : तो फिर तुम मारे कैसे गए ?
कटोरे ने हरकत की : पीछे से.
उसने कहा : और अब मैं क्या करूँ
इतने सारे अकेलेपन के साथ ?
कटोरे ने कोई हरकत नहीं की.
उसने कहा : क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो ?
कटोरा हाँ के संकेत में दाहिनी तरफ चला गया..
उसने कहा : क्या मैं तुम्हें यहाँ रोक सकती हूँ ?
कटोरा नहीं की तरफ के संकेत में बायीं तरफ चला गया..
उसने पूछा : क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकती हूँ ?
कटोरा बायीं तरफ चला गया.
उसने कहा : क्या हमारी ज़िंदगी बदलेगी ?
कटोरा दाहिनी तरफ चला गया.
उसने पूछा : कब ?
कटोरे ने हरकत की - 1996.
उसने पूछा : क्या तुम सुकून से हो ?
कटोरा हिचकिचाते हुए हाँ की तरफ चला गया.
उसने पूछा : मुझे क्या करना चाहिए ?
कटोरे ने हरकत की - बच निकलो.
उसने पूछा : किधर ?
कटोरे ने कोई हरकत नहीं की.
उसने कहा : तुम मुझसे क्या चाहते हो ?
कटोरे एक बेमतलब जुमले पर फिरी.
उसने कहा : कहीं तुम मेरे सवालों से ऊब तो नहीं गए ?
कटोरा बायीं तरफ चला गया.
उसने कहा : क्या मैं और सवाल कर सकती हूँ ?
कटोरे ने कोई हरकत नहीं की.
थोड़ी चुप्पी के बाद, वह बुदबुदाई :
ऐ आत्मा... जा, तुझे सुकून मिले.
उसने कटोरा सीधा किया
मोमबत्ती को बुझा दिया
और अपने बेटे को आवाज़ लगायी
जो बगीचे में कीट-पतंगे पकड़ रहा था
गोलियों से छिदे हुए एक हेलमेट से.

* *

खेल

वह एक मामूली प्यादा है.
हमेशा झपट पड़ता है अगले खाने पर.
वह बाएँ या दाएं नहीं मुड़ता
और पीछे पलटकर भी नहीं देखता.
वह एक नासमझ रानी द्वारा संचालित होता है
जो बिसात के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चल सकती है
सीधे या तिरछे.
वह नहीं थकती, तमगे ढोते
और ऊँट को कोसते हुए.
वह एक मामूली रानी है
एक लापरवाह राजा द्वारा संचालित होने वाली
जो हर रोज गिनता है खानों को
और दावा करता है कि कम हो रहे हैं वे.
वह सजाता है हाथी और घोड़ों को
और एक सख्त प्रतिद्वंदी की करता है कामना.
वह एक मामूली राजा है
एक तजुर्बेकार खिलाड़ी द्वारा संचालित होने वाला
जो अपना सर घिसता है
और एक अंतहीन खेल में बर्बाद करता है वक़्त अपना.
वह एक मामूली खिलाड़ी है
एक सूनी ज़िंदगी द्वारा संचालित होने वाला
किसी काले या सफ़ेद के बिना.
यह एक मामूली ज़िंदगी है
एक भौचक्के ईश्वर द्वारा संचालित होने वाली
जिसने कोशिश की थी कभी मिट्टी से खेलने की.
वह एक मामूली ईश्वर है.
उसे नहीं पता कि
कैसे छुटकारा पाया जाए
अपनी दुविधा से.



एक आवाज़


मैं लौटना चाहता हूँ
वापस
वापस
वापस

दुहराता रहा तोता
उस कमरे में जहां
उसका मालिक छोड़ गया था उसे
अकेला

यही दुहराने के लिए :
वापस
वापस
वापस...

नया साल

1
कोई दस्तक दे रहा है दरवाजे पर.
कितना निराशाजनक है यह...
कि तुम नहीं, नया साल आया है.

2

मुझे नहीं पता कि कैसे तुम्हारी गैरहाजिरी जोडूँ अपनी ज़िंदगी में.
नहीं मालूम कि कैसे इसमें से घटा दूं खुद को.
नहीं मालूम कि कैसे भाग दूं इसे
प्रयोगशाला की शीशियों के बीच.

3

वक़्त ठहर गया बारह बजे
और इसने चकरा दिया घड़ीसाज को.
कोई गड़बड़ी नहीं थी घड़ी में.
बस बात इतनी सी थी की सूइयां
भूल गईं दुनिया को, हमआगोश होकर.

* *

झूलने वाली कुर्सी


जब वे आए,
बड़ी माँ वहीं थीं
झूलने वाली कुर्सी पर.
तीस साल तक
झूलती रहीं वे...
अब
मौत ने मांग लिया उनका हाथ,
चली गयीं वे
बिना एक भी लफ्ज़ बोले,
अकेला
छोड़कर इस कुर्सी को
झूलते हुए.

 
अनुवादक से सम्पर्क : 09838599333 ; manojneelgiri@gmail.com

Saturday, February 5, 2011

महेश वर्मा की छ: कविताएँ

'कला के तीसरे क्षण ' का अचूक सूत्र तभी सफल दीखता है जब रचना से यह बात भी झाँकती दिखे कि इस रचना में जीवनानुभव की व्याप्ति कितनी है. जीवनानुभव और कला के इस बेहतरीन 'ब्लर' के लिए जो हुनर चाहिए उसकी खातिर कवि की यह ख्वाहिश कि "पहले सीख लूं एक सामाजिक भाषा में रोना / फिर तुम्हारी बात लिखूंगा". महेश की कविताओं से गुजरते हुए हम यह अनुभव शिद्दत से करते हैं. अगर कोई कवि रविवार को " यह कविता का दिन है गद्य के सप्ताह में" बताता है तो हम यह बूझ लेते हैं कि बाकी के छ: दिन कितने कठिन बीते या आगामी छ: दिनों के बाबत कवि कितनी तैयारी कर रहा है. प्रस्तुत छ: कविताएँ महेश वर्मा की हैं और हरेक कविता नए सत्य के साथ और नई युक्तियों के साथ जाहिर होती है.
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रविवार

 रविवार को देवता अलसाते हैं गुनगुनी धूप में
अपने प्रासाद के ताखे पर वे छोड़ आये हैं आज
अपनी तनी हुई भृकुटी और जटिल दंड विधान

नींद में मुस्कुराती किशोरी की तरह अपने मोद में है दीवार घड़ी 

खुशी में चहचहा रही है घास और
चाय की प्याली ने छोड़ दी है अपनी गंभीर मुखमुद्रा

कोई आवारा पहिया लुढ़कता चला जा रहा है
वादियों की ढलुआ पगडण्डी पर

यह खरगोश है आपकी प्रेमिका की याद नहीं
जो दिखा था, ओझल हो गया रहस्यमय झाडियों में

यह कविता का दिन है गद्य के सप्ताह में

हम अपनी थकान को बहने देंगे एड़ियों से बाहर
नींद में फैलते खून की तरह

हम चाहेंगे एक धुला हुआ कुर्ता पायजामा
और थोड़ी सी मौत
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पूर्वज कवि

पूर्वज कवि आते हैं
और सुधार देते हैं मेरी पंक्तियाँ
मैं कहता हूँ कि हस्ताक्षर कर दें जहाँ
उन्होंने बदला है कोई शब्द या पूरा वाक्य

होंठ टेढा करके व्यंग्य में मुस्काते
वे अनसुनी करते हैं मेरी बात


उनकी हस्तलिपि एक अभ्यस्त हस्तलिपि है
                  अपने सुन्दर दिखने से बेपरवाह
                  और तपी हुई
                  कविता की ही आंच में

सुबह मैं ढूँढता उनके पदचिन्ह ज़मीन पर
सपनों पर और अपनी कविता पर

फुर्र से एक गौरय्या उड़ जाती है खिड़की से 
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पुराना पेड़

वह दुःख का ही वृक्ष था
जिसकी शिराओं में बहता था शोक
दिन भर झूठ रचती थीं पत्तियाँ हंसकर
कि ढका रह आये उनका आंतरिक क्रंदन

एक पाले की रात
जब वे निःशब्द गिरतीं थीं रात पर और
ज़मीन पर
हम अगर जागते होते थे
तो खिडकी से यह देखते रहते थे

देर तक 
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घर

घर वैसा ही होगा जब हम लौटेंगे
जैसे शताब्दियों तक वैसे ही रहते हैं घर किताबों में

हम किताबों की धूल झाड़ेंगे
और घर में प्रवेश करेंगे
वहाँ चूल्हा वैसे ही जल रहा होगा
जैसा कहानी में जलता था और
लकड़ी बुझने से पहले शुरू हो गया था दूसरा दृश्य
वह बुढ़िया अभी भी आराम कुर्सी में
सो रही होगी जो कुछ सौ साल पहले
ऊंघ गयी थी आंच से गर्म कमरे के विवरणों के बीच
इसे एक गोली की आवाज़ ही जगा सकती है
लेकिन मालूम नहीं कब

हम चाहते भी थे कि दुर्भाग्य का वह पन्ना उधड़ कर
उड़ता चला जाए किसी रहस्य कथा में

हम चांदनी से भी आरामदेह एक बिस्तर पर लेट जायेंगे
जहाँ नींद की उपमा की तरह आएगी नींद
और हमें ढक लेगी

हम सपना देखेंगे एक घर का या किताब का
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सामाजिक भाषा में रोना 

और जबकि किसी को बहला नहीं पाई है मेरी भाषा
एक शोकगीत लिखना चाहता था विदा की भाषा में और देखो
कैसे वह रस्सियों के पुल में बदल गया

दिशाज्ञान नहीं है बचपन से
सूर्य न हो आकाश में
तो रूठकर दूर जाते हुए अक्सर
घर लौट आता हूँ अपना उपहास बनाने

कहाँ जाऊँगा तुम्हें तो मालूम हैं मेरे सारे जतन
इस गर्वीली मुद्रा के भीतर एक निरुपाय पशु हूँ
वधस्थल को ले जाया जाता हुआ

मुट्ठी भर धूल से अधिक नहीं है मेरे
आकाश का विस्तार - तुम्हें मालूम है ना ?

किसे मै चाँद कहता हूँ और किसको बारिश
फूलों से भरी तुम्हारी पृथ्वी के सामने क्या है मेरा छोटा सा दुःख ?

पहले सीख लूं एक सामाजिक भाषा में रोना
फिर तुम्हारी बात लिखूंगा
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पत्थर

इतने संतुष्ट थे पत्थर
कि उनकी छाया ही नहीं थी
जो लाखों साल वे रहे थे समंदर के भीतर
यह भिगोए रखता था उनके सपनों को

गुनगुनी धूप थोड़ा और देर ठहरे
इस मामूली इच्छा के बीच
वे बस इतना चाहते हैं
कि कोई अभी उनसे बात न करे
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कवि से सम्पर्क : maheshverma1@gmail.com ; 09425256497

Saturday, January 29, 2011

अफ़ज़ाल अहमद सैयद की कविताएँ



अफ़ज़ाल अहमद सैयद : जिन्होंने “शायरी ईज़ाद की”.

आधुनिक समय की विश्व कविता अगर कोई संसार है तो अफज़ाल अहमद सैयद उस प्यारे संसार की राजधानी हैं. प्रसंग विशिष्ट सम्वेदना के अटूट चित्रण के लिये विख्यात यह कवि/ शायर कविता के जादुई ‘डिक्शन’ और प्रभावशाली कहन (बयान) के अन्दाज का मास्टर है. जिस संग्रह की कवितायें यहाँ प्रस्तुत हैं ( रोकोको और दूसरी दुनियायें ) उसके पन्नों से गुजरते हुए अफज़ाल की विलक्षण विश्वदृष्टि और इतिहासबोध का पता चलता है. अगर इनका नाम पाकिस्तान और समूचे विश्व के अप्रतिम कवियों की सूची में शुमार होने लगा है तो इसकी ठोस वजह है : पाकिस्तानी समाज में फैल चुकी धर्मान्धता, जातिगत लड़ाईयाँ, सांस्कृतिक क्षरण, क्रूरता और राज्य – प्रायोजित आतंकवाद से कवि की सीधी मुठभेड़. वर्तमान समय के सर्वाधिक रचनाशील और उर्वर कवि अफ़ज़ाल, दरअसल अपने पूरे ढब में भविष्य के (FUTURISTIC) कवि हैं.

1946 (गाजीपुर) की पैदाईश अफ़ज़ाल के नाम कुल चार किताबे और ढेरों अनुवाद हैं. नज्मों की तीन किताबें क्रमश: छीनी हुई तारीख़ (1984) दो ज़ुबानों में सजाये मौत (1990) तथा रोकोको और दूसरी दुनियायें (2000) हैं. गजलों का एक संग्रह – खेमा-ए-स्याह( 1988). वैसे इनका रचना समग्र “मिट्टी की कान” नामक संग्रह में समाहित है.

लिप्यंतरण के बारे में : अफ़ज़ाल का रचना समग्र हमें कैसे मिला, यह बेहद लम्बा और रोमांचक किस्सा है और जिसे फिर कभी बताऊंगा. समूची रचनाओं के अनुवाद/ लिप्यंतरण की इज़ाज़त हमें अफ़जाल साहब ने कुछ यह लिख कर दिया:

Dear Chandan,

I wish I could meet you and your friends Manoj and krishan.

I do hereby give Mr. Manoj Patel my permission to translate and publish my poems in Hindi including those published in " Roccoco and the Other Worlds".


Best regards

Afzal Ahmed Syed.

और सबसे जरूरी यह कि साथी मनोज पटेल ने सिर्फ और सिर्फ अफ़ज़ाल साहब की रचनाओं के अनुवाद/ लिप्यंतरण के लिये उर्दू सीखी. मनोज के उर्दू सीखने और इन नज्मों के लिप्यंतरण में शहाब परवेज़ ने भरपूर सहयोग दिया. मनोज अब तक अफ़ज़ाल साहब के दो संग्रह क्रमश: रोकोको और दूसरी दुनियायें तथा दो ज़ुबानों में सज़ाये मौत का लिप्यंतरण कर चुके हैं और छीनी हुई तारीख़ पर जुटे हैं. नज्मों की ये तीनों संग्रह, एक ही जिल्द में, शीघ्रातिशीघ्र प्रकाश्य.

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हमें बहुत सारे फूल चाहिए

हमें बहुत सारे फूल चाहिए
मारे जाने वाले लोगों के क़दमों में रखने के लिए,
हमें बहुत सारे फूल चाहिए
बोरियों में पाई जायी जानेवाली लाशों के चेहरे ढाँकने के लिए,
एक पूरी सालाना फूलों की नुमाईश
ईधी सर्दखाने में महफूज कर लेनी चाहिए
नामजद मरने वालों की
पुलिस कब्रिस्तान में खुदी कब्रों के पास रखने के लिए,
खूबसूरत बालकनी में उगने वाले फूलों का एक गुच्छा चाहिए
बस स्टाप के सामने
गोली लग कर मरने वाली औरत के लिए,
आसमानी नीले फूल चाहिए
येलो कैब में हमेशा की नींद सोए हुए दो नौजवानों को
गुदगुदाने के लिए,
हमें खुश्क फूल चाहिए
मस्ख किए गए जिस्म को सजाकर
असली सूरत में लाने के लिए,
हमें बहुत सारे फूल चाहिए
उन जख्मियों के लिए
जो उन अस्पतालों में पड़े हैं
जहां जापानी या किसी और तरह के रॉक गार्डन नहीं हैं,
हमें बहुत सारे फूल चाहिए
क्योंकि उनमें से आधे मर जाएंगे
हमें रात को खिलने वाले फूलों का एक जंगल चाहिए
उन लोगों के लिए
जो फायरिंग की वजह से नहीं सो सके,
हमें बहुत सारे फूल चाहिए
बहुत सारे अफ्सुर्दः लोगों के लिए,
हमें गुमनाम फूल चाहिए
बेसतर कर दी गई एक लड़की को ढांपने के लिए

हमें बहुत सारे फूल चाहिए

हमें बहुत सारे फूल चाहिए
बहुत सारी रक्स करती बेलों पर लगे
जिनसे हम इस पूरे शहर को छुपाने की कोशिश कर सकें
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सर्दखाने - कोल्ड स्टोरेज, मुर्दाघर
मस्ख - विकृत
अफ्सुर्द : - उदास

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हमारा कौमी दरख़्त

सफ़ेद यास्मीन की बजाए
हम कीकर को अपनी शिनाख्त करार देते हैं
जो अमरीकी युनिवर्सिटियों के कैम्पस पर नहीं उगता
किसी भी ट्रापिकल गार्डेन में नहीं लगाया जाता
इकेबाना खवातीन ने उसे कभी नहीं छुआ
नबातात के माहिर उसे दरख़्त नहीं मानते
क्योंकि उसपर किसी को फांसी नहीं दी जा सकती

कीकर एक झाड़ी है
जिससे हमारे शहर, रेगिस्तान
और शायरी भरी है

काँटों से भरा हुआ कीकर
हमें पसंद है
जिसने हमारी मिट्टी को बहिरा-ए-अरब में जाने से रोका.
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इकेबाना - फूल सजाने का जापानी तरीका
नबातात - जमीन से उगने वाली चीजें
बहिरा - ए- अरब - अरब सागर

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एक इफ्तेताही तकरीब

फ्लोरा लक
लहरिएदार स्कर्ट
नीम बरहना शानों
और काली क्रोशिया की बेरेट में
मुख़्तसर जुलूस के साथ
केमाड़ी तक गई

वह स्काच चर्च में रुकी
उसने गैर दिलचस्प तकरीरें सुनीं
सुबह उसे
ट्रालियों के
गैल्वनाइज्ड लोहे की छतों वाले गोदाम
और साठ घोड़ों के अस्तबल का दौरा कराया गया

ट्राम वे की इफ्तेताही तकरीब में
कराची की सबसे खूबसूरत लड़की
खुश नजर आ रही थी

अगर उसका कोई महबूब होता
वह उसे उस दिन बहुत बोसे देती

उसकी खुशी के एहतिराम में
कराची ट्राम वे
नौवें साल तक पटरियों पर दौड़ती रही

और जब
मजबूत ट्रांसपोर्टरों ने
ट्राम की पटरियां उखाड़ दीं

शहर उजड़ना शुरू हो गया
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इफ्तेताही तकरीब - उद्घाटन समारोह
नीम बरहना शानों - अर्धनग्न कन्धों
बेरेट - टोपी
मुख़्तसर - संक्षिप्त
तकरीरें - भाषण
एहतिराम - सम्मान

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हिदायात के मुताबिक़

वजीरे आजम जोनूब की तरफ नहीं जाएंगी
सदर
सिर्फ अमूदी परवाज करेंगे
सिपाही
ढाई घर चलेंगे
जलावतन रहनुमा
साढ़े बाईस डिग्री पर घूमेंगे
लोग घरों से नहीं निकलेंगे
एक्बुलेंस जिग जैग चलेंगे
तारीख
पहले ही एंटी क्लाक वाइज चल रही है

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जोनूब - दक्षिण
अमूदी - लम्बवत, वर्टिकल

* *
एक लड़की

लज्जत की इन्तेहा पर
उसकी सिसकियाँ
दुनिया के तमाम कौमी तरानों से ज्यादा
मौसीकी रखती हैं

जिन्सी अमल के दौरान
वह किसी भी मलिकाए हुस्न से ज्यादा
खूबसूरत करार पा सकती है

उसके ब्लू प्रिंट का कैसेट
हासिल करने के लिए
किसी भी फसादजदा इलाके तक जाने का
ख़तरा लिया जा सकता है

सिर्फ उससे मिलना
नामुमकिन है
पाकिस्तान की तरह
हाला फारुकी भी
पुलिस की तहवील में है

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कौमी तराना - राष्ट्र गान
तहवील - कस्टडी, अभिरक्षा

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लिप्यंतरण का सारा दारोमदार मनोज पटेल का रहा जिनसे manojneelgiri@gmail.com ( दूरभाष - 09838599333) पर सम्पर्क किया जा सकता है. अफ़ज़ाल की दूसरी कवितायें/ नज्में और गजले समय समय पर मनोज पटेल के ब्लॉग पढ़ते पढ़ते पर प्रकाशित होती रहेंगी.   

Friday, December 24, 2010

महाकवि नाजिम हिकमत की कवितायें


( महाकवि नाजिम हिकमत को पढ़ते हुए यह एहसास लगातार बना रहता है कि जैसेजीना हमारी जिम्मेदारी है”. इनकी कविता में जो उम्मीद के स्वर हैं वे किन्ही वायवीय स्वप्न सरीखे नहीं हैं. यह उम्मीद गूलर का फूल भी नहीं है जो आज तक किसी को दिखे ही नहीं. उनकी कविता की दिखाई उम्मीद - राह बहुत खास परंतु प्राप्य लक्ष्यों की तरह होती है. अपने अदना से ब्लॉग पर नाजिम को पोस्ट करते हुए मैं बे-इंतिहा खुश हूँ.)

अनुवादक का नाम बार बार बताना कहाँ जरूरी होता है....

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दिल का दर्द : नाजिम हिकमत


अगर मेरे दिल का आधा हिस्सा यहाँ है डाक्टर,

तो चीन में है बाक़ी का आधा

उस फौज के साथ

जो पीली नदी की तरफ बढ़ रही है..

और हर सुबह, डाक्टर

जब उगता है सूरज

यूनान में गोली मार दी जाती है मेरे दिल पर .

और हर रात को डाक्टर

जब नींद में होते हैं कैदी और सुनसान होता है अस्पताल,

रुक जाती है मेरे दिल की धड़कन

इस्ताम्बुल के एक उजड़े पुराने मकान में.

और फिर दस सालों के बाद

अपनी मुफलिस कौम को देने की खातिर

सिर्फ ये सेब बचा है मेरे हाथों में डाक्टर

एक सुर्ख़ सेब :

मेरा दिल.

और यही है वजह डाक्टर

दिल के इस नाकाबिलेबर्दाश्त दर्द की --

न तो निकोटीन, न तो कैद

और न ही नसों में कोई जमाव.

कैदखाने के सींखचों से देखता हूँ मैं रात को,

और छाती पर लदे इस बोझ के बावजूद

धड़कता है मेरा दिल सबसे दूर के सितारों के साथ.

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दरअसल, यह कुछ इस तरह से है


खड़ा हूँ मैं राह दिखाती हुई रोशनी में,

भूखे हैं मेरे हाथ, खूबसूरत है दुनिया.


बाग का बड़ा हिस्सा नही पातीं मेरी आँखें

कितने आशापूर्ण हैं वे, कितने हरे-भरे .


एक चमकीली सड़क गुजर रही है शहतूत के पेड़ों से होकर

कैदखाने के अस्पताल की खिड़की पर खड़ा हूँ मैं.


दवाओं की गंध नहीं ले पा रहा मैं --

जरूर गुलनार के फूल खिल रहे होंगे कहीं आस-पास.


इस तरह से है यह :

गिरफ्तारी तो दीगर मसला है,

असल मुद्दा है हार न मानना.

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अनुवादक से सम्पर्क: 09838599333; manojneelgiri@gmail.com


शुरुआती पंक्तियों में कोट की हुई पंक्ति "जीना हमारी जिम्मेदारी है" कवि मित्र सूरज की आगामी कविता की पंक्ति है.