Saturday, June 4, 2011

मनोज कुमार झा की कविताएँ

शब्दकोशों के आसरे कविता में अचम्भा का पुट डालने की अथक और उबाऊ कोशिशों के जमाने में  मनोज की कविताएँ शुभ समाचार की तरह सामने आतीं हैं. अनोखी बिम्ब योजना में माहिर मनोज, हमारे आपके स्वप्नों के कुछ तिनके उठाकर वितान रच देतें हैं. यहाँ मनोज की चार कविताएँ प्रस्तुत हैं. और यहाँ भी छ: कविताएँ.    



कोई भी, कहीं भी


कभी भी हास्यास्पद हो सकता हूँ
इससे भी नीचे का कोई शब्द कहो
कोई शब्द कहो जिसमें इससे भी अधिक ताप हो, अधिक विष
मनुष्यता को गलनांक के पार ले जाने वाला कोई शब्द कहो.

कभी भी हो सकता हूँ हास्यास्पद - घर, बाहर कहीं भी
बच्चे के हिस्से का दूध अपनी चाय में डालते वक्त
कभी भी कलाई पकड़ सकती है पत्नी.
मेरे जैसा ही तो था जो उठाने झुका कोलतार में सटा सिक्का
मैं उसको चीन्ह गया, उस दिन एक ही जगह खरीदे हमने भुट्टे
जब उसको कह रहे हास्यास्पद तो मैं ही कितना बचा.

कभी भी हो सकता हूँ हास्यास्पद -
और यह कौन बड़ी बात है इस पृथ्वी पर
जब हर इलाके में जूठा पात चाट रहा होता है कोई मनुष्य,
सुविधा में जिसे पागल कह डालते हो.


शाप

जो पाँव कट जाते हैं वे भी शामिल रहते हैं यात्रा में,
कट गये हिस्सों से देखो तो दुनिया और साफ दिखती है
नक्शों की लकीरें और गहरी.

दर्शनियाँ जितने आते हैं मरियल या मोटाया हुआ
पुजारी तो बस उन्हें प्रसाद देता है
किसी किसी को ही पहचानता जिससे रिश्ते लेन-देन के,
मगर प्रवेशद्वार पर बैठा भिखारी जानता है सबकी खूबी, सबके ऐब.

प्रार्थना करो, यह शाप न मिले कि
सारे अंग साबूत
मगर जब जल में उतरो तो लगे नहा लिया बहुत देर
और शरीर को अज्ञात ही रह जाये जल का स्पर्श


चमक की चोट


यह वो रोशनी नहीं जो सुस्तकदम आती, बैठ जाती अँधियारे से सटकर
और उसके हाथ की सुई में धागा डाल देती है.
रेत के कण पर पानी का पानी चढ़ाती वस्तुओं के माथे पर चढ़ी है यह ढीठ चमक
नहीं यह सकुचौहाँ चमक जो एक स्वस्थ मनुष्य के नाखून में होती है
यह तो वो चमक जो एक फूँक में मनुष्य को पॉलिथीन की त्वचा में बदल देती है.
आधी रात गये जब करवट बदलते कमर में गड़ रही होती है अधपकी नींद की डंठल
उस वक्त कोई अभागा काँच का केंचुल उतार रहा होता है
फिर हट जाता है साँप की लपलपाती जीभ से मोहक शीशे से दूर
और लौट जाता है चूर उस फाँट में जो अबतक उगी हर सभ्यता में
इन्ही के लिए है.

पुनर्वास

 
यकायक इतना प्रकाश
मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा
होता जाता है चित्त चोटिल और बरसता जाता है प्रकाश मूसलाधार
मुझे प्रकाश के भीतर का दूध वापस दे दो.
किसने फोड़ा इतनी जोर से नारियल कि
 इसके भीतर का पानी धुँआ हो गया
मुझे डाभ के भीतर का जल लौटा दो.
एक नाम, दो नाम , तीन नाम, दस नाम
मुझे नामपट्टिका नहीं ठोस जलमय चेहरा दिखाओ.
इस झाड़ी में कुछ था जो त्वच का गंध बदल देता था
मुझे वो सबकुछ वापस करो - सारे गंध और सारी झाड़ियाँ.

मेरी इन्द्रियाँ मेरी देह के भीतर ही रास्ते भूल गई हैं
मुझे जाने दो अपनी इन्द्रियाँ वापस पाने
और सब कुछ यहीं- इसी देश में, इसी काल में
इसी धूल में, इसी घाम में.

6 comments:

vandan gupta said...

बेहद गहन कवितायें।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

मनोज कुमार झा जी की बहुत सुन्दर रचनाएँ हैं!

Meera said...

bahut achi kavitayen hain ..khas taur par 'punarvas' bahut sundar likhi gayi hai...

Meera said...

bahut achi kavitayen hain ..khas taur par 'punarvas' bahut sundar likhi gayi hai...

अरुण चन्द्र रॉय said...

बेहद गहन कवितायें।

महेश वर्मा mahesh verma said...

मुझे नामपट्टिका नहीं ठोस जलमय चेहरा दिखाओ.
इस झाड़ी में कुछ था जो त्वच की गंध बदल देता था
मुझे वो सबकुछ वापस करो -
सारे गंध और सारी झाड़ियाँ...

शानदार कवितायें , कवि को हार्दिक बधाई और प्रकाशक का आभार .