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Tuesday, December 6, 2011

मोपासाँ की कहानी - चाँदनी


( मोपासाँ. यह नाम कथा साहित्य की दुनिया में सुपरिचित है. सीधी सरल  भाषा, चुस्त थीम निर्वाह, स्थिति और सम्वेना पर कमाल की पकड़,  वैचारिक स्पष्टता.. यह सब सीखने के लिए लोग मोपासाँ को पढ़ते हैं. प्रस्तुत कहानी का अनुवाद युवा कवि श्रीधर ने किया है. संस्कृत ( M.A.) पढ़े लिखे श्रीधर ने फ्रेंच पर भी अच्छी पकड़ बनाई है. " तुझसे भी दिलफ़रेब हैं गमे- रोजगार के" जैसी स्थिति से जूझते हुए श्रीधर ने  अनुवाद के जो काम  किए वो अब शनै: शनै: उसे प्रकाश में ला रहे हैं. बॉदलियर की  कविताओं का अनुवाद किया है. बारहवीं सदी के कवि जयदेव के गीत गोविन्द की टीका लिख रहे हैं जो समय बेसमय ब्लॉग या पत्रिकाओं में दिखेंगी.  ) 

चाँदनी


मादाम जूली रोबेर अपनी बडी बहन मादाम हेनरियेत लतोघ, जो अभी अभी स्विट्जरलैंड की यात्रा से लौटी थी, का इंतजार कर रही थी.
लतोघ का सामान पॉच हफ्ते पहले ही आ चुका था. मादाम हेनरियेत अपने पति को अकेले ही वापस लौट जाने को कह गई थी, जहॉ कारोबार को उनके देख-रेख कि जरूरत थी और खुद अपनी  बहन के साथ कुछ समय बिताने पेरिस आ गई. ढलती शाम की खामोशी कमरे मे तैर रही थी. मादाम रोबेर अध्ययन मे तल्लीन थी और रह-रह कर उनकी ऑखे उस ओर घूम जातीं जिधर कोई आवाज होती.
आखिरकार दरवाजे की घंटी बजी, जहाँ उनकी बहन यात्रा वाले कपडों में उपस्थित मिलीं. तत्काल, बिना किसी सम्बोधन के दोनों एक-दूसरे के गले लिपट गईं. उसके बाद उन्होने ढेर सारी बातें कीं, एक-दूसरे के स्वास्थ्य तथा परिजनों के बारे में पूछा, तथा बाकी की और भी हजारों बातें करते हुए मादाम हेनरियेत ने अपनी टोपी उतार दी.
अब तक अन्धेरा पूरी तरह घिर चुका था. मादाम रोबेर लैम्प लाने गई. जैसे ही वह लैम्प के साथ वापस आयी और अपनी बहन के चेहरे का परीक्षण किया, अपनी बहन का कोई और रूप देखकर घबरा गई. मदाम लतोघ के कन्धे पर सफेद बालो के दो गुच्छे लटक रहे थे. और बाकी के बाल काले और भूरे मिलेजुले थे. वह यह सोचकर चिंतित हो उठी कि केवल 24 साल की उम्र में ही इतना परिवर्तन और वो भी अचानाक स्विट्जरलैंड की यात्रा के दौरान!
बिना किसी हरकत के मादाम रोबेर ने हेनरियेत को विस्मय भरी दृष्टि से देखा, उसकी ऑखों मे आँसू तैरने लगे, जैसे ही उसने यह सोचा कि जरूर उसकी बहन के ऊपर कोई आपदा आ पड़ी है. उसने पूछा,
“तुम्हे क्या हो गया है हेनरियेत?” “
एक दुखद मुस्कान के साथ हेनरियेत ने उत्तर दिया,
“क्यो, कुछ भी तो नहीं हुआ, क्या तुम मेरे सफेद बालो की वजह से पूछ रही हो ?”
लेकिन मदाम रोबेर ने आवेग के साथ लतोघ का कंधा पकड़ लिया और उसके चेहरे पर मानो कुछ खोजती हुई बोली, “क्या हुआ है तुम्हारे साथ? मुझे सबकुछ सही सही बताओ, अगर कुछ भी छिपाने की कोशिश की तो ठीक नहीं होगा.”
दोनों बहनें आमने सामने खड़ी रहीं. मदाम हेनरियेत, जो मूर्छा के आवेग से पीली पड़ गईं, उनकी ऑखे डबडबा गईं.
उनकी बहन लगातार पुछ्ती रही,
“क्या हुआ, कुछ बताती क्यों नही ? जबाब दो !”
मादाम हेनरियेत ने सिसकते हुए कहा, “ मेरा... मेरा एक प्रेमी है.” और अपना चेहरा बहन के कन्धे पर टिकाकर सुबकने लगी. थोडी देर मे हेनरियेत ने खुद को कुछ हल्का पाया लेकिन खुद को और ज्यादा हल्का करने के लिये वो अपनी सारी बातें बहन के सामने उड़ेल देना चाहती थीं.
इसके बाद दोनो औरतें कमरे के अन्धेरे कोने पर रखे सोफे पर बैठ गईं, छोटी बहन ने बड़ी बहन को गलबाहों में भर लिया और उसकी बातें ध्यान से सुनने लगीं.
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वह स्थिति ऐसी थी की कुछ कहा नहीं जा सकता बहन. मैं खुद को भी उस वक्त समझ नहीं पाई. और उसी दिन से मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि मै पागल हो गई हूँ. अपनी बहन को आगाह करने के अन्दाज में हेनरियेत ने कहा, “खुद को लेकर बिल्कुल सावधान रहना बच्ची, क्योंकि तुम्हें पता भी नहीं चलेगा कि तुम कब इतनी कमजोर और विवश हो गयी.” और आगे की बात बताना शुरु कर दिया....
“तुम तो मेरे पति को जानती ही हो और यह भी जानती हो कि मै उनसे कितना स्नेह रखती हूँ. लेकिन परिपक्व और भावुक होते हुए भी वह नारी हृदय की कोमलता को कभी समझ ही नही पाये. वह हमेशा एक जैसे ही रहते हैं. हमेशा की तरह अच्छे, मुस्कराते रहने वाले, दयालु और संपूर्ण. ओह, कभी कभी तो मैं तड़प उठती हूँ कि काश वो मुझे अपनी बाहों मे लेकर उन कोमल चुम्बनो से भर देते जो दो युवाओ को अंतरंग बनाते है. काश वो थोडे असंयमी और कमजोर होते ताकि मेरी भावनाओ व मेरे आसुओं का ख्याल रखते!
“ये सारी चीजें तुच्छ जान पडती हैं; लेकिन हम औरतें बनी ही इस तरह से है. इसके लिये हम कुछ कर भी नहीं सकते.”
लेकिन फिर भी, अभी तक जो मेरे साथ नही हुआ था वही उस रोज घटित हुआ. ऐसा होने का कोई खास कारण नही था. वजह बस ये थी कि उस रोज लूसेघ्न की खुबसूरत झील मे चाँदनी झिलमिला रही थी.
“महीने भर की यात्रा के दौरान, मेरे पति के शांत और उदासीन स्वभाव के कारण मेरा उत्साह मरता जा रहा था तथा मेरे कवित्व की सरगर्मी भी शांत होती जा रही थी. सूर्योदय के वक्त ऊँची पहाडियों के रास्ते पर चलते हुए जब हमने पहाडियों पर फैली पारदर्शी धुन्ध, घाटियों, जंगलों और गॉवों को देखा, मैने आनन्द के अतिरेक मे अपने पति से कहा, “कितना खूबसूरत दृश्य है प्रिय!” और उनसे एक चुम्बन लेने का अनुरोध करने लगी. तीखी लेकिन दयालुता से भरी मुस्कान लिये उन्होने उत्तर दिया, “क्यों? यहाँ प्रेम करने का कोई कारण मुझे नहीं दिखता और सिर्फ इस वजह से मैं तुमारा चुम्बन नहीं ले सकता कि यहाँ का दृश्य तुम्हे बेहद पसन्द आया है.”
“उनके इन शब्दो ने मेरे हृदय को बर्फ की तरह जमा दिया. इतना ही नहीं, उस दृश्य को देखकर मेरे अन्दर जो काव्यानुभूति जाग रही थी उसकी भी उन्होने उपेक्षा की, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि खुद को कैसे व्यक्त करूँ? मै लगभग उस तप्त भट्टी की तरह हो गई थी जिसके अन्दर भाप भरी हो लेकिन उसका मुह ऊपर से बन्द हो.”
एक शाम ( जबकि हम दोनों 4 दिन से फ्लोलेन नामक होटल मे ठहरे हुए थे), रोबेर्त को हल्का सिरदर्द था इसलिये वह खाने के बाद तुरंत बिस्तर पर चला गया और मै झील के किनारे टहलने के लिये अकेले निकल पडी.”
वह ऐसी रात थी जिसको मैंने सिर्फ कहानियो में ही पढा था. पूर्णिमा का चाँद आकाश मे दिपदिपा रहा था. ऊँचे पहाड़ों की बर्फीली चोटियों को देखकर ऐसा जान पडता था, मानो उन्होने चाँदी का मुकुट पहन रखा हो, झील का पानी चंचल गति से बह रहा था. हवा बहुत मीठी लय में डोल रही थी. धीरे-धीरे मेरे उपर एक नशा सा तारी होने लगा. यह दृश्य जादू की तरह मेरे ऊपर हावी होने लगा. अजीब क्षण था वह. मेरे अन्दर से भावनाओ का समुद्र फूटने लगा. मैं वही घास पर बैठ गयी और चुपचाप झील के किनारो को निहारने लगी. एक विचित्र भाव ने मुझको अपने अधीन कर लिया. मै एक अतृप्य प्रेम की आकांक्षा के वशीभूत होने लगी. यह भाव एक तरह से मेरे अन्धकार और निराशा से भरे जीवन के प्रति विद्रोह जैसा था. ओह! क्या मेरा भाग्य ऐसा कभी नही होगा कि इस झील के किनारे कि चॉदनी रात मे उस इंसान  से आलिंगनबद्ध हो सकूँ जिससे मै प्रेम करती हूँ? क्या मै उन अधर चुम्बनो का रसास्वादन कभी नही कर सकती जिसकी शोभा विधाता के वरदान जैसी होती है. क्या मैं ग्रीष्म की ऐसी खूबसूरत चॉदनी में प्रेम का वह पवित्र एहसास कभी नहीं कर पाऊगी?
“अचानक मै किसी ऐसी औरत की तरह रोने लगी जिसका सबकुछ लुट चुका हो. मैने अपने पीछे किसी की आहट सुनी. मुझे रोता देखकर एक आदमी लगातार मुझे घूरे जा रहा था. जब मैने अपना सिर पिछे की तरफ घुमाया, वह मुझे पहचान गया और पूछ बैठा, “आप रो क्यो रही है मदाम?”
“वह एक युवा वकील था जो अपनी माँ के साथ टहल रहा था, जिससे कि हम पहले भी मिल चुके थे. उसकी आँखें मेरे उत्तर कि प्रतीक्षा कर रही थीं. मेरी समझ मे नही आ रहा था कि क्या जवाब दूँ उसे, और उस स्थिति से कैसे उबरूँ? मैने कहा, “मेरी तबीयत ठीक नही है.”
वह अपनी सहज और गरिमामयी चाल में टहलता हुआ मेरे करीब आ गया और चाँदनी के उस छोटे से  सफर में महसूस की हुई चीजों को बयाँ करने लगा. वह उस दृश्य के बारे मे वही सारी तफसीलें देने लगा, जो कि मैंने कुछ देर पहले महसूस किया था; यह जानकर मैं अचम्भित थी कि वह इस दृश्य को मुझसे भी बेहतर ढंग से समझ रहा था. अचानक ही उसने ‘अल्फ्रेड द मोसे’ की कुछ पंक्तियॉ उद्धृत कीं. मेरी साँसें मानो थम सी गयीं, मैं भावनाओं के अतिरेक मे डूब गयी. मैने ऐसा महसूस किया कि ये पर्वत, झरने, चाँदनी रात, सब के सब मेरे भीतर सँगीत की तरह गूँज रहे हैं.
उसने अपनी तफसीलों वाला कार्ड भी मुझे दे रखा था, और अगले दिन प्रस्थान के समय तक मुझे वापस नजर नहीं आया.”
“बहन उस छोटे से लम्हे मे मेरे साथ यह सब कुछ घटित हुआ लेकिन कब और कैसे हुआ ये मैं नहीं जानती.” अपनी बात खतम करके वह अपनी बहन की बाहों मे लिपटते हुए दर्द से कराह उठी.
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इसके बाद मदाम रोबेर स्वपूर्ण व गम्भीर मुद्रा मे बोली, “देखो बहन यह जरूरी नहीं की हम जिसे प्रेम करते हो वह इंसान ही हो, प्रेम इसके बगैर भी हो सकता है. उस रात तुम्हारा वास्तविक प्रेमी रात की वह मनोहर चॉदनी थी.”

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श्रीधर से सम्पर्क : shridhardubey1@gmail.com / 08285837372.


Wednesday, November 16, 2011

उस्ताद की कहानी : सुखांत


उस्ताद का सीधा सच्चा अर्थ अंतोन चेखव से है. लगभग सभी ने चेखव का नाम सुझाया पर 'कहानी कैसे लिखें' नामक भाषण में रॉबर्तो बोलान्यो ने चेखव और रेमंड कार्वर के नाम का जैसा जलवापूर्ण जिक्र किया है और नए कहानीकारों के लिए सुझाया है वह काबिले गौर है. प्रस्तुत है चेखव की कहानी सुखांत, जिसका अनुवाद कवि कथाकार श्रीकांत ने किया है. अपनी दैनन्दिन व्यस्तताओं को सुलझाते हुए श्रीकांत अनुवाद के जितना समय निकाल लेते हैं वह सराहनीय है. मुझे तो यह पराक्रम सरीखा लगता है.  

सुखांत

बतौर हेड कंडक्टर काम करने वाले निकोलाई निकोलाएविच स्टिचकिन ने छुट्टी के एक दिन लुबोव ग्रिगोर्येव्ना नाम की खास महिला को एक जरूरी बात के लिए अपने घर बुलाया. लुबोव ग्रिगोर्येव्ना चालीस के आस पास की उम्र वाली प्रभावशाली और दिलेर औरत थी, जो लोगों की शादियाँ जोड़ने के सिवाय ऐसे सारे जरूरी बंदोबस्त कराती थी, जिनकी कि चर्चा सभ्य समाज में महज फुसफुसाहटों में होती है. हमेशा विचारों में खोया हुआ, गंभीर तथा हास परिहास से कोसों दूर रहने वाला स्टिचकिन, कुछ कुछ शर्माया हुआ सा, अपनी सिगार जलाते हुए कहने लगा,

“आपसे मिलकर मुझे खुशी हुई. सिमोन इवानोविच ने मुझे बताया कि आप कुछ ऐसे विशेष और अहम मसलों पर मेरी मदद कर सकती हैं, जिनका सीधा वास्ता मेरी जिंदगी की निजी सुख सुविधाओं से है. लुबोव ग्रिगोर्येव्ना, जैसा कि आप देख सकती हैं कि मैं पहले ही से बावन की उम्र पार कर चुका हूँ, एक ऐसी उम्र जिसमें बहुतों की औलादें भी वयस्क हो चुकी होंगी. मैं एक अच्छे ओहदे पर काम करता हूँ. हालाँकि मेरे पार बहुत ज्यादा संपत्ति नहीं है, लेकिन फिर भी मैं एक प्रमिका, पत्नी या बच्चों की परवरिश कर सकता हूँ. मैं जरूरी तौर पर यह बताना चाहूँगा कि तनख्वाह के अतिरिक्त मेरे कुछ पैसे बैंक के पास भी हैं, जिन्हें कि मैंने अपनी सीधी सादी और ईमादार जिंदगी जीते हुए बचा रखा था. मैं एक गंभीर और संयमी इंसान हूँ, तथा एक सम्मानजनक और कायदे कानून वाली जिंदगी जीता हूँ, जो कि औरों के लिए एक मिसाल भी हो सकती है. आज जो चीज मेरे पास नहीं है, वो है एक परिवार का अपनापा और अपनी बीवी. मेरी हालत दर दर घूमकर लोगों के असबाब पहुँचा रहे एक फेरी वाले, या फिर ऐसे ही किसी और इंसान की है जो बिना किसी सुख के जीवन काटता हुआ, किसी भी ऐसे शख्स से दूर रहता है जिससे कि वह अपना दुख बाँट सके, बीमार होने पर एक गिलास पानी माँग सके. और, लुबोव ग्रिगोर्येव्ना, मेरी इस तरह की अर्जी की एक और वजह यह है कि शादीशुदा इंसान एक गैर शादीशुदा के मुकाबले समाज में ज्यादा कद्र का हकदार होता है. मैं पढ़े लिखे तबके से बावस्ता हूँ, मेरे पास पैसे हैं, लेकिन अगर आप एक दूसरे नजरिए से देखें, तो इन सब के बावजूद, मैं हूँ क्या? एक ब्रह्मचारी, जिसने कोई कसम वसम ले रखी हो. यूँ, इन सभी को नजर में रखते हुए, मैं किसी योग्य महिला के साथ विवाह बंधन में बॅंधने की अपनी दिली ख्वाहिश जाहिर कर देना चाहूँगा.”

“यह एक अच्छी बात भी होगी.” बिचौलिए का रूप लिए लुबोव ने उसाँस भरी.

“मैं अब सेवानिवृत्ति ले लेने वाला हूँ, और इस शहर में किसी से मेरी जान पहचान भी नहीं है. ऐसे में, हर किसी को समान रूप से अजनबी पाते हुए, मैं जा भी कहाँ सकता हूँ. और कुछ कह-पूछ भी किससे सकता हूँ? इसीलिए सिमोन इवानोविच ने मुझे किसी ऐसे के पास जाने की सलाह दी जो इस काम में माहिर हो तथा लोगों के जीवन में खुशियाँ भरना ही उसका पेशा हो. तो इस तरह से, मैं आपसे ये गुजारिश करता हूँ कि आप मेरे आने वाले कल को सॅंवारने में कृपया मेरी मदद करें. आपके पास शहर की सभी योग्य लड़कियों की तफसील है, और आप आसानी से मेरी बात बना सकती हैं.....”

“हाँ, ऐसा हो सकता है.”

“पानी पीजिए, कृपा करके, पानी.....”

अपनी सहज भंगिमा के साथ लुबोव ने गिलास को अपने होठों से सटाया और बिना पलक झपकाए उसे खाली कर दिया.
“जरूर हो सकता है.” उसने जवाब दिया, और दुल्हन के रूप में आप किस तरह की लड़की पसंद करेंगे, मि. निकोलाई निकोलाएविच?”

“मैं, जो भी मेरी किस्मत को मंजूर हो.”

“बिलकुल सही फरमाया, वाकई यह किस्मत का ही सौदा होता है, लेकिन फिर भी, हर आदमी के पास पसंद नापसंद की एक अपनी समझ होती है. किसी को काले बालों वाली औरत भाती है, तो किसी को भूरे....”

एक गहरी साँस लेते हुए स्टिचकिन ने कहा “लुबोव ग्रिगोर्येव्ना, मैं एक गंभीर मिजाज वाला दृढ़ चरित्र आदमी हूँ. मेरे लिए खूबसूरती तथा रूप रंग जैसी बाह्य चीजें कभी भी प्राथमिकता नहीं रखतीं, क्योंकि, जैसा कि आपको पता भी है, कि चेहरा आखिरकार अदद चेहरा भर होता है, और एक खूबसूरत बीवी होने का मतलब साथ में बहुत सारी उलझनें और परेशानियाँ भी पाले रहना होता है. मेरे हिसाब से, एक औरत का सौंदर्य वो नहीं है जो हमें बाहर से दिखता है, बल्कि वो कहीं उसके अंदर छुपी चीज होता है. मेरा मतलब है कि उसे दिल का ठीक होना चाहिए तथा ऐसे ही कुछ और गुण होने चाहिए उसके पास. एक और गिलास लीजिए, प्लीज, एक और गिलास..... ठीक तो यह भी होगा अगर एक तनदुरुस्त पत्नी मिले, लेकिन आपसी सह-भाव के सामने यह भी कोई उतनी जरूरी चीज नहीं होगी: सबसे अहम है समझ. लेकिन वहीं दूसरी तरफ, इसके भी कुछ खास मायने नहीं, क्योंकि अगर वो ज्यादा समझ वाली निकली तो दिमाग कुछ ज्यादा ही चलाएगी, अपने बारे में ही सोचती रहेगी और उसके जेहन में उलूल जुलूल खयाल आते ही रहेंगे. यह कोई कहने की बात तो नहीं है, लेकिन आजकल के इस दौर में अच्छी शिक्षा के बिना भी बात नहीं बनेगी, लेकिन इस मामले में भी केवल ‘पढ़ाई – पढ़ाई’ जैसी बात का डर है. यह तो अति उत्तम होगा कि आपकी पत्नी एक साथ फ्रेंच, जर्मन तथा ऐसी और भी भाषाओं में बड़बड़ कर सकने वाली हो, लेकिन इन सब का क्या फायदा अगर उसे बटन टाँकने का शऊर न आए? मैं एक पढ़े लिखे तबके से बावस्ता हूँ, मैं कह सकता हूँ कि प्रिंस केनितलिन तक से मेरी वैसी ही बातचीत रही है, जैसी अभी आपसे है, लेकिन मैं अपने तरीके का साधारण इंसान हूँ. मुझे एक सीधी सादी लड़की चाहिए. जरूरी सिर्फ ये है कि वो मुझे एक तरजीह दे, और अपनी खुशियों के लिए मेरा कृतज्ञ हो.

“जाहिर सी बात है.”

“ठीक है फिर, तो अब सबसे जरूरी मसले पर आते हैं.... मुझे दुल्हन के रूप में कोई अमीर लड़की नहीं चाहिए. मैं ऐसी किसी भी चीज के सामने नहीं झुक सकूँगा जो मुझे अहसास करा दे कि मैं पैसे की वजह से शादी कर रहा हूँ. मैं अपनी बीवी की कमाई रोटी नहीं खाना चाहता, मैं चाहता हूँ कि वो मेरा जुटाया खाए, और इसे समझे भी. लेकिन हाँ, मुझे किसी गरीब लड़की से भी ऐतराज है. हालाँकि मैं एक उसूलों वाला आदमी हूँ, और मैं पैसे के लिए नहीं, बल्कि प्यार के लिए शादी करना चाहता हूँ, लेकिन इसके लिए एक गरीब लड़की भी नहीं चलेगी, क्योंकि, आपको तो पता ही है कि कीमतें किस तरह आसमान छूने लगी हैं, और फिर आगे बच्चे भी होंगे.”

“मैं दहेज वाली लड़की भी खोज सकती हूँ,” लुबोव ग्रिगोर्येव्ना ने कहा.

“प्लीज, थोड़ा और पानी लीजिए....”

दोनों के बीच लगभग पाँच मिनट तक चुप्पी छाई रही. फिर बिचौलिए की भूमिका वाली लुबोव ने एक जम्हाई ली, और जनाब कंडक्टर पर तिरछी निगाह डालते हुए बोली, “और गलती से... कुँवारियाँ कैसी रहेंगी? मेरे पास कुछ ऐसे सौदे भी हैं. एक फ्रेंच और दूसरी ग्रीक नस्ल की, दोनों ही ठीक ठाक.”

स्टिचकिन ने इस पर विचार किया, बोला:

“जी नहीं, शुक्रिया. अब, यह देखने के लिए कि एक असामी के साथ आपकी डील किस तरह से पूरी होती है, क्या मैं पूछ सकता हूँ: आप अपनी इस कृपा के लिए क्या लेंगी?”

“मैं ज्यादा की अपेक्षा नहीं करती. मुझे बस एक पच्चीस रूबल का नोट, और काम हो जाने पर एक ड्रेस दे दीजिएगा, मैं शुक्रगुजार होउंगी आपका.... और अगर दहेज वाली बात हुई, तो मामला थोड़ा अलग होगा और आप मुझे अलग से कुछ देंगे.”

स्टिचकिन ने दोनों हाथ मोड़े, और उन्हें सीने से सटाते हुए शर्त पर गौर करने लगा. फिर एक साँस भरते हुए बोला:
“इतनी फीस तो बहुत ज्यादा होगी”

अरे, यह किसी भी लिहाज से ज्यादा नहीं है. पहले के जमाने में, जब इस तरह से बहुत सारी शादियाँ होती थीं, तब हम कम रकम लेते थे. लेकिन अब का जैसा चलन है, उसमें हमें मेहनताने के नाम पर मिलता ही क्या है? अगर मुझे महीने भर में, बिना उधारी के वायदे के पच्चीस रूबल के दो नोट मिल जाएँ तो मैं खुद को खुशकिस्मत समझूँगी. और आपको तो पता ही है. आम शादियों में तो हमें कुछ मिलता भी नहीं है.”

स्टिचकिन ने औरत की तरफ देखा और कंधे उचका दिया.

“आपका मतलब है कि एक महीने में पच्चीस रूबल की दो नोटें पा लेना छोटी कमाई है?”

“बहुत ही छोटी. पहले के जमाने में तो हम कभी कभार सौ रूबल से भी ऊपर बना लेते थे.”

“मुझे तो एहसास ही नहीं था कि आपके तरह के कारोबार में रहकर एक औरत इतना अच्छा कमा सकती है. पचास रूबल! हर किसी की कमाई इतनी नहीं होती. थोड़ा सा और पानी लीजिए, थोड़ा....”

लुबोव ने गिलास को पलक झपकने से पहले खाली कर दिया. स्टिचकिन ने उसे सिर से पाँव तक देखता रहा. फिर बोला:
“पचास रूबल.... एक साल के मतलब छह सौ रूबल... गिलास भर लीजिए... क्यों, आपकी तरह की आय से तो... लुबोव ग्रिगोर्येव्ना, आप तो आसानी से अपने लिए किसी को चुन सकती थीं.”

“मेरे लिए?”, लुबोव ग्रिगोर्येव्ना हँसने लगी, “मैं तो बूढ़ी हो चुकी हूँ.”

“बिलकुल नहीं,.... आप अभी भी काफी खूबसूरत हैं, चेहरा भी भरा पूरा है, और दूसरी सारी खूबियाँ भी हैं आपमें....?”

लुबोव आत्मगौरव से फूलती हुई शर्माने लगी. स्टिचकिन भी शर्म सा महसूस करते हुए उसकी बगल में बैठ गया.

“सच में, मैं बताऊँ, तुम बहुत ही आकर्षक हो. अगर तुम किसी ऐसे शख्स से शादी रचाओ, जो धीर-गम्भीर होने के साथ सोच समझकर खर्च करने वाला हो, तो उसकी तनख्वाह और तुम्हारी आय के मिले जुले सहयोग से तुम एक बहुत ही सुखी जिंदगी जी सकोगे...”

“ओह निकोलाई निकोलाएविच, तुम कैसे तो बहे जा रहे हो....”

“क्यों, मैं तो बस कह ही रहा था...”

एक खामोशी पसर गई, स्टिचकिन ने तेज आवाज के साथ अपनी नाक साफ की, और लुबोव अपने लाल होते चेहरे के साथ उसे नखरीले तरह से देखने लगी. पूछी:

“महीने का तुम्हें कितना मिलता है, निकोलाई निकोलाएविच?”

“किसे, मुझे? पचहत्तर रूबल, बोनस को न जोड़ूँ तो.... इतने से इतर, थोड़ा बहुत हम चर्बी की मोमबत्ती और  ‘खरगोशोंके जरिए भी कमा लेते हैं.”

“तुम्हारा मतलब, शिकार करके?”

“अरे नहीं, खरगोशों हम बिना टिकट यात्रा करने वाले यात्रियों को कहते हैं.

एक और वक्फा खामोशी के साथ बीत गया. स्टिचकिन ने अपना पैर ऊपर उठा लिया और, जैसा कि जाहिर था, घबड़ाहट में फर्श पर चलाने लगा.

“मैं पत्नी के रूप में कोई नौजवान लड़की नहीं चाहता,” उसने कहा, “मैं अधेड़ उम्र का आदमी हूँ, और मुझे किसी ऐसे की तलाश है, जो काफी हद तक... तुम्हारी तरह की हो... गंभीर और आत्मसम्मान वाली... और शरीर से भरी पूरी, तुम्हारे जैसी...”

“रहम करो, तुम कैसे बोले जा रहे हो,” लुबोव ग्रिगोर्येव्ना खिलखिलाने लगी, अपने बैंजनी हो आए चेहरे को रुमाल से ढँकती हुई.

“इसमें इतना सोचने वाली कौन सी बात है? तुम एक ऐसी औरत हो जो मेरे दिल को भा सके, तुम्हारे अंदर वो सारे गुण हैं जो मेरे लिए सटीक हों. मैं एक इमानदार और संयमी आदमी हूँ, और यदि तुम्हें भी पसंद हूँ, तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है? मुझे तुम्हें अपना हाथ सौंपने की अनुमति दो!”

लुबोव ग्रिगोर्येव्ना ने खुशी का एक आँसू ढुलकाया, हल्के से हँसी, और प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हुए स्टिचकिन के साथ चश्मे की काँच को छू लिया.

“तो अब,” होने वाले, प्रसन्न, पति ने कहा, “मुझे बताने दो कि मैं तुम्हारे साथ किस तरह के जीवन की अपेक्षा करता हूँ,... मैं एक दृढ़ इंसान हूँ, संयमी और ईमानदार. मेरे पास चीजों की एक परिपक्व समझ है, मैं अपनी होने वाली पत्नी से भी वैसी ही दृढ़ता की उम्मीद करता हूँ, और इसकी भी, कि वो समझे कि मैं उसे संरक्षण प्रदान करने वाला तथा उसके लिए दुनिया का पहला शख्स हूँ.”

स्टिचकिन एक गहरी साँस लेते हुए बैठ गया, और अपनी शादीशुदा जिंदगी तथा एक पत्नी के दायित्वों के बारे में बोलता गया.

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अनुवादक श्रीकांत से सम्पर्क writershrikant@gmail.com / 9818152475

Tuesday, August 23, 2011

अपनी नई कहानी : जमीन अपनी तो थी

पिछले वर्ष सितम्बर के शुरुआती दिनों में ' रिवॉल्वर ' प्रकाशित हुई थी. तब से अब तक काफी कुछ बदल गया है. तबादले की वजह से बंगलुरु आ गया. नई जगह और नया काम था, जिसे करने / सीखने में महीनों लग गए. पर यह कहानी तब से लिख रहा था जब नया नया चन्डीगढ़ गया था. फिर तय हुआ कि रिहाईश करनाल रहेगी. उन्हीं दिनों इस कहानी ने मन में आकार लेना शुरु किया था. दो ढाई साल बीते और पूरी भी तब हुई, जब हरियाणा / पंजाब छूट गया.

कहानी का शीर्षक है : जमीन अपनी तो थी . यह शीर्षक, प्रसिद्ध उपन्यासकार जगदीश चन्द्र के उपन्यास से लिया है. ( उस उपन्यास का 'टाईटिल' से हू ब हू लिया है ). वजह दो है : पहली यह कि इससे मौजूँ कोई शीर्षक इस कहानी का सूझ नहीं रह था, दूसरे, इसी माध्यम से मैं जगदीशचन्द्र जी को श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ. जगदीश जी मूलत: पंजाब के रहने वाले थे और हिन्दी में खूब लिखा. 

मेरी इस कथा ले लिए यहाँ क्लिक करें. हम अनुराग वत्स के आभारी हैं कि उन्होने इस कथा को सबद पर प्रकाशित किया. 




Thursday, March 10, 2011

प्रतिनिधि हिन्दी कहानियों पर डॉ. कृष्णमोहन


किस्से की तरह मशहूर बात है कि कैसे डॉ. नामवर सिंह की टिप्पणी के बाद प्रेमचन्द की ‘ईदगाह’
हिन्दी में महत्वपूर्ण हो चली थी. पहले वो मेले की कहानी थी पर नामवर जी कि टिप्पणी के बाद
हामिद की कहानी, एक बच्चे के ‘कंसर्ंस’ की कहानी हो गई थी. कहानियाँ हम किसी बेगानी धुन में

पढ़े जा रहे होते हैं पर कभी किसी आलेख से अचानक जाग खुलती है और वही कहानी नए अर्थ के
साथ हमारे सामने उपस्थित हो जाती है. यहाँ प्रस्तुत आलेख ‘लोकतांत्रिक मूल्यों के पैमाने पर हिन्दी
कहानी’ डॉ. कृष्णमोहन का है जो निसन्देह एक नहीं, कई कहानियों के बारे में पूर्वप्रचलित धारणा
बदलने वाला आलेख है.

यह आलेख, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा सम्पादित हिन्दी की प्रतिनिधि कहानियों के संकलन की भूमिका है. इस आलेख में चर्चित, यशपाल की कहानी ‘करवा का व्रत’ के अलावा, सभी अठारह कहानियाँ उस पुस्तक में है. ‘कहानी संग्रह’ नाम से सम्पादित इस किताब का प्रकाशन इसी वर्ष विश्वविद्यालय प्रकाशन से हुआ है.








लोकतांत्रिक मूल्यों के पैमाने पर हिन्दी कहानी




किसी ने सच कहा है कि साहित्य और समाज में होने वाले परिवर्तन की सबसे सटीक पहचान स्त्री – पुरुष सम्बन्ध में आने वाले बदलाव के माध्यम से की जा सकती है. बीसवीं सदी का आरम्भ यूँ तो दुनिया की बन्दरबाँट के लिये आयोजित विश्वयुद्ध के साथ हुआ, लेकिन जल्द ही यह दुनिया स्वतंत्रता, समानता और न्याय के लिये जूझ रही ताकतों का मंच बन गई. हमार देश भी इस दौरान देशभक्ति और आत्मोत्सर्ग की भावना से उत्तरोत्तर ओतप्रोत होता रहा. ‘उसने कहा था’ और ‘गुंडा’ इसी मनोवृति की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं. खास बात यह है कि इन दोनों कहानियों में क्रमश: जर्मनों और अंग्रेजों से देश की रक्षा के जारी संघर्ष में आहुति देने के कारण स्त्री के प्रति पुरूष का प्रेम है. विपरीत परिस्थितियों के चलते मिलन नहीं हो सका, लेकिन विलगाव से भी वह आँच मद्धम न पड़ी. लहनासिंह और नन्हकूसिंह की सूबेदारनी और पन्ना के प्रति वचनबद्धता देश और मानवता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का विकल्प नहीं, उसका पर्याय बनती है. उच्चतर मानवीय मूल्यों की एकता जीवन में चाहे जितनी अनूठी जान पड़ती हो, कला के दायरे की यह सीधी साधी सच्चाई है.


हमारी आजादी की लड़ाई के दौरान तीस का दशक कई स्तरों पर निर्णायक मोड़ का समय है. क्रांतिकारी आन्दोलन के दमन, सविनय अवज्ञा आन्दोलन की असफलता और दुनिया के पैमाने पर जारी फ़ासीवादी उभार ने इस दौर के साहित्य को आत्मावलोकन और रूपांतरण के लिये प्रेरित किया. कविता के क्षेत्र में छायावादी वायवीयता और रूमान के आग्रह ने मानव - समाज की प्रगति के पक्षधर ठोस मूल्यों के लिये जगह खाली कर दी. इस युगांतर का श्रेय हिन्दी में प्रमुख रूप से प्रेमचन्द को है. 1936 का वर्ष इस दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय है. इसी वर्ष ‘गोदान’. ‘कफन’ और ‘साहित्य का उद्देश्य’ का प्रकाशन हुआ.


प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को एक – दूसरे की विपरीत परम्पराओं का वाहक बताने वालों की हिन्दी में कमी नहीं है. लगभग पैतृक विरासत की तर्ज पर ये लोग हर बड़े लेखक के नाम से एक परम्परा निकालने को तत्पर रहते हैं. समय – समय पर इन ‘परम्पराओं’ में परस्पर टकराव, अवमूल्यन और अधिग्रहण की प्रक्रिया भी चलती रहती है. इस दौरान साहित्य की अपनी परम्परा कहीं पीछे छूट जाती है.


परम्परा के साथ ऐसा मनमाना व्यवहार करने वाले भूल जाते हैं कि ख़ुद साहित्य की अपनी परम्परा होती है जिसमें मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के पक्षधर मूल्यों का पोषण होता है. इन मूल्यों का विरोध करने वाली प्रवृतियाँ भी साहित्य में सक्रिय होती हैं, जो सामाजिक यथास्थिति को बनाये रखने के लिए प्रभुत्वशाली वर्ग के मान – मूल्यों का समर्थन करती हैं. व्यापक रूप से साहित्य में यही दो परम्पराएँ सक्रिय होती हैं. इनके परस्पर संघर्ष से साहित्य का विकास होता है. बाकी सारा अन्तर सिर्फ शैली का होता है. रचना के अभिप्राय को न पकड़ पाने पर हम विभिन्न शैलियों और विषयों को ही पहचान पाते हैं, और उनके आधार पर परम्पराओं का निर्माण करने लगते हैं. इस प्रसंग में एक विशेष बात यह भी है कि सच्ची रचना का अभिप्राय कई बार रचनाकार से अलग, यहाँ तक कि उसके विरुद्ध भी हो सकता है. इस वजह से भी उसके अभिप्राय को ग्रहण करने में बाधा आती है. रचना में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ज़ोर-आजमाईश को स्वतंत्र होते हैं. कोई रचना उतनी ही प्रभावशाली होती है, जितना उसका प्रतिपक्ष (रचनाकार जिस प्रवृति को सही नहीं मानता और जिसका निषेध करना चाहता है ) मज़बूत होता है. अगर किसी रचना में चित्रित, नकारात्मक प्रवृतियों को धारण करने वाले पात्र कमजोर और हास्यास्पद है तो वह रचना उठ ही नहीं सकती. रचनाकार को अपना पक्ष भी अपने सशक्त प्रतिद्वन्दी से जूझकर ही वास्तविक ऊँचाई हासिल करता है. तभी वह प्रतिपक्ष का सकारात्मक निषेध कर पाता है. आधुनिक कला की दुनिया का यह भी सार्वभौम नियम है.


रचना का दूसरा लेकिन अधिक महत्वपूर्ण मानदण्ड है स्त्री के प्रति उसमें व्यक्त हुआ नज़रिया. लैंगिक विषमता का इतिहास सभ्यता की समूची यात्रा से जुड़ा हुआ है. इसलिए इस कसौटी पर आधुनिक काल के हिन्दी साहित्य को आसानी से कसा जा सकता है. स्त्री को हीन और हेय समझने वाली कोई रचना न तो लोकतांत्रिक हो सकती है, न ही मानवीय. हाँ, रचना के सत्य को ग्रहण करते समय सावधानी बरतना जरूरी है. रचनाकार की इच्छा और रचना की वस्तुगत भूमिका को अलग अलग समझना अनिवार्य है. इसे रचनाकार की विचारधारा और उसकी संवेदना के बीच के के अंतराल के रूप में देख सकते हैं.


बहरहाल, हम अपने मूल बिन्दु पर लौटें, तो प्रेमचंद और जैनेन्द्र के बीच जो अंतर है वह यथार्थ को चित्रित करने के तरीके का है. प्रेमचंद के यहाँ मनुष्य का अन्तर्जगत अपने सामाजिक परिवेश के बीच शरीर में आत्मा की तरह मौजूद होता है. जबकि जैनेन्द्र के यहाँ आत्मा का ही एक़्स-रे होता है. कहा जा सकता है कि वे आत्मा के शिल्पी अथवा गुप्तचर हैं. लेकिन इस आधार पर इन्हें अलग – अलग खानों में बाँटना हास्यास्पद होगा. सच तो यह है कि अंतर्जगत की गाँठें भी बाह्य जीवन की ही देन होती हैं. कभी हम प्रत्यक्ष जीवन से उसका सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, कभी नहीं जोड़ पाते.


उदाहरण के लिए प्रेमचन्द की दो लगभग अंतिम रचनाएँ ‘गोदान’ और ‘कफन’ को लेते हैं. ‘ गोदान ’ का होरी जिस ‘धरम – मरजाद' से पीड़ित है, वह उसके समाज का एक मूल्य है, जो उसकी आंतरिक विवशता बन गया है. विचार और व्यवहार की एकता का कोई विकल्प उसके पास नहीं है, इसलिए अपने पाखंडी समाज में वो अकेला पड़ जाता है. इसी स्थितिजन्य विवशता के धनिया जैसी तेजस्विनी स्त्री को प्रतीकात्मक गोदान करने के लिए बाध्य होना पड़ता है. होरी और धनिया अपने समाज की जकड़बंदी तोड़ नहीं पाते. प्रेमचन्द का रचनाकार इसे स्वीकार नहीं करता. वे उस समाज से प्रतिशोध लेने के लिए घीसू – माधव जैसे चरित्रों की रचना करते हैं. गोदान की कौन कहे, वो दोनों कफन तक की परवाह नहीं करते. पुरोहिती कर्मकाण्डों के प्रति, इस तरह वे अपनी घृणा व्यक्त करते हैं. ध्यान दें कि ऊपरी तौर पर होरी-धनिया और घीसू-माधव में कोई साम्य नहीं है, लेकिन आंतरिक रूप से वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. ‘पूस की रात’ का हल्कू भी इसी तस्वीर का एक और रूख है.


‘कफ़न’ पर विचार करते हुए कुछ विचारकों ने बुधिया के प्रति जताई गई संवेदनहीनता के निहितार्थों की चर्चा की है. वास्तव में यह हमारे समाज में स्त्री की स्थिति से जुड़ी हुई त्रासदी है. इस कहानी में प्रेमचन्द ने बुधिया के दर्दनाक अंत को तेज गति से चित्रित किया है. पर हमारे समाज में स्त्री की धीमी और खामोश मौत की तरफ बढ़ते हुए हमेशा देखा जा सकता है ; चाहे वह ‘पत्नी’ की सुनन्दा हो, ‘रोज’ की मालती, ‘करवा का व्रत’ (यशपाल ) की लाजो हो. ‘होली नहीं खेलता’ की ज्योत्सना अधिक स्वतंत्रचेता और निर्णयात्मक ठहरती है. जब उसके एक स्वाधीनतामूलक वक्तव्य को उसका प्रेमी बैजल उसकी पराधीनता का सूचक मानकर उसे उसके पति की सम्पत्ति के बतौर देखने लगता है, वह पति की इच्छा के विरूद्ध जाकर भी उससे सम्बन्ध तोड़ लेती है. बैजल की चेतना का पिछड़ापन उसके आड़े आ जाता है और अंगूर खट्टे हैं वाले अंदाज़ में उसे होली न खेलने की घोषणा करनी पड़ती है.


फिर भी ‘पत्नी’ का पुरुष इस मामले में विशिष्ट है कि वह अपने समय के उन्नत राजनीतिक विचारों का प्रतिनिधित्व करता है. राजनीतिक रूप से उन्नत और सामाजिक रूप से पिछड़ा होना हमारे स्वाधीनता आन्दोलन की दूरगामी अर्थ रखने वाली सच्चाई है. कालिन्दीचरण क्रांतिकारी आन्दोलन पर तनिक उदार, गाँधीवादी नज़रिये से विचार करता है. सम्भवत: यह नज़रिया स्वयं जैनेन्द्र का भी है. उन्होंने कालिन्दीचरण को प्रतिपक्ष के रूप में चित्रित किया है, जिसका उन्हें निषेध करना है. लेकिन इसका चित्रण उन्होंने अपनी आत्मा के एक अंश से किया है. वह पात्र अपनी शक्ति और सीमा, दोनों के साथ उपस्थित होता है. इससे पाठक को अपने भी अन्दर मौजूद ‘कालिन्दीचरण’ का पता चलता है. वह उस बुराई के प्रति सचेत होता है. ऐसा न होने पर ‘रोज़’ या ‘करवा का व्रत’ के पतियों से सामना होता है, जो सर्जरी के अभ्यास के लिए मरीज की टांग काट देने या अधिकार जताने के लिए पत्नी को थप्पड़ रसीद करने में गुरेज नहीं करते. हम इनकी आलोचना तो करते हैं, लेकिन आत्मसमीक्षा को प्रेरित नहीं होते. वह बुराई हमारे अन्दर फलती-फूलती रहती है और हम ‘दूसरों’ की कमियों को अपना निशाना बनाते रहते हैं.


पति के लिए ‘पत्नी’ द्वारा किये जाने वाले त्याग की परम्परा समाज और साहित्य, दोनों में अक्षुण्ण रही है. यह हमारे सामंती – पितृसत्तात्मक समाज को संचालित करने वाली अनेक जड़ताओं में से एक है. दूसरे शब्दों में, यह एक सामंती आदर्श है जिसको समानता और स्वतंत्रता के लोकतांत्रिक आदर्श से चुनौती मिलती है. ‘गोदान’ में सामंती आदर्श के निर्वाह को देखकर मन में क्षोभ उत्पन्न होता है, जबकि ‘कफ़न’ में इन बन्धनों को एक झटके में तोड़ फेंकने का लोकतांत्रिक आदर्श प्रस्तुत है. पहली प्रवृति को आलोचनात्मक यथार्थवाद और दूसरी को वैकल्पिक आदर्शवाद कह सकते हैं. फ़िलहाल, सामंती आदर्श हमारे समाज को संचालित कर रहे हैं, इसलिए उनका आलोचनात्मक चित्रण ही कहानियों में अधिक होता है. ‘कफ़न’ जैसी रचनाएँ यूटोपिया रचती हैं, इसलिए विरल होने पर भी हमें गहरे तक हाँट करती हैं.


‘नन्हों’ और ‘कोसी का घटवार’ में यह तनिक बदले हुए कोण से उभरता है. यहाँ समाज की पिछड़ी हुई मान्यताओं की वेदी पर व्यक्तिगत भावनाओं की कुर्बानी दी जाती है. दोनों कहानियों में एक दूसरे को दिलो-जान से चाहने वाले प्रेमी युगल हैं. बीच में कोई वास्तविक बाधा भी नहीं है. लेकिन वे एक –दूसरे से दिल की बात नहीं कह पाते. अपनी भावनाओं को लेकर वे अकारण शर्मिन्दा होते हैं. अपने अंतर्निषेधों के सामने समर्पण करते हुए वे अलग हो जाने को बाध्य हो जाते हैं. दोनों सोचते हैं कि पहल दूसरा करे. ‘ हमसे आया न गया तुमसे बुलाया न गया’ की यह मन:स्थिति उन्हें सामंती मूल्यों के असहाय शिकार में बदल देती है. सहानुभूति के नहीं, वे दया के पात्र बन कर रह जाते हैं.


‘परिन्दे’ में ह्यूबर्ट लतिका के सामने प्रेम का प्रस्ताव रखता तो है, पर यह जानकर कि वह पहले भी किसी को प्रेम कर चुकी है, अपने प्रस्ताव पर लज्जित होने लगता है. इधर लतिका, जो अपने प्रेमी के असामयिक निधन के कारण दु;खी और एकाकी जीवन बिताती है, उसके प्रस्ताव को विचारणीय भी नहीं मानती. ह्यूबर्ट के सीने में होते दर्द को लेकर मन ही मन वह आशंकित होती है. भाव यह उभरता है कि उसे प्रेम करने वाला अकाल मृत्यु के लिए अभिशप्त है. हमारे समाज में ऐसे अंधविश्वास भारी मात्रा में मौजूद हैं, लेकिन इस आधुनिक परिवेश में उनकी मजबूत पकड़ देखकर आश्चर्य होता है. हमारी आधुनिकता ऐसी ही है, बहुत कुछ बाहरी तामझाम पर निर्भर. यह कहानी हमें, इस प्रकार, आत्मावलोकन के लिए प्रेरित करती है.


‘तीसरी कसम’ की रसिक मार्मिकता की तह में जाएँ तो पता चलता है कि हिरामन की शादी उसकी भाभी ने हो जाने दी होती तो शायद तीसरी कसम की नौबत ही न आती. भाई – भाई के प्रेम को गौरवांवित करने के साथ–साथ जीवन – व्यवहार में भाई का हिस्सा हड़पने की प्रवृति हमेशा हमारे लोकमन में बद्धमूल रही है. हिरामन की निश्छलता के चलते उसे भाई – भाभी का यह व्यवहार नहीं खटकता, और उनकी सेवा में जुटा वह एक के बाद दूसरी कसम खाता रहता है. रेणु ने इस विडम्बना का संकेत तो किया लेकिन मन उनका भी लोकजीवन के सरस पक्षों में रमने वाला था, इसलिए यह पहलू कहानी में उभर नहीं सका. कुल मिलाकर सचाई, शालीनता और सादगी जैसे गुण यहाँ भी अन्याय का विरोध करने से रोक देते हैं, और उसे परिस्थिति का शिकार बनने की ओर ले जाते हैं.


‘यही सच है’ की नायिका दीपा दो पुरूषों के बीच झूलती रहती है. वह जिसे छोड़ आई है, पहला मौका मिलते ही उसे वापस पाना चाहती है, और जिसे पा चुकी है उसे छोड़ने – छोड़ने को हो आती है. स्त्री की पेंडुलम जैसी नियति को ही सच कहना यथार्थ के प्रति अनालोचनात्मक प्रतिबद्धता के चलते सम्भव है.


नई कहानी के दौर में स्त्री – पुरुष सम्बन्ध से अलग अन्य विषयों पर जो कहानियाँ लिखी गईं उनमें भी स्वार्थपरता के माहौल में जी सकने के लिए जूझते हुए मासूम और निरीह लोग दिखाई पड़ते हैं. ‘ जिन्दगी और जोंक ’ के रजुआ के साथ मुहल्ले वालों का बरताव हो या ‘ चीफ़ की दावत ‘ के शामनाथ का अपनी माँ से लगाव, हर जगह यही धूसर यथार्थ प्रकट हुआ है. ‘ भोलाराम का जीव ‘ का भोलाराम तो भ्रष्टाचार से जूझते – जूझते भगवान को प्यारा हो जाता है, लेकिन उसकी आत्मा पेंशन की फ़ाईल में ही अटकी रह जाती है. कहने को, इन कहानियों को मानवीय जिजीविषा की कहानियाँ कह सकते हैं, लेकिन असल में ये मनुष्य के अपनी गरिमा से वंचित हो जाने और उसे वापस पाने की उम्मीद तक के बग़ैर लगभग बदहवासी में जीते लोगों की कहानियाँ हैं. ये कहानियाँ ‘ कफ़न’ की ही परम्परा में हैं, हालाँकि इनमें घीसू – माधव के जीवट का अभाव है.


साठ और सत्तर के दशक में सामने आई ‘साठोत्तरी कहानी’ में सामाजिक यथार्थ की निष्क्रिय आलोचना के बजाय मोहभंग और विद्रोह का स्वर सक्रिय हुआ, लेकिन कोई तर्कसंगत राह न पाकर अराजकता की गर्त में गिर पड़ा. इस दौर की कहानियों का प्रतिनिधित्व ‘घंटा’ करती है. ‘पेट्रोला’ और कुछ नहीं घीसू – माधव के ही रहने की जगह है. आज़ादी के बाद विकसित दलाल – तंत्र ने कर्म के प्रति उनकी उदासीनता में छिपे परिवर्तनकामी सत्व का अपहरण कर उन्हें भेड़ियाधसान में शामिल मलूकदास के शिष्यों मे बदल दिया है. कुछ इस वजह से भी बैठकबाज़ों को, उनकी उनकी कुत्सित मंडली को अब वैसी नीची नज़र से नहीं देखा जाता. ‘घंटा’ का मुख्य पात्र ‘रेस्तराँ’ की जिन्दगी को लात मारकर अंतत: ‘पेट्रोला’ में लौट आता है. वास्तव में यह कोई सकारात्मक अंत नहीं है. ‘रेस्तराँ’ की जिन्दगी कम से कम प्रतिक्रिया तो पैदा करती है. उसमें सक्रियता की, गति की सम्भावना है. ‘पेट्रोला’ की जड़ता का आत्म-मोह से जैसा नाता है, उसमें उन्मेष की कोई सम्भावना नहीं दिखती. इस तरह ‘कफ़न’ की निष्क्रियता सकारात्मक है जबकि ‘घंटा’ का विद्रोह प्रतिगामी. नेहरुवीय स्वप्न के शेष होने के साथ हमारा मध्यवर्गीय युवा वर्ग अराजकता और जड़ता के बीच बहुत हद तक ऐसी ही स्थिति में फँसा रहा था.


साठोत्तरी दौर के कहानीकारों के परवर्ती दौर की कहानियों – ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ और ‘कविता की नई तारीख’ से यह बात अधिक स्पष्ट होती है. ‘धर्मक्षेत्रे.....’ की ज़ंजीर से बँधी हुई स्त्री अपने अपहर्ताओं में से एक की ‘मर्दानगी’ को चुनौती देकर अंतत: उसे उसके बाप से लड़ाने में सफल हो जाती है. इस तरह उसके नवजात शिशु की रक्षा होती है और ज़ंजीर से छूटकर वह ‘असार –संसार’ में खुशी के आँसुओं के साथ प्रवेश करती है. धार्मिक अखाड़ों वगैरह के प्रासंगिक चित्रण के बावजूद यह कहानी स्त्री की पराधीनता का मिथक रचती है और यथार्थ के कहीं बहुत पीछे छूट गए पहलू को व्यक्त करती है.


‘कविता की नयी तारीख’ के लेखक की पत्नी उसके नायकोचित व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए गर्व से बताती है कि शादी की पहली रात को ही उसने जो तमाचा मारा था, उसका निशान अब भी पत्नी के चेहरे पर है. आत्ममुग्ध पति जब भावुक होता है तो उस निशान को चूमने की इच्छा उसके मन में उठती है. धीरोदात्त तेवर में किया गया यह वर्णन कहानी को वापस जैनेन्द्र की ज़मीन पर ला पटकता है. यहाँ ‘पत्नी’ का असंतोष भी नदारद है. यथार्थवाद और यथास्थितिवाद में बस सूत भर का फासला होता है. यह कहानी इसे प्रमाणित करती है.


’90 के उथल–पुथल भरे दशक की पूर्वपीठिका ’80 के दशक में ही तैयार हो गई थी. इसकी प्रथम सूचना 1986 में प्रकाशित कहानी ‘तिरिछ’ ने दी थी. समाज और सत्ता के सर्वग्रासी चेहरे को बेनक़ाब करने के कारण यह कहानी वैसे ही ‘ट्रेंडसेटर’ साबित हुई जैसे पचास साल पहले ‘कफ़न’ हुई थी. तिरिछ जैसे अन्धविश्वासों के सहारे ही रामऔतार जैसे ज्योतिषियों का धंधा चलता है. तिरिछ के काटने के बाद किसी के बच जाने पर लोकमन से तिरिछ का आतंक कम हो सकता है. इसलिए तिरिछ के काटने की झूठी – सच्ची शंका के बाद पिता को धतूरे का काढ़ा पिला दिया जाता है जो खुद घातक जहर है. अपने गाँव वालों के साथ शहर जाते पिता अभी प्यास के बारे में बता भी नहीं पाते कि वे शहर लाकर उन्हें छोड़ देते हैं. शहर में अर्द्धविक्षिप्त पिता बैंक से पुलिस थाने तक मारे मारे फिरते हैं और अंतत: ‘पाकिस्तानी जासूस’ क़रार दिये जाकर संगसार कर दिये जाते हैं. अपने रिहायशी मकान को बचाने के लिए तारीख पर आए पिता मुक़दमें के कागज़ात को भी नहीं बचा पाते और अपने परिवार के सड़्क पर आ जाने की आशंका के बीच ही दम तोड़ देते हैं. तिरिछ के ‘काटने’ और धतूरे का काढ़ा पीने के बावजूद शहर आना जरूरी था क्योंकि तारीख पर न पहुँचने पर वकील लापरवाही करता और ज़ज का मूड अगर खराब हुआ तो वह कुर्की का आदेश दे सकता था. यह है गाँव से शहर तक हमारे नागरिक समाज और पुलिस से अदालत तक राज्यसत्ता का वास्तविक चरित्र. बक़ौल कवि राजेश जोशी – ‘ सबसे बड़ा अपराध है इस समय / निहत्था और निरपराध होना/ जो अपराधी नहीं होंगे/मारे जायेंगे.’


‘तिरिछ’ की सम्वेदना ’90 के दशक में परवान चढ़ी और नई सदी के आते –आते हिन्दी कहानी में वह असाधारण उन्मेष हुआ जिसे हम ‘समकालीन कहानी’ के नाम से पहचानते हैं. यह सिलसिला अब भी जारी है.



Tuesday, January 18, 2011

यासूनारी कावाबाता की कहानी : छाता

( नई उम्र का प्रेम कितनी कोमल अनुभूतियों से निर्मित होता है इसकी एक बानगी यासूनारी कावाबाता की यह कथा दिखाती है. यासूनारी कावाबाता का जन्म 1899 में जापान के एक प्रतिष्ठित चिकित्सक परिवार में हुआ था. चार वर्ष की उम्र में वह अनाथ हो गए जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके दादा-दादी ने किया. पंद्रह वर्ष की उम्र तक वे अपने सभी नजदीकी रिश्तेदार खो चुके थे. कावाबाता ने स्वीकार किया है कि उनके लेखन पर अल्पायु में ही अनाथ हो जाने और दूसरे विश्व युद्ध का सबसे ज्यादा असर रहा है. अपने उपन्यास Snow Country  के लिए मशहूर कावाबाता को 1968 में साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला. यह सम्मान प्राप्त करने वाले वह पहले जापानी लेखक बने. 1972 में इस महान लेखक ने आत्महत्या कर लिया. अनुवाद मनोज पटेल का है. मनोज द्वारा अनूदित कावाबाता की तमाम कहानियाँ जल्द से भी जल्द ब्लॉग्स पर दिखने लगेगीं)


छाता

बसंत ऋतु की बारिश चीजों को भिगोने  के लिए काफी नहीं थी. झीसी इतनी हलकी थी कि बस त्वचा थोड़ा नम हो जाए. लड़की दौड़ते हुए बाहर निकली और लड़के के हाथों में छाता देखा. "अरे क्या बारिश हो रही है ?"

जब लड़का दुकान के सामने से गुजरा था तो खुद को बारिश से बचाने के लिए नहीं बल्कि अपनी शर्म को छिपाने के मकसद से, उसने अपना छाता खोल लिया था.

फिर भी, वह चुपचाप छाते को लड़की की तरफ बढ़ाए रहा. लड़की ने अपना केवल एक कंधा भर छाते के नीचे रखा. लड़का अब भीग रहा था लेकिन वह खुद को लड़की के और नजदीक ले जाकर उससे यह नहीं पूछ पा रहा था कि क्या वह उसके साथ छाते के नीचे आना चाहेगी. हालांकि लड़की अपना हाथ लड़के के हाथ के साथ ही छाते की मुठिया पर रखना चाहती थी, उसे देख कर यूं लग रहा था मानो वह अभी भाग निकलेगी.

दोनों एक फोटोग्राफर के स्टूडियो में पहुंचे. लड़के के पिता का सिविल सेवा में तबादला हो गया था. बिछड़ने के पहले दोनों एक फोटो उतरवाना चाहते थे.

" आप दोनों यहाँ साथ-साथ बैठेंगे, प्लीज ?" फोटोग्राफर ने सोफे की तरफ इशारा करते हुए कहा, लेकिन वह लड़की के बगल नहीं बैठ सका. वह लड़की के पीछे खड़ा हो गया और इस एहसास के लिए कि उनकी देह किसी न किसी तरह जुड़ी है, सोफे की पुश्त पर धरे अपने हाथ से उसका लबादा छूता रहा. उसने पहली बार उसे छुआ था. अपनी उँगलियों के पोरों से महसूस होने वाली उसकी देंह की गरमी से उसे उस एहसास का अंदाजा मिला जो उसे तब मिलता जब वह उसे नंगी अपने आगोश में ले पाता.

अपनी बाक़ी की ज़िंदगी जब-जब वह यह फोटो देखता, उसे उसकी देंह की यह गरमी याद आनी थी.

" क्या एक और हो जाए ? मैं आप लोगों को अगल-बगल खड़ा करके नजदीक से एक तस्वीर लेना चाहता हूँ."

लड़के ने बस गर्दन हिला दी.

"तुम्हारे बाल ?" लड़का उसके कानों में फुसफुसाया. लड़की ने लड़के की तरफ देखा और शर्मा गई. उसकी आँखें खुशी से चमक रही थीं. घबराई हुई वह गुसलखाने की और भागी.

पहले, लड़की ने जब लड़के को दुकान से गुजरते हुए देखा था तो बाल वगैरह संवारने में वक्त जाया किए बिना वह झट निकल आई थी. अब उसे अपने बिखरे बालों की फ़िक्र हो रही थी जो यूं लग रहे थे मानो उसने अभी-अभी नहाने की टोपी उतारी हो. लड़की इतनी शर्मीली थी कि वह किसी मर्द के सामने अपनी चोटी भी नहीं गूंथ सकती थी, लेकिन लड़के को लगा था कि यदि उस वक्त उसने फिर उससे अपने बाल ठीक करने के लिए कहा होता तो वह और शर्मा जाती.

गुसलखाने की ओर जाते वक्त लड़की की खुशी ने लड़के की घबराहट को भी कम कर दिया. जब वह वापस आई तो दोनों सोफे पर अगल-बगल यूं बैठे गोया यह दुनिया की सबसे स्वाभाविक बात हो.

जब वे स्टूडियो से जाने वाले थे तो लड़के ने छाते की तलाश में इधर-उधर नजरें दौड़ाईं. तब उसने ध्यान दिया कि लड़की उसके पहले ही बाहर निकल गई है और छाता पकड़े हुए है. लड़की ने जब गौर किया कि लड़का उसे देख रहा है तो अचानक उसने पाया कि उसका छाता उसने ले रखा है. इस ख्याल ने उसे चौंका दिया. क्या बेपरवाही में किए गए उसके इस काम से लड़के को यह पता चल गया होगा कि उसके ख्याल से तो वह भी उसी की है ?

लड़का छाता पकड़ने की पेशकश न कर सका, और लड़की भी उसे छाता सौंपने का साहस न जुटा सकी. पता नहीं कैसे अब यह सड़क उस सड़क से अलग हो चली थी जो उन्हें फोटोग्राफर की दुकान तक लाई थी. वे दोनों अचानक बालिग़ हो गए थे. बस छाते से जुड़े इस वाकए के लिए ही सही, दोनों किसी शादीशुदा जोड़े की तरह महसूस करते हुए घर वापस लौटे.

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