Monday, January 11, 2010

जब हम देखते हैं तो क्या देखते हैं?


(कुणाल सिंह के शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास का एक और महत्वपूर्ण अंश, तस्वीर भी कुणाल की ही )

हाँ तो सन् 1760 की कथा चल रही थी जब ज़मींदारी खत्म कर ईस्ट इंडिया कम्पनी के तीन कारिन्दे मालगुजारी के नियमों में हुए बदलाव की घोषणा करने आदिग्राम पहुँचे थे। कहते हैं कि तब यहाँ जंगल का फैलाव मीलों मील था। नलहाटी बाज़ार तो अँग्रेजों के यहाँ आने के बाद बसा, जब जी.टी. रोड से नज़दीकी के कारण वहाँ अनाज मंडी और गोदाम बनाये गये। इधर जहाँ आज रानीरहाट है, वहाँ पहले कुछ मुसलमान घर थे और बाद में रानी रासमणि के नाम पर उस जगह का नाम रानीरहाट पड़ गया। इस पूरे इलाके का ज़मीदार का नाम बाबर था, जिसकी कोठी आदिग्राम में थी। कोठी अब खंडहर में तब्दील हो चुकी है, जहाँ बाघा और दक्खिना ने अपनी गृहस्थी बसा रखी है।

ईस्ट इंडिया कम्पनी की तरफ से जो तीन कारिन्दे आए थे, उनमें दो गोरे थे और तीसरा काला। काले को साथ में इसलिए रखा गया था क्योंकि वह मूलत: यहीं का रहने वाला था, सो इलाके के भूगोल से भली-भाँति परिचित था। दूसरे, वह गोरे साहबों की भाषा भी जानता था और यहाँ बोली जाने वाली देसी भाषा भी।

आदिग्राम के किसानों ने जब जाना कि अब उनकी ज़मीन उनकी नहीं रही, ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो गयी है, और इस पर खेती करने के लिए उन्हें फसल का एक हिस्सा कम्पनी को देना होगा, तो वे मरने-मारने पर उतारू हो गये। एक दिन आदिग्राम के जंगलों में दोनों गोरे अफसरों की लाश पायी गयी। काले को इसलिए जि़न्दा छोड़ दिया गया कि वह जाकर अपने हुक्मरानों को इसकी इत्तेला कर सके। उन दो गोरे अफसरों में हैट और चुरुट वाला, भारत का पहला अँग्रेज कलक्टर था और दूसरा जो उससे थोड़ी कम उम्र का, लेकिन ज़्यादा अनुभवी लगता था, दारोगा था।

आदिग्राम के इतिहास में होने वाला यह पहला कत्ल था, और एक नहीं दो-दो, दोनों ही गोरे अफसर। दूर-दूर से लोग आए थे देखने। छूकर देख रहे थे कि गोरी चमड़ी को छूने में कैसा लगता है। लाशों की मिट्टी काठ की तरह कड़ी हो गयी थी। लोग तय नहीं कर पा रहे थे कि लाशों को हिन्दुओं की तरह जलाया जाए या मुसलमानों की तरह दफ्न किया जाए। हिन्दू तैयार नहीं थे कि जहाँ उनके शवों का दाह किया जाता है वहाँ किसी म्लेच्छ का भी अन्तिम संस्कार हो और दूसरी तरफ मुसलमान भी अपने कब्रिस्तान में उन्हें कोई कब्र देने के लिए राज़ी नहीं हो रहे थे। इलाके के इतिहास में यह पहली बार था जब दो-दो लाशों को यों ही छोड़ दिया गया जंगली जानवरों के हवाले। जंगली जानवरों ने पहली बार इंसानी खून चखा।

दस-पन्द्रह दिन के भीतर आदिग्राम का चप्पा-चप्पा गोरे-काले फौजियों से भर गया। जंगल के सीमान्त प्रदेश में सात-आठ सौ तम्बू लग गये, जगह-जगह तोप, बंकर। लोगों के चेहरे पर भय की काली परछाइयाँ उतरने लगीं। फौज के कमांडर ने गाँव में घूम-घूमकर मुनादी करवा दी कि जो किसान कम्पनी को मालगुजारी देने में आनाकानी करेगा, उसे सरेआम कोड़े से पीटा जाएगा। अगर वह फिर भी राज़ी नहीं हुआ, तो उसे सूली पर टाँग दिया जाएगा। इस प्रकार रातोंरात पूरे इलाके पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज हो गया। सारी ज़मीन एक झटके में कम्पनी की हो गयी। अब किसान अपनी ही ज़मीन पर मजदूरी करेंगे। फसल बोने से पहले उन्हें कम्पनी की इजाज़त लेनी पड़ेगी कि धान रोपें या मान लीजिए अफीम या नील की खेती करें।

इतना होने के बाद, जैसे यह काफी नहीं था, पाँच-छ: साल बाद भीषण अकाल पड़ा। अब तक दर्ज इतिहास में बंगाल पर पडऩे वाला पहला अकाल। लोग दाने-दाने के लिए मोहताज हो गये। चारों तरफ हाहाकार मच गया। लेकिन कम्पनी ने मालगुजारी में कोई रियायत नहीं बरती। खाने को अन्न नहीं, मालगुजारी कहाँ से दे! बच्चे बूढ़े सब पर कोड़े बरसे, औरतों ने अफसरों की सेवा-टहल तक कबूल कर ली, फिर भी मालगुजारी चुक्ता करने भर पैसे इकट्ठा नहीं हुए।

परिमलेन्दु दा बताते हैं कि एक तरफ तो बंगाल के इस इलाके में इतना भीषण अकाल पड़ा था, दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कम्पनी के कारिन्दों का मालगुजारी वसूलने के लिए इतना अमानवीय अत्याचार। धीरे-धीरे अकाल की मार से बचे हुए लोगों में विद्रोह की चिनगारी सुलगने लगी। वे एकजुट होकर छिटपुट हमले करने लगे। कम्पनी के कारिन्दों की लाशें कभी पोखर से तो कभी जंगल से बरामद होतीं। बाद के वर्षों में आदिग्राम में दो और अँग्रेज कलक्टरों की हत्या हुई। इतिहास में इस विद्रोह को 'चुआड़ विद्रोह’ कहा गया। अँग्रेज इस विद्रोह को कुचलने में नाकामयाब हो रहे थे। इलाके के बच्चे-बच्चे तक तीरन्दाज़ी में पारंगत हो चुके थे। जंगलों में गुप्त मीटिंगें होतीं और आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की जाती। 'जान दूँगा, ज़मीन नहीं दूँगा’ जैसे नारे पहली बार इतिहास में तभी गूँजे थे।
लेकिन परिमलेन्दु दा ये किस इतिहास की बात कर रहे हैं? स्कूल के पाठ्यक्रम में इतिहास की जो पुस्तक लगी है, उसमें कहाँ किसी 'चुआड़ आन्दोलन’ और 'जान दूँगा, ज़मीन नहीं दूँगा’ जैसे नारों का जिक्र आता है? कोलकाता से पढ़-लिखकर आए इतिहास के सर भी इस बारे में कुछ नहीं जानते। ...और वह 27 अक्तूबर वाली घटना? बच्चों ने जि़द की कि परिमलेन्दु दा एक बार फिर से 27 अक्तूबर वाली कथा सुनाएँ।

रानी रासमणि ने इलाके की औरतों को बटोरकर एक लड़ाकू वाहिनी तैयार की थी। 27 अक्तूबर, 1770 की घनघोर अँधेरी रात जब कम्पनी के कुछ कारिन्दे नलहाटी बाज़ार से बैलगाडिय़ों पर धान लादकर चले तो उन्हें इस बात का ज़रा भी अन्दाज़ा नहीं था कि उनके साथ क्या होने जा रहा है।

नलहाटी से जी.टी. रोड पकड़कर कलकत्ते की ओर बढ़ें तो बशीरपुर के पास आधेक मील तक रोड जंगल से होकर गुज़रता है। कृष्ण पक्ष की अँधेरी रात। जंगल में चारों तरफ झिंगुरों की चिर्र-चिर्र, साँपों की सिसकारियाँ। जुगनुओं की चौंध उरूज पर थी। धान से लदी चार बैलगाडिय़ाँ थीं, सबके नीचे एक-एक लालटेन लटक रहा था। लालटेन की रोशनी आगे कुछ फलाँग भर पीला उजाला कर रही थी, फिर दूर दृश्य के अँधेरे में बिला जाती थी।
पहली बैलगाड़ी पर एक बन्दूकधारी सिपाही भी बैठा था। बैल सुस्त चाल में चलते-चलते जब एकाएक ठिठक गये तो उसकी नींद में झिपझिपाती आँखें खुलीं। उसने चौंककर गाड़ीवान को देखा। गाड़ीवान के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, यह उस मद्धिम रोशनी में भी साफ-साफ दिख गया। आँखों की पुतलियाँ स्थिर पड़ गयी थीं, मानो पत्थर की हो गयी हों। वह सामने की तरफ देख रहा था। सिपाही ने उसकी दृष्टि का अनुसरण करते हुए जब सामने की तरफ देखा, उसकी भी घिघ्घी बँध गयी।

पहली नज़र में तो लगा, जंगल के घनघोर अँधेरे में कहीं से दूधिया रोशनी का एक फौव्वारा फूट निकला हो। धीरे-धीरे रोशनी के केन्द्र में एक स्त्री आकृति उद्भासित हुई। सिपाही ने देखा, उस स्त्री की देह पर एक सूत भी कपड़ा नहीं था। बाल खुले हुए पीछे, जैसे घुटनों तक काले पानी का कोई झरना गिर रहा हो। शरीर का हर अंग अनावृत होकर जैसे सम्पूर्ण हो गया हो, और इस दर्प से भरकर दमकने लगा हो। केले के थम्ब जैसी चिकनी जाँघें, पेट के सुडौल खम और निर्दोष गोलाइयों वाले स्तन जैसे दुनिया की नश्वरता और असम्पूर्णता का उपहास उड़ा रहे हों। उसकी देह से छिटकती रोशनी में दुनियावी मिट्टी का कण मात्र नहीं था, वह मानो स्वर्ग से उतरी कोई अप्सरा हो।

सिपाही को काठ मार गया। वह अपनी जगह पर बुत बन गया। कम्पनी का वह जाना-माना बन्दूकची था। सिपाही पद पर नियुक्ति से पहले उसे बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग दी गयी थी। उसका निशाना इतना पक्का था कि उड़ती हुई चिडिय़ा के पंख झाड़ देता था। नियुक्तिपूर्व वह हर अभ्यास में अव्वल आया था। उसका कद छ: फुट से ऊपर था। चौरस चेहरा, प्रकांड सिर, घने-घुँघरीले बाल, गलमुच्छे। उसके शरीर में दैत्य का बल था। चलता था तो धरती धम्म-धम्म बजती थी। वह उखड़े हुए अरबी घोड़े की लगाम पकड़कर मिनटों में उस पर काबू पा लेता था। अशर्फी को मुट्ठी में जकड़कर चूरमा बना डालता था। पेड़ को अँकवार में पकड़कर जड़ समेत उखाड़ फेंकता था। पूरा मेमना एक बार में खा जाता था और डकारता भी नहीं था। लोगबाग उसका नाम सुनकर ही काँप जाते थे। लेकिन जीवन में पहली बार डर के मारे उसकी पेशानी पर पसीने की बूँदे चुहचुहा आईं।

रानी रासमणि उसके करीब आई। लालटेन की पीली रोशनी में उसने रासमणि के अंडाकार चेहरे को देखा। भँवों की गोलाई, मछलियों जैसी उसकी आँखें देखीं। गरदन की धारियाँ और नीचे की फीकी त्वचा जहाँ से स्तन उगने शुरू हुए थे, बायीं तरफ एक काला तिल था। सिपाही उस तिल पर जाकर अटक गया। उसे लगा, उसके भीतर के सारे दरवाज़े एकाएक भड़भड़ाकर बन्द पड़ गये हों। उसने अपने घुटनों में हल्की कँपकँपी महसूस की। पेडू में रह-रहकर एक मरोड़-सी उठ रही थी। हलक में मानो काँटे उग आये हों। उसने कई बार अपने होंठ गीले करने की कोशिश की। धड़कनों की रफ्तार इतनी बढ़ गयी थी कि लगता था छाती के पंजरे फट पड़ेंगे। सिपाही पद पर नियुक्ति के वक्त उसे बिल्कुल नहीं सिखाया गया था कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए। उसके पास कारतूस से भरा बन्दूक था, लेकिन आज वह एक छोटे-से तिल से हार गया था।

तभी पीछे से कई स्त्रियाँ आईं और बैलगाडिय़ों से धान की बोरियाँ उतारने में लग गयीं। सिपाही समेत सारे गाड़ीवान उन्हें ऐसा करते देखते रहे और अपनी जगह पर बुत बने रहे। बोरियाँ उतारकर उन्होंने एक दूसरे की पीठ पर लादी और जैसे आई थीं, वैसे ही अँधेरे में बिला गयीं। रानी रासमणि ने सिपाही के कन्धे पर हाथ रखा। एकाएक सिपाही के शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ गया। सबसे पहले उसकी नाक से खून की बूँदें निकलीं, टपकने लगीं। दाँतों-मसूढ़ों से खून निकलकर होंठों को रँगने लगा। उँगलियों की पोरें फट गयीं। कनपटी के पीछे से खून की एक झिझकती-सी रेखा निकल पड़ी। हड्डियाँ तिड़कने लगीं। रासमणि के निर्वस्त्र शरीर की आँच से सिपाही झुलसने लगा, उसकी चमड़ी गलने लगी। चारों तरफ मांस जलने की एक चिरचिराती-सी गन्ध फैल गयी। देखते-देखते सिपाही का पूरा शरीर गलकर बहने लगा। सिपाही फना हो गया।

ऐसी रानी रासमणि ने इलाके के ज़मींदार बाबर से शादी क्यों की? कहते हैं कि बाबर अमावस की अँधेरी रात की तरह काला था, उसकी तोंद निकली हुई थी, उसकी एक आँख पत्थर की थी, उसे एक कान से सुनाई नहीं देता था, वह लँगड़ा कर चलता था और उसकी देह से हमेशा पसीने की एक अजीब खट्टी गन्ध आती थी। क्या इन्हीं सब वजहों से इस दुनिया में सिर्फ वही था जो रानी रासमणि से ब्याह कर सकता था?

लेकिन मूल प्रश्न था कि रानी रासमणि ने बाबर में ऐसा क्या देखा जो उससे शादी कर ली! फोटोग्राफर से पूछा जाए कि देखना आखिर कहते किसे हैं! फटिकचन्द्र के बहुत से साथियों को बिलकीस अच्छी नहीं लगती, लेकिन जब फटिक उसे देखता है तो बस देखता ही रह जाता है। वह अक्सर अपने दोस्तों को सफाई देता है कि तुम लोग जिस दिन उसे मेरी नज़र से देखोगे, समझ जाओगे। किसी और की नज़र से भला कैसे देखा जाए! दो लोगों की नज़र में दुनिया दो तरह की दिखती होगी। इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ इतने एक जैसे थे कि भले ही उन्हें दुनिया दो तरह की दिखती हो, लेकिन दुनिया उन्हें एक ही नज़र से देखती थी। वे भी चालाकी से अपनी अलग-अलग देखी दुनिया को परस्पर साझा कर लिया करते थे। एक कहता था, भाई याद रखना मैंने बेनी माधव की बहू से मज़ाक किया है और कहा है कि तुम मुझे बहुत सुन्दर लगती हो। उस दिन के बाद से बेनी माधव की बहू दूसरे भाई को भी सुन्दर लगने लगती। मुलाकात होती तो वह भी कहता, तुम मुझे बहुत सुन्दर लगती हो जी! बेनी माधव की बहू कहती, ओहो, कितनी बार कहोगे! इसी तरह जो भाई अपने अब्बा के साथ दुकान पर बैठा, वह नलहाटी बाज़ार में मुंशीगिरी करने के बाद लौटे हुए भाई को यह ज़रूर बता देता कि आज बंशी पोद्दार ने पचास रुपये का बकाया सामान लिया है, ताकि दूसरे दिन अगर उसकी जगह मुंशी भाई दुकान पर बैठे तो बकाया वसूल न सही, कम से कम तगादा तो कर सके। दोनों भाई अपने साथ घटने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का जिक्र एक दूसरे से करते। इस प्रकार बाकियों के लिए अगर चौबीस घंटे के दिन-रात हों तो इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ के लिए अड़तालीस घंटे के होते थे। यह प्रकृति के शाश्वत नियमों का उल्लंघन था। दुनिया में एक आदमी एक ही वक्त दो-दो जगहों पर मौजूद रहे, यह दुनिया की आँखों में धूल झोंकने जैसा था। इसलिए दुनिया ने षड्यन्त्र रचकर एक देश के दो टुकड़े कर दिए और दोनों को अलग-अलग दो देशों में डाल दिया। बीच में सरहद खींची, बी.एस.एफ. का दस्ता तैनात कर दिया।
जब हम देखते हैं, तो आखिर क्या दिखता है! जो हमें दिखता है, ऐन वही क्या गाय भैंस बकरी को भी दिखता है? गाय भैंस बकरी की नज़र से देखा जाए तो दुनिया घास से भरी हुई एक टोकरी है। उन्हें हर जगह घास ही घास दिखता होगा। अगर कहीं नहीं दिखता तो घास की तलाश में वे पृथ्वी के दूसरे कोने तक चले जाएँगे। पर्वत पठार गुफा समन्दर सब लाँघ जाएँगे, लेकिन जब लौटेंगे तो उनके पास सिर्फ घास के संस्मरण होंगे। वे घास के बारे में बतियाते होंगे, उस पर कविता-कहानी लिखते होंगे, रियलिटी शो और टैलेंट हंट करवाते होंगे और पुरस्कार स्वरूप जीतने वाले के घास-फूस के घर को एक टाल घास से भर देते होंगे।
फोटोग्राफर को जब अपने देखने पर यकीन नहीं होता कि उसने सिटकनी लगायी है या नहीं, तो वह उसे छूकर देख लेता है। लेकिन तारों को देखना हो तो उन्हें कैसे छुआ जाए! किसी तारे को देर तक एकटुक देखते रह जाया जाए जो वह सिहरकर टिमटिमाने लगता है। सूरज की रोशनी या दिन को देखना इतना अदृश्य होता है कि उन्हें अलग से नहीं देखना पड़ता। दोपहर के वक्त किसी पेड़ के दृश्य में दिन की रोशनी का दिखना इतना घुला-मिला होता है जैसे दूध में पानी। हंस को पेड़ का दिखना और दिन का दिखना अलग-अलग दिख जाता होगा। अँधेरे में बिना टॉर्च या लालटेन के चलो तो रास्ता नहीं दिखता, सिर्फ अँधेरा दिखता है। जुगनुओं को दिखने के लिए अँधेरे का इन्तज़ार करना पड़ता है। रात के अँधेरे में कहीं रातरानी खिली हो तो उससे आती खुशबू उसका पता बता देती है। रातरानी कभी नहीं देख पाती कि वह कितनी खूबसूरत है और एक दिन मुरझा कर गिर जाती है। रासमणि और रातरानी में कितनी समानता है! दोनों ही एक दूसरे की तरह अन्धी हैं।

Sunday, January 10, 2010

निज़ार कब्बानी की दो कवितायें


निज़ार कब्बानी (1923-1998) अरब जगत में प्रेम , ऐंद्रिकता , दैहिकता और इहलौकिकता के कवि अपनी कविता के बल पर बहुत लोकप्रिय नामचीन गायकों ने उनके काव्य को वाणी दी है. साहित्यिक संस्कारों वाले एक व्यवसायी परिवार में जन्में निज़ार ने दमिश्क विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि प्राप्त करने के बाद दुनिया के कई इलाकों में राजनयिक के रूप में अपनी सेवायें दीं जिनसे उनकी दृष्टि को व्यापकता मिली. उनके अंतरंग अनुभव जगत के निर्माण में स्त्रियों की एक खास भूमिका रही है ; चाहे वह बहन की आत्महत्या हो या बम धमाके में पत्नी की मौत. परिचय साभार कबाड़खाना. यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी दो कवितायें.


जब जब मैं तुम्हे चूमता हूँ


हर लम्बी जुदाई के बाद
जब मैं तुम्हे चूमता हूँ
मुझे महसूस होता है
किसी लाल पोस्टबॉक्स में
कोई प्रेम पत्र छोड़ रहा होऊँ


गर्मियों में


गर्मियों में
मैं समुद्र किनारे पड़ा रहता हूँ
और तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
तुम्हे लेकर मैं क्या महसूसियत रखता हूँ
अगर यह कभी मैं समुद्र को बता देता
तब ये समुद्र अपने कूल-किनारे
अपने घोंघो
अपनी मछलियों को छोड़
मेरे पीछे चला आया होता

Wednesday, January 6, 2010

मार्ती - निकोलस गियेन की कविता

निकोलस गियेन: क्यूबा के ‘राष्ट्रीय कवि’। ‘ब्लैक पोयट्री’ के प्रतिनिधि कवि। पूरा नाम निकोलस क्रिस्तोबाल गियेन बतिस्ता। क्यूबा के कामाग्वे में जन्म (1902-1989)। कवि, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता।यह कविता क्यूबा के पूर्वोत्तर में स्थित एक शहर मार्ती पर है।

मार्ती

ओह!
मत सोचो कि उसकी आवाज
एक आह है! जिसके पास है
परछाईं के हाथ
और धुँधली दृष्टि हैं बूँदे जैसे
ठंड से काँपती कोई तिल किसी
गुलाब पर
उसकी आवाज
दरार डाल दे चट्टान में, उसके हाथ
दरका दे लोहे, उसकी आंखे
पहुंच जायें जलती हुई रात के जंगलों तक,
रात के काले जंगल

उसे छेड़ो: पाओगे कि जलाता है तुम्हे
उसे हाथ दो: देखोगे उसकी खुली बाहें
जिसमे समा जाये समूचा क्यूबा
जैसे तूफान में मजबूत पंखो वाली
चमकदार तोमेगिन।

पर जरा रात में चलो इसके पीछे:
आह! क्यों खींचती हैं तुम्हे स्वच्छ राहें
उसकी रौशनी किसी रात में।

मार्ती: क्यूबा के पूर्वोत्तर का शहर।
तोमेगिन: सुरीली आवाज में गाने वाला फिन्च समुदाय का पक्षी।

(श्रीकांत दुबे ने इस कविता का अनुवाद स्पानी भाषा से किया है। उनकी कविताओं से पूर्व परिचित हम जैसो के लिये यह सुखद है कि वो अनुवाद के बहुतेरे काम कर रहें है जो इस ब्लॉग पर समय-दर-समय आती रहेंगी। सूचनार्थ: ये मार्खेज की कुछ ऐसी रचनाओं का अनुवाद कर रहे हैं जो अंग्रेजी में भी उप्लब्ध नहीं हैं। )

Saturday, January 2, 2010

मिर्जा ग़ालिब की शाइरी पर लेखमाला, लेखक डॉ. कृष्णमोहन।

मिर्ज़ा ग़ालिब। दुनिया के महानतम काव्य विभूतियों में से एक। या शायद सर्वोत्तम।

डॉ. कृष्णमोहन। हिन्दी आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर। मुक्तिबोध की प्रमुख कविताओं पर किताब। साहित्यालोचना पर आपकी किताब “आधुनिकता और उपनिवेश”। हिन्दी कथा साहित्य की विशद पड़ताल करती आलोचना पुस्तक “कथा समय” शीघ्रातिशीघ्र प्रकाश्य। हिन्दुस्तानी कविता पर महत्वपूर्ण काम। पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन। ग़ालिब पर यह लेखमाला किश्तों में चलेगी। सम्प्रति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर।

अय आफ़ियत किनारा कर अय इंतिज़ाम चल

ग़ालिब की शाइरी के सामाजिक राजनीतिक आशयों को लेकर कई तरह के भ्रम हैं। पिछले दिनों 1857 के सन्दर्भ में बात करते हुए अनेक अध्येताओं ने उन्हे नये सिरे से व्यक्त किया है। कविता की सामाजिक भूमिका की गलत समझ और भारतीय काव्य-परम्परा की अवहेलना के कारण यह समस्या पैद हुई है। हम यहाँ संक्षेप में इन्हीं पहलुओं पर विचार करेंगे।

ग़ालिब की एक अपेक्षाकृत कम उद्धृत की गई ग़ज़ल के चन्द शेर हैं-

गुलशन में बंदोबस्त बरंगे–दिगर है आज
कुमरी का तौक हल्का-ए-बेरूने-दर है आज

आता है एक पारा-ए-दिल हर फुग़ां के साथ

तारे-नफस कमंदे-शिकारे-असर है आज

अय आफ़ियत किनारा कर अय इंतिज़ाम चल
सैलाबे-गिरिया दर पै-ए-दीवारो-दर है आज

पहले शेर का आशय है कि बग़ीचे का इंतज़ाम आज दूसरे ढंग का हो गया है। पहले जो फंदा चिड़िया के गले के इर्द-गिर्द था, अब वह दरवाजे का दायरा बन गया है। ऊपरी तौर पर तो चिड़िया अपना गीत गाने के लिए तो आजाद है, लेकिन यह आज़ादी एक बड़े कैदखाने के अन्दर की आज़ादी है। आबो-हवा में उन्मुक्तता की जगह घुटन भर गई है, और पूरा माहौल प्रदूषित हो गया है। यह फ़र्क शासकवर्गीय कठोरता और उदारता का है। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इन हथकंडों का बखूबी इस्तेमाल किया था। हमारे मौजूदा शासक भी अक्सर इसका स्वांग भरते दिख जाते हैं। यहाँ ‘दूसरे (दिगर) ढंग का इंतज़ाम’ की बात में व्यंग्य और विडंबना है। अव्वल तो वह पहले से अलग है नहीं, और फिर उसे आज़ाद करने वाला समझा जा रहा है जबकि वह गुलामी को ही और गहराई देता है।

दूसरे और तीसरे शेर में इसी परिस्थिति से उपजी मन:स्थिति का बयान है। इस स्थिति में हर कराह के साथ दिल का एक टुकड़ा बाहर आ जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति की सांस का हर तार मानो कमान बन गया है, जिससे छूटने वाला तीर उसके दिल में पैबस्त हो जाता है।

‘ऐ दिल की शांति तू अपनी राह ले और ऐ व्यवस्था तू चलती रह। आंसुओं की बाढ़ आज घरबार को ढा देने पर उतारू है।‘

ग़ालिब के अधिकांश आधुनिक अध्येताओं के साथ समस्या यह है कि वे उन्हें वास्तविक सन्दर्भों से काटकर पढ़ते हैं। नतीजा यह निकलता है कि उनके शेर शाब्दिक अर्थ तक सीमित हो जाते हैं और उनकी व्यंजना खो जाती है।....(जारी..)


Friday, January 1, 2010

युवा कथाकार कुणाल सिंह का पहला उपन्यास – "आदिग्राम उपाख्यान"

अप्रतिम युवा कथाकार कुणाल सिंह। अभिनव भाषा, बेहतरीन गद्य और नई सूझ बूझ से लैस कथाकार। ‘सनातन बाबू का दामपत्य’ कथा संग्रह खूब चर्चित। पारम्परिक किस्म के आलोचकों की पहली (ना)पसन्द। बावजूद इसके, लोग इनकी रचनाओं का इंतजार करते हैं। पच्चीस तक की उम्र कलकत्ते में गुजारी और अब पिछले तीन सालों से दिल्ली में। यह पहला उपन्यास- ‘आदिग्राम उपाख्यान’। आज की तारीख में बेहद मौजूँ विषय वस्तु।
इस उपन्यास के अंश नितांत पहली बार कहीं भी प्रकाशित हो रहे..नववर्ष के पहले पहल दिन पर...। उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य।


किस बाबरनामे में आदिग्राम का जिक्र आता है?

परिमलेन्दु दा ने बच्चों को जिस रानी रासमणि की कथा सुनाई थी, वह कोई सचमुच की रानी नहीं थी। वह एक गरीब चासी (किसान) की बेटी थी, जिसकी मौत बंगाल के अकाल में चावल की खुशबू से हुई थी। बंगाल में अकाल कब पड़ा था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं कि सन् तैंतालीस की बात है। रानी रासमणि की शादी बाबर से कब हुई थी, पूछा जाए तो परिमलेन्दु दा कहेंगे कि सन् 1760 की बात है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इस पूरे इलाके को गोरे-काले फौजियों और तोपचियों से भर दिया था। बाबर कौन था, यहाँ कहाँ से आया था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं...। यह सब क्या गोलमाल है! परिमलेन्दु दा एक साथ कितनी कहानियों को जोड़-गूँथ देते हैं।


अच्छा, बाबर मतलब तो मुस्लिम, फिर उसकी शादी रानी रासमणि से क्योंकर हुई! होती है क्या? फटिकचन्द्र पूछना चाहता है कि इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की बेटी बिलकीस से वह चाहे तो ब्याह कर सकता है क्या! पिछले बरस गौरांग पूजा के टाइम उसने बिलकीस को एक हेयरबैंड और रोटोमैक की कलम दी थी। लिखते-लिखते लव हो जाए। बिलकीस ने मुस्कराकर कहा था— आईलवयू।

इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ दोनों जुड़वाँ भाई थे। बचपन से ही वे दोनों इतने एक जैसे थे कि उनके अम्मी-अब्बा भी उन्हें सही-सही नाम से पहचानने में धोखा खा जाते थे। जब तक दोनों ने होश सम्भाला, तब तक किसका नाम इज़राइल है और किसका इस्माइल, यह पता कर पाना मुश्किल था। हो सकता है बचपन में कई बार इनके नामों में अदला-बदली भी हुई हो। अन्तत: लोगों ने इसका समाधान ऐसे निकाला कि जब भी किसी एक से काम पड़ता, वे दोनों का ही नाम लेकर पुकारते। जब वे स्कूल जाने जितने बड़े हुए, आर्थिक तंगी के कारण उनके अब्बा ने स्कूल में दोनों में से एक को ही दाखिला दिलवाया— इज़राइल हसन। लेकिन गुप्त बात यह थी कि कभी इज़राइल स्कूल चला जाता तो कभी इस्माइल। इस तरह गाँव वालों को बहुत मुश्किल से दोनों को अलग-अलग पहचानने का एक नुस्खा मिला कि दोनों में से जो भी स्कूल जाए वह इज़राइल, और जो न जाए तत्काल के लिए वह इस्माइल। स्कूल के रजिस्टर की मानें तो इज़राइल हसन ही पढ़ा-लिखा है और इस्माइल हसन काला अक्षर भैंस बराबर है। इस प्रकार 'इज़राइल हसन’ नाम ने छठी दर्जा पास कर लिया और 'इस्माइल हसन’ नाम अब्बा के साथ हाइवे के पास जड़ी-बूटियों और मसालों की दुकान पर बैठने लगा। बाद में जब उनकी दाढ़ी-मूँछ आ जाए जितने वे बड़े हो गये तो लोगों ने सुझाया कि एक को दाढ़ी और दूसरे को मूँछ रख लेनी चाहिए। कुछ दिनों तक उन्होंने ऐसा किया भी। लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात। लोग भूल जाते कि दाढ़ी वाला इज़राइल है या इस्माइल।


चूँकि अब्बा ने स्कूल में सिर्फ एक लड़के की फीस भरी थी, इसलिए उनका एक ही लड़का छठी पास कहा जा सकता था और दूसरे को अनिवार्यत: अनपढ़ होना होगा। उन्होंने एक पतलून-कमीज़ सिलवा दी ताकि पढ़े-लिखे इज़राइल को नलहाटी बाज़ार में कोई ठीक-ठाक काम मिल सके। पतलून-कमीज़ वाले लड़के को एक आढ़त में मुंशी के काम पर रख लिया गया। पतलून-कमीज़ पहनकर मुंशीगिरी करने कभी इज़राइल चला जाता तो कभी इस्माइल। दूसरा जो रह जाता, लुंगी-बनियान पहनकर मसालों की दुकान पर बैठ जाता। एक दिन पास के गाँव से पढ़े-लिखे इज़राइल के लिए एक रिश्ता आया। पहले यह सोचा गया था कि इज़राइल और इस्माइल की शादी एक ही साथ किन्हीं दो बहनों से की जाएगी। लेकिन अब्बा को दहेज़ में अच्छी-खासी रकम मिल रही थी, सो इंकार न कर सके। अच्छा, लड़की अगर दो बहन होती तो भी क्या उसका बाप दूसरी लड़की की शादी 'अनपढ़’ इस्माइल से करने के लिए राज़ी हो पाता? बहरहाल, लड़की इकलौती थी और सुनने में आ रहा था, बहुत सुन्दर थी।

ऐन शादी के दिन क्या हुआ कि इज़राइल को दस्त लग गयी। शादी की तैयारियाँ पूरी हो चुकी थीं, बारात निकल पडऩे को तैयार थी और इधर इज़राइल ने खाट पकड़ ली। लोगों को कुछ सूझ नहीं रहा था। अचानक इज़राइल तैयार होकर घर से बाहर आया और बोला कि अब उसकी तबीयत बिल्कुल ठीक हो चुकी है और बदले में इस्माइल की तबीयत बिगड़ गयी है। लोगों ने कुछ नहीं कहा। इज़राइल ने निकाह पढ़ी। शादी हो गयी। दुल्हन घर आई। साल भर बाद बिलकीस का जन्म हुआ।


बिलकीस का जन्म 6 दिसम्बर, 1992 को हुआ था। उसके जन्म के दिन देश भर में एक ज़लज़ला आया था, आदिग्राम में भी। लोगों के घर धू-धू कर जलने लगे थे। कई लोग मारे गये। कुछ मुसलमान बांग्लादेश भाग गये और कुछ हिन्दू वहाँ से भागकर यहाँ आ बसे। इज़राइल-इस्माइल की जोड़ी भी उसी साल टूटी। इनमें से एक के बारे में कहा जाता है कि वह बांग्लादेश भाग गया। कुछ लोग कहते हैं कि दरअसल वह कहीं नहीं गया, सचाई यह थी कि वही बिल्कीस का असली बाप था, इसलिए इज़राइल-इस्माइल में से दूसरे ने उसे मारकर कहीं दफ्ना दिया। अन्त के दिनों में कुछ लोगों ने उसे बाघा की पत्नी मयना के साथ भी देखा था और वे मानते हैं कि अफरा-तफरी का फायदा उठाकर वह मयना के साथ बांग्लादेश भाग गया। बाघा भी ऐसा ही सोचता है।

यह बहुत पहले की बात है जब बिलकीस पैदा हुई थी। जिस दिन बिलकीस पैदा हुई थी, उसी दिन बाबरी मस्जिद का ढाँचा ढहाया गया था। इतिहास के सर बताते हैं कि बाबर दिल्ली का...। लेकिन रानी रासमणि तो आदिग्राम की थी। ...इज़राइल मियाँ-इस्माइल मियाँ की तरह इतिहास में दो-दो बाबर हुए थे क्या? या दोनों दो इतिहास में अलग-अलग हुए। कौन से इतिहास में आदिग्राम का जिक्र आता है?

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रानी रासमणि का जन्म एक गरीब किसान के घर हुआ था। रासमणि जब पैदा हुई, उसे देखकर उसका बाप डर गया। रासमणि की माँ ने समझा कि उसके पति का चेहरा सहसा इसलिए बुझ गया है कि वह मन ही मन बेटे की आस लगाये होगा। उसने डरते-डरते कहा, ''लेकिन तुम तो कहते थे कि बेटा हो या बेटी, भगवान का दिया सर-आँखों पर! बेटी को भी वही दर्जा दोगे जो, मान लो कि बेटा होता, तो उसे देते’’।

''लेकिन इतनी सुन्दर लड़की! हमलोग गरीब हैं। आखिर क्या गलती हुई जो हम गरीब को ऊपरवाले ने इतनी सुन्दर लड़की दी!”


रासमणि की माँ ने नवजात को देखा, उसकी छोटी-सी देह से जैसे रोशनी की धारें फूटती हों।''हम इसे कहाँ छिपा के रखेंगे!” बाप ने कहा और डर गया।

कहते हैं जिस दिन वह पैदा हुई, एकाएक उसके बाप की उमर दुगनी हो गयी। बाल आधे से ज़्यादा झड़ गये और जो बचे उस पर चाँदी का पानी चढ़ गया। चेहरा झुर्रियों से भर गया, सारे दाँत गिर गये, आँखों में मोतिया के छल्ले पड़ गये। वह दिन-दिन भर खाँसने और कमर के दर्द के मारे झुककर चलने लगा। वह इतना कमज़ोर हो गया कि साँस लेने में भी उसे काफी मशक्कत करनी पड़ती और चलते वक्त अक्सर उसका दायाँ पैर सन्तुलन खोकर घिसटने लग पड़ता था।


जैसे-जैसे रासमणि बड़ी होती गयी, उसकी सुन्दरता की कीर्ति फैलती गयी। वह जहाँ कहीं जाती, एक पवित्र उजाले से उसका आसपास भर उठता। अँधेरे में भी रासमणि की देह से रोशनी फूटती होती। लोग दूर-दूर से उसे देखने आते और कहीं किसी आड़ से देखते, लौट जाते। दुनिया में यह कहने-सुनने का प्रचलन होता था कि रासमणि की सुन्दरता में ऐसी गैबी ताकत है कि जो कोई भी उसे सीधे-सीधे, बिना किसी ओट के देखता, फिर उसमें कुछ और देखने की लालसा हमेशा के लिए मर जाती। उसका कोई अंग विक्षत हो जाता, एक आँख की रोशनी चली जाती, एक पैर में फालिज मार जाता, एक हाथ बेकाम हो जाता, वह गूँगा-बहरा हो जाता। इस संसार से उसका जी उचाट हो जाता, मन में वैराग्य घर कर जाता, घर-द्वार पत्नी-बच्चे बूढ़े माँ-बाप को छोड़कर वह साधू-संन्यासी हो जाता, जंगल-जंगल पर्वत-पर्वत घूमता-बउआता रहता, एक दिन आत्महत्या कर लेता।

रानी रासमणि जब अठारह साल की हुई तो बंगाल में फिर दूसरा अकाल पड़ा। तब तक ईस्ट इंडिया कम्पनी नलहाटी बाज़ार में अनाज की आढ़त और गोदाम बनवा चुकी थी। यहाँ से अनाज बैलगाडिय़ों में लादकर कलकत्ते पहुँचाये जाते। कहा जाता है कि जब दूसरा अकाल पड़ा, कम्पनी के गोदामों में कोई एक लाख मन धान जमा रखे हुए थे। रानी रासमणि का बूढ़ा बाप अब तक इतना कमज़ोर पड़ चुका था जैसे कोई पुराना ज़र्द कागज़। उसकी देह की चमड़ी छिपकली की तरह सिकुड़ गई थी। कहते हैं कि जिस दिन वह मरा, उस दिन अँग्रेजों की कोठी में बासमती चावल पकाया जा रहा था। चूल्हे पर चढ़ाई गयी चावल की हाँड़ी से गरम-गुदाज खदबदाहट की आवाज़ निकल रही थी।


पकते हुए चावल की खुशबू हाँड़ी से निकलकर कोठी की सेहन तक जब पहुँची, सुबह के सवा दस बज रहे थे। सेहन में दो काले पहरेदार रात भर के जागरण के बाद अभी अधनींदे बैठे थे। वहीं एक खाज खाया कुत्ता गुटिआया हुआ पड़ा था। कुत्ते ने अपनी थूथन उठाकर खुशबू को देखा और इशारा किया। खुशबू, इसकी भरपूर कोशिश करते हुए कि उसके पैरों की आहट पहरेदारों को न मिले, सेहन से उतरकर बाहर चली आई।कुत्ते ने जिस रास्ते की ओर इशारा किया था, उस पर कदम रखते ही चावल की खुशबू के होश उड़ गये। चारों तरफ, जहाँ तक नज़र जाती, लाश ही लाश पड़ी थीं। कुछ लाशों को गिद्ध-सियारों ने बुरी तरह नोंच डाला था। उनके खुले हुए पेट से आँतों की बद्धियाँ दूर-दूर तक खिंची हुई थीं। एक बच्चे की साँसें अभी तक चल रही थीं। दो कौव्वे उसकी आँखों पर चोंच मार रहे थे। बच्चे के शरीर में इतनी सकत भी नहीं बची थी कि वह उन्हें उड़ा पाता। खून और कीचड़ से सनी पृथ्वी पर बेशुमार घोंघे और केंचुए रेंग रहे थे। साँपों से धरती पट गयी थी।

चावल की सोंधी खुशबू ने अपने पाँयचे उठा लिए और खून के चहबच्चों को पार करने लगी। जैसे ही वह बच्चे के पास से गुज़री, न जाने कहाँ से ताकत बटोरकर बच्चे ने उसके एक पैर को कस के जकड़ लिया। खुशबू डरकर चीख पड़ी। बच्चे की आँखें कौव्वों की चोंच के प्रहार से बाहर निकलकर किसी पतली शिरा के सहारे लटक रही थीं। बच्चे का मुँह बार-बार खुलता बन्द हो रहा था, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। थोड़ी देर बाद बच्चे की पकड़ ढीली हो गयी और उसका आधा उठा हुआ शरीर वापस ज़मीन पर धम्म-से गिर पड़ा।


खुशबू ने ठिठककर इधर-उधर देखा कि कहीं उसकी चीख सुनकर पहरेदार तो नहीं दौड़े आ रहे हैं! ...नहीं, कोई नहीं। वह जल्दी-जल्दी रानी रासमणि की झोंपड़ी तक पहुँची। दरवाज़ा जैसा जो कुछ था, खुला हुआ था। भीतर चटाई पर लेटा रासमणि का बूढ़ा बाप भूख से बिलबिला रहा था। खुशबू ने राहत की एक लम्बी साँस ली कि उसे यहाँ आते किसी ने देखा नहीं। उसकी साँस की आवाज़ बूढ़े तक पहुँची तो उसने पूछा, ''आ गयी तू?”खुशबू ने कहा, ''हाँ!”
अपरिचित आवाज़ से बूढ़ा चौंका। पूछा, ''रासमणि? ...कौन?”
''मैं, चावल की खुशबू!”
बूढ़ा बाहर आया। उसे चावल की खुशबू की लू लग गयी। वह मर गया।