
Monday, January 11, 2010
जब हम देखते हैं तो क्या देखते हैं?

Sunday, January 10, 2010
निज़ार कब्बानी की दो कवितायें
निज़ार कब्बानी (1923-1998) अरब जगत में प्रेम , ऐंद्रिकता , दैहिकता और इहलौकिकता के कवि अपनी कविता के बल पर बहुत लोकप्रिय नामचीन गायकों ने उनके काव्य को वाणी दी है. साहित्यिक संस्कारों वाले एक व्यवसायी परिवार में जन्में निज़ार ने दमिश्क विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि प्राप्त करने के बाद दुनिया के कई इलाकों में राजनयिक के रूप में अपनी सेवायें दीं जिनसे उनकी दृष्टि को व्यापकता मिली. उनके अंतरंग अनुभव जगत के निर्माण में स्त्रियों की एक खास भूमिका रही है ; चाहे वह बहन की आत्महत्या हो या बम धमाके में पत्नी की मौत. परिचय साभार कबाड़खाना. यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी दो कवितायें.
जब जब मैं तुम्हे चूमता हूँ
हर लम्बी जुदाई के बाद
जब मैं तुम्हे चूमता हूँ
मुझे महसूस होता है
किसी लाल पोस्टबॉक्स में
कोई प्रेम पत्र छोड़ रहा होऊँ
गर्मियों में
गर्मियों में
मैं समुद्र किनारे पड़ा रहता हूँ
और तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
तुम्हे लेकर मैं क्या महसूसियत रखता हूँ
अगर यह कभी मैं समुद्र को बता देता
तब ये समुद्र अपने कूल-किनारे
अपने घोंघो
अपनी मछलियों को छोड़
मेरे पीछे चला आया होता
Wednesday, January 6, 2010
मार्ती - निकोलस गियेन की कविता
निकोलस गियेन: क्यूबा के ‘राष्ट्रीय कवि’। ‘ब्लैक पोयट्री’ के प्रतिनिधि कवि। पूरा नाम निकोलस क्रिस्तोबाल गियेन बतिस्ता। क्यूबा के कामाग्वे में जन्म (1902-1989)। कवि, पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता।यह कविता क्यूबा के पूर्वोत्तर में स्थित एक शहर मार्ती पर है।
मार्ती
ओह!
मत सोचो कि उसकी आवाज
एक आह है! जिसके पास है
परछाईं के हाथ
और धुँधली दृष्टि हैं बूँदे जैसे
ठंड से काँपती कोई तिल किसी
गुलाब पर
उसकी आवाज
दरार डाल दे चट्टान में, उसके हाथ
दरका दे लोहे, उसकी आंखे
पहुंच जायें जलती हुई रात के जंगलों तक,
रात के काले जंगल
उसे छेड़ो: पाओगे कि जलाता है तुम्हे
उसे हाथ दो: देखोगे उसकी खुली बाहें
जिसमे समा जाये समूचा क्यूबा
जैसे तूफान में मजबूत पंखो वाली
चमकदार तोमेगिन।
पर जरा रात में चलो इसके पीछे:
आह! क्यों खींचती हैं तुम्हे स्वच्छ राहें
उसकी रौशनी किसी रात में।
मार्ती: क्यूबा के पूर्वोत्तर का शहर।
तोमेगिन: सुरीली आवाज में गाने वाला फिन्च समुदाय का पक्षी।
(श्रीकांत दुबे ने इस कविता का अनुवाद स्पानी भाषा से किया है। उनकी कविताओं से पूर्व परिचित हम जैसो के लिये यह सुखद है कि वो अनुवाद के बहुतेरे काम कर रहें है जो इस ब्लॉग पर समय-दर-समय आती रहेंगी। सूचनार्थ: ये मार्खेज की कुछ ऐसी रचनाओं का अनुवाद कर रहे हैं जो अंग्रेजी में भी उप्लब्ध नहीं हैं। )
Saturday, January 2, 2010
मिर्जा ग़ालिब की शाइरी पर लेखमाला, लेखक डॉ. कृष्णमोहन।
मिर्ज़ा ग़ालिब। दुनिया के महानतम काव्य विभूतियों में से एक। या शायद सर्वोत्तम।
डॉ. कृष्णमोहन। हिन्दी आलोचना के सशक्त हस्ताक्षर। मुक्तिबोध की प्रमुख कविताओं पर किताब। साहित्यालोचना पर आपकी किताब “आधुनिकता और उपनिवेश”। हिन्दी कथा साहित्य की विशद पड़ताल करती आलोचना पुस्तक “कथा समय” शीघ्रातिशीघ्र प्रकाश्य। हिन्दुस्तानी कविता पर महत्वपूर्ण काम। पत्र पत्रिकाओं में निरंतर लेखन। ग़ालिब पर यह लेखमाला किश्तों में चलेगी। सम्प्रति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर।
अय आफ़ियत किनारा कर अय इंतिज़ाम चल
ग़ालिब की शाइरी के सामाजिक राजनीतिक आशयों को लेकर कई तरह के भ्रम हैं। पिछले दिनों 1857 के सन्दर्भ में बात करते हुए अनेक अध्येताओं ने उन्हे नये सिरे से व्यक्त किया है। कविता की सामाजिक भूमिका की गलत समझ और भारतीय काव्य-परम्परा की अवहेलना के कारण यह समस्या पैद हुई है। हम यहाँ संक्षेप में इन्हीं पहलुओं पर विचार करेंगे।
ग़ालिब की एक अपेक्षाकृत कम उद्धृत की गई ग़ज़ल के चन्द शेर हैं-
गुलशन में बंदोबस्त बरंगे–दिगर है आज
कुमरी का तौक हल्का-ए-बेरूने-दर है आज
आता है एक पारा-ए-दिल हर फुग़ां के साथ
तारे-नफस कमंदे-शिकारे-असर है आज
अय आफ़ियत किनारा कर अय इंतिज़ाम चल
सैलाबे-गिरिया दर पै-ए-दीवारो-दर है आज
पहले शेर का आशय है कि बग़ीचे का इंतज़ाम आज दूसरे ढंग का हो गया है। पहले जो फंदा चिड़िया के गले के इर्द-गिर्द था, अब वह दरवाजे का दायरा बन गया है। ऊपरी तौर पर तो चिड़िया अपना गीत गाने के लिए तो आजाद है, लेकिन यह आज़ादी एक बड़े कैदखाने के अन्दर की आज़ादी है। आबो-हवा में उन्मुक्तता की जगह घुटन भर गई है, और पूरा माहौल प्रदूषित हो गया है। यह फ़र्क शासकवर्गीय कठोरता और उदारता का है। 19वीं सदी में अंग्रेजों ने इन हथकंडों का बखूबी इस्तेमाल किया था। हमारे मौजूदा शासक भी अक्सर इसका स्वांग भरते दिख जाते हैं। यहाँ ‘दूसरे (दिगर) ढंग का इंतज़ाम’ की बात में व्यंग्य और विडंबना है। अव्वल तो वह पहले से अलग है नहीं, और फिर उसे आज़ाद करने वाला समझा जा रहा है जबकि वह गुलामी को ही और गहराई देता है।
दूसरे और तीसरे शेर में इसी परिस्थिति से उपजी मन:स्थिति का बयान है। इस स्थिति में हर कराह के साथ दिल का एक टुकड़ा बाहर आ जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति की सांस का हर तार मानो कमान बन गया है, जिससे छूटने वाला तीर उसके दिल में पैबस्त हो जाता है।
‘ऐ दिल की शांति तू अपनी राह ले और ऐ व्यवस्था तू चलती रह। आंसुओं की बाढ़ आज घरबार को ढा देने पर उतारू है।‘
ग़ालिब के अधिकांश आधुनिक अध्येताओं के साथ समस्या यह है कि वे उन्हें वास्तविक सन्दर्भों से काटकर पढ़ते हैं। नतीजा यह निकलता है कि उनके शेर शाब्दिक अर्थ तक सीमित हो जाते हैं और उनकी व्यंजना खो जाती है।....(जारी..)
Friday, January 1, 2010
युवा कथाकार कुणाल सिंह का पहला उपन्यास – "आदिग्राम उपाख्यान"
इस उपन्यास के अंश नितांत पहली बार कहीं भी प्रकाशित हो रहे..नववर्ष के पहले पहल दिन पर...। उपन्यास शीघ्र प्रकाश्य।
परिमलेन्दु दा ने बच्चों को जिस रानी रासमणि की कथा सुनाई थी, वह कोई सचमुच की रानी नहीं थी। वह एक गरीब चासी (किसान) की बेटी थी, जिसकी मौत बंगाल के अकाल में चावल की खुशबू से हुई थी। बंगाल में अकाल कब पड़ा था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं कि सन् तैंतालीस की बात है। रानी रासमणि की शादी बाबर से कब हुई थी, पूछा जाए तो परिमलेन्दु दा कहेंगे कि सन् 1760 की बात है जब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने इस पूरे इलाके को गोरे-काले फौजियों और तोपचियों से भर दिया था। बाबर कौन था, यहाँ कहाँ से आया था, पूछने से इतिहास के सर बताते हैं...। यह सब क्या गोलमाल है! परिमलेन्दु दा एक साथ कितनी कहानियों को जोड़-गूँथ देते हैं।
अपरिचित आवाज़ से बूढ़ा चौंका। पूछा, ''रासमणि? ...कौन?”
''मैं, चावल की खुशबू!”
बूढ़ा बाहर आया। उसे चावल की खुशबू की लू लग गयी। वह मर गया।