Wednesday, May 24, 2017

काव्यशास्त्रविनोद-५: भाषा का स्वभाव

वाक्य में क्रिया की केंद्रीय भूमिका की नासमझी और उसके प्रति हमारी लापरवाही को एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। "पीना" हमारी भाषा की सबसे सहज क्रियाओं में से एक है। हम चाय या शरबत "पीते" हैं, लेकिन अंग्रेज़ी के सामने अपनी हीन भावना के चलते हमने अब उन्हें "लेना" शुरू कर दिया है। "टु टेक ए कप ऑफ़ टी" की तर्ज पर हम अब चाय या कॉफी "लेते" हैं, "पीते" नहीं। "आप चाय लेंगे या कॉफी" जैसे वाक्यांश अब आम तौर पर सुनने में आ जाते हैं। इसी क्रम में अब "ठंडा"या "गरम" लेने की बारी भी आ चुकी है। "पीना" की जगह "लेना" का प्रयोग कितना भ्रामक है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि अगर हम चाहते हैं कि हमारे परिवार का कोई सदस्य बाज़ार से चाय पीकर चला आये तो हम उससे यह नहीं कह सकते कि "बाज़ार से चाय लेकर आओ"। ऐसा कहने पर वह बाज़ार से चाय खऱीदकर तो ला सकता है, लेकिन पीकर नहीं आ सकता। यानी "पीना" क्रिया को अपदस्थ करने में अंग्रेज़ी अभी पूरी तरह से कामयाब नहीं हुई है। अभी इस प्रदूषण को पहचान कर इसे दूर किया जा सकता है।
यहाँ किसी "उदारतावादी" विद्वान को शुद्धतावाद का ख़तरा दिखाई पड़ सकता है और वह "भाखा बहता नीर" जैसी किसी उक्ति की आड़ में छुपने की कोशिश कर सकता है। इस संबंध में फ़िलहाल इतना ही कहना पर्याप्त है कि जैसे बहते हुए पानी में दूसरे स्रोतों का पानी भी आकर मिलता है तो उसका प्रवाह बढ़ता है, उसी प्रकार दूसरी भाषा के शब्दों को लेकर कोई भी भाषा समृद्ध होती है, लेकिन जब किसी भाषा पर उसके स्वभाव के विपरीत दूसरी भाषा की वाक्यरचना और क्रिया थोपी जाती है तो उस भाषा का वही हाल होता है जो हमने गंगा-यमुना के बहते हुए नीर का कर रखा है। इस मामले में भाषा की तुलना नदी के साथ उचित ही की गई है।
दूसरी बात अंग्रेज़ी के सामने हीन भावना की है। अंग्रेज़ी की इस भूमिका को समझ लेना इसलिए ज़रूरी है कि यह हमारी भाषा के प्रदूषण का लगभग एकमात्र स्रोत है। इसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। अंग्रेज़ी में पीने के लिए क्रिया "ड्रिंक" है, लेकिन सिगरेट का सुट्टा लगाने को वे "स्मोक करना" कहते हैं, जबकि हिंदी में इसे भी "पीना" ही कहते हैं। अब अगर अंग्रेज़ी के वाक्य में हिंदी की क्रिया का प्रयोग कर दें तो वाक्य बनेगा "आई ड्रिंक सिगरेट"।जब कभी मैं सामान्य पढ़े-लिखे हिन्दीभाषी लोगों के बीच इस वाक्य का ज़िक्र करता हूँ, उन्हें हंसी आ जाती है, जबकि अपनी भाषा में "पीने-लेने" के प्रसंग में इसी तरह की गलती करते हुए वे पूरी तरह सहज रहते हैं। इससे यह पता नहीं चलता कि हमारे लोग हिंदी से ज़्यादा अच्छी तरह अंग्रेज़ी को जानते- बरतते हैं। इससे सिर्फ़ यह पता चलता है कि अंग्रेज़ी की श्रेष्ठता और हिंदी की हीनता का भाव हमारे अवचेतन में घर कर चुका है। इसीलिए अंग्रेज़ी के वाक्य में हिंदी की क्रिया को घुसपैठ करते देखकर हम उसके दुःसाहस पर हंस पड़ते हैं। जबकि विदेशी भाषा होने के कारण अंग्रेज़ी के साथ यह बर्ताव व्याकरणिक रूप से ग़लत होने पर भी अधिक मानवीय और स्वाभाविक है। किसी ने कहा है कि अपनी भाषा में सामने आई क्रिया की ग़लती मुंह के कौर में आये बाल की तरह होती है जिसका एहसास हुए बिना नहीं रहता और जिसे नज़रंदाज़ करना बिलकुल नामुमकिन होता है। यह हमारी रग-रग में बसी ग़ुलामी का ही असर होगा कि हम अंग्रेज़ी के मामले में तो इस क़िस्म की संवेदनशीलता दिखाते हैं, लेकिन हिंदी के मामले में उदासीन बने रहते हैं।
इस उदासीनता को देखने के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं।हम अपने आसपास ग़ौर करें तो पाते हैं कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर कहीं कोई बहस दिखाई नहीं पड़ती। "अनस्थिरता" शब्द को लेकर महावीरप्रसाद द्विवेदी और बालमुकुंद गुप्त के बीच हुए लगभग सौ साल पुराने विवाद की चर्चा हम ऐसे करते हैं जैसे वे किसी और ग्रह से आये लोग थे जो ऐसी "मामूली" बातों पर अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा देते थे। आज़ादी के पहले तो फिर भी कुछ जवाब-सवाल होते थे, लेकिन उसके बाद ये तौर-तरीक़े शायद संदिग्ध मान लिए गए। इधर पिछले तीन दशक के बारे में तो मैं ख़ुद एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में कह सकता हूँ कि हिंदी के किसी प्रयोग को लेकर न कोई किसी को रोकता-टोकता है, न कोई किसी की बात काटता है। यह सब ग़ैरज़िम्मेदाराना अशिष्टाचार माना जाता है। एक-डेढ़ दशक पहले तक अभिनव ओझा नामके एक जागरूक पाठक की चिट्ठियाँ पत्र-पत्रिकाओं में दिखती थीं, जिनमें प्रकाशित रचनाओं में हुई भूलों की चर्चा होती थी। ऐसी कोशिशें भी हमारी उदासीनता की भेंट चढ़ गईं। ऐसा तब हुआ जबकि हिंदी में कम से कम एक अदद शिखरपुरुष, एक अदद कविकुलभूषण, एक अदद रसिक कलावंत, एक अदद दुर्वासा और लगभग एक दर्जन जनपक्षधर आलोचक सक्रिय हैं। इनके होने के बावजूद हिंदी में वैचारिक बहसों का स्तर ननद-भौजाई की हंसी-ठिठोली जैसा रह गया है। सामाजिक हलचलों और उथल-पुथल ने हमारे साहित्य को लोकतांत्रिक दिशा ज़रूर दी, लेकिन हमारी साहित्यिक संस्कृति ने उसका मार्ग प्रशस्त नहीं किया, उसकी राह में रोड़े ही अटकाए।
ग़ौरतलब है कि हम अपने वाक्यों में केवल क्रिया को नहीं बदलते बल्कि उसका काल और उसकी संभाव्यता को भी बदलकर अपने वाक्यों को पूरी तरह भोथरा कर लेते हैं। एक सर्वव्यापी उदाहरण लें। किसी भी उच्चस्तरीय साहित्यिक सभा-संगोष्ठी में बड़ी आसानी से संचालक को कहते हुए सुना जा सकता है---"अब मैं बुलाना चाहूँगा अलाँ साहब को जिन्होंने फलाँ क्षेत्र में चिलाँ तीर चलाये हैं"। न बुलाता हूँ, न बुलाना चाहता हूँ, बल्कि "आई उड लाइक टु काल यू" की तर्ज पर भविष्य में कभी ऐसा करने की इच्छा की घोषणा। सचमुच बुला लूँगा ऐसा कोई वादा भी नहीं। लेकिन "खग जानै खगही की भाषा" को चरितार्थ करते हुए वक्ता महोदय माइक पर नमूदार होते हैं और फ़रमाते हैं---"मैं फलाँ साहब का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा जिन्होंने मेरी इतनी ताऱीफ की"। इस तरह हिंदी का कारोबार भविष्य की अनिश्चित संभावना के रूप में चल रहा है, अथवा स्थगित है। हिंदी जैसी बाँकी, क्षिप्र और असरदार भाषा का दम ऐसे बोझिल और जड़ प्रयोगों से घुटता है।
एक उदाहरण और देखते चलें। हिंदी में भोजपुरी के प्रभाव से परसर्ग "ने" के विलोप पर तो कभी -कभी असहमति का अनौपचारिक इज़हार हो जाता है।यानी, मैंने कहा, मैंने खाया, मैंने गाया जैसे वाक्यों की जगह हम कहे, हम खाये, हम गाये जैसे वाक्यों को ख़ासतौर पर विद्यार्थियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता क्योंकि इससे नौकरी के इंटरव्यू आदि में उनकी ग्रामीण जड़ों की पोल खुल सकती है। लेकिन निष्क्रियता की खुली वकालत करने वाले अंग्रेज़ी के "पैसिव वॉइस" के दबाव में हिंदी के वाक्यों के सौन्दर्य के मटियामेट होने पर मैंने किसी विद्वान को ध्यान देते नहीं देखा। हिंदी में कहते हैं कि"आपने जो किया वह मैंने देखा"। लेकिन आजकल की हिंदी में इसे कुछ यूँ कहते हैं, "आपके द्वारा किये गए कार्य को मैंने देखा"। आई सा द वर्क डन बाय यू।
कहने का आशय यह कि इंग्लैंड जैसे छोटे से द्वीप की अपनी भौगोलिक-ऐतिहासिक परिस्थितियों में विकसित भाषा के प्रयोग अगर भारतीय उपमहाद्वीप के विस्तृत भूभाग में जन्मी और पली-बढ़ी भाषा पर वर्चस्व स्थापित कर लेंगे तो यह किस क़दर विनाशकारी होगा इसकी कल्पना भी आसानी से नहीं की जा सकती। इसे समझने के लिए हमें अपनी नदियों और उनमें गिरने वाले नालों को देखना होगा।
अंत में, हिंदी के स्वभाव की गतिशीलता और अंग्रेज़ी से इसके फ़र्क़ को समझने के लिए एक उदाहरण और देख लेते हैं। हिंदी में जब हम अतीत की किसी घटना का ब्यौरा देते हैं तो इसकी सूचना के साथ ही हम ख़ुद उस काल में पहुँच जाते हैं और वह घटना हमारे लिए वर्तमान काल की हो जाती है। मिसाल के तौर पर अगर हम किसी दोस्त के घर उससे मिलने गए और उसे सोता हुआ पाकर वापस आ गए तो, अगले दिन इसका ब्यौरा कुछ यूँ देंगे---"कल मैं उसके घर गया और मैंने देखा कि वह सो रहा है"। अंग्रेज़ी में इस वाक्य का प्रासंगिक अंश कुछ यूँ बनेगा---",,,,,,,,,,आई सॉ दैट ही वाज़ स्लीपिंग"। आजकल हिंदी में लगभग निरपवाद रूप से अंग्रेज़ी वाला ही प्रयोग चल रहा है, यानी "मैंने देखा कि वह सो रहा था"। इस तरह हम हिंदी की जीवंतता और सक्रियता पर अंग्रेज़ी की निष्क्रियता और अनिश्चितता को थोपकर उसके स्वाभाविक प्रवाह को रोक देते हैं।

काव्यशास्त्रविनोद-४: भाषा की भूमिका

गणेशशंकर विद्यार्थी ने कभी कहा था कि अगर मेरा देश ग़ुलाम हो रहा हो और मेरी भाषा भी दूषित हो रही हो तो, मैं पहले अपनी भाषा को बचाऊंगा क्योंकि भाषा बची रहेगी तो देश को आज़ाद कराया जा सकता है, लेकिन भाषा दूषित हो गई तो देश को ग़ुलाम होने से कोई रोक नहीं सकता। इस कथन से भाषा के महत्व पर कुछ प्रकाश पड़ता है। हममें से ज़्यादातर लोग भाषा को अभिव्यक्ति के माध्यम से अधिक कुछ नहीं समझते। जैसे ट्रेन या बस यात्रा के माध्यम हैं, वैसे ही भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है। हमने जो अनुभव किया उसे भाषा में व्यक्त कर दिया। अगर वह ठीक ठाक से श्रोता अथवा पाठक तक पहुँच गया तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भाषा का प्रयोग कैसे हुआ।कहने सुनने में यह बात चाहे जितनी अजीब लगती हो लेकिन व्यवहार में हम भाषा के साथ इसी तरह पेश आते हैं।
दरअसल, भाषा को इतना महत्व इसलिए दिया जाता है कि यह अभिव्यक्ति के साथ साथ अनुभूति का भी माध्यम है। भाषा का हर शब्द अपने अंदर किसी विशिष्ट अनुभव की स्मृति को धारण करता है। उस शब्द से परिचित होने का अर्थ है उसमें छुपी विशिष्ट अनुभूति से, उससे जुड़े तमाम विचारों से परिचित होना। इनसे परिचित होकर ही हम इनसे जुड़ी हुई या इनके बाद आने वाली धारणाओं की तरफ़ क़दम बढ़ाते हैं। उदाहरण के लिए दुःख, शोक, अवसाद, विषाद, पीड़ा, कष्ट, वेदना, यातना, यंत्रणा आदि एक ही वर्ग की भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्द हैं, लेकिन इनकी छायाएं अलग अलग हैं। जो व्यक्ति इन शब्दों को समझता है, वह अपने जीवन में इन शब्दों से जुड़ी भावनाओं को पहचान लेगा। अगर ऐसा नहीं है तो उसे इन भावनाओं में से किसी का सामना होने पर दुखद तो महसूस होगा लेकिन वह ठीक ठीक अपनी भावना को पहचान न सकेगा।
जीवन के सीमित कार्यव्यापार में संलग्न रहने वाले किसी व्यक्ति के मन में भी अनेक प्रकार की भावतरंगें उठती हैं, लेकिन कोई भाषा संपन्न व्यक्ति जैसे उन्हें अलग अलग पहचान सकता ही वैसा वह नहीं कर पाता, क्योंकि उसका काम सीमित शब्दावली से चल जाता है। उसकी शब्दसंपदा उसकी अनुभूतिक्षमता को निर्धारित करती है। किसी वस्तु को पहचानने का मतलब है उसके बारे में एक अवधारणा ग्रहण करना और उसके सहारे उस वस्तु का वर्गीकरण करना। गुड़, चीनी, बूरा, खाँड़, मिश्री जैसे शब्दों के साथ इनके अलग अलग स्वाद की अवधारणा भी हमारे दिमाग़ में सुरक्षित रहती है। अगर कोई व्यक्ति इन अवधारणाओं से परिचित नहीं है तो इन चीज़ों को आकस्मिक रूप से खाने के बावजूद वह अलग अलग इनके स्वाद की विशेषता को पहचान नहीं सकेगा। आकस्मिकता की शर्त इसलिए कि अगर वह व्यक्ति अक्सर इन चीज़ों को खाता है तो वह इनके नाम से परिचित न होने के बावजूद अपने दिमाग़ में इनके स्वाद के अनुसार इनका वर्गीकरण करना और किसी न किसी रूप में इन्हें संबोधित करना सीख जायेगा। इस प्रकार वह आवश्यक भाषा अर्जित कर लेगा। इसके बाद वह इनकी बारीकियों पर और ध्यान देकर अपनी अनुभूति क्षमता का विकास करने में सफल हो सकेगा। इसी अर्थ में भाषा अनुभूति का माध्यम होती है। वह हमारे अनुभवों की स्मृति को संरक्षित और वर्गीकृत करती है। उसके सहारे ही हम अनुभूतियों की यात्रा पर निकल पाते हैं।
भाषा से वंचित होने का अर्थ है अनुभूति के सूक्ष्म विभेदों से अपरिचित रह जाना और इस प्रकार मनुष्योचित गरिमा और संवेदना से युक्त जीवन की संभावना का न्यूनतम रह जाना। ख़ास तौर पर हमारे देश में जहाँ विशाल आबादी निरक्षर है, और जो पढ़े लिखे हैं वे भी भाषा की शक्ति के प्रति सचेत नहीं हैं, यह मुद्दा निर्णायक हो जाता है। भूमंडलीकरण के युग में देश दुनिया के बड़े बड़े कारपोरेट निगम और कंपनियां हमारे जल, जंगल,और ज़मीन पर गिद्धदृष्टि लगाये बैठी हैं। किसानों, दलितों और आदिवासियों को उनकी ज़मीनों से बेदख़ल करके दर दर भटकने पर मजबूर किया जा रहा है। लोगों को जानवरों की तरह हाँका लगाकर खदेड़ने की तैयारी है। समृद्धि और सम्पन्नता के द्वीपों के इर्द गिर्द उगे बाड़ों में उन्हें संगीनों के बल पर क़ैद करके देश की धरती, पहाड़, जंगल,और नदियों का सौदा किया जाने वाला है। ऐसे में भाषा वह अकेला हथियार है जिसके बल पर लोग न्याय की अपनी मानवीय चाहत को बचा पाएंगे और उसके लिए लड़कर सत्ता के इस शिकंजे को तोड़ पाएंगे। इस पृष्ठभूमि में हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि भाषा का मुद्दा कितना अहम है और गणेशशंकर विद्यार्थी ने क्यों इसे देश को बचाने की पूर्वशर्त माना था।
यहाँ आकर हमारे सामने एक बात आईने की तरह साफ़ होनी चाहिए कि अगर हम देश, समाज, गरीब, दलित, आदिवासी, किसान, मज़दूर अथवा मध्यवर्ग के जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव लाने के लिए काम करना चाहते हैं तो भाषा का सवाल हमारे एजेंडे में सबसे ऊपर होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो हमारी सारी क़वायद निष्फल हो जायेगी और हम अंग्रेज़ीदां बुद्धिजीवियों के पिछलग्गू बनकर रह जायेंगे।
अब लाख टके का सवाल यह है कि भाषा में आये प्रदूषण को कैसे पहचानें और उसके ख़ात्मे के लिए शुरुआत कहाँ से करें। इसका जवाब पाने के लिए हमें भाषा की बुनियादी इकाई वाक्य की छानबीन करनी होगी। वाक्य के विभिन्न अंगों संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण आदि पर नज़र डालते हैं तो एक दिलचस्प खींचतान दिखाई पड़ती है। कवि त्रिलोचन ने कहा था---
भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है
ध्वनि से शब्द और भाषा का संकेत मिलता है। ध्वनिव्यवस्था के लिपिबद्ध संकेत को ही भाषा कहते हैं। ध्वनि कंपन से उत्पन्न होती है, यानी एक क्रिया जो ध्वनि-तरंगों को जन्म देती है। क्रिया में बल होने का और चाहे जो आशय हो, एक बात तो तय है कि बिना बल के क्रिया नहीं हो सकती और जहाँ सक्रियता है वहां निर्बलता नहीं रह सकती। यानि जहाँ क्रिया है वहां बल है। भाषा में क्रिया का वही स्थान है जो जीवन में क्रियाशीलता का है। भाषा की लहरों में जीवन की हलचल के होने का यही अभिप्राय है।
त्रिलोचन की ही एक दूसरी काव्यपंक्ति है--
"हिंदी की कविता उनकी कविता है जिनकी सांसों को आराम नहीं था"।
मीर तक़ी मीर ने कहा था---
क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सुरूरे-क़ल्ब
आया नहीं ये लफ़्ज़ तो हिंदी ज़ुबाँ के बीच
सांसों को आराम न होने का अभिप्राय भी इसी अहर्निश क्रियाशीलता से संबद्ध है। हाँ, उसमें बेचैनी और जुड़ जाती है।इसी बात को मीर ख़ूबसूरती के साथ कहते हैं कि दिल का सुकून (सुरूरे-क़ल्ब) नामका शब्द तो हिंदी भाषा में आया ही नहीं। यह कथन वैसे ही है जैसे हम किसी के आत्मविश्वास की सुचना देते हुए कहते हैं कि असंभव शब्द उसके शब्दकोष में ही नहीं है। तात्पर्य यह कि हिंदी बोलने वालों ने दिल के सुकून का अनुभव ही नहीं किया। उनकी सांसों को आराम नहीं था। ज़ाहिर है, हिंदी समाज को परिभाषित करने वाली उनकी बुनियादी विशेषता क्रियाशीलता है।वही उसे अर्थ देती है।
यहाँ आते आते एक बात साफ़ हो जाती है कि जिस प्रकार जीवन की प्राथमिक और बुनियादी इकाई मनुष्य का सौंदर्य और उसकी सार्थकता क्रिया पर टिकी हुई है, उसी प्रकार भाषा की बुनियादी इकाई वाक्य का सौंदर्य क्रिया पर टिका हुआ है। लेकिन हमारे समाज में कर्म के अवमूल्यन की प्रवृत्ति और विचारधारा भी न केवल वजूद में है, बल्कि ख़ासी मज़बूत है। वर्तमान समय में यह कोई अपनी राह तो नहीं बना पाती, लेकिन कर्मण्यता के महत्व को लेकर भ्रम फैलाती रहती है। ऐसे ही एक विचारक रामस्वरूप चतुर्वेदी हैं। ये अपनी किताब "हिंदी गद्य:विन्यास और विकास"(लोकभारती,2002) में लिखते हैं, "वाक्य-विन्यास में सहज प्रवाह का एक साक्ष्य तब माना जा सकता है जबकि वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण तत्व क्रिया का विलोप हो जाय, और वाक्य शेष अवयवों के संतुलन पर तना रहे"(पृष्ठ 18)। यहाँ क्रिया को सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताने की "सावधानी" तो बरती गई है, लेकिन किसी अनूठे कारण से उसके विलोप को ही अच्छे वाक्य की शर्त बता दिया गया है। आगे चलकर विभूतिभूषण वंदोपाध्याय और प्रसाद की रचनाओं के हवाले से वे वाक्य में क्रियाहीनता को बाक़ायदा एक मूल्य की तरह प्रस्तावित करते हैं। इस वैचारिकी की प्रतिध्वनि हमारे समय के एक प्रमुख कथाकार-चिंतक दूधनाथ सिंह की पुस्तक "महादेवी"(राजकमल,2009) में देखने को मिलती है। वे लिखते है, "कभी-कभी मुझे लगता है कि सर्वनामों के बिना उत्कृष्ट कविता संभव ही नहीं है। संज्ञाएँ और अलंकृतियां, अव्यय और क्रियापद- ये सब तो काव्य-रण के पिछले मोर्चे के योद्धा हैं। असली युद्ध तो सर्वनाम ही लड़ते हैं।"(पृष्ठ 59) सर्वनामों के अमूर्तन के सहारे कविता कई बार सामान्यीकरण के अपने लक्ष्य की साधना करती है, व्यक्तिगत से सार्वजनीन की यात्रा करती है। लेकिन संज्ञा की बनिस्बत इसकी नामरूपहीनता व्यक्तित्वों के विलोप की संभावना भी अपने अंदर छिपाये रहती है। कहना अनावश्यक है कि व्यक्तित्वों का विखंडन, पतन और अंततः उनका विघटन हमारे समय और समाज की प्रमुख विडंबनाओं में से एक है। इसलिए सर्वनाम की उपयोगिता को स्वीकार करते हुए भी उसे वाक्य का सबसे प्रमुख अंग नहीं माना जा सकता। आगे चलकर लेखक की रणनीति तब और स्पष्ट होती है जब वह प्रसाद के विषय में लगभग तोहमत के रूप में कहता है कि "लेकिन प्रसाद में छायावाद के प्रारम्भिक चरण के सारे लक्षण हैं। वे अक्सर क्रियापदों का दामन नहीं छोड़ते(पृष्ठ 65)।" इससे पता चलता है कि सर्वनाम को प्रमुखता देने की रणनीति क्रिया को देशनिकाला देने से जुड़ी हुई थी। इस रणनीति से न कविता का भला होगा न समाज का। हाँ, इससे हमारे समय में फैली धुंध और गहरी हो जायेगी।
बहरहाल, ताज्जुब इस बात का नहीं है कि इन विचारकों ने ये बातें लिखीं। सबके अपने विचार हैं और अगर वे खुलकर व्यक्त होते हैं तो हम उनका स्वागत करते हैं। ताज्जुब इस बात का है कि इन विचारों से हिंदी के किसी कवि-आलोचक के कान पर जूं नहीं रेंगी। ये विचार अपने तरीक़े से हमारी चेतना में सक्रिय रहे लेकिन कहीं कोई सवाल नहीं उठा। अकर्मण्यता और व्यक्तित्वहीनता को मूल्य बनाकर वैधता और प्रमाणिकता देने की कोशिशें जारी रहीं लेकिन हिंदी समाज का सामूहिक विवेक शायद घोड़े बेचकर सोता रहा। यह क़िस्सा कोई नया नहीं है। हमने अपनी भाषा के साथ जो लापरवाही बरती है और उसके जो दुष्परिणाम सामने आये हैं, उनकी चर्चा हम इस श्रंखला की अगली कड़ी में करेंगे।

Saturday, September 3, 2016

काव्यशास्त्रविनोद-३: आलोचना के बारे में

आजकल हिंदी में आलोचना की निंदा करने और उसे अनावश्यक ठहराने का चलन है। इस काम में हवा के साथ बह जाने वाले मतदाताओं जैसी सादगी के साथ बहुत से साहित्यप्रेमी लगे हुए हैं। लेकिन असल में यह खेल उन मठाधीशों का है जिन्होंने अतीत में हमेशा आलोचकों के साथ दुरभिसंधियां की हैं और उनसे अनुचित लाभ उठाया है। अब जबकि आलोचना को अपनी अनैतिक सत्ता का औज़ार बनाने वाले आलोचक अपने ही कारनामों के कारण अप्रासंगिक हो चुके हैं, ये लोग युवा तुर्क का स्वांग भरते हुए आलोचना के ख़िलाफ़ बग़ावत का एलान कर रहे हैं। इस तरह ये आलोचना के बहाने हिंदी में सुचिंतित विचार-विमर्श की संभावना को भी ख़ारिज़ कर देना चाहते हैं ताकि उन जैसों की भूमिका पर सवाल उठने की आशंका न रह जाये और अब तक येन केन प्रकारेण अर्जित की हुई उनकी हैसियत बनी रहे। इसलिए आलोचना की भूमिका और प्रक्रिया पर पुनर्विचार आवश्यक है।
साहित्य की तमाम विधाओं में होने वाली रचनाओं की व्याख्या और उनका मूल्यांकन करने वाली विधा को आलोचना कहते हैं। रचना और पाठक के बीच पुल की भूमिका निभाने वाली इस विधा का विकास आधुनिक युग की जटिलताओं के चलते हुआ है। रचना अगर जीवन की पुनर्रचना है तो आलोचना रचना की पुनर्रचना है। आलोचक रचना में समाहित अनेक तत्वों में से किसी एक को प्रमुख मानकर अपनी समझ के मुताबिक़ रचना के प्रधान पक्ष का उदघाटन करता है। इस प्रक्रिया में प्रासंगिक उद्धरण और उनकी व्याख्या उसके औज़ार होते हैं। उद्धरणों के चुनाव का विशेषाधिकार उसका होता है, किन्तु उनकी व्याख्या का वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत होना अनिवार्य है अन्यथा आलोचना अविश्वसनीय हो जाती है।
आलोचना में वस्तुनिष्ठता और पक्षधरता का प्रश्न अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसका अभिप्राय है रचना के विश्लेषण के दौरान उसकी अर्थसंपदा के उद्घाटन के अतिरिक्त सत्य और न्याय के साथ रचना के रिश्ते का परीक्षण करना। परस्पर विभाजित और संघर्षरत स्वार्थों वाले समाज में स्वभावतः सत्य और न्याय के प्रति दृष्टिकोण भी अलग अलग होते हैं।इसलिए रचना की मूल्यवत्ता को लेकर मतभेद होते हैं, लेकिन समाज से निरपेक्ष किन्हीं शाश्वत मान-मूल्यों के अनुरूप रचना के रसास्वादन की अवधारणा अब अप्रासंगिक हो चुकी है। ऐसे मानदंडों का प्रस्ताव करने वाले कुछ बौद्धिक अब भी हो सकते हैं , लेकिन साहित्यिक संस्कृति पर उनका प्रभाव नगण्य है।
सत्य और न्याय के प्रति पक्षधरता आलोचना का अनिवार्य अंग भले ही हो, उसे तथ्यों के आलोक में ही इनका पोषण करने की अनुमति है। ये तथ्य प्राथमिक तौर पर रचना से प्राप्त होते हैं ।आलोचक इन तथ्यों को सामाजिक और ऐतिहासिक तथ्यों के समानांतर रखकर उनकी विश्वसनीयता का परीक्षण करता है। इस प्रक्रिया से प्राप्त निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ होते हैं। वस्तुनिष्ठता ही पक्षधरता की आधारशिला है। वस्तुनिष्ठ हुए बिना पक्षधर होना आसान है,लेकिन उसका कोई मूल्य नहीं।
आलोचना के लिए प्रधान और गौण के अंतर को समझना ज़रूरी है। किसी भी वस्तु, व्यक्ति, समाज, रचना अथवा परिघटना में अनेक तत्वों का समावेश होता है, लेकिन किसी समय विशेष में उनमें से एक तत्व ही प्रधान भूमिका में होता है, बाक़ी सब गौण होते हैं। प्रधान तत्व के आधार पर ही वस्तु का चरित्र तय होता है। प्रधान तत्व के अपने अंतर्विरोध होते हैं, जिनके चलते कई बार वह शक्तिच्युत होकर प्रधान भूमिका खो बैठता है, और कोई दूसरा तत्व शक्तिशाली हो प्रधान भूमिका में आ जाता है। ऐसी स्थिति में वस्तु का चरित्र बदल जाता है। यह बदलाव बिलकुल उलटी दिशा में भी ले जा सकता है। जैसे क़ानून का सम्मान करने वाला कोई व्यक्ति विकास के क्रम में वाह्य परिस्थितियों से जूझते हुए क़ानून तोड़ने वाले किसी मुजरिम में बदल सकता है, वैसे ही किसी अपराधी के अंदर अनुकूल मानसिक स्थिति में क़ानून के समक्ष समर्पण करके अपनी सज़ा काटकर शांतिपूर्ण जीवन जीने की कामना बलवती हो सकती है, और वह इसके अनुरूप आचरण कर सकता है। ऐसी स्थितियों में इन व्यक्तियों का चरित्र अपने विपरीत में बदलता दिखाई पड़ता है। ऐसा इसलिए होता है कि इनके अंदर अपने जीवन को दिशा देने वाला जो सबसे शक्तिशाली तत्व था वह अपने अंतर्विरोधों के चलते अपने विरोधी तत्व से पराजित हो गया और उसके विरोधी ने प्रधान भूमिका अपना ली। प्रधान तत्व में बदलाव से अन्य तत्वों की भूमिका और अर्थवत्ता भी कुछ न कुछ प्रभावित होती है।
यह नियम प्रकृति से प्राप्त सार्वभौम सत्य है और हर आलोचक अपने लेखन में इससे प्रभावित होता है। अंतर सिर्फ़ यह है कि सचेत आलोचक इस सचाई को समझकर इसका उपयोग करते हैं जबकि इससे अनभिज्ञ आलोचक अनजाने में इस नियम के उदाहरण बन जाते हैं। मसलन, अगर कोई आलोचक इस नियम को नहीं समझता तो वह रचना में घटित होने वाली घटनाओं और चरित्रों में होने वाले परिवर्तनों को तर्कसंगत तरीक़े से नहीं समझ सकेगा और उन्हें संयोग, सनक, विचारधारा या किसी अन्य अप्रासंगिक तत्व पर आधारित मानकर अपना निष्कर्ष प्रस्तुत कर देगा। ऐसी स्थिति में उसकी आलोचना रचना के सत्य का उद्घाटन करने की बजाय स्वयं उसके आलोचक-रूप का उद्घाटन करेगी, जिसका प्रधान तत्व अज्ञान है।
कहने का आशय यह कि आलोचना के क्षेत्र में पहला क़दम रचना के पर्याप्त अध्ययन-मनन के बाद उसके समूचे कलेवर के प्रधान तत्व की खोज है। ध्यान रहे कि लिख जाने के बाद रचना का अपना व्यक्तित्व होता है और वह स्वतंत्र रूप से समय और समाज के साथ अंतःक्रिया करती है। इसके बाद ख़ुद लेखक की राय का महत्व भी किसी पाठकीय प्रतिक्रिया से अधिक नहीं होता। साहित्य के लोकतंत्र में लेखक और पाठक दोनों के पास एक ही वोट होता है। किसी जीवित व्यक्ति की तरह ही जीवंत रचना में भी समय के साथ परिवर्तन और विकास होता है। हाँ, यह विकास उसकी अर्थवत्ता और प्रासंगिकता में आने वाले बदलाव के माध्यम से दिखाई पड़ता है। आलोचक का काम रचना में आये इसी बदलाव और नवीनता की खोज है। जो रचना जितनी ही सशक्त होती है उसमें विकास की यह गुंजाइश उतनी ही अधिक होती है। मिसाल के तौर पर ग़ालिब का यह शेर देखें-
दाइम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मैं
ख़ाक ऐसी ज़िन्दगी पे के पत्थर नहीं हूँ मैं
उर्दू कविता की रीत थी माशूक़ की चौखट पर सर पटकते हुए या तो पत्थर की चौखट को घिस डालना , या सर को ही मिटा देना-(मिट जाएगा सर गर तेरा पत्थर न घिसेगा- ग़ालिब)। इस पारंपरिक दृष्टि से देखने पर इस शेर में यह अफ़सोस ज़ाहिर होता है कि माशूक़ के दर पर हमेशा पड़े रहने के लिए जो धैर्य और नसीब चाहिए, काश वो मेरे पास होता। लेकिन आधुनिक दृष्टि से देखने पर इश्क़ में अब तक रही बेबसी भरी ज़िन्दगी पर ही ख़ाक डालने और पत्थर नहीं इंसान बनने की बात निकलती जान पड़ती है। इसी प्रकार रचना के भाषिक संयोजन में से समय के साथ कोई नया तत्व उभरकर प्रधानता हासिल कर लेता है और रचना के अर्थ को बदल डालता है।
रचना के प्रधान तत्व की खोज का यह आशय कदापि नहीं है कि किसी रचना में निर्विवाद रूप से कोई प्रधान तत्व होगा और उसे खोज निकालने के साथ ही आलोचक का काम ख़त्म हो जायेगा।इसके विपरीत अपनी-अपनी रुचि और संस्कार के मुताबिक़ विभिन्न आलोचक रचना के प्रमुख अभिप्राय के बारे में अलग-अलग राय व्यक्त करते हैं और यह मतभेद बहस और विवाद को जन्म देता है। किसी एक मत की सर्वस्वीकार्यता की बजाय यह स्थिति आलोचना की संस्कृति के लिए अधिक सुखद है। इस तरह की बहसों से गुज़रकर हम रचना, मनुष्य और समाज की बेहतर समझ हासिल करते हैं।
रचना के मुख्य सूत्र की तलाश के लिए कुछ उपयोगी संकेत तो किये जा सकते हैं, लेकिन इसका कोई निश्चित फ़ार्मूला नहीं हो सकता। उस तत्व को जो रचना के केंद्र में है और उसके आशय को निर्धारित करता है, रचना का मर्म कहा जा सकता है। कभी यह रचना में आरम्भ से अंत तक विद्यमान रहता है, तो कभी एक या दो जगह ही सशक्त रूप में आकर पूरी रचना पर नई रोशनी डाल सकता है। इस दूसरी स्थिति के उदाहरण के रूप में हम निराला की प्रसिद्ध कविता "राम की शक्तिपूजा" को लेते हैं।
विपुल सन्दर्भों से समृद्ध इस लंबी कविता में आया एक छोटा सा प्रसंग इसके समूचे आशय को निर्धारित करता है। कथा सर्वविदित है कि रावण से युद्ध के दौरान राम के संशयग्रस्त होने पर जाम्बवान उन्हें शक्ति की पूजा करने की सलाह देते हैं--"शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन"। पूजन की जो विधि है वह पारम्परिक रीति से ही सम्पन्न होती है, हालाँकि उसमें राम की दृढ़ता का सन्निवेश है। पूजा के अंतिम चरण में राम की परीक्षा लेने के लिए दुर्गा अर्पण के लिए रखे अंतिम पुष्प को चुरा लेती हैं। इससे साधना के अधूरी रह जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है। यहाँ आकर राम जो निर्णय करते हैं उससे शक्ति की मौलिक कल्पना करने की सलाह सार्थक होती है। कमल के फूल की भरपाई अपनी आँख से करने का निश्चय दरअसल, अपने मक़सद के लिए ख़ुद को दांव पर लगाने, कर्तव्य की वेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने का वह चुनाव है जिसे अनेक आसान विकल्पों को ठुकरा कर किया गया है। अपने संकल्प के अनूठेपन के कारण शक्ति की यह कल्पना मौलिक है। कविता और जीवन में असली फ़र्क़ इसीसे पड़ता है। समूची कविता इस एक संकेत से प्रज्ज्वलित है। इस प्रकार "राम की शक्तिपूजा" का केंद्रीय सूत्र कर्तव्य के प्रति निष्ठा और समर्पण की ऐच्छिक आत्यन्तिकता है जो निराला के राम को नई और मौलिक आभा से दीप्त करती है।
बड़ी और कालजई रचनाएँ प्रायः मनुष्य के आदिम और मूलगामी संवेगों पर आधारित होती हैं। प्रेम, साहस, सहानुभूति, करुणा, कृतज्ञता और विश्वास जैस भावों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। विशेष बात यह है कि इनके विलोम भाव भी रचना में उतनी ही सशक्त भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा ज्ञान, इच्छा और क्रिया के बीच चलने वाला द्वंद्व भी आधुनिक मनुष्य की एक मूलभूत संचालक शक्ति है। प्रेमचंद का उपन्यास "गोदान" और मुक्तिबोध की कविता "अँधेरे में" समेत तमाम महत्वपूर्ण रचनाओं का गठन इसी द्वंद्व से हुआ है। व्यक्ति और समाज तथा अंतर्जगत और बहिर्जगत के बीच चलने वाला द्वंद्व भी आधुनिक साहित्य की एक मूल विषयवस्तु है।
आलोचना के क्षेत्र में जड़ जमाये भ्रमों में एक यह है कि कला अथवा सौंदर्य पर ज़ोर देने से रचना का अभिप्राय विघटित हो जाता है। इस मसले को "क्या कहा गया"(कथ्य),और "कैसे कहा गया" (रूप), इन दो प्रश्नों के उत्तरों के बीच मौजूद रिश्ते की पड़ताल मान सकते हैं। वास्तव में अगर साहित्य-कर्म की विशिष्टता को समझे बग़ैर रचनाकार अपने मंतव्य को समुचित कलात्मक ढंग से नहीं प्रकट करता तो इस बात की संभावना अधिक है कि रचनाकार का अभिप्राय स्पष्ट होने के बावजूद वह अपने पाठकों पर अनुकूल प्रभाव न छोड़ सकेगा। अंतर्वस्तु रचना का सत्य है और रूप उसकी शक्ति है। सत्य के साथ शक्ति का योग होने पर ही उसे जीवन मिल सकता है, अन्यथा नहीं। हाँ, इस मामले में कला और उसके नाम पर होने वाली नासमझ पच्चीकारी के बीच अंतर करना वैसे ही ज़रूरी है जैसे साहित्य के यथार्थ को अख़बारी बयानों से अलगाना। किसी भी हाल में रचना से तुरंत समझ में आ जाने की मांग करना अपने प्रति ज़्यादती है और इससे बचना चाहिए।
आलोचना करते समय एक बात का ध्यान हमेशा रखना चाहिए कि रचना में जो कुछ प्रस्तुत है हम उस पर ही विचार व्यक्त करने के लिए अधिकृत हैं। जो बात रचना में आई ही नहीं, उसके न आने की वजहों को लेकर हायतौबा मचाने और इससे अपने निष्कर्ष निकालने वाली आलोचना अवैध होती है। किसी रचना की सीमा वह तत्व नहीं हो सकता जो उसका विषय ही नहीं बना, वैसे ही जैसे किसी तैराक की सीमा यह नहीं हो सकती कि वह धावक नहीं है। किसी देश की तरह रचना की सीमा भी उसकी ज़मीन की, उसमें मौजूद सकारात्मक क्षमता की सीमा होती है।
इस नियम का एक अपवाद भी है। रचना का सम्बन्ध चूंकि मनुष्य की स्मृति, उसके यथार्थ और स्वप्न से होता है, इसलिए समय के तीनों रूपों (अतीत, वर्तमान और भविष्य) में आवागमन उसका स्वभाव बन जाता है। इसमें भी कई बार स्मृति और यथार्थ स्वप्न के लिए राह बनाने का माध्यम बनते हैं। तभी रचना में भविष्य में खिलने वाले फूलों की ख़ुशबू शामिल होती है। लेकिन कभी कभी रचना में स्वप्न अथवा दुःस्वप्न के प्रबल रेखांकन से रचनाकार यथार्थ की किसी विसंगति का संकेत भी करता है। यथार्थ को अपना विषय बनाते हुए वह उसमें अनुपस्थित किसी वांछनीय तत्व को रचना में सायास उपस्थित दिखा कर उसकी अनुपस्थिति को हाइलाइट कर सकता है। कभी इसके विपरीत वह समाज में उपस्थित किसी अवांछनीय तत्व को रचना में सायास अनुपस्थित दिखाकर उसकी अवांछनीयता पर ज़ोर दे सकता है। किसी स्टैंसिल की तरह यह रचना अनुपस्थित की उपस्थिति और उपस्थित की अनुपस्थिति के नियम से संचालित होती है। समाज के यथार्थ और रचना के यथार्थ के बीच इस मानीखेज़ अंतर से वह हमारे जीवन की विडम्बना को प्रकट करता है।
सही और ग़लत, न्याय और अन्याय के बीच संघर्ष में रचना का पक्ष क्या है, यह आलोचना की अनिवार्य जिज्ञासा है। ध्यान देने की बात यह है कि रचना का पक्ष रचनाकार के पक्ष का पर्याय नहीं होता। सच्ची रचना तब होती है जब रचनाकार अपने प्रतिपक्ष को भी अपनी आत्मा के अंश से रचता है। उसकी भूमिका सज़ा देने वाले जज की नहीं बल्कि ऐसे वक़ील की होती है जिस पर वादी और प्रतिवादी दोनों का पक्ष प्रस्तुत करने का दायित्व है। इस तरह वह सामाजिक अपराधों और बुराइयों की हमारी समझ को गहरा और विस्तृत करता है। सत्य और न्याय की स्थापना में इस समझ की अनिवार्य भूमिका होती है। दोस्तोयवस्की कृत " अपराध और दंड" तथा टॉलस्टॉय कृत "पुनरुत्थान" जैसी रचनाएँ इस श्रेणी में आती हैं।आलोचक को यह ध्यान रखना चाहिए कि जघन्य व्यक्तिगत और सामाजिक अपराधों की नृशंसता के वर्णन में लेखक इतना तो नहीं रम गया है कि वह पाठक की चेतना को जाग्रत करने की बजाय उसे सुन्न किये दे रहा है।अपनी सदिच्छा के बावजूद सुई का काम तलवार से लेने वाली ऐसी रचनाएँ मानवीय विवेक को कुंद करती हैं, और 'यही सब तो होता है' की यथास्थितिवादी चेतना का विस्तार करती हैं। विकराल विभीषिकाओं के प्रति जागरूक करने के लिए मानवीय संवेदना पर उसके प्रभाव को दर्शाने वाला कोई नाज़ुक सा हवाला जो पाठक के दिल को छू जाए, कहीं अधिक कारगर होता है। सआदत हसन मंटो की कहानी 'टोबाटेक सिंह' भारत पाकिस्तान विभाजन का ऐसा ही रचनात्मक रूपांतरण है।
आलोचना का सुनहला नियम यह है कि किसी भी समय, समाज, रचना , रचनाकार अथवा आलोचक का मूल्यांकन उसके सर्वश्रेष्ठ के आधार पर होना चाहिए। किसी की कमतर उपलब्धि के आधार पर होने वाली उसकी आलोचना निष्फल होती है। जैसे किसी पर्वतारोही के असफल अभियानों के आधार पर उसका मूल्यांकन करना समझदारी नहीं है, वैसे ही किसी रचनाकार की कमज़ोर रचनाओं का उल्लेख करते हुए भी उसकी बेहतर उपलब्धियों के आधार पर ही उसका मूल्यांकन होना चाहिए। रचनाकार के जीवन और उसकी रचना में घालमेल से भी बचना चाहिए। आलोचक को रचनाकार के जीवन से अधिक उसके समय और समाज में रुचि लेनी चाहिए और रचना से उसके रिश्ते की पड़ताल करनी चाहिए। रचनाकार का जीवन नहीं उसका समय रचना की कसौटी है। हाँ, उसकी रचना उसके जीवन की कसौटी ज़रूर है और हमेशा बनी रहेगी।
किसी आलोचक के मूल्यांकन में एक बात ध्यान रखने की है कि उसने जिन रचनाओं को महत्वपूर्ण माना उनके आधार पर उसका रिपोर्ट कार्ड बनेगा। अगर किसी महत्वपूर्ण रचना को समझने से वह चूक गया तो यह उतना अहम नहीं है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति हर अच्छी रचना का सही मूल्यांकन नहीं कर सकता। हाँ, अगर वह किसी कमज़ोर रचना को महत्वपूर्ण बताता है और उसे अपना प्रतिमान बनाता है तो यह ज़रूर उसकी आलोचकीय अक्षमता का प्रमाण होगा।
अंततः, विश्वसनीय आलोचना लिखने के लिए आलोचक को चाहिए कि वह रचना से कम से कम एक आवश्यक सन्दर्भ-सूत्र लेते हुए अपनी बात तर्कसहित कहे। 'ऐसा मानते हैं', 'सुनते हैं', 'कहते हैं' जैसे वाक्यांशों से बचते हुए जो कुछ वह कहता है उसकी ज़िम्मेदारी उसे स्वयं उठानी चाहिये। इसका मतलब यह नहीं कि दूसरों को उद्धृत न किया जाए, बल्कि जो भी कहें उसके बारे में अपनी राय भी साफ़ साफ़ प्रकट करें। वही विश्लेषण वैध है जिसे हर स्तर पर चुनौती दिया जा सके, जिससे तर्क किया जा सके और आवश्यक होने पर जिसका खंडन किया जा सके। इसके अलावा सभी विश्लेषण गोलमटोल, सारहीन, और आलोचना की संस्कृति के लिए घातक शब्दाडंबर भर हैं। सच्ची आलोचना को निष्कवच और वेध्य होना चाहिए।

काव्यशास्त्रविनोद-२: भाषा की अंतर्वस्तु

निराला ने गद्य को जीवनसंग्राम की भाषा कहा था।आधुनिक युग को गद्ययुग भी कहा गया है।ज़ाहिर है कविता पर विचार करते हुए अब हमारे सामने मसला गद्य बनाम काव्य का नहीं है, बल्कि गद्य बनाम बेहतर गद्य का है। गद्य की बेहतरी को आंकने के लिए भाषा की सरलता, प्रवाहमयता, विचारशीलता और सार्थकता जैसे परंपरागत पैमानों से सहमत होते हुए हम ये मानते हैं कि ये विशेषताएँ भाषा के रूप आकार की हैं। काव्यभाषा की वास्तविक विशेषता अपने पाठक की सोई हुई मानसिक क्षमताओं को जगाने, उसकी प्रश्नाकुलता को धार देने, उसके अंदर की मानवीय भावनाओं और उसके उदात्त आशयों को उसके सम्मुख प्रकट करने में निहित होती है। इसी भूमिका में वो काव्यरचना की सहयोगी बन सकती है। आइये कुछ और निकट से देखें कि वह ऐसा कैसे कर पाती है।
आम तौर पर ये मान्यता है कि भाषा में जो कुछ कहते या लिखते हैं, उसीसे से वांछित अर्थ निकल आता है, उसे कैसे कहा या लिखा गया इसकी भूमिका गौण है।भाषा एक माध्यम है जिसे सुविधाजनक होना चाहिए, यानी सरलतापूर्वक किसी कथन का मनोवांछित अर्थ निकल आये। सिद्धान्तरूप में हम अभिधा, लक्षणा, व्यंजना जैसी शब्दशक्तियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन उन्हें रचनाकार के वांछित अभिप्रायों से अलग करके नहीं देखते। लेखक की इच्छा के मुताबिक़ किसी कथन से प्रत्यक्ष तौर पर आने वाले अभिधार्थ, और अप्रत्यक्ष तौर पर आने वाले लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ की अपेक्षा तो करते हैं, पर स्वयं भाषा में ये शक्तियां लेखक की इच्छा से निरपेक्ष तौर पर भी निहित हो सकती हैं, इस संभावना पर विचार नहीं करते।
उदाहरण के लिये, अपने रोज़मर्रा के जीवन में हम देखते हैं कि हमारी कही हुई बातें कई बार हमारे मन्तव्य के विपरीत प्रभाव छोड़ती हैं। हम किसी उद्विग्न व्यक्ति को सांत्वना देना चाहते हैं और वो हमारी बात से चिढ़ जाता है क्योंकि हमारी भाषा शैली और हावभाव उस व्यक्ति की मनःस्थिति के अनुरूप नहीं होते। ऐसे में हमारे शब्द बिलकुल उपयुक्त हो सकते हैं लेकिन उनका अर्थ हमारे अनजाने ही बदल जाता है। इसी प्रकार अगर हम अपनी रचना में कोई सामाजिक राजनीतिक सन्देश देने की कोशिश करते हैं लेकिन वह सन्देश वस्तुगत परिस्थितियों की उचित समझ पर आधारित नहीं है तो उसका परिणाम उल्टा निकल सकता है। कहने का आशय यह कि भाषा में दिए गए किसी वक्तव्य का वास्तविक अर्थ जितना वाचक के मन में होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण तरीक़े से वाह्य परिस्थितियों और उन व्यक्तियों के मन में होता है जो उससे अपने को सम्बंधित पाते हैं।जब दोनों पक्षों के बीच भाषा एक जैसा संवाद बना पाती है तो यह आदर्श स्थिति होती है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि किसी रचना की वास्तविक भूमिका उसके शब्दकोषीय अर्थ और रचनाकार की इच्छा से परे सामाजिक परिस्थितियों में विद्यमान होती है।
इस प्रकार भाषा में अंतर्वस्तु का निवेश दो स्तरों पर होता है। पहला स्तर वह है जब रचनाकर अपनी रचना में अपने मनोनुकूल भावों को शब्दबद्ध करता है, और दूसरा वह जब रचना पाठक के पास आती है और वह अपनी स्थिति के अनुरूप उसका अर्थ ग्रहण करता है। पहले को मनोगत स्तर और दूसरे को वस्तुगत स्तर कह सकते हैं। वस्तुगत स्तर पर भले ही आरम्भ में पाठकों में अंतर्वस्तु को लेकर मतभेद दिखें लेकिन लोकतान्त्रिक बहस मुबाहिसे की प्रक्रिया में वे मतभेद सिमटते चले जाते हैं और न्यूनतम सम्भव स्तर पर पहुँच जाते हैं। जैसे पानी जिस बर्तन में जाता है उसीका आकार ग्रहण कर लेता है, किन्तु विकास की प्रक्रिया में अंततः कुछ ख़ास आकार के बर्तन पानी के अनुकूल पड़ते हैं और वे पानी के समुचित आकार की सूचना देते हैं। हम थाली में पानी नहीं पीते गिलास में पीते हैं क्योंकि गिलास का आकार पानी की प्रकृति के अनुरूप होता है।
यहाँ एक सवाल यह उठता है कि अगर किसी भाषिक रचना का अभिप्राय वाह्य परिस्थितियों अथवा उसके पाठक के अनुसार तय होता है तो उसे भाषा की अंतर्वस्तु कैसे कह सकते हैं। इसका जवाब यह है कि यह गुंजाइश खुद भाषा के अंदर होती है। उसकी संरचना में अनेक अर्थ छिपे होते हैं जो मौक़े के मुताबिक़ ख़ुद को ज़ाहिर करते हैं। जिस तरह पत्थर के अंदर अनेक मूर्तियां छिपी होतीं हैं, लेकिन मूर्तिकार उसके फालतू हिस्सों को तराश कर अपने मनमाफिक मूर्ति गढ़ लेता है, उसी तरह कविता का पाठक भी उससे अपने अनुरूप अर्थ ग्रहण करता है। शर्त बस यह है कि वह अर्थ कविता की भाषिक संरचना से वैध ढंग से निकलना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं। एक बार जब रचना पाठक के सामने चली जाती है तो रचनाकार के मंतव्य का प्रश्न समाप्त हो जाता है। रचना के बारे में उसकी राय किसी पाठक की राय से अधिक महत्त्व नहीं रखती। इस प्रक्रिया में एकाधिक वैध अर्थ भी हो सकते हैं, और यह विशेषता रचना की ताक़त है कमजोरी नहीं। अर्थों के इस बहुलतावादी लोकतंत्र में एक बार फिर पाठक अपने काव्यार्थ को चुनता है और अलग अलग पाठकों पर पड़ने वाले प्रभाव के अनुसार रचना की सामाजिक भूमिका तय होती है। ज़ाहिर है कि इस प्रक्रिया में भाषा की अंतर्वस्तु की निर्णायक भूमिका होती है।
उदाहरण के लिये मान लें कि कोई कवि वर्तमान में दलितों के बारे में पूरी हमदर्दी के साथ सोचना और लिखना चाहता है लेकिन अपने संस्कारों से बाध्य होकर वह उनके प्रति दया का प्रचार करता है। वह पूरी ईमानदारी से सोचता है कि अगर दलित प्रतिरोध और संघर्ष के रास्ते पर चलना छोड़ दें तो सामंती शक्तियों के अंदर उनके प्रति सहनशीलता पैदा हो सकती है और धीरे धीरे दलितों का उत्थान सम्भव हो सकता है। ऐसी स्थिति में उसकी इच्छा के विपरीत उसकी रचना दलितों के अपमान और उनकी अवमानना का कारण बनेगी और दलित विरोधी शक्तियों को मज़बूत करेगी।
ग़ालिब का मशहूर शेर है:
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है
प्रत्यक्ष तौर पर इस शेर का अर्थ है कि किसी की मृत्यु के बाद उसके शरीर को जला दिया गया है और इस प्रक्रिया में उसका दिल, जो समस्त भावनाओं का आधार हुआ करता था, भी जल कर ख़त्म हो चुका है इसलिए बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। शाब्दिक रूप से इस व्याख्या पर आपत्ति नहीं हो सकती और इसकी सदिच्छा पर भी सवाल नहीं उठ सकता। इस व्याख्या का इस्तेमाल किसी प्रियजन के बिछोह पर सांत्वना देने से लेकर अनात्मवाद की स्थापना के लिए भी हो सकता है। लेकिन इसमें जो राख कुरेदने का प्रसंग है और जिसके पीछे छिपी ख़्वाहिश को लेकर उत्सुकता भी ज़ाहिर की गई है, वह इस शेर में एक अलग अर्थ की संभावना पैदा करता है।
ध्यान से देखें तो ख़ुद कविता भी राख कुरेदने के अलावा क्या है। यह बात प्रायः स्वीकृत है कि वास्तविक जीवन प्रसंगों के गुज़र जाने के बाद और उनसे थोड़ी दूरी बन जाने पर ही स्मृति के सहारे बड़ी कविता अस्तित्व में आती है। यथार्थ और स्वप्न भी कविता के स्रोत हैं लेकिन कालजयी रचनाएँ अक्सर स्मृति को अपना माध्यम बनाती हैं। इसी तरह भावनाएं भी अपने आलंबन के गुज़र जाने के बाद अधिक तीव्र और मर्मस्पर्शी होकर सामने आती हैं।कहने का आशय यह कि किसी पाठक के लिए इस शेर का वास्तविक और वैध अभिप्राय यह भी हो सकता है कि शरीर के न रहने पर प्रियजन की यादें अधिक प्रभावी होती हैं।
अब ये दोनों व्याख्याएं पाठकों के मन मस्तिष्क में उनकी अभिरुचियों के मुताबिक़ जगह बनाती रहती हैं। अंततः इनमें से कोई एक ही व्याख्या समय की कसौटी पर खरी उतरेगी, लेकिन इसमें कितना वक़्त लगेगा यह नहीं कहा जा सकता। कबीर और तुलसी जैसे कवियों के अभिप्रायों पर अब भी अनेक राय है। इसी श्रेणी में ग़ालिब भी आते हैं। जो कविता जितनी समर्थ होती है उसे लेकर मत मतान्तर की गुंजाइश उतनी ही अधिक होती है। इस प्रसंग में अंतिम बात फ़िलहाल यह है कि हिंदी समाज और साहित्य में बहस का अवकाश कम होता जा रहा है। हमारे लेखकों और पाठकों को इस परिस्थिति में निहित ख़तरे को समझना चाहिए और अपने समाज को इस दिशा में चलने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

काव्यशास्त्रविनोद-१

डॉ. कृष्णमोहन की यह टिपण्णी फेसबुक पर शाया हुई थी. बाद में इसकी दो और किश्तें भी छपी. कई अर्थों में यह श्रृंखला बेहतर बन पडी है. लगा कि इन्हें एक जगह सहेज लिया जाए ताकि जरुरत पड़ने पर फेसबुक पर अनंत तक की 'स्क्रॉलिंग' करनी पड़े. 
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संस्कृत में कहा गया है कि गद्य कवियों का निकष है। हिंदी में आकर इस उक्ति का अर्थ प्रायः यह समझा गया है कि कवियों को कविता के अलावा कहानी या आलोचना में भी कुछ काम करते रहना चाहिए।कवि त्रिलोचन ने इस प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए कभी लिखा था-- गद्य वद्य कुछ लिखा करो कविता में क्या है। कवि-कथाकार और कवि-आलोचक जैसी नई श्रेणियाँ सामने आ गईं और इस तरह के सूत्रीकरण भी कि ऐसे लेखकों की कथारचना और आलोचना भी छूँछे कथाकारों और आलोचकों से बेहतर होती है, कविता का तो कहना ही क्या।अनेक विधाओं में काम करने पर लेखन में निखार आना तो स्वाभाविक है,लेकिन उपर्युक्त उक्ति में गद्य का उल्लेख कवियों की कविता ही के सन्दर्भ में की गई है। कवि को संबोधित कथन सबसे पहले उसकी कविता के सन्दर्भ में होगा क्योंकि वही उसे कवि बनाती है।
दरअसल, हिंदी में गद्य और पद्य को परस्पर विलोम नहीं तो नदी के दो पाटों की तरह समानांतर मानकर चलने की रीति रही है।इस खाई को पाटने के लिए "गद्य कविता" नामक विधा का प्रचलन भी इसी रीति की ताईद करता है। सच तो यह है कि कविता, चाहे वह तुकांत हो या अतुकांत, छंदोबद्ध हो या मुक्तछंद हमेशा गद्य पर निर्भर रही है।प्राचीन संस्कृत से आधुनिक हिंदी तक तमाम भाषाओँ की इसकी यात्रा इस बात की बेहिचक पुष्टि करती है।
भाषा की बुनियादी इकाई वाक्य है और वाक्य गद्य और पद्य में अलग अलग नहीँ होते। कविता और गद्य के वाक्यों में ख़ास अंतर यह होता है कि गद्य के वाक्यों में अर्थ की बहुलता उसे संदिग्ध बनाती है जबकि कविता में यह उसका विशेष गुण होती है। इसलिए कविता में यह कमाल दिखाने के लिए कवि को वाक्य में कर्ता, कर्म और क्रिया के क्रम में फेरबदल की थोड़ी सी छूट मिलती है लेकिन वाक्य को तोड़ने-मरोड़ने या उसका अंग-भंग करने की इजाज़त उसे क़तई नहीं है।बहरहाल, यहाँ बिलकुल अनायास याद आने वाली कुछ काव्य पंक्तियों को प्रस्तुत करना उचित होगा--
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति
भर्तृहरि
कबिरा खड़ा बजार में मांगे सबकी ख़ैर
ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर
कबीर
रहिमन पानी राखिये बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरैं मोती मानुस चून
रहीम
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
मीर
रोक लो गर ग़लत चले कोई
बख़्श दो गर ख़ता करे कोई
ग़ालिब
गद्य के दो भरे पूरे वाक्यों से रचित कविता के ये उदाहरण बताते हैं कि भारतीय कविता की लंबी परम्परा में गद्यमयता की यह रीति 19वीं सदी तक बिना रोकटोक चलती रही है। बीसवीं सदी के आरंभिक युग में विशेषकर छायावाद के दौर में गद्य पर निर्भरता की यह परंपरा हाथ से छूटी और उससे कविता का कुछ नुकसान भी हुआ लेकिन परवर्ती हिंदी कविता इस मसले को लेकर सचेत दिखाई पड़ती है।हम कह सकते हैं कि हिंदी कविता के मूल्यांकन में वाक्यों की रचना का दोषपूर्ण होना कोई बड़ी बाधा नहीं है।यानी, रूप के स्तर पर तो हिंदी कविता
गद्य के निकष पर खरी उतरती है,लेकिन क्या अंतर्वस्तु के स्तर पर भी यही बात कही जा सकती है?हम इस पर अपनी अगली कड़ी में विचार करेंगे।