बीते कल से मेरे अनुज उमंग यहाँ करनाल आये हुए हैं। कल ही शाम को हम काईट्स देखने गये और पाया कि आलोचना की अजीब सी बीमारी भारतीय जन मानस मे घर करती जा रही है। आलोचना होनी चाहिये पर एक पैमाने के साथ। यहाँ तो हो यह रहा है कि जो पत्रकार नही बन पाया वो पूरी मीडिया को पानी पी पी के गाली देता है। जो कवि कहानीकार नही बन सकता और जिसने रचनाकार की पीड़ा का एक अंश भी नही बर्दाश्त किया वो साहित्यकारो को चरित्रहीन साबित करने मे लगा रहता है। जो नेता नही बन पाये उनमे से कई ऐसे मिले जो मन ही मन संसद पर हुए हमले से बहुत खुश थे और यह दुष्ट इच्छा भी व्यक्त की कि काश सारे नेता मारे गये होते। जिन्हे पता है कि सिनेमा की दुनिया से उनका कोई वास्ता नही पड़ने वाला, उससे कोई काम नही निकलने वाला उन लोंगो ने ‘काईट्स’ फिल्म को जम के गरिआया।
यह सच है कि काईट्स महान फिल्म नही है। पर ये जो प्रेरक प्रसंग जैसी फिल्मे बन रही हैं जैसे माई नेम इज सुपर खान और ऑल ईडियट्स, वो भी सामान्य और मनोरंजक फिल्म ही बन के रह गई हैं। दोनो ही फिल्मों मे कितने ऐसे दृश्य हैं जिनके बचकानेपन और बनावटी ब्रिलिएंस पर शर्म वाली झुरझुरी फैल जाती है।
यह सच है कि काईट्स महान फिल्म नही है और इस महानता की उम्मीद लगाये लोगो की चालाक मूर्खता पर दो पल के लिये अफसोस कर ले फिर आगे बढ़े। ये वही लोग हैं जो ऑर्नॉल्ड स्वाज्नेगर और जेम्स बॉंड की निरा बेतुकी फिल्मों की तारीफ मे मरे जाते हैं। ऋतिक, शाहरूख आमिर और अमिताभ की फिल्मों को देखते हुए ओमपुरी और नसीर द्वारा अभिनीत दिमाग झनझना देने वाली फिल्मों की अपेक्षा बेमानी है। सिनेमा से सामाजिक अर्थवत्ता की उम्मीद अपनी जगह मह्त्वपूर्ण है पर इसके मनोरंजक पहलू को कम करके ऑकने का काम वही लोग करेंगे जो जीवन से इतना खुश हैं जिन्हे रोने धोने के लिये टी.वी के धारावाहिको की शरण लेनी पड़ती है।
काईट्स की कहानी में वो धीमापन मौजूद है जो प्रेम कहानियों में होता है जैसे ‘ अ वॉक टू रिमेम्बर, फिफ्टी फर्स्ट डेट्स, स्वीट नवम्बर, इत्यादि’। गाने भी सुनने लायक हैं – ‘इंतजार कब तलक हम करेंगे भला’। सिनेमैटोग्राफी बहुत अच्छी है। और सबसे उपर अपना देवदूत – ऋतिक। चाहे वो कंफ्यूज्ड इंसान वाला किरदार हो या अपनी प्रेमिका को तलाशने की व्यग्रता या प्रेम के खूबसूरत पलों की अदाकारी, सबमें ऋतिक ने अच्छा काम किया है।
बारबारा। ब्यूटीफूल!! उन लोगो की चिंता नाजायज नही है जो विदेशी सुन्दरियों के भारतीय सिनेमा मे दखल से डरे सहमें हैं। आज की तारीख में जितनी नई अभिनेत्रियाँ लग के काम कर रही हैं उनमे से गजब की दीपिका को छोड़ दें तो कोई बारबारा के पासंग भी नही ठरने वाली। फिल्म मे एक दृश्य है कि वे दोनो होटल के कमरे मे बैठे हैं। बारबारा नीली जींस के शॉर्ट्स और झक्क उजले टॉप में है, उस एक सीन मे वो जितनी खूबसूरत दिख पड़ी है और उसके बराबर में बैठा मोस्ट हैंडसम ऋतिक! उनके एक साथ होने वाले इस दृश्य मे जो रूहानियत और मासूमियत है उसके लिये अगर भाषा के भदेस का तनिक सहारा लें तो कहेंगे ‘पैसा वसूल’। ऋतिक में अदाकारी और वो फिटनेस है जो उसे एक दिन इंटरनेशनल लेवल तक मशहूरी देगी। उसके लिये एक अर्धवाक्य फिर दूहरा दूँ- देवदूत लगता है।
औसत से अच्छी फिल्म है। सुन्दर प्रेम कहानी। खटकने वाली चीज यह लगी कि जिस तरह से धोखेबाजी और बेवफाई को ‘ग्लोरिफाई’ किया गया है वो गलत है। इसके बरक्स बाबा भारती का किस्सा याद आता है। जिन्होने डाकू मंगल सिंह को उसके धोखे की बात सबसे बताने के लिये मना करते हैं क्योंकि उन्हे डर है कि कल को फिर कोई घुड़सवार किसी जरुरतमन्द राहगीर की मदद नही करेगा। वैसे यही सुर आजकल पूरे जमाने ने साध रखा है तो फिल्म्कार बेचारा क्या करे? और साथ ही यह भी कि अनुराग बसु से हम अनुराग कश्यप होने की अपेक्षा नही रखते।
पूरी फिल्म में ऋतिक ने शानदार अभिनय किया है। एक बार देखने लायक तो है ही है।
रही बात इस पोस्ट के शीर्षक की तो ये गीत मेरे जीवन के इर्द गिर्द इतना ज्यादा बज रहा था कि लगा जैसे कोई बहुत पुराना गीत हो। पर उमंग ने बताया यह आने वाले समय के राजनीति का गीत है।
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Wednesday, June 2, 2010
Thursday, May 13, 2010
मृत्यु का शीर्षक कहाँ होता है?
कल एक या दो अजीब बातें हुई. बहुत दिनों बाद कल मैं करनाल था और एक साहित्यिक मित्र से किये वादे को नहीं पूरा कर पाने का दुःख मुझे घेर रखा था.यह दूसरा मौक़ा था जब मैंने उनसे कहानी देने का वादा किया और अंततः अपनी व्यस्तताओं के कारण कहानी समय पर लिख पाने में अक्षम रहा. इस बार मैंने सोच रखा था कि कोई वादा खिलाफी नहीं होगी और नवम्बर से ही वो कहानी लिख रहा था, लगभग एक ड्राफ्ट पूरा हो जाने के बाद की बात है, जब मेरा लैपटॉप ही छीन लिया गया.उसके बाद मेरी हिम्मत जाती रही, प्रयास मैंने फिर भी किया पर,जैसा कि डर था, असफल रहा. इधर दूसरी मुश्किल यह आई है कि एक फिल्म प्रोड्यूसर से मैंने अडवांस ले रखा है और अब उसे पूरी स्क्रिप्ट चाहिए.मेरे पास स्क्रिप्ट के नाम पर लिखा हुआ एक पैरा तक नहीं है, कहानी दिमाग में है पर उसे पन्नो तक लाने के लिए जो समय और एकाग्रता चाहिए उसे देने से नौकरी ने समूचा इनकार कर दिया है.मेरे पास दस दिन का समय था जिसमे से दो दिन मैंने यह सोचते हुए बिता दिए हैं कि अरे बाप रे! बस दस दिन का समय है.
कल कई दिनों बाद करनाल था और अपने एकलौते मित्र से मिलाने गया, सोचा कहानी शुरू हो सकेगी. करनाल में यह मेरे एक मात्र मित्र है. नाम मैं इनका नहीं जानता हूँ ना ही वो मेरा नाम जानते हैं.उनकी उम्र नहीं भी होगी तो पचहत्तर की होगी. चाय की दूकान सुबह साढ़े सात बजे खोल बैठ जाते हैं और पंजाब केसरी जैसा अखबार, जिसमे सचमुच में पढ़ने लायक कुछ नहीं छपता है, दिन भर पढ़ते रहते हैं. उनकी आमदनी इतनी कम हो गयी है कि अगले महीने से वो यह अखबार भी बंद कराने वाले हैं. सुबह सुबह चाय पीने की आदत ने इनसे बातचीत चला दी वरना करनाल में किसी से मैं बात ही नहीं कर पाता( अगर बातचीत की परिभाषा से इस तरह की बातो को निकाल दे कि वेटर ज़रा, रोटी लाना, सलाद बिना चटनी के देना, खरबूजा क्या भाव ताऊ? तब तो मेरे दिन अबोले ही निकल जाएँ). पिछले दिसंबर से चाय वाले अंकल से बातचीत शुरू हुई. ये मेरे लिए ठेठ दूध पत्ती (चाय की अमीर किस्म जिसमे सिर्फ दूध और चायपत्ती होती है) बनाते हैं और मुझे हरयाणवी सिखाने का काम भी कर रहे हैं.
कल गया तो क्या देखत़ा हूँ कि दूकान तो बंद है! याद आया कि पिछले हफ्ते मैं दो दिन करनाल था और दोनों ही दिन दूकान बंद थी. मुझे नकारात्मक आश्चर्य हुआ. क्या कारण हो सकता है? मन में खराब ख़याल आया कि कहीं अंकल जी "बाबुल के घर" तो नहीं चले गए? आस पास कोई ऐसी दूकान नहीं जिससे कुछ पूछा जाए.फिर मैं ऑफिस चला गया. घिरी दोपहर में कमरे तक आ रहा था तो देखा, ताऊ दूकान सजा रहा है. आप मानेगे नहीं, मैंने यही सोचा कि पट्ठा मृत्यु से भीड़ कर लौट आया है. वैसे भी इस बूढ़े इंसान की बातचीत में इतना उमंग रहता है कि बनावटी किस्म के शरीफ इनसे खफा हो जाते हैं. आस पास की kमोटर मैकेनिक की दुकानों पर काम करने वाले नौजवानों से यह इंसान काफी खुला हुआ है. मैंने नमस्कार किया. उन्होंने कहा, चाय पिएगा? मैंने कहने को कह दिया बनाओ पर गरमी इतनी ज्यादा थी और गुमटी के बाहर की बरसाती इतनी ताप रही थी कि क्या बताऊँ? चाय पी और अनायास ही टूटी फूटी हरियाणवी में बोल बैठा- इतने दिन दूकान बंद देख ताऊ मैंने यह समझा कि तुम टपक लिए.
तिलमिलाती शक्ल वाली दोपहर में मैंने उस बुजुर्ग की प्रतिक्रया देखी. वो उदास नहीं हुआ और नहीं उसके चहरे पर खुशी का नंगा अतिरेक था. बेहद सामने भाव से उन्होंने मुझे देखा और कहा: अब तो उसी का इंतज़ार है छोरे! और देर तक दूकान के बाहर खाली और तपती सड़क को देखते रहे. हमलोग मृत्यु पर बात कर रहे थे और बजाय उनके, ये मैं था जो डर गया था. उन्होंने अगला सवाल हँसते हुए किया: फिर तू चाय पीने कहाँ जाया करेगा? तू शादी क्यों नहीं कर लेता? तेरी उम्र में मेरे दो दो बेटे थे?' फिर वो बुढाऊ अपनी मजाकिया औकात पर आ गया: मैं लड़की दिखाऊ?” पर मैं उसी आसन्न मृत्यु और उसके डर पर अटका हुआ था. यह कोई नई बात नहीं थी पर मुझ पर या तो लम्बी और गर्म दोपहर का असर था या या अकेलेपन का या अपनी खराब तबियत का या पता नहीं किसका कि शाम तक मैं मृत्यु के ख्याल से उबार ही नहींपाया.
शाम को अम्मा(माँ) से बात हुई. अम्मा उन बेहद ख़ास दो लोगों में से एक है जिनसे मैं लगभग रोज ही बात करता हूँ. फोन पर उसकी आवाज ही ऐसी आयी कि लगा, उसकी तबीयत नासाज है. मैंने मर्ज पूछा तो उसने हंसने की कोशिश करते हुए बताया,"बुढापा". कहने लगी, अब तो चलने चलाने की उम्र ही आ गयी कि जिसमे कुछ ना कुछ लगा रहेगा. आगे बात करने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. यह दोपहर की बातचीत का असर था वरना अब सचमुच में अम्मा की तबियत अक्सर खराब रहने लगी है. दोपहर को मैंने मृत्यु को ऐसे महसूस कर लिया था कि जीवन में पहली बार मैंने सोचा कि क्या पता अम्मा भी ना रही तो? अपनी सारी होशियारी और समझदारी के बावजूद मैं अम्मा के बिना अपने जीवन में कुछ कल्पना भी नहीं कर पाता. मेरे पास इसका नक्शा जरूर बन गया है कि मेरा अजीज दोस्त मेरे साथ नहीं होगा तो क्या होगा.पर अम्मा के बिना.यही सब मेरे सपने हैं कि अम्मा के साथ मौसी के यहाँ जाना है, अम्मा को यहाँ घुमाना है, ये करना है, वो करना है, जागती आँखों के तमाम तमाम स्वप्न.
कल बहुत दिनों बाद मुझे रोने की इच्छा हो रही थी. एक दोस्त से यह सब बताते हुए गला भर आया था. मेरे मुंह से वाक्य नहीं फूट रहे थे. फिर अपनी ज्यादतियां याद आई. कई मौके ऐसे आये जब मैं गलत छोर पर खडा रहा और अम्मा को काफी दुःख हुआ. एक मन हो रहा है कि अभी छुट्टी डाल कर घर चला जाऊं. अगले तीन दिन के लिए घर में लगभग सब जमा हो रहे हैं.पर मुझे अगस्त से पहले छुट्टी नहीं मिलनी है.
एक दूसरा मन यह भी कह रहा कि चूकि मैं स्क्रिप्ट पर काम करने से डर रहा हूँ इसलिए ही शायद दुनिया के सबसे सुरक्षित कोने की याद लगातार आ रही है. वैसे आज फिर मैं अगले चार दिनों के लिए सिरसा, फतेहाबाद और हिसार निकल आया हूँ.
कल कई दिनों बाद करनाल था और अपने एकलौते मित्र से मिलाने गया, सोचा कहानी शुरू हो सकेगी. करनाल में यह मेरे एक मात्र मित्र है. नाम मैं इनका नहीं जानता हूँ ना ही वो मेरा नाम जानते हैं.उनकी उम्र नहीं भी होगी तो पचहत्तर की होगी. चाय की दूकान सुबह साढ़े सात बजे खोल बैठ जाते हैं और पंजाब केसरी जैसा अखबार, जिसमे सचमुच में पढ़ने लायक कुछ नहीं छपता है, दिन भर पढ़ते रहते हैं. उनकी आमदनी इतनी कम हो गयी है कि अगले महीने से वो यह अखबार भी बंद कराने वाले हैं. सुबह सुबह चाय पीने की आदत ने इनसे बातचीत चला दी वरना करनाल में किसी से मैं बात ही नहीं कर पाता( अगर बातचीत की परिभाषा से इस तरह की बातो को निकाल दे कि वेटर ज़रा, रोटी लाना, सलाद बिना चटनी के देना, खरबूजा क्या भाव ताऊ? तब तो मेरे दिन अबोले ही निकल जाएँ). पिछले दिसंबर से चाय वाले अंकल से बातचीत शुरू हुई. ये मेरे लिए ठेठ दूध पत्ती (चाय की अमीर किस्म जिसमे सिर्फ दूध और चायपत्ती होती है) बनाते हैं और मुझे हरयाणवी सिखाने का काम भी कर रहे हैं.
कल गया तो क्या देखत़ा हूँ कि दूकान तो बंद है! याद आया कि पिछले हफ्ते मैं दो दिन करनाल था और दोनों ही दिन दूकान बंद थी. मुझे नकारात्मक आश्चर्य हुआ. क्या कारण हो सकता है? मन में खराब ख़याल आया कि कहीं अंकल जी "बाबुल के घर" तो नहीं चले गए? आस पास कोई ऐसी दूकान नहीं जिससे कुछ पूछा जाए.फिर मैं ऑफिस चला गया. घिरी दोपहर में कमरे तक आ रहा था तो देखा, ताऊ दूकान सजा रहा है. आप मानेगे नहीं, मैंने यही सोचा कि पट्ठा मृत्यु से भीड़ कर लौट आया है. वैसे भी इस बूढ़े इंसान की बातचीत में इतना उमंग रहता है कि बनावटी किस्म के शरीफ इनसे खफा हो जाते हैं. आस पास की kमोटर मैकेनिक की दुकानों पर काम करने वाले नौजवानों से यह इंसान काफी खुला हुआ है. मैंने नमस्कार किया. उन्होंने कहा, चाय पिएगा? मैंने कहने को कह दिया बनाओ पर गरमी इतनी ज्यादा थी और गुमटी के बाहर की बरसाती इतनी ताप रही थी कि क्या बताऊँ? चाय पी और अनायास ही टूटी फूटी हरियाणवी में बोल बैठा- इतने दिन दूकान बंद देख ताऊ मैंने यह समझा कि तुम टपक लिए.
तिलमिलाती शक्ल वाली दोपहर में मैंने उस बुजुर्ग की प्रतिक्रया देखी. वो उदास नहीं हुआ और नहीं उसके चहरे पर खुशी का नंगा अतिरेक था. बेहद सामने भाव से उन्होंने मुझे देखा और कहा: अब तो उसी का इंतज़ार है छोरे! और देर तक दूकान के बाहर खाली और तपती सड़क को देखते रहे. हमलोग मृत्यु पर बात कर रहे थे और बजाय उनके, ये मैं था जो डर गया था. उन्होंने अगला सवाल हँसते हुए किया: फिर तू चाय पीने कहाँ जाया करेगा? तू शादी क्यों नहीं कर लेता? तेरी उम्र में मेरे दो दो बेटे थे?' फिर वो बुढाऊ अपनी मजाकिया औकात पर आ गया: मैं लड़की दिखाऊ?” पर मैं उसी आसन्न मृत्यु और उसके डर पर अटका हुआ था. यह कोई नई बात नहीं थी पर मुझ पर या तो लम्बी और गर्म दोपहर का असर था या या अकेलेपन का या अपनी खराब तबियत का या पता नहीं किसका कि शाम तक मैं मृत्यु के ख्याल से उबार ही नहींपाया.
शाम को अम्मा(माँ) से बात हुई. अम्मा उन बेहद ख़ास दो लोगों में से एक है जिनसे मैं लगभग रोज ही बात करता हूँ. फोन पर उसकी आवाज ही ऐसी आयी कि लगा, उसकी तबीयत नासाज है. मैंने मर्ज पूछा तो उसने हंसने की कोशिश करते हुए बताया,"बुढापा". कहने लगी, अब तो चलने चलाने की उम्र ही आ गयी कि जिसमे कुछ ना कुछ लगा रहेगा. आगे बात करने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. यह दोपहर की बातचीत का असर था वरना अब सचमुच में अम्मा की तबियत अक्सर खराब रहने लगी है. दोपहर को मैंने मृत्यु को ऐसे महसूस कर लिया था कि जीवन में पहली बार मैंने सोचा कि क्या पता अम्मा भी ना रही तो? अपनी सारी होशियारी और समझदारी के बावजूद मैं अम्मा के बिना अपने जीवन में कुछ कल्पना भी नहीं कर पाता. मेरे पास इसका नक्शा जरूर बन गया है कि मेरा अजीज दोस्त मेरे साथ नहीं होगा तो क्या होगा.पर अम्मा के बिना.यही सब मेरे सपने हैं कि अम्मा के साथ मौसी के यहाँ जाना है, अम्मा को यहाँ घुमाना है, ये करना है, वो करना है, जागती आँखों के तमाम तमाम स्वप्न.
कल बहुत दिनों बाद मुझे रोने की इच्छा हो रही थी. एक दोस्त से यह सब बताते हुए गला भर आया था. मेरे मुंह से वाक्य नहीं फूट रहे थे. फिर अपनी ज्यादतियां याद आई. कई मौके ऐसे आये जब मैं गलत छोर पर खडा रहा और अम्मा को काफी दुःख हुआ. एक मन हो रहा है कि अभी छुट्टी डाल कर घर चला जाऊं. अगले तीन दिन के लिए घर में लगभग सब जमा हो रहे हैं.पर मुझे अगस्त से पहले छुट्टी नहीं मिलनी है.
एक दूसरा मन यह भी कह रहा कि चूकि मैं स्क्रिप्ट पर काम करने से डर रहा हूँ इसलिए ही शायद दुनिया के सबसे सुरक्षित कोने की याद लगातार आ रही है. वैसे आज फिर मैं अगले चार दिनों के लिए सिरसा, फतेहाबाद और हिसार निकल आया हूँ.
Thursday, December 17, 2009
कैसे बताऊँ राज-ए-इश्क....
एक बार फिर करनाल रेलवे स्टेशन।
यह तस्वीर पोस्ट करते हुए एक संकोच मन में लगातार बना रहा कि इसे इजहार का अश्लील नमूना ना समझ लिया जाये और मेरे इस प्रयास को एक उच्श्रृंखल व्यवहार। जबकि मेरा यह भरपूर मानना है कि और जो भी हो, यह कहीं किसी कोने से अश्लील इजहार नहीं है। साथ ही यह भी, बचपन से ऐसी लिखावटों को पढ़ना ठीक लगता है। इजहार के ये तरीके आकर्षण लिए रहे हैं। मालगाड़ियों के लाल डब्बों पर लिखी ये इबारतें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। कहीं कहीं तो गाँव कस्बे का नाम भी दर्ज मिलता है। लड़के और लड़की का नाम भी। मैं सोचता हूँ कि इतनी मेहनत करने की हिम्मत जुटाना भी एक बात है। जिस किसी आशिक ने इसे लिखा होगा उसे जब कभी इसकी याद आती होगी वो, शायद, मुस्कुराता होगा और पुन: एकाध बीते ख्यालों से गुजर कर अपने काम में लग जाता होगा। दक्षिण मध्य रेल के इस डब्बे पर लिखी यह इबारत कहाँ कहाँ घूम आई होगी।
यह तस्वीर पोस्ट करते हुए एक संकोच मन में लगातार बना रहा कि इसे इजहार का अश्लील नमूना ना समझ लिया जाये और मेरे इस प्रयास को एक उच्श्रृंखल व्यवहार। जबकि मेरा यह भरपूर मानना है कि और जो भी हो, यह कहीं किसी कोने से अश्लील इजहार नहीं है। साथ ही यह भी, बचपन से ऐसी लिखावटों को पढ़ना ठीक लगता है। इजहार के ये तरीके आकर्षण लिए रहे हैं। मालगाड़ियों के लाल डब्बों पर लिखी ये इबारतें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। कहीं कहीं तो गाँव कस्बे का नाम भी दर्ज मिलता है। लड़के और लड़की का नाम भी। मैं सोचता हूँ कि इतनी मेहनत करने की हिम्मत जुटाना भी एक बात है। जिस किसी आशिक ने इसे लिखा होगा उसे जब कभी इसकी याद आती होगी वो, शायद, मुस्कुराता होगा और पुन: एकाध बीते ख्यालों से गुजर कर अपने काम में लग जाता होगा। दक्षिण मध्य रेल के इस डब्बे पर लिखी यह इबारत कहाँ कहाँ घूम आई होगी।
Monday, December 14, 2009
करनाल रेलवे स्टेशन पर कुछ गुत्थियाँ
यह तस्वीर करनाल रेलवे स्टेशन पर ली गई है। उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी है, मेरे सामने वह किताब खरीदी जो उसके हाथ में है। दोनों पुलिस वाले उतनी देर उस रस्सी, और उस रस्सी में बँधे आदमी, को थामे खड़े रहे जब तक की उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी है, अपनी मनपसन्द किताब नहीं खरीद ली। वो किताब ज्योतिष की है। उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी हुई है, पुलिस वालों को कुछ देर ज्योतिष में अपनी रुचि और गहरे ज्ञान के बारे में बताता रहा जब तक कि उनके प्रतीक्षित रेल की सूचना नहीं हुई।
मुझे यह दृश्य अजब लगा। लगा कि क्या बात है! और आश्चर्य कि तस्वीर को अब ध्यान से देखने के बाद एक नितांत नई और उतनी ही ताकतवर गुत्थी बनती नजर आई – पिछे बैठा प्रेमी युगल। कौन नहीं जानता कि करनाल जैसी छोटी जगहों पर प्रेम करने वालों के लिए ऐसी सुखद मुलाकात परिकल्पना या गप्प होती है।
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