सुबह सुबह बस स्टॉप पर कहीं नहीं जाने के लिए खड़े
होने की बहुत सी वजहें हो सकती हैं मसलन ये कि यह
क्रम बदस्तूर पिछली कई सुबहों से जारी है और इस
निरंतरता में मिल गया है कोई ऐसा अर्थ जो जीवन
की लगातार जारी प्रक्रिया में और कहीं संभव नहीं था.
सुबह सुबह बस स्टॉप पर कहीं नहीं जाने के लिए खड़े होने के मामले में ऐसा भी
हो सकता है कि यह पूरी रात लगातार खड़े रहने के बाद के सुबह की स्थिति हो और
खड़े होने वाले का साथ रात के विस्तृत वीरान और अँधेरे के सिवाय किसी मकान के कमरे से बमुश्किल पहुँच रही एक टुकड़ा रौशनी और बलगम से जकड़ी लम्बी लम्बी खांसियों ने दिया हो.
इसकी एक वजह के तौर पर यह भी सोचा जा सकता है कि
मेहनत और पसीने से कमाई शुरू करने वाला कोई पूंजीपति
सामने की सड़क पार वाले विशालकाय घर और पूंजी के रूप
में अपनी पत्नी और संतानों के असुरक्षाबोध से ग्रस्त रात भर
उनकी रखवाली किया हो अथवा अपनी पत्नी, बेटे और बहुओं
द्वारा खुद को घर में पडी एक गैरज़रूरी चीज़ मान लिए जाने
की उपेक्षा में पूरी रात बस स्टॉप की खुली छत के नीचे खड़ा
खुद के किये को कोसता रहा हो.
ऐसा होने का एक और कारण यह भी संभव है कि खड़ा होने वाला सख्स
सूरज की रौशनी के प्रत्येक खुली जगह में बिखर जाने को दिन नहीं मानता और
खुद पर आरोपित दुनिया भर की मान्यताओं से ऊबकर वह अभी अभी सुबह
की सैर पर निकला हो.
और कोई इसलिए भी तो सुबह सुबह बस स्टॉप पर
खड़ा हो सकता है कि उसे किसी ऐसी जगह जाने
वाली बस का इंतज़ार है जहां अब दुनिया की कोई
बस नहीं जाती लेकिन चूंकि उसने किसी ऐसी ही सुबह
में एक बस से उस सफ़र को तय किया था इसलिए उसे
यकीन है कि वह सुबह कभी न कभी फिर से ज़रूर आएगी.
...............................................................श्रीकांत
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