बेहोशी के बाद होश आना एक पुनर्जन्म के जीवन की तरह है
बेहोशी के बाद बेहोशी के पहले की याददाश्त का धीरे धीरे वापस
आ जाना पिछले जन्म की विरासत को बदस्तूर अगले जीवन
तक लाये जाने जैसा है.
बेहोशी कि प्रक्रिया के दौरान अधिकतम चीज़ों का यथावत
रह जाना एक सुखद आश्चर्य भी हो सकता है लेकिन यह भी
संभव है कि बेहोशी के बाद के समय में बेहोशी के पहले की
याददाश्त कभी वापस न आती हो और बेहोश होने वाला तमाम
दूसरी मान्यताओं की ही तरह बेहोशी की घटना को अपने अतीत से
जुड़ा मानने लगे और पृथ्वी पर सृष्टि के इतिहास की अनेक
व्याख्याओं की तरह उसके मस्तिष्क ने भी अपनी बेहोशी
के पहले के जीवन की एक कहानी गढ़ ली हो और इस अचानक
गढ़े तिलिस्म में पूरी दुनिया सहायक की भूमिका निभाने
लगी हो. कुछ नहीं बदलने का बोध एक अनिवार्य भ्रम भी संभव
है जैसा कि रेटिना पर बने उलटे प्रतिबिम्ब को मस्तिष्क द्वारा हर बार
सीधा देखे जाने की स्थिति में होता है.
बेहोशी संभावनाओं का एक आकाश भी है जिसके भीतर सबसे
सुखद चीज़ प्रेम नहीं है. बेहोशी की दुनिया के भीतर हमारी
भाषाएं और व्याकरण अनावश्यक चीज़ें हैं और संभव है
कि वहाँ अभिव्यक्ति का कोई माध्यम अपनी सदियों जारी
विकास प्रक्रिया को जल्द ही पूरी कर लेने वाला हो जिसके बाद बेहोशी के
भीतर के जीवन कि दिलचस्प कथाएँ, इतिहास, मिथक और
तकनीकों पर बहस और शोधों का सिलसिला चले बेहोशी के बाहर
के जीवन में ब्रह्माण्ड के एक ही ग्रह पर खोजे गए जीवन के इन दोनों स्तरों
में सूचनाओं और संचार का विकास भी जारी हो जाए और दोनों के
बीच संस्कृतियों, रहन सहन और एक दूजे के
इतिहास से उठाए प्रेरक प्रसंगों की अदला बदली भी.
इन दोनों के सिवाय एक तीसरी दुनिया के बारे में भी सोचा जा
सकता है जो मृत्यु है और जिसके भीतर बेहोशी की दुनिया के भीतर के
रहस्यों से कई गुना अधिक संभावनाएं अब तक छुपी हुई हैं
लेकिन बेहोशी और मृत्यु के बाहर के जीवन से दोनों को एक
साथ देखने पर इनमें ढेर सारी चीज़ें एक जैसी लगती हैं.
एक संभावित निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है
मृत्यु एक लम्बी बेहोशी है.
(कोट की हुई कविता पंक्ति मशहूर कवि आलोक धन्वा की कविता “सात सौ साल पुराना छन्द” से है।)