Monday, December 21, 2009

बेहोशी

नये साथियों की सूची में यह होनहार नाम - श्रीकांत दुबे। बाईस की कुल उम्र। हरेक ईमानदार की तरह, पहला प्रेम ही इनके जीवन की पहली रचना हुई। गोरखपुर से बनारस से दिल्ली से अभी बंगलौर। ‘’पूर्वज” कहानी से और साथ ही अपने शानदार व्यवहार से भरपूर चर्चित। पॉच वर्षों के सघन और उर्जावान प्रेम के बाद एक दिन अचानक प्रेमिका को घर की याद आ गई और उसके बाद हमने, हम सबने, किस्से कहानियों में नहीं, असल जीवन में प्रेम का घातक असर देखा। “पहला प्रेम जब राख हो गया खुद को बचाया उस साँवली नृत्य शिक्षिका ने..दंगे के खिलाफ दिखी वह प्रभातफेरी में..” की जीवनदायिनी तर्ज पर श्रीकांत ने खुद को कविता और नौकरी के सहारे बचाया। हम सब उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
बेहोशी
एक छोटी मृत्यु है बेहोशी.

बेहोशी के बाद होश आना एक पुनर्जन्म के जीवन की तरह है
बेहोशी के बाद बेहोशी के पहले की याददाश्त का धीरे धीरे वापस
आ जाना पिछले जन्म की विरासत को बदस्तूर अगले जीवन
तक लाये जाने जैसा है.

बेहोशी कि प्रक्रिया के दौरान अधिकतम चीज़ों का यथावत
रह जाना एक सुखद आश्चर्य भी हो सकता है लेकिन यह भी
संभव है कि बेहोशी के बाद के समय में बेहोशी के पहले की
याददाश्त कभी वापस न आती हो और बेहोश होने वाला तमाम
दूसरी मान्यताओं की ही तरह बेहोशी की घटना को अपने अतीत से
जुड़ा मानने लगे और पृथ्वी पर सृष्टि के इतिहास की अनेक
व्याख्याओं की तरह उसके मस्तिष्क ने भी अपनी बेहोशी
के पहले के जीवन की एक कहानी गढ़ ली हो और इस अचानक
गढ़े तिलिस्म में पूरी दुनिया सहायक की भूमिका निभाने
लगी हो. कुछ नहीं बदलने का बोध एक अनिवार्य भ्रम भी संभव
है जैसा कि रेटिना पर बने उलटे प्रतिबिम्ब को मस्तिष्क द्वारा हर बार
सीधा देखे जाने की स्थिति में होता है.

बेहोशी संभावनाओं का एक आकाश भी है जिसके भीतर सबसे
सुखद चीज़ प्रेम नहीं है. बेहोशी की दुनिया के भीतर हमारी
भाषाएं और व्याकरण अनावश्यक चीज़ें हैं और संभव है
कि वहाँ अभिव्यक्ति का कोई माध्यम अपनी सदियों जारी
विकास प्रक्रिया को जल्द ही पूरी कर लेने वाला हो जिसके बाद बेहोशी के
भीतर के जीवन कि दिलचस्प कथाएँ, इतिहास, मिथक और
तकनीकों पर बहस और शोधों का सिलसिला चले बेहोशी के बाहर
के जीवन में ब्रह्माण्ड के एक ही ग्रह पर खोजे गए जीवन के इन दोनों स्तरों
में सूचनाओं और संचार का विकास भी जारी हो जाए और दोनों के
बीच संस्कृतियों, रहन सहन और एक दूजे के
इतिहास से उठाए प्रेरक प्रसंगों की अदला बदली भी.

इन दोनों के सिवाय एक तीसरी दुनिया के बारे में भी सोचा जा
सकता है जो मृत्यु है और जिसके भीतर बेहोशी की दुनिया के भीतर के
रहस्यों से कई गुना अधिक संभावनाएं अब तक छुपी हुई हैं
लेकिन बेहोशी और मृत्यु के बाहर के जीवन से दोनों को एक
साथ देखने पर इनमें ढेर सारी चीज़ें एक जैसी लगती हैं.

एक संभावित निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है
मृत्यु एक लम्बी बेहोशी है.
..................................श्रीकांत
(पूर्वज कहानी तद्भव 16 में प्रकाशित)
(कोट की हुई कविता पंक्ति मशहूर कवि आलोक धन्वा की कविता “सात सौ साल पुराना छन्द” से है।)

Thursday, December 17, 2009

कैसे बताऊँ राज-ए-इश्क....

एक बार फिर करनाल रेलवे स्टेशन।

यह तस्वीर पोस्ट करते हुए एक संकोच मन में लगातार बना रहा कि इसे इजहार का अश्लील नमूना ना समझ लिया जाये और मेरे इस प्रयास को एक उच्श्रृंखल व्यवहार। जबकि मेरा यह भरपूर मानना है कि और जो भी हो, यह कहीं किसी कोने से अश्लील इजहार नहीं है। साथ ही यह भी, बचपन से ऐसी लिखावटों को पढ़ना ठीक लगता है। इजहार के ये तरीके आकर्षण लिए रहे हैं। मालगाड़ियों के लाल डब्बों पर लिखी ये इबारतें अक्सर पढ़ने को मिलती हैं। कहीं कहीं तो गाँव कस्बे का नाम भी दर्ज मिलता है। लड़के और लड़की का नाम भी। मैं सोचता हूँ कि इतनी मेहनत करने की हिम्मत जुटाना भी एक बात है। जिस किसी आशिक ने इसे लिखा होगा उसे जब कभी इसकी याद आती होगी वो, शायद, मुस्कुराता होगा और पुन: एकाध बीते ख्यालों से गुजर कर अपने काम में लग जाता होगा। दक्षिण मध्य रेल के इस डब्बे पर लिखी यह इबारत कहाँ कहाँ घूम आई होगी।

Monday, December 14, 2009

करनाल रेलवे स्टेशन पर कुछ गुत्थियाँ


यह तस्वीर करनाल रेलवे स्टेशन पर ली गई है। उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी है, मेरे सामने वह किताब खरीदी जो उसके हाथ में है। दोनों पुलिस वाले उतनी देर उस रस्सी, और उस रस्सी में बँधे आदमी, को थामे खड़े रहे जब तक की उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी है, अपनी मनपसन्द किताब नहीं खरीद ली। वो किताब ज्योतिष की है। उस आदमी ने, जिसके हाथ में हथकड़ी लगी हुई है, पुलिस वालों को कुछ देर ज्योतिष में अपनी रुचि और गहरे ज्ञान के बारे में बताता रहा जब तक कि उनके प्रतीक्षित रेल की सूचना नहीं हुई।
मुझे यह दृश्य अजब लगा। लगा कि क्या बात है! और आश्चर्य कि तस्वीर को अब ध्यान से देखने के बाद एक नितांत नई और उतनी ही ताकतवर गुत्थी बनती नजर आई – पिछे बैठा प्रेमी युगल। कौन नहीं जानता कि करनाल जैसी छोटी जगहों पर प्रेम करने वालों के लिए ऐसी सुखद मुलाकात परिकल्पना या गप्प होती है।

Wednesday, December 9, 2009

महापुरुष का कथन और पराजित प्रेम

मैं किसी ईश्वर की तलाश में हूँ

जिस किसी ने कहा ईमानदार स्वप्न देखने वालों की मदद चाँद तारे आदमी आकाश सूरज बयार सब करते हैं गलत कहा/ प्रेम करते हुए मुझे अपनी प्रेमिका से भी यह आशा थी आशा ही रही औरों की तो बात क्या/ तुम्हे खोने के डर से थरथराता रहा और तुम थी कि मुट्ठी की रेत थी/ डर था मेरे स्वप्न को बेईमान कह दिया जायेगा और तुम वो पहली थी।

तुम कब थी ही यह बताना कठिन है पर जब थी मैने ठान रखा था तुम्हारे होठों के संतरें वाले रँग मैं कौमी रंग बनाउंगा उन संतरों के बाग मशहूर हो जायेंगे और मेरी प्यास अमिट/ मेरी अमिट प्यास की खातिर मेरे स्वप्न के भव्य चेहरे पर लम्बी नीली नदी का दिखता हुआ मखमली टुकड़ा है।
(बाकी बची नस सरस्वती की तरह ओझल)
(ठान अब भी वही है और तुम ‘अब भी’ हो)

हम ऐसे जुड़े कि निकलना बिना खरोंच के सम्भव ना था/ अपनी खरोंच से पहले यह मानना नामुमकिन था कि आत्मा से खून रिसता है/ तुम्हे मेरी आवाज से डरने की कोई वजह नहीं जैसे मेरे लिये तुम्हारी खुशी से विलग कोई मकसद नहीं/

डर है तुम्हे बजती हुई मेरी नवासी चुप्पियाँ ना सुनाई पड़े

एक कम नब्बे की संख्या, एक जिप्सी, एक बस और एक ही रात/ क्या खुद प्रेम को पराजित होने के लिये इन सबका ही इंतजार था/ पसन्द नापसन्द के बीच कोई झूला नहीं होता/ कोई कविता नहीं आई मुझे बचाने/सूरज देर से निकला/ मैने नींद से टूट जाने की प्रार्थना भी की/

प्रेम मकसद है पूरा का पूरा/ पर खरोंच भी एक गझिन काम है/ दुख देता हुआ/ समुद्र सी फेनिल यादें/ दरका हुआ आत्मविश्वास/ मांगता है
कुछ अजनबी ईंट,
अपना ही रक्त,
और उम्र से लम्बी उम्र।

-सूरज

Wednesday, December 2, 2009

लॉटरी की वापसी

ये खबर अभी किसी याद की तरह ताजा है कि कांग्रेस सरकार “जनहित” में लॉटरी की शुरुआत फिर से करने वाली है, इससे जुड़ा कोई महत्वाकांक्षी बिल संसद मे पेश करने वाली है। जिन राज्यों मे लॉटरी का कारोबार चलता है कभी उन लॉटरियों का विज्ञापन देखिये, वो कुछ इस तर्ज पर होते है:- महालक्ष्मी लॉटरी, खेले आप, विकसित होगा राज्य। ऐसे ऐसे तमाम विज्ञापन। उदाहरण के लिये अपना महाराष्ट्र। वहॉ ऐसे खेल इन्ही विज्ञापनों के सहारे फल फूल रहे हैं। इस खेल के पीछे कोई ना कोई मंत्री या दूसरा रसूखवाला ही क्यों होता है ये जान लेना हमारे आपके बस का नहीं है। हम तो इतने लाचार है कि चाह ले तब भी बर्बादी के इस खेल की पुन: वापसी रोक नहीं सकते।

पर क्या हम यह भी नहीं सोच सकते कि अपने जीवन मे हमने लॉटरी से जुड़ा क्या खेल देखा है? हमारे आपके जीवन में ऐसे पात्र जरूर हैं जिन्हे शराब या पैसे की तरह लॉटरी का नशा है या था।

लॉटरी से तबाह होने वालों को अपनी आंखो से देखा। मेरा एक मित्र था जिसने मुझे लॉटरी के नम्बर पकड़ना सिखाया था। उसका दिमाग इसमें खूब चलता था। बचपन में हम लॉटरी का स्टाल देखते थे और तमाम फंतासियॉ बुना करते थे। पर डर लगता था। उस उस समय कभी आजमाया नहीं और बाद में किस्मत जैसी चीजों का कोई मह्त्व नहीं रहा।

लॉटरी आपको कैसी लगती है? क्यों ना लॉटरी पर आपकी राय हम जाने? क्यों ना हम आपके शहर/कस्बे के उन लोगों के बारे मे जाने जो राज्य का विकास कर रही लॉटरी के चक्कर में बर्बाद हो गये और अपने आश्रितों को भी सड़क पर ला दिया? उनके बारे में जानना सुखद होगा जो लॉटरी से आबाद भी हुए, भले ही वो लाखों में एक क्यों ना हों?

अपन इतना तो कर ही सकते हैं कि इसे सम्भाल कर रखेंगे और जब इस वैज्ञानिक समझदारी वाले देश में जुये(लॉटरी) का जानलेवा खेल अखिल भारतीय स्तर पर शुरु होगा तब उन व्यवसायिओं को इसका पुलिन्दा बना कर भेजेंगे।