Saturday, August 14, 2010

गोदान की आत्मा का सर्वोत्तम अनुवाद है पीपली [लाईव]

इस अच्छी फिल्म में होरी एक पात्र है. ईंट के भट्ठे के लिये बन्जर जमीन से मिट्टी खोदकर बेचता है. पूरी फिल्म में गड्ढा गहरा होता जाता है सिर्फ इसलिये कि अंत में होरी उसी गड्ढे में मर जाएगा. पूरी फिल्म में एक ही डायलॉग होरी के जिम्मे आया है जिसमें वो अपना नाम बताता है: होरी. एक शब्द उसे कहानी का प्रमुख पात्र बना देता है. होरी नाम का शख्स राकेश नाम के चरित्र में इतने संजीदा बदलाव लाता है कि नत्था के बदले खुद ही मारा जाता है और एक असम्वेदनशील एंकर/रिपोर्टर नन्दिता मलिक एक वाक्य में (‘राकेश फोन नहीं उठा रहा’) अपने मन-मष्तिस्क से ‘डिलीट’ कर देती है.

बिना किसी लाग लपेट के सुनिये: पीपली लाईव इस साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है. मौलिक भी. फिल्म टीम के ‘कंसंर्स’ कितने गहरे हैं इसका अन्दाजा एक ही वाक्य के लगातार दुहराव से पता चलता है: भारत की सत्तर फीसदी जनता गरीब है. इस वाक्य के अनेक अर्थार्थ फिल्म में इतनी बार दुहराये गये हैं कि ये पंक्ति कविता की गम्भीर शक्ल ले लेती है.

भारतीय ग्राम्य जीवन की दुश्वारियों को इस फिल्म ने आत्मा की तह तक जाकर उठाया है. यह एक ऐसी ‘हिन्दी’ फिल्म है जो पिछले दिनों आये एक चुटकुले(आप जरूर उसे बड़ी खबर कहेंगे) को नोचकर नंगा कर देती है जिसे अंग्रेजी और हिंग्रेजी के अखबारों ने मशरूफियत से छापा: भारत में अमीरों की संख्या गरीबों से ज्यादा. भारत के गाँव के समानान्तर यह फिल्म एक अन्य महत्वपूर्ण विषय उठाती है और वह है: असहाय और दयनीय अवस्था को जा पहुंचा मीडिया तंत्र.

यह फिल्म इस खातिर हमेशा याद रखी जायेगी कि इसने आज के तारीख में जो हाल मीडिया का है उसे सच्ची सच्ची उकेरा. हाय री मीडिया ! कमजोर, खस्ताहाल और झूठी खबरों के सहारे जी रही मीडिया. जब तक प्रशासन, सरकार और राजनीतिक पार्टियाँ नत्था के खेल में शामिल नहीं होतीं तब तक तो लगता है कि एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास अकूत ताकत है, वो कुछ भी कर सकती है. परंतु जब मामला गम्भीर होता दिखता है तो सरकार का एक आदेश आता है: मीडिया को दूर रखो और क्या आप यकीन करेंगे इस एक मात्र वाक्य के बाद फिल्म में मीडिया का हाल पिद्दी के शोरबे के बराबर भी नहीं रहता. हद है! तब लगता है कि इतने उंचे उंचे मीडियाकर्मी इसी बात से खुश हो लेते हैं कि उनके कहने से रेलवे में उनका वेटिंग टिकट कन्फर्म हो जाता है. व्यक्तिगत उपलब्धियों जैसे सस्ते या मुफ्त का फ्लैट या घर पा जाना ही अपने जीवन की चरम उपलब्धि मानने वाले मीडियाकर्मी अपनी कमजोरी जानने तथा उसे दूर करने के लिये भी इस फिल्म को जरूर देखें. यही इनकी खुशी के लिये काफी है कि नत्था के ट्टटी का फुटेज इनके पास है. ये कद्दू में ओम को सबसे उर्जावान विषय मानते हैं. प्रेस कान्फ्रेस में उपहार मिलने की लत से जूझना भी इन्हे कठिन लगता है.

फिल्म के एक दृश्य से कितना कुछ स्पष्ट हो जायेगा: एक नेता नत्था के घर आता है – भाई ठाकुर. वो घर के बाहर सारे गूंगे कैमरों के सामने उसे धमकी देता है कि दो दिन के भीतर उसने आत्मह्त्या नहीं किया तो भाई ठाकुर नत्था के बड़े भाई बुधिया की हत्या कर देगा. वो दोनो डरे हुए हैं. कैमरामैन दूर से इस बात चीत के दृश्य को शूट करने में लगे हैं पर उस एक आदेश के बाद मीडिया वालों को इतना दूर फेंक दिया गया है कि उन तक आवाज आ ही नहीं सकती और इसी का फायदा भाई ठाकुर जैसे लोग उठाते हैं. वो मीडियाकर्मियों के पास आकर ठीक उल्टा बयान देता है कि नत्था नहीं मरेगा और वाह री मीडिया! जो इस झूठ को बिना किसी पड़ताल के ‘एक्सक्लूसिव’ बना देता है.
इतना कुछ कहते हुए भी मैं आपको वही बता रहा हूँ जो कुछ इस फिल्म में मीडिया को लेकर सकारात्मक है. आगे आप खुद होशियार हैं..

सबसे जरूरी बात सबसे आखिर में. फिल्म का नायक पात्र स्त्री है. नत्था की पत्नी: धनिया. जीजिवषा का मूर्त रूप. उसके ही उलाहनों तानों से डर कर घबराकर घर के पुरुष कर्ज वापसी के प्रयास शुरु करते हैं. पूरी फिल्म में यह औरत कुछ ना कुछ काम करते हुए दिखाई देती है. यहाँ तक कि जब अपने पति के मृत्यु के बारे में जानकर उदास होना सबसे अनिवार्य उम्मीद होती वहाँ भी वह अपने जेठ को पानी दे रही होती है, अपने बच्चे के बटन टॉक रही होती है.

फिल्म देखते हुए आप खूब हंस रहे होते हैं पर फिल्म खत्म होते ही आप अपनी हंसी को ही राकेश का हत्यारा मानने लगते हैं और अगर ठीक उसी वक्त एकांत मिल जाये तो आप रोने भी लगें.

एक बेहतरीन फिल्म के लिये अनुषा रिजवी तथा महमूद फारूकी को बधाई.

फिल्म की रीलिजिंग डेट भी क्या ही खूब है. पन्द्रह अगस्त के पास.(हाल फिलहाल में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एक सरकारी विज्ञापन की माने तो भारत का गणतंत्र दिवस). इस फिल्म को जरूर देखिये.

Saturday, August 7, 2010

माफी क्या होती है? (अपशब्द विवाद के बहाने)

इत्तिफाकन यह पोस्ट भी एक साहित्यिक बुजुर्ग को ही सम्बोधित है. विभूति नारायण राय को. पर इस पोस्ट में जिनसे घृणा बरती गई हैं वो हैं दोमुहे लोग जिन्होने विभूति को डिफेंड करने की कोशिश की और विभूति को इस अन्धेरे में रखा कि कहीं ना कहीं वो सही हैं.

अपशब्द के इस्तेमाल के बाद माफी मांग ली गई है ऐसे जैसे बड़ा भाई छोटी बहन की शादी किसी शराबी-जुआरी से करा, बहन का विश्वास नष्ट करके माफी मांग ले. अगर गलती करने का अधिकार सबको है तो सजा पाने की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिये. गलती के हिसाब से ही सजा का प्रावधान है. लालची लोग जितनी मर्जी खुद को नीचे गिरा लें पर बगैर वाजिब सजा के लगातार गलतियाँ करते जाने के पक्ष में इस्तेमाल सूक्तियाँ और कवितायें तो क्या, बड़े बड़े तर्क भी ओछे पड़ जायेंगे.

इस माफीनामे पर मेरा सवाल बस इतना है : जिस तरीके से भारतीय विश्वविद्यालयों का संघीकरण हो रहा है और वहाँ के अबुद्ध शिक्षक आर.एस.एस. की शाखाओं में जाना अपने जीवन का चरम उद्देश्य मानने लगे हैं वैसे मे कल को कोई कुलपति जातिविरोधी और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे दे और जनता में आक्रोश भर दे तो क्या एवजी में माफी काफी होगी? और क्या वो चालाक कुलपति इसे तर्क के तौर पर नहीं उछालेगा कि जब एक कुलपति को कुंठित-बयानबाजी के लिये माफ किया गया तो मुझे क्यों नहीं? मैं नहीं समझता कि ऐसा करते हुए वो गलत कह रहा होगा?

विवाद से परिचित लोगों को यह जानना चाहिये कि विभूति जी द्वारा माफी किस ऐंठ के साथ मांगी गई है? जितना दु:ख उस अपशब्द के इस्तेमाल का है उतना ही दु:ख इस लाचारी का भी कि कोई इंसान कुछ संस्थानों/संगठनों के सहारे सत्ता को कैसे अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेता है और आम अमरूद साहित्यिक जनता ठगा महसूस करती है. वरना वृन्दा करात, जो रामदेव की दवाईयों के खिलाफ आग उगल रही थी, ऐसे ही चुप नहीं हो गई होंगी. अब तक जिम्मेदारी का बोझ सम्भाले एक संगठन खुलेआम कुलपति के बचाव का रास्ता बताता है. और जिस तरह इन्दिरा गान्धी के जमाने में भारत में हो रही हर बारिश और सूखे का दोषी पाकिस्तान था उसी तरह धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में बयान देने वाले लोग ईश्वर की प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके है, जो कभी गलती नहीं करता.

विभूति नारायण राय को यह इंटरव्यू वापस ले लेना चाहिये. बाकायदा घोषित करके. तब उनकी माफी का कोई मतलब होगा. विभूति जी, आज आप जो भी है वो पाठकों की बदौलत हैं वरना आपके आई.पी.एस होने के नाते जो लोहे स्टील आदि के .... आपके इर्द गिर्द हैं, जो आपके इस अपशब्द प्रयोग के पक्ष में तमाम तर्क दे रहे हैं वे अधम नीच लोग आपके रिटायर होते ही किसी दूसरे आई.(पी.एस या ए.स) को पकड़ लेंगे. यह मैं सबसे न्यूनतम की बात कर रहा हूँ, विभूति जी. आगे आप जाने भी गये अगर कभी इतिहास में तो अपनी ‘साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ या ‘शहर में कर्फ्यू’ के लिये ही जाने जायेंगे, कुलपतीत्व के लिये नहीं.


मैं समझता हूँ कि इस्तीफे या बर्खास्तगी से ज्यादा बड़ी बात होगी जब ये खुद से ही सामने आये और इस साक्षत्कार को वापस लें. ‘डिसऑन’ करें. यह कुलपति के बतौर एक बड़ी नजीर पेश होगी वरना यह गुमान तो उन्हे छोड़ ही देना चाहिये कि वे अपने पक्ष में तर्क देकर खुद को सही साबित कर ले जायेंगे. ऐसा हो नही सकता क्योंकि ऐसा है ही नहीं. हिन्दी भाषा की जितनी लेखिकाओं को मैं जानता हूँ वे ऐसी हरगिज नहीं हैं. उन्हे अपने लिखे शब्दों पर ही इतना भरोसा है और होगा कि दूसरे किन्ही हथकंडों की जरूरत ही नहीं.

गलती हो जाती है पर उसे स्वीकारने से आपका कद बढ़ेगा. आपको इस बात के लिये माफी नहीं मागनी चाहिये कि आपकी बात से किसी को ठेस पहुंची है. अपनी भाषा से आप किसी को ठेस पहुंचा सके इसके लिये बहुत विनम्रता और भाषा के रियाज की जरूरत होती है. यह जो लेखिकाओं या लेखको का गुस्सा है यह ठेस से नहीं आपकी गलती से उपजा है. इसलिये महोदय आप अपने कहे शब्द के लिये माफी मांगिये.

नया ज्ञानोदय पत्रिका की टीम को भी इस आशय की घोषणा करनी चाहिये कि अगले संस्करण से यह इंटरव्यू बाहर हो रहा है या बाजार से पत्रिका वापस मंगाई जा रही है. इसके लिये पर्याप्त प्रयास होने चाहिये.

मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि बेवफाई की सजा माफी कत्तई काफी नहीं होती है. हो सकता है हम अपनी कमजोरी के कारण माफ करने के अलावा कुछ ना करने पायें क्योंकि हर वो आदमी(स्त्री या पुरुष) जो बेवफाई या विश्वासध्वंस करता है कभी यह मानता ही नही कि उससे गलती हुई है( बेवफा प्राणी और कुछ हो ना हो मौकापरस्त जरूर होता है, नौकरी या दूसरे लालच के लिये कहीं भी लोट या बिछ जाने वाला) और विभूति जी ने अपने पाठको तथा मित्रों का विश्वास तोड़ा है, भले उनके मित्र उनसे लाभान्वित होने की आशा में कुछ कह न रहे हों.

इस पूरे मसले ने जो महत्वपूर्ण पर्दाफाश किया है वो है सम्बन्ध और साहित्य. साहित्यिक दुनिया इतनी संकुचित हो चुकी है कि हर आदमी एक दूसरे को व्यक्तिगत तौर पर जानता है. पर जानने का यह मतलब भी निकाल लिया गया है कि अगर हम आपकी किसी बात का विरोध करें तो आपके पूरे जीवन का विरोध कर रहे हैं. साहित्य से लोकतंत्र गायब हो रहा है. मतलब अगर मैं गलत हूँ तो जो मेरा घोषित मित्र है वो मेरे पक्ष में बोलेगा और जो शत्रु है वो विपक्ष में. मुझे आश्चर्य हुआ जब लोग विभूति जी के वकालत में आगे आये. उन दोमुहों ने दुहरा नुकसान किया. पहला मैं उपर बता चुका हूँ और दूसरा यह कि कहीं ना कहीं वे विभूति को यह विश्वास दिलाने में कामयाब हुए कि आप सही हैं. इसलिये ही उन्होने शुरुआती जिद में अपने आप को डिफेंड किया. हमें सम्बन्धो और उससे मिलने वाले चन्द पुरस्कारों वाली सोच के दायरे तोड़ने चाहिये. इससे अपना कम अपने उस मित्र का ज्यादा भला होगा जिसका शालीन विरोध हम कर रहे होंगे.

Tuesday, July 13, 2010

लोर्का की कविता: प्रेसिओसा और हवा का झोंका

फेदेरिको गार्सिया लोर्का: विश्व कविता का अद्वितीय नाम. (5 जून 1898 – 19 अगस्त 1936) जितनी कम उम्र में कविता की 14 किताबें, 18 नाटक और 'ट्रिप टू द मून' फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी. इनकी मृत्यु पर कहने वाले तो बड़ी कला से बहुत कुछ कह जाते हैं पर जिस तरीके से इनकी हत्या हुई, उसे जानकर यह अन्दाजा भी लगाना मुश्किल है कि यह महाकवि उन दिनों कैसे एकांत और निर्वासन में धकेल दिया गया होगा. मैं साथियों से यह निवेदन करूंगा कि इनकी जीवन गाथा एक बार जरूर पढ़ें. अन्धराष्ट्रवाद हमसे क्या क्या छीन लेता है...

मेरे लिये यह बेइंतिहा खुशी की बात है कि इतने महान कवि की कविता अपने ब्लॉग पर लगा रहा हूँ..

1924 – 27 के बीच लिखी इस कविता की नायिका 'प्रेसिओसा' दुनिया के पहले आधुनिक उपन्यासकार कहे जाने वाले 'मिगेल दे सर्वान्तेस' की रचना 'ला गितानिल्या' की एक पात्र है. वह एक किशोर उम्र की खूबसूरत बंजारन है जो एक बुढ़िया के साथ रहती है और उन्मुक्त प्रेम करती है. वैसे 'प्रेसिओसा' का शाब्दिक अर्थ 'बहुमूल्य' भी होता है.



प्रेसिओसा और हवा का झोंका

(दामासो आलोंसो के लिये)

अपनी डफली बजाती हुई
चली आ रही है प्रेसिओसा,
कल्पवृक्षों से सजी,
चमकती रहगुजर से।
दूर उठी बहुत पुरानी कोई धुन और
फैल जाती है खामोशी धुन्ध की मानिन्द
मछलियों की गन्ध से लिपटी रात में
मचलता हुआ समुद्र
गीत गाता है.
पर्वतों की धवल चोटियों की सुरक्षा में
उनींदे वे सिपाही, वहाँ
जहां अंग्रेजों की रहनवारी है।
समुद्री बंजारे
बिताने के लिये
अपना खुश और खाली वक्त
बनाते हैं कुंज,
समुद्री शंख
और चीड़ की हरी टहनियों से।
....................................................................................

अपनी डफली बजाती हुई
आती है प्रेसिओसा।
उसे देखते ही उठ बैठता है
कभी न सोने वाला हवा का आलसी झोंका।

आशिर्वचनओं की बरसात करने वाले,
बांसुरी की मधुर तान में खोये,
नग्न,
संत किस्टोफर,
देखते हैं उसे, अचानक.

"लडकी, मुझे उठाने दे अपने वस्त्र
ताकि देख सकूं तुम्हें।
मेरी बुजुर्ग उंगलियों पर खिल जाने दे
अपने गर्भ का नीला फूल।"

प्रेसिओसा फेंक देती है अपनी डफली
और भागती है बेतहाशा।
हवा का शिकारी झोंका करता है पीछा
जलती तलवार लिये।

समुद्र समेटता है अपनी फुसफुसाहटें।
पीले पड़ जाते हैं जैतून के सदाबहार पेड़।
गाने लगती हैं
परछाईं की बाँसुरी
और बर्फ की सपाट सिल्लियां


प्रेसिओसा,
भाग, प्रेसिओसा
कि तुम्हें धर लेगा हरे रंग का झोंका
भाग, प्रेसिओसा
भाग !
देख, किधर से आया वो
अपनी लपलपाती जीभ के साथ
ढलती उम्र का विलासी संत।

.....................................................................................

प्रेसिओसा
भयभीत,
घुसती है उस घर में,
चीड़ के पेड़ों के पार
जहां रहता है वह अंग्रेजी राजदूत।

उसकी चीख से आतंकित
निकलते हैं तीन रक्षक,
उनके लबादे चुस्त,
टोपियां उनकी मंदिरों जैसी।

अंग्रेज उसे देता है
दूध का गर्म प्याला,
और पैमाने भरा ज़िन
प्रेसिओसा जिसे नहीं पीती।

और जब वह सुना रही होती है रोकर,
उन्हें अपनी दास्तान
हवा का गुस्सैल झोंका,
काटता रहता है
स्लेट की खपरैलें।
.............................

श्रीकांत का आभार जो इस जटिल कविता का सरस अनुवाद किया! यह सूचित करना जरूरी है कि लोर्का की कविताओं का अनुवाद कठिनतम से भी कठिन कार्य है. यहाँ तक कि उन्हे पढ़ना भी. इनके बिम्ब और काव्य संरचना महान कवि नेरुदा की तरह आसान नहीं होती. अभी जो युवा सम्वाद चला उसमें जब श्रीकांत अपनी राय रख रहा था तो कुछ निखट्टू इसे यह सलाह दे दे के मरे जा रहे थे कि सिर्फ और सिर्फ (कुछ निर्जीव) लिखने पढ़ने पर ही ध्यान दो. अब जब यह सकारात्मक सम्वाद करते हुए महफिल लूट लाया और इतनी जटिल कविता का अनुवाद भी कर लाया तब भी वे, सलाहों के देवता, अभी फेसबुक फेसबुक ही खेल रहे हैं. श्रीकांत का अनुवाद कार्य लगातार जारी है.

Thursday, July 8, 2010

‘शापित एकांत’ सीरिज

यह सूरज की कविता है. उसने “शापित एकांत” नाम से कविताओं की यह सीरिज शुरु की है. हालांकि एकांत-वेकांत मुझे भी अच्छे नही लगते पर जो नाम उसने चुना है, वो ही कभी इसे परिभाषित भी करेगा.


अलविदा के लिये


अलविदा के लिये उठते हैं हाथ
थामने हवा में बाकी बची देह-गन्ध
नमक के कर्जदार बनाते पसीने और
याद से भींगे होठों के चूम
(या उनकी भी याद ही)

अलविदा के लिये
तुमसे भी जरूरी हों कई काम
(?)
झूठ है सफेद जो बोले जाने हैं
यादें चींटियों की कतार से लम्बी
भूलना जिन्हे जीवन लक्ष्य
होगा एकसूत्रीय

वापसी की रूखी धुन शामिल होती
हो अलविदा में तो आता है रंग
आती है गूँजती पुकार

सोमवार को धकेल
आने को आतुर रहता है
मेरे जीवन का हर मंगलवार
सारे बुध करते रहते हैं मंगल के
बीतने का बोझिल इंतज़ार

अलविदा, अलविदा

डोलते हाथों और काँपती उंगलियों से पहले
अलविदा के वक्त चाहिये एक मनुष्य
जीवन में शामिल
जिसकी आंखों में बचे रहे मेरे हाथ
बचे रहे कुछ सिलसिले जो उसी से
सम्भव हुए
बचा रहूँ मैं
इंसान की तरह


कवि से सम्पर्क: soorajkaghar@gmail.com

Friday, July 2, 2010

कुम्भकर्ण का विरोध पत्र

तहलका के पठन पाठन अंक में साहित्यिक संसार के आदरणीय बुजुर्गों ने जिस प्रतिबद्धता और जिस ताकत से समूची युवा उम्र, समूची युवा रचनाशीलता को नकारा है वो दु:खद है. पहले लगा कि जीवन में कुछ भी नही करने वालों की राय मान ले और इन सम्माननीय बुजुर्गों की बातों को दरकिनार कर अपने में मगन रहें. फिर अपना ही मन धिक्कारा कि क्या कोई भी कुछ भी बोल सुन के चला जायेगा और हम अपने व्यस्त और ‘महत्वपूर्ण’ होने के तथाकथित भ्रम के कारण चुप रहेंगे? यही सब सोच विचार कर मैने अपनी यह प्रतिक्रिया ‘तहलका’ को दी है. यह जानते हुए कि यही लोग गुरुजन हैं, इनसे ही सीखा है कि गलत का प्रतिरोध करो. खास कर ज्ञानरंजन जी और काशीनाथ जी की कहानियों से तो पढ़ने लिखने की शुरुआत ही हुई. पर जीवन कभी कभी ऐसे मुहाने पर ला छोड़ता है कि रास्ते चुनने पड़ते हैं. इसलिये ही यह विनम्र विरोध पत्र:

कुम्भकर्ण का विरोध पत्र

तहलका द्वारा साहित्य पर केन्द्रित अंक का स्वागत. साथ ही तहलका का आभार, जिसके जरिये हमें युवा कथाकारों की रचानाओं और रचनाशीलता पर हिन्दी कथाजगत के बुजुर्गों की महत्वपूर्ण राय तथा एक जैसे ‘सुविचार’ जानने को मिले. युवा पीढ़ी की आलोचना होनी चाहिये,अक्सर लोग यही करते हैं, पर क्या उस आलोचना की भाषा की कोई मर्यादा नही होनी चाहिये? बुजुर्गियत की अचूक और कुठाँव मार झेल रहे इन अग्रज कथाकारो की बात और भाषा को सच मान लें तो कोई तर्क नही बचता जिसे आधार बना कर युवा लिखते रहें. अगर दिनेश कुमार द्वारा सम्पादित उस लेख का भरोसा कर लें तो हम युवाओं को अब तक अपने लिखे के अपराध का प्रायश्चित करना होगा. तानाशाह बन जाने की इच्छा पाले इन बुजुर्गों की तमन्ना पूरी करने के लिये क्या कहानी लिखना छोड़ देना ही कामचलाउ सजा होगी या कहानी के इन जमींदारों के महल के आगे हमारे आत्मदाह ही पर्याप्त होंगे – इसे जब तक कोई पता लगाये, तब तक मैं इनके महान विचारों के दूसरे कोने अँतरे खंगालता हूँ.

विश्वनाथ जी का यह कहना कि नये रचनाकार एक जैसे रच रहे हैं, बहुत गहरे आशय देता है. इनके लिये काला अक्षर भैंस बराबर कहने की हिमाकत तो मैं नही कर सकता पर भैंस का ही उदाहरण लें तो कह सकते हैं सारी भैंसे,अपने झुंड में, हमारे लिये तो एक जैसी ही होती हैं पर जो ग्वाले हैं, जिन्होने अपना जीवन दूध व्यवसाय को समर्पित कर दिया है, जो बीसियों साल से अपनी साईकिल पर दूध के बाल्टे रामनगर से बनारस लाते है, रोज, बिला नागा, वो बन्धु दूर से देख कर ही बता सकते हैं कि अमुक भैस की क्या खासियत है और तमुक की क्या? यह दरअसल ‘इंवॉल्वमेंट’ कहलाता है. जैसा माहौल तैयार हो चुका है उसमें आसानी से त्रिपाठी जी मेरी बात का बुरा मान जायेंगे. उनके चमचे उन्हे मेरे खिलाफ भड़कायेंगे पर वो अगर अपनी आत्मा से बात करें तो पायेंगे कि उन्होने सबकी कहानियाँ पढ़ी ही नही है. और पढ़ी है तो उन्हे बताना था कि यह एक-सा पन किस किस कहानियों में उन्हे मिला.

इनकी ‘नंगातलाई का गॉव’ पढ़ कर खासा प्रभावित हुआ और एक कार्यक्रम में इन्हे सुनने गया. कार्यक्रम हजारी प्रसाद द्विवेदी पर था जो, सुनने में ही भर आता है कि, इनके गुरु थे. हजारी प्रसाद जी के सारे उपन्यास हमने पढ रखे हैं और आज तक यह समझ ही नही पाए कि अपने पूरे जीवन में चालीस से पचास कहानियाँ भी नही लिखने वाले ‘महान’ बुजुर्गों ने हजारी प्रसाद जैसे रचनाकार को किस चालाकी से पूरे परिदृश्य से ही गायब कर दिया है? उम्मीद थी कि त्रिपाठी जी इस चालाकी के खिलाफ बोलेंगे पर वो पूरी गोष्ठी में यही बोलते रह गये कि हजारी प्रसाद जी की धर्मपत्नी द्वारा बनाये गये दाल,भात और चोखे का स्वाद कितना असाधरण होता था. उनके हाथ का अचार कितना अच्छा होता था. तालियाँ, जैसा कि उनके बजने की रवायत है, बजती रहीं.

आप स्वाद में इस कदर उलझे पड़े है सर जी कि आपको पता ही नही - हम उन कहानीकारों की श्रेणी से नही आते जो टारगेट बना कर एक कहानी स्त्री विमर्श पर, अगली कहानी दलित विमर्श पर और फिर अगली कहानी साम्प्रयादियकता पर(जिसमें यह निश्चित है कि वो प्रेम कहानी ही होगी और हिन्दू बहुलता का ख्याल रखते हुए पुरुष पात्र हिन्दू होगा तथा स्त्री माईनॉरिटी ग्रुप से होगी, इसे गदर सिंड्रोम कहते हैं, जिसे पढ़ते हुए हिन्दू और ‘सॉफ्ट हिन्दू’ आँख मूँद मूँद कर यह सोचते और सोच कर खुश हो लेते है कि गनीमत है जो मुसलमान नायक नही है वरना वो हिन्दू की लड़की के साथ यह सब करता...).सर जी, स्त्री हमारी कहानियों में प्रमुखतम पात्र के तौर पर आती है. वह स्त्री अपने सारे निर्णय खुद लेती है. ऐसे ही दलित भी आयेंगे और जब आयेंगे तो सवर्ण कुकर्मियों के लिये विलाप से अलग दूसरा कोई चारा नही बचेगा. आपको हमारे लेखन पर पछताने की जरूरत नही है जैसा कि श्रद्धेय कथाकार काशीनाथ जी इन दिनों लगातार पछता रहे हैं.

डॉक्टर काशीनाथ जी की हालत उस अमीर इंसान की हो गई है जिसकी दी हुई खराब कमीज को उसके गरीब मित्र ने साफ सुथरा कर, इस्त्री लगा पहन लिया था. अब वो दोनो जहाँ भी जायें, लोग गरीब मित्र के कमीज की तारीफ कर दें तब फिर बेचारा अमीर मित्र तुरंत कहता- ये कमीज मैने ही इसे दी है. इनके पछतावे से हम डरे हुए हैं. अगर किसी बुजुर्ग लेखक को अपने लिखे का इस कदर पश्चाताप हो तो हमारा दु:ख जायज है. जिसने पूरा जीवन, कम से कम कहा तो यही जायेगा, रचते हुए गुजार दिया उसे एकाएक अपने लिखे पर शक होने लगे तो उस बेचारे लेखक के लिये कितनी दु:ख की बात है. हम नही चाहते कि आप अपनी दूसरी रचनायें भी दुबारा पढ़े ताकि आपको यही समस्या अपनी कहनियों के बारे में घेर ले. रही बात आपके वागर्थ वाले लेख की तो कहाँ फंसे पड़े हैं महाराज? किसी के लिखने से कोई कहानीकार स्थापित होता है भला! आपके साथ ही ज्ञानरंजन जी भी लिखने वाले थे,पर उन्होने नही लिखा तो क्या हमने लिखना बन्द कर दिया? पर आपको यह जरूर बताना चाहिये कि आप कौन सी विज्ञापन विधि से अपरिचित थे जिससे हम परिचित हो गये हैं? ये कोई अन्धा भी जानता है कि जिस दौर में आप लोग साहित्य साहित्य खेल रहे थे वह हिन्दी साहित्य का स्वर्णिम दौर था और जिसे आप सब ने यों ही बीत जाने दिया. आपके समय पत्रिकाओं की लाख प्रतियाँ छपती थी, दो घंटे की मास्टरी के बाद लिखने के नाम भर पर उस समय के लोगों को कितना अफराद समय मिलता था?

हम पर बाजार का कोई दबाव नहीं है गुरुवर. जब भी यह खबर मिलती है कि हम युवा रचनाकारों की किताबों के तीसरे या चौथे संस्करण आ रहे हैं तो मुझे हैरानी इस बात की होती है कि क्या इतने पाठक हैं? पाठक के कम होते जाने का जो सिलसिला, जाने कैसे, हिन्दी कहानी पर आप लोगों के शासन काल से शुरु हुआ वो बदस्तूर जारी है और इस सच से हम खूब वाकिफ हैं. बाजार का असर तो तब होता जब पाठक बढ़ते. उल्टे इससे हमें यह सबक मिला कि जो भी लिखो ईमानदारी से लिखो क्योंकि जो पाठक ऐसे समय में भी साहित्य के साथ है वो बहुत जेनुईन है, वो समझदार है, उसके कंसर्ंस हवाई नही है. हमारा पाठक दिन में तारे देखना पसन्द नही करता, उसे ठोस सच्चाईयॉ जानने का जुनून है. रही अपनी बात तो अगर हम युवा आपको अपना कलेजा चीर के भी दिखा दें तब भी आपको यकीन नही होगा कि सिर्फ और सिर्फ अच्छी रचना ही हम सबका मकसद है. आपको भरोसा वैसे ही नही होगा जैसे किसी धार्मिक को इसका भरोसा नही होता कि ईश्वर नही है, जैसे किसी अफसर को इस बात का भरोसा नही होता कि घूस लेना अपराध है. मुझे उदय प्रकाश की डिबिया याद आ रही है.

हमारी इस चिंता से जाहिर होता है कि हम मनुष्य विरोधी नही है जैसा कि ज्ञानरंजन जी ने सत्य उद्घाटित करने के अन्दाज में बताया है.. पर ये हमारे इतने प्रिय कथाकार हैं कि एक बार तो ‘बेनेफिट ऑफ डॉऊट’ इन्हे देना ही होगा और इनकी स्थापना माननी होगी कि यह सचमुच की नई और युवा पीढ़ी मनुष्य विरोधी है.. पर इसे मानते ही दु:खद समस्या खड़ी होती है.क्योंकि यह विश्वास करने का कोई कारण नही है कि ज्ञान जी को यह ‘रिवेलेशन’ अचानक से हुआ होगा, पहल जैसी अनोखी पत्रिका के सम्पादक की वैज्ञानिकता पर जायें तो इन्हे ये बात हमारी रचनाओं को इधर उधर पढ़ कर पहले ही मालूम पड़ गई होगी कि यह पीढ़ी हिंसक और मनुष्य विरोधी है. फिर भी आपने हमारी कहानियाँ अपनी पत्रिका पहल में प्रकाशित किया. क्यों? क्यों फिर आपने पहल जैसी नामधारी और प्रतिबद्ध पत्रिका के पाठकों, जिसके पाठक, जिनमें मैं भी एक हूँ, पहल को एक किताब का दर्जा देते हुए उसमें छपी एक एक रचना पढ़ जाते हैं, के साथ ऐसा खिलवाड़ किया?

सर, कहीं ऐसा तो नही कि आपने कहानी प्रकाशित करने से पहले ही उसके मनुष्यविरोधी और क्रूर होने को जान लिया हो और इस उम्मीद में कहानियाँ प्रकाशित किये हो कि लोग हम युवाओं पर हसेंगे, हमारे लिखे का मजाक उड़ायेंगे. पर हो इसका उल्टा गया. लोगों ने उन कहानी में मनुष्यता के सार्थक चिन्ह ढूंढ लिये होंगे. तब हार पीछ कर आपने इस सत्योघाटन का जिम्मा लिया हो. जो भी हो, हम बहुत दु:खी हैं यह जानकर कि पहल जैसी सचमुच की अच्छी पत्रिका में छपने की हमारी क्षमता नही थी. फिर भी आपने...? आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप आगे कि किसी बात चीत को ऐसे तोड़ मरोड़ देंगे जिससे आप, हमें मनुष्यविरोधी घोषित करने के अपने तुर्की फैसले, पर कुछ भी कहने से बचे रहे. आप हमारा यकीन करिये हम आपसे पूछेंगे ही नही कि आखिर हम सब मनुष्य विरोधी कैसे हो गये? हमें खूब पता है कि हम ऐसे हर्गिज नहीं है.

संजीव जी से खौफ खाते हुए, डरते हुए अगर यह मान लिया जाये कि हम विवादस्पद और खराब लोग हैं तो उन्होने ही इस राज का भी सनसनीखेज खुलासा किया है कि ऐसे भी कहानीकार हैं जिन्हें संजीव जी तो जानते हैं पर वो कम चर्चित है या उन सचमुच के अच्छे कहानीकारों का रास्ता हम जैसे विवादास्पद और विज्ञापनबाज (काशीनाथ जी के पछताये शब्दों में) कहानीकारों ने छेंक रखा है. तो फिर आपने ऐसा ‘अपराध’ क्यों कर दिया संजीव जी? आपको तहलका ने मंच दिया. यहाँ से गूंजी आवाज बहुत ज्यादा फैलेगी यह आपको पता तो था फिर आपने भी उन अच्छे युवा रचनाकरों को गुमनाम रहने दिया. आपको यहाँ, तहलका के इस बेहतरीन मंच पर, उनके नामों की घोषणा करनी चाहिये थी ताकि वो आगे आ सके. पर आपने नही किया और बड़ी चालाकी से आपने उन बेहतरीन नगीनो को गुमनामी के अन्धेरे मे डूबे रहने के लिये छोड़ दिया? यह जान बूझ कर किया गया और ज्यादा सघन ‘अपराध’ है संजीव जी जिसके लिये थीसिस फेंकने की भी जरूरत नही पड़ी.कितने चालाक हैं आप! कहीं रवीन्द्र कालिया जी ने आप सबों की गहरे कहीं डूबती नब्ज पर तो हाथ नही रख दिया यह कहते हुए कि- नई पीढ़ी के आने के बाद पुरानी पीढ़ी असुरक्षित हो गई है.

हम युवा लोग तो आप सबकी कहानियों/कविताओं/ उपन्यासों को पढ़ते, दुहराते, तिहराते बड़े हुये हैं. आप सब लोग, कम से कम मेरे लिये, द्रोणाचार्य सरीखे हैं. पर आपकी चाहत ययाति बन जाने की दीख रही है. आपकी बातों से तिरस्कार और बे-ईमानी की बू आ रही है. मेरी प्यारी भोजपुरी में जिसे चोरहथई कहते हैं. इसलिये ही मैं कहना चाहता हूँ कि मोल जीवन और गोल भाषा के आदी हो चुके आप लोगों ने जिस गोल-मोल अन्दाज में सकारात्मक प्रचुर अपवाद का जिक्र किया है मैं उसमे से एक नही होना चाहता.खासकर जैसे अकाट्य सत्यों के पक्ष में आप खड़े हुए हैं उसे जान कर तो हर्गिज नहीं. मुझे यह भी यकीन है कि आप अपने पैने शाब्दिक नाखून लेकर मेरे पीछे पड़ जायेंगे. आपके स्टील, लोहे, चाँदी और नकली सोने के चमचे मुझे उचित-अनुचित तरीकों से नुकसान पहुँचाने मे भिड़ जायेंगे. मेरी भाषा/कहानी में तम्बाकू की अमर गन्ध की तलाश कर उसे खारिज करने में लग जायेंगे पर इन सब के बावजूद अगर आप सब ही हिन्दी के अवधराज हुए तो विभीषण के प्रति सच्ची सहानुभूति रखते हुए भी मैं अपने लिये कुम्भकर्ण का किरदार चुनता हूँ.