Sunday, February 7, 2010

निकोलस गियेन की कविता- पहेलियाँ

दाँतों में, सुबह,
और रात चमड़ी में।
कौन है, कौन नहीं?

......... नीग्रो

उसके एक सुन्दर स्त्री न होने पर भी,
वही करोगे जो उसका हुक्म होगा।
कौन है, कौन नहीं?

......... भूख

गुलामों का गुलाम,
और मालिक के संग जुल्मी।
कौन है, कौन नहीं?

......... गन्ना

छुपा लो उसे एक हाथ से
ताकि दूसरा कभी जाने भी नहीं।
कौन है, कौन नहीं?

......... भीख

एक इंसान जो रो़ रहा है
एक हंसी के साथ जो उसने सीखी थी।
कौन है, कौन नहीं?

......... मैं


कवि: निकोलस गियेन (परिचय और कवितायें यहाँ)
अनुवाद: श्रीकांत

Thursday, February 4, 2010

नींद में खड़ी रहे रेलगाड़ी

जब शहर में तुम नहीं होती
तो रहें वे सारी चीजें
जिन्हें छोड़कर तुम चली गई
स्टेशन पर खड़ी थी जो रेलगाड़ी
कुछ दिनों तक नींद में पड़ी रहे
घड़ी में सात बजें
और समय थककर बैठ जाय
खो जायें चाभियाँ बाज़ार के दुकानों की
मेरी जेब में बचे रहें
छाछठ रूपये नब्बे पैसे
चप्पलें बीमार होकर पड़ी रहें
दरवाजे के बाहर

तुम्हारे आने तक
बचाना चाहता हूं इन्हें ऐसा
कि तुम कहीं गयी ही नहीं
शहर से.
......चन्द्रिका (कवि परिचय यहाँ)

Wednesday, February 3, 2010

ऐसी नींद किसे नही चाहिये!

गोएथे की आत्मकथा “ट्रुथ ऐंड फिक्शन रेलटिंग तो माई लाईफ” पढ़ने के दौरान कुछेक गलत/उलझाऊ अनुवादों से पाला पड़ा जिसका मुझे फायदा ही हुआ। गलत अनुवाद पढ़ते हुए हम हमेशा कई सारी कल्पनाओं के लिये आजाद होते हैं, जो मुझे काफी कुछ सिखाती है। इसी तर्ज पर इस किताब से मैने सीखा कि जब हम भविष्य काल में पहुंच कर पीछे यानी अतीत की ओर देखते हैं तो बाकी सब तो वही रहता है पर एक सूना डर जो उस वर्तमान में हमे सता रहा था, अब वह नदारद रहता है।

उदाहरण के लिये यह तस्वीर। चैन की नींद सो रही श्रेया(नाम इसकी दादी ने बताया)। ऐसी नींद सबको नसीब हो। पर अभी तो शिल्प की बात। यह तस्वीर अपनी अम्बाला से दिल्ली यात्रा के दौरान मैने ली है। जब मैं इसे ले रहे हूँ तो यह बच्ची गहरी नीन्द में सो रही है और मेरे मन में दो समान लालच है। पहला कि इस लड़की की नींद ना खुले और दूसरा, इसकी तस्वीर भी मैं ले लूँ। सूचनार्थ, वह कन्धा मेरा ही है जिससे लग के श्रेया सो रही है। अब मुझे सारा काम दाहिने हाथ से करना है।
मैने कैमरा ऑन किया और जैसे ही क्लिक किया बच्ची कुनमुनाई है। इसका मतलब फ्लैश इसके चेहरे पर तेज आ रहा है। मुझसे जैसे कोई अपराध हो गया हो, मैं एक तस्वीर के लिये किसी की नींद नही खराब कर सकता। अब मैं फ्लैश ऑफ करता हूँ और बेहद शाइस्तगी से सो रही श्रेया के चार पांच फोटो उतारे। फोटो उतारने के बाद मैं पूरे रास्ते सोचता रहा कि अगर मैं पहले उतर गया तो कही इस लड़की की नींद में खलल ना पड़ जाये। पर मेरी मुश्किल आसान हो गई है जो मुरथल आने से पहले ही मैडम नींद से जग जाती हैं और अपनी दादी से पानी मांग रही हैं।
दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली श्रेया तुम्हे धन्यवाद। कारण कि गोयथे की आत्मकथा पढ़ जाता और ध्यान मे आये इस शिल्प को भूल भी जाता पर तुम्हारी नींद ने इस शिल्प को साधने का मौका दिया।

Tuesday, February 2, 2010

निकोलस गियेन की कविता : एक सर्द सुबह

सोचता हूं उस सर्द सुबह को कि जिसमें गया था मिलने तुम्हें,
वहां जहां हवाना जाना चाहता है खेतों की खोज में,
वहां तुम्हारे रौशन उपांत में।
मैं अपनी रम की बोतल
और अपनी जर्मन कविताओं की किताब के साथ,
जो आखिरकार तुम्हें दे आया था तोहफे में।
(या फिर रख लिया था तुमने ही उसे?)

माफ करो, लेकिन उस दिन
मुझे दिखी थी तुम एक छोटी अकेली बच्ची,
या शायद एक भीगी नन्ही गौरैया।
पूछना चाहा था तुमसे:
और तुम्हारा घोसला? और तुम्हारी मां, पिता?
लेकिन नहीं पूछ पाया था।
तुम्हारे कुर्ते के वितल से,
जैसे गिरीं थीं दो गिन्नियां एक कुंड में,
तुम्हारी छातियों ने बहरा कर दिया था मुझे अपने शोर से।

.........निकोलस गियेन। (कवि परिचय यहाँ)
..........अनुवाद: श्रीकांत।

Monday, February 1, 2010

उन्नीसवें पुस्तक मेले के विशिष्ट मेहमान



हुदा आलम। सात महीने की कोमल उम्र में विश्व पुस्तक मेले में शामिल।